लेखक परिचय

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, दैनिक समाचार पत्र दैनिक मत के प्रधान संपादक, कविता के क्षेत्र में प्रयोगधर्मी लेखन व नियमित स्तंभ लेखन.

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आमिर,राजकुमार हिरानी की पिके !

हिंदुत्व से कशीदेकारी भरी कमीनगी कर ली,आमिर और हिरानी ने,पीके के माध्यम से!

सेंसर बोर्ड देश-काल–परिस्थिति का जानकार नहीं बल्कि सुदूर मरुस्थली-खाड़ी या यूरोपीय पृष्ठभूमि का दलाल हैं?!

यदि कोई अनपढ़, अशिक्षित, किसी कट्टर मदरसे से निकला हुआ या तालिबानी शिविरों में रहा हुआ कोई मुस्लिम युवा किसी अन्य के धर्म पर इस प्रकार के आक्षेप लगाता तो इस दोष को कदम दर कदम बनाई गई जहरीली मानसिकता का दोष कहा जा सकता था. किन्तु आमिर खान जैसा जानकार व्यक्ति जिसे दुर्भाग्य से कलाकार कहा जा रहा हो, वह ऐसा करे तो निश्चित ही यह कलाकारी नहीं भांडगिरी ही कहा जाएगा. परफैक्शनिस्ट कहे जानें वाले आमिर खान नें अपनी फिल्म पीके में पुरे पूर्णतावादी होकर हिंदुत्व की तह दर तह तक जाकर बखिया उधेड़ी है. ये व्यक्ति संवेदनशीलता का इतना गहरा जानकार है कि मक्कारी की हदें पार करके यह असंवेदनशील हुआ और हिंदुत्व और उसके अनुयाइयों को ह्रदय की गहराइयों तक चोट करनें वाले दृश्य फिल्माए. आमिर हिरानी इतनें कुशाग्र हैं कि वे मोदी सरकार के रहते भी सेंसर से अपनी यह कमीनगी भरी फिल्म को कशीदेकारी के नाम पर पास करा कर एक बड़े धंधेबाज बन गए. अपनी कुख्यात फिल्म पीके में आमिर खान और राजकुमार हिरानी हिंदुत्व और इस राष्ट्र की संस्कृति के प्रति एक जानकार और मंजे हुए अपराधी की तरह पेश आयें हैं, फिल्म के हर दृश्य में हर अंश में ये मक्कार और वितंडावादी जोड़ी दृश्यों के कंधों पर रखकर हिंदुत्व को जहर बुझे तीर मारती हैं, भाले मारती है, कुल्हाड़ी मारती हैं किन्तु ये मंजे अपराधी, धंधेबाज और विधर्मी, धर्म अपराध क़ानून के इतनें गहरे जानकार हैं कि उनकें पास रखी हुई लायसेंस्ड रिवाल्वर से गोली मारकर अपराधी नहीं बनते हैं! यहाँ आकर आमिर और हिरानी का दोष सामाजिक दृष्टि से शतगुणित हो जाता है कि राजकुमार हिरानी ने धंधेबाजी की दृष्टि से और आमिर खान नें हिंदुत्व को चोटिल करनें की स्पष्ट दृष्टि से यह साझा प्रयास अनजानें में नहीं बल्कि साशय, संज्ञावान होकर और पुर्णतः शैतानी-बदमाशी की मानसिकता से किया. अब चाहे हिरानी का धंधा हो या आमिर खान की मक्कारी दोनों ही एक दुसरे के कांधों पर चढ़कर मुखरता से जहर फैला रही है. इस देश में किसी अबोध बालक से भी पूछ लीजिये कि क्या आमिर खान को यह अहसास नहीं रहा होगा कि इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद भारत का सामाजिक ताना बाना आहत और चोटिल होगा तो उसका उत्तर हाँ में ही आएगा. जब अबोध बच्चे की मानसिकता के स्तर के तथ्यों को ये भांड फिल्मकार और उनकें ऊपर बैठा सेंसर बोर्ड अनदेखा कर रहा हो तो स्पष्ट लगता है कि सेंसर बोर्ड में बैठे लोग देश-काल –परिस्थिति के जानकार नहीं हैं बल्कि वस्तुतः वे तो कहीं सुदूर मरुस्थल – खाड़ी या यूरोपीय पृष्ठभूमि के धंधेबाज दलाल हैं. सेंसर बोर्ड में बाबर और माउंट बैटन के जींस अब भी सक्रिय हैं!!

फिल्म के दृश्यों में बेहद कलाकारी से इस्लाम के विषय में और उसमें गहरे तक फ़ैली गंडे, तावीज, चादर चढानें, खतना, मांसाहार, के अंधविश्वासों की चर्चा नहीं की गई है. इस्लाम धर्म में फैले अंधविश्वासों को तो छुनें की भी हिम्मत इस दुराग्रही, पूर्वाग्रही और एकपक्षीय आमिर खान ने नहीं की है. इस्लाम के मक्का मदीनें पर कोई आक्षेप नहीं है. मोहम्मद पैगम्बर के एक बाल के प्रति आस्था और उसकी सुरक्षा व्यवस्था पर हो रहे बड़े सरकारी खर्च पर टिपण्णी करनें का साहस आमिर खान में नहीं आ पाया. आमिर खान और हिरानी में यह साहस भी नहीं आया कि वे देश के कुछेक हिस्सों के मदरसों में दिए जा रहे हथियारों और आतंकवाद के प्रशिक्षण का विषय उठायें. मुस्लिम समाज में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढानें में भी यह फिल्म कोई रचनात्मक विषय या बहस छेड़ती नहीं आती. लव जिहाद की हजारों लाखों की संख्या में शिकार हो गई भारतीय लड़कियों के प्रति संवेदना का एक शब्द इस फिल्म में नहीं है किन्तु लव जिहाद को संबल, न्यायसंगत, सहारा देनें वाला और नवयुवतियों को भरमाने, उलझानें, बहलानें, फुस्लानें और मानसिक तंत्र को संवेदना से छेड़ने वाला एक कथानक बड़ी ही लुच्चाई से बनाया गया है. कहानी के जानकार बड़ी सहजता से समझ सकतें हैं कि मुस्लिम युवक और हिन्दू युवती वाली यह कथा इस फिल्म का एक सहज अंश नहीं बल्कि एक अलग से रौपा हुआ जहरीला पौधा है. फिल्म में पैबंद के रूप में बदमाशी पूर्वक लगाए इस कथा अंश के माध्यम से बड़ा ही बारीक, महीन और कशीदेकारी भरा इंजेक्शन (Slow Poison) हिन्दू युवतियों को दिया गया है. मुझे बड़ा खेद है कि सभ्य भाषा में गाली देनें के कुछ अच्छे और ऐसे शब्द इस आलेख को लिखते समय मुझे नहीं सूझ रहें हैं, जो इस फिल्म को देखनें के बाद मुझे हो रही सतत वेदना, व्यथा और संत्रास को प्रकट कर सकें.

इस फिल्म को लेकर हम केवल आमिर हिरानी को कोसें तो भी यह विषय को अधूरा देखनें जैसा ही होगा. सेंसर बोर्ड को ये सब क्यों नहीं दिखा? क्या सेंसर बोर्ड भारत के सामाजिक तानें बानें का जानकार नहीं है या सब पैसे का खेल चल रहा है? सेंसर बोर्ड को अकेलें भी क्यों कोसें? कांग्रेस शासन में यदि यह फिल्म प्रकाशित होती तो लोग कहते कि कांग्रेस हिंदुत्व के प्रति संवेदनशील नहीं है इसलिए इस प्रकार का वातावरण बन जाता है कि हिन्दू विरोधी रूख की फिल्में सहजता से सेंसर पास हो जाती है! किन्तु अब तो केंद्र से लेकर देश के आधे राज्यों में हिंदुत्व, भारतीय संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के नाम छाती कूटनें वाली भाजपा सरकार शासन कर रही है!! भाजपा के सुचना प्रसारण मंत्रालय, संस्कृति मंत्री, मानब संसाधन मंत्री ये सब भी तो उत्तरदायी हैं कि यह फिल्म बननें के बाद निष्कंटक होकर अपनें विकृत और विद्रूप रूप में प्रदर्शित हो गई.

फिल्म के एक दृश्य को तो कानूनी दृष्टि से भी घेरा जा सकता है जिसमें भगवान शिव को भागते हुए और बाथरूम में बंद घबराई हालत में बच्चों के नाम पर आमिर खान से अनुनय विनय करते बताया गया है और आमिर खान निर्लज्ज जवाब देतें हैं कि मुझे पता है आपके कार्तिकेय और गणेश नामक बच्चें हैं जो अब बड़े हो गएँ हैं. कम से कम भाजपा शासित सेंसर बोर्ड को तो यह समझ में आना ही चाहिए था कि एक आस्थावान हिन्दू के लिए इस फिल्म को देखना और इतनी ईश निंदा सुनना एक पाप के ही बराबर है. और भी कई मक्कारी भरे दृश्य फिल्माएँ हैं इस आमिर हिरानी के गिरोह नें जिनकी चर्चा इस देश के सम्बंधित मंत्रालयों में तुरंत और तत्काल होनी चाहिए. यह फिल्म सेंसर बोर्ड से पास होकर छविगृहों तक कैसे निष्कंटक-बाधारहित पहुँच गई इस बात की जांच इस भाजपा सरकार के असरकारी लोगों को करनी चाहिए. केंद्र की भाजपा सरकार के असरकारी लोगों से यह भी आशा है कि वे इस फिल्म के माध्यम से उपजें संकट को राष्ट्रीय संस्कृति के लिए एक अवसर में बदलें एवमं इस फिल्म के अंशों को हटाकर नहीं अपितु सम्पूर्ण फिल्म को बैन करके और भविष्य हेतु चाक चौबंद सेंसर व्यवस्था बनाकर सार्थक पहल करें. बात आमिर के शो सत्यमेव जयते की भी प्रासंगिक है. सत्यमेव जयते में भी आमिर खान एकांगी, एकपक्षीय, दुराग्रही और पूर्वाग्रही रहें हैं. उनका रचना संसार सदा से भारतीय संस्कृति के प्रति दुराग्रही रहा है.

अंत में एक कथन, एक दृष्टांत और एक उद्वेग प्रस्तुत करके पीके फिल्म, आमिर, हिरानी के प्रति इस विधवा विलाप को बंद कर दूं –

एक कथन – बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन नें इस विषय में कहा कि – यदि इस प्रकार की फिल्म पाकिस्तान या बांग्लादेश में बनती तो या तो आमिर हिरानी जेल की कोठरी में हो जाते या बाहर रहते तो मार काट दिए जाते.

एक दृष्टांत – पाकिस्तानी मीडिया समूह जियो टीवी के मालिक, अभिनेत्री वीना मलिक और उनके पति असद बशीर खान को पाक के आतंकवाद-निरोधी अदालत ने ईशनिंदा मामले में 26 साल कैद की सजा सुनाई है. जियो और जंग समूह के मालिक मीर शकील-उर-रहमान पर मई 14 में जियो टीवी पर ईशनिंदा करने वाले कार्यक्रम प्रसारित करनें का आरोप है. इस कार्यक्रम में अभिनेत्री वीना मलिक और उनके पति बशीर के नकली निकाह में धार्मिक गीत बजाया गया था. न्यायाधीश शाहबाज खान ने वीना और बशीर सहित टीवी शो की मेजबान शाइस्ता वाहिदी को भी 26 साल कैद की सजा सुनाई. आतंकवाद-निरोधी अदालत ने आरोपियों पर 13 लाख पाकिस्तानी रुपये का जुर्माना लगाया है और आदेश दिया कि राशि जमा नहीं करने की स्थिति में धन की पूर्ति के लिए उनकी संपत्ति बेच दी जाए. न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा कि चारों आरोपियों ने ईशनिंदा की है. पाक कोर्ट नें दोषियों को गिरफ्तार करने को कहा. फलस्वरूप इस घटना के आरोपी पाकिस्तान से बाहर विदेशों में घोषित भगोड़े होकर भटक रहें हैं.

एक उद्वेग – एक राष्ट्र के रूप में मैं पाकिस्तान जैसा मध्ययुगीन तो कतई नहीं होना चाहता किन्तु ऐसा लुंज पुंज और लकवा ग्रस्त भी नहीं रहना चाहता कि जिसके मन में जैसा आये मेरें सामाजिक तानें बानें और मूल निवासियों की भावनाओं से खेल जाए!!

 

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4 Comments on "फिल्म या मक्कारी?"

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बीनू भटनागर
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बीनू भटनागर
पूरे समय शायद ही किसी फिल्म मे मै हाल मे बैठकर इतना हंसी होउंगी, पर अंत मे जब पीके जा रहा तो आँखे नम कर गया। राजकुमारहिरानी ने कमाल का निर्देशन किया है सब बातें खुल कर की है पर कहीं भी अश्लील नहीं होने दिया है।मूवी मे मनोरंजन तो भरपूर है ही, साथ मे बहुत अच्छे संदेश है – 1.भगवान वो है जिसने हमे बनाया है वो नहीं जिसे हमने बनाया है। 2 धर्म केवल संस्कृति है, कोई जूते पहन कर चर्च, जा सकता है, मंदिर नहीं। कोई घुटनो पर बैठकर नमाज़ पढ़ता है, कोई दण्डवत प्रणाम करता है।… Read more »
आर. सिंह
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यह हुई फिल्म की असली और निस्पक्ष समीक्षा.पर यह उनलोगों को कैसे अच्छा लग सकता है,जो हिन्दुओं को कम से कम चार बच्चे पैदा करने की सलाह दे रहे हैं. पहले मैं कट्टर कम्युनिष्टों को कहा करता था की लाल चश्मा उतार कर देखिये,दुनिया अपने असली ख़ूबसूरत रूप में दिखाई देगी.आज वही सलाह मैं ढोंगियों को देना चाहता हूँ कि यह पूर्वाग्रह छोड़िये तो आप अपने को इंसान और इंसानियत के ज्यादा करीब पाएंगे.

आर. सिंह
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मैं लेखक से केवल एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ.क्या आपने परेश रावल (भाजपा के एम.पी.) की फिल्म ओह माई गॉड देखी है?अगर हाँ,तो उसके बारे में आप क्या कहना चाहते हैं?

suresh chandra maheshwari
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suresh chandra maheshwari

Sahi likha.

suresh maheshwari

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