लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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gandhi‘प्रवक्ता’ के माध्यम से ‘हिंद स्वराज्य’ पर गंभीर-विमर्श की एक सार्थक शुरुआत  हुई. पूरी टीम को बधाई. अनेक विचार पढने के बाद  मेरे  मन भी हलचल हुई. सोचा, कि कुछ तो लिखा जाये. ‘हिंद स्वराज्य’ में गाँधी जी ने यंत्रो को लेकर भी गंभीर चर्चा की है. मै गाँधी जी के दर्शन के सन्दर्भ में समकालीन यांत्रिक -सभ्यता पर बात को केन्द्रित करना चाहता हूँ. हिंद स्वराज्य का प्रति-पाठ हमें नित नए अर्थ-लोक तक ले जाता है। गाँधीजी का यह लघु-कृति एक शताब्दी के बाद भी  विचारों का जो बड़ा शिखर रचती है, वह चमत्कृत करने वाला है। मैं अपने विश्वास के साथ कह सकता हूँ, कि नए भारत के पुनर्निर्माण के लिए जो आधुनिक चिंतन पिछली शताव्दी में शुरू हुए. हिंद स्वराज्य उनका प्रस्थान बिंदु है । बीसवीं सदी में जब भारत गुलामी का दंश झेल रहा था और आजादी के संघर्षरत था, तब गाँधी जी मानों एक नए अवतार की तरह भारत आते हैं और यह बताने-समझाने की कोशिश करते हैं, कि हमारा देश आजाद कैसे हो और  आजा़द भारत का स्वरूप कैसा हो। गाँधीजी केवल स्वतंत्रता नहीं चाहते थे, वरन ऐसा समाज भी चाहते थे जहाँ सभ्यता हो, स्वदेशीपन हो, जहाँ अपनी भाषा-बोली की प्रतिष्ठा हो, जहाँ मनुष्य यंत्रों का गुलाम न बन कर श्रम के सम्मान के लिए प्रतिबद्ध रहे। वर्तमान यांत्रिक सभ्यता और तदजनित पतन को देखते हुए साफ लगता है, कि ‘हिंद’ में गाँधी का ‘स्वराज्य’ पराजित होता जा रहा है और आधुनिकता की अंधी दौड़ में पश्चिम से प्रभावित नया इंडिया भारत या हिंदुस्तान को पीछे छोड़ा चला जा रहा है।
हिंद स्वराज्य की अधिकांश बातें समकालीन निकष पर सौ टंच खरी उतर  रही हैं। आज भी अगर हम गाँधीजी के ‘हिंद स्वराज्य’ की बातों पर चल सकें तो पुनर्निमाण की  दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हो सकती है।  हिंद स्वराज्य के बीस अध्याय मुझे ‘आधनिक विचारों की गीता’ के  बीस अध्याय सरीखे लगते हैं। इन्हें आत्मसात करके ही भारत भारत बन सकता है। लेकिन अब जैसे अधिकांश जीवन-मूल्य, नैतिकता, परम्पराएँ बहिष्कृत-सी होती जा रही हैं। ठीक उसी तरह गाँधी को भी अप्रासंगिक करार देने की साजिशें हो रही है। अपने काल से कापी आगे की प्रगतिशील सोच रखने वाले गाँधी के बगैर बारत सच्चा विकास नहीं कर सकता। गाँधी के बगैर बढऩा आत्मघाती कदम हो सकता है।
‘हिंद स्वराज्य’ के बारे में गाँधी पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं, कि ‘यह पुस्तक द्वेष धर्म की जगह प्रेम सिखाती है, हिंसा की जगह आत्म बलिदान को रखती है। पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है।” आज गाँधी की इन्ही बातों को अमल में लाने की जरूरत है। फिर चाहे वह यंत्रोन्मुखी होने का मसला हो, राष्ट्रभाषा का सवाल हो, गो-हत्या का मामला हो। जब तक समाज आत्मबलिदान के लिए प्रवृत्त नहीं होगा, ऐसे तमाम मुद्दों पर सफलता नहीं मिल सकती जो हमारी अस्मिता के पर्याय हैं। यांत्रिक सभ्यता से ग्रस्त समाज निर्मम-मन का स्वामी हो जाता है। वह करुणाविहीन हो कर स्वार्थसिद्धि के लिए हिंसा का, छल का, लूट का, बलात्कार का यानी कि हर अनैतिक कार्यों का सहारा लेता है जो कि किसी भी शिष्ट समाज के विरुद्ध नजर आते हैं। सौ साल पहले गाँधी जी जिन तमाम मुद्दों पर हिंद स्वराज्य में गंभीरतापूर्वक विमर्श किया है, वे तमाम मुद्दे और गहनतम होते गए हैं। इन पर सोचने-विचारने और बेहतर समाज कैसे बन सके, इस पर ही चिंतन की जरूरत है।
आजकल जिस यांत्रिक सभ्यता का (आज के ही जुमले में कहूं तो) एक तरह से जो बूम-सा नजर  आ रहा है, और जिसके कारण नैतिकता हाशिये पर दम तोड़ रही है, उसकी जालिम पदचाप गाँधी ने सौ साल पहले ही सुन ली थी। इसीलिए तो उन्होंने मशीनों पर आश्रित होने की बढ़ती ललक पर जो तल्ख टिप्पणियाँ की हैं, वे आज सार्थक हो रही हैं। कपड़ा मिलों के बढ़ते दुष्प्रभाव आज हमारे सामने हैं। खादी जो कभी वस्त्र नहीं विचार था, अंगरेजों से लडऩे का कारगर हथियार था, आज कहाँ हैं? सरकारें तक खादी की उपेक्षा कर रही हैं। गाँधी जी ने उस वक्त भारतीयों की मानसिकता समझ ली थी इसीलिए उन्होंने कहा था, कि ”मिल मालिक यकायक मिलें छोड़ दें, यह मुमकिन नहीं है लेकिन हम उनसे ऐसी विनती कर सकते हैं कि वे अपने इस साहस को बढ़ाएँ नहीं। अगर वे देश का भला चाहें तो खुद अपना काम धीरे-धीरे कम कर सकते हैं। वे खुद पुराने, प्रौढ़ पवित्र चरखे देश के हजारों घरों में दाखिल कर सकते हैं और लोगों का बुना कपड़ा लेकर उसे बेच सकते हैं।”..

प्रस्तुत है गिरीश पंकज जी द्वारा लिखा  ‘हिंद स्वराज्य’ विषय पर  लेख की पहली किस्त ,  पुरा  लेख तीन किश्तों में रहेगा, जैसा कि ज्ञात रहे प्रवक्ता ने हिन्द स्वराज विषय पर व्यापक चर्चा शुरु किया है। संपादक को अपेक्षा है कि पाठक इस चर्चा में शामिल होकर इस नया आयाम देंगे…

आज मिलें तो स्वदेसी हैं, लेकिन हमारी मानसिकता विदेशी हो गई है। जो खादी घर-घर में तैयार होती थी, जो चरखा  पूजा की थाल से कम नहीं माना जाता घा, जिस चरखे की आवाज मंत्र सरीखी प्रतीत होती थी, वह चरखा कहाँ है? खादी अब खद्दर बन कर बुजुर्गों की तरह घर से निकाल बाहर कर दी गई है। गाँधी के देश में खादी की इतनी दुर्गति की कल्पना खुद गाँधी जी ने उस वक्त नहीं की होगी। इसका एक मुख्य  कारण है यांत्रिकता के प्रति हमारी गहरी अनुरक्ति। मिलों के बने चिकने कपड़ें के बरअक्स खादी की हालत ऐसी हो गई है, जैसे किसी अर्धवसना आधुनिका के सामने सिर पर पल्लू लेने वाली ठेठ भारतीयता की प्रतीक कोई संस्कारित नारी। ऐसी नारियों को अब पूछता ही कौन है? अब नग्नता ही प्रगतिशीलता है। ऐसी मानसिकता के कारण चरखे से उपजी खादी-गंगा मैली हो कर लुप्त होती जा रही है। खादी की दुर्गति यांत्रिक सभ्यता का ही दुष्परिणाम है। अगर गाँवों को खुशहाल रखना है तो हमें यंत्रजनित उत्पादों की जगह कुटीर उद्योगोंएवं हस्तशिल्पों को बढ़वा देना होगा। गाँव वैसे भी तबाह हो रहे हैं। डायनासौर बनते जा रहे शहर गाँवों को निगलते जा रहे हैं। ऐसे संक्रमण-काल में गाँधी जी का स्वदेशी-चिंतन ही भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तार-तार होने से बचा सकता है।
गाँधीजी अगर यांत्रिक सभ्यता के विरुद्ध थे तो इसका मतलब यह नहीं कि वे विकास विरोधी थे। दरअसल वे विकास को ग्रामीण अर्थशास्त्र से जोड़कर देखते थे। हिंद स्वराज्य को बहुत से तताकथित विचारक अब तक ठीक से समझ ही नहीं सके हैं। या तो उन्होंने हिंद स्वराज्य को सरसरी तौर पर ही पढ़ा है, अथवा वे जानबूझ कर गाँधी के विचारों को नकार रहे हैं। यह संतोष की बात है कि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से लेकर नोबेल पुरस्कार विजेती भारतीय अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन जैसे अनके लोग हैं, जो गाँधी के विचारों का आदर करते हैं। अमर्त्य सेन ने ‘हिंद स्वराज्य’ की तमाम बातों से अपनी सहमति जताई है।
यंत्रों के बारे गाँधी जी के विचारों को पढऩे के बाद जब रामचंद्रन ने उनसे पूछा था कि क्या आप तमाम यंत्रों के खिलाफ हैं, तो गाँधी जी ने मुस्कराते हुए कहा था, कि ”वैसा मैं कैसे हो सकता हूँ जब मैं जानता हूँ कि यह शरीर भी एक बहुत नाजुक यंत्र ही है। खुद चरखा एक यंत्र है, छोटी दाँत कुरेदनी भी यंत्र है। गाँधी जी यहाँ बिल्कुल साफ कर दिया कि मेरा विरोध यंत्रों से नहीं है बल्कि यंत्रों के पीछे जो पागलपन चल रहा है, उसके लिए हैं। आज तो जिन्हें मेहनत बचाने वाले यंत्र कहते हैं, उनके पीछे लोग पागल हो गए हैं। उनसे मेहनत जरूर बचती है लेकिन लाखों लोग बेकार हो कर भूखों मरते हुए रास्तों पर भटकते हैं। समय और श्रम की बचत तो मैं भी चाहता हूँ  परंतु वह किसी खास वर्ग की नहीं, बल्कि सारी मानव जाति की होनी चाहिए। कुछ गिने-चुने लोगों के पास संपत्ति जमा हो ऐसा नहीं, बल्कि सबके पास जमा हो, ऐसा मैं चाहता हूँ। आज तो करोड़ों की गरदन पर कुछ लोग सवार हो जाने में यंत्र मददगार हो रहे हैं। यंत्रों के उपयोग के पीछे जो प्रेरक कारण है, वह श्रम की बचत नहीं है बरन धन का लोभ है। आज की चालू अर्थव्यवस्था के खिलाफ मैं अपनी ताकत लगा कर युद्ध चला रहा हूँ।” गाँधी जी का यह कथन बताता है कि वे यंत्रों के खिलाफ नहीं थे लेकिन यंत्रों के पीछे छिपे षडयंत्रों के खिलाफ जरूर थे। वे तब समझ चुके थे कि यंत्र चंद लोगों के शोषण के औजार और विलासता के विकास के उपकरण बन चुके हैं। अगर यही रफ्तार रही तो भविष्य में मेहनतकश समाज के भविष्य पर प्रश्नच्न्हि लग जाएगा।
हिन्द स्वराज्य को ध्यान से पढ़े । यंत्रों के उपयोग का पीछे की मानसिकता पर बापू कहते हैं कि ”मैं इतना जोडऩा चाहता हूँ, कि सबसे पहले यंत्रों की खोज और विज्ञान लोभ के साधन नहीं रहने चाहिए। फिर मजदूरों से उनकी ताकत से ज्यादा काम नहीं लिया जाएगा और यंत्र रुकावट बनने की बजाय मददगार हो जाएँगे। मेरा उद्देश्य तमाम यंत्रों का नाश करने का नहीं है बल्कि उनकी हद बाँधने का है।”  गाँधी जी ने अपनी बात को और साफ करते हुए कहा, कि ‘हम जो कुछ भी करें, उसमें मुख्य विचार इंसान के भले का होना चाहिए। ऐसे यंत्र नहीं होने चाहिए जो काम न रहने के कारण आदमी के अंंगों को जड़ और बेकार बना दे। इसीलिए यंत्रों को मुझे परखना होगा। जैसे सिंगर की सीने की मशीन का मैं स्वागत करूँगा। आज की सब खोजों में जो बहुत काम की थोड़ी खोजें हैं, उनमें से यह सीने की मशीन है। इस मशीन की खोज के पीछे मनुष्य की जो करुणा की बावना है, उसके बारे में भी गाँधी जी ने घटना बताई कि सिंगर ने अपनी पत्नी का सीने और बखिया लगाने का उकताने वाला काम देखा। पत्नी के प्रति उसके प्रेम ने गैर जरूरी मेहनत से उसे बचाने के लिए मशीन बनाने की प्रेरणा दी। ऐसी खोज करके उसने न सिर्फ अपनी पत्नी का ही श्रम बचाया, बल्कि जो भी ऐसी मशीन खरीद सकते हैं उन सबको हाथ से सीने के उबाने वाले श्रम से छुड़ाया।”  इस उदाहरण से तो बिल्कुल साफ हो जाता है कि गाँधी मशीनों के कतई खिलाफ नहीं थे। इसलिए गाँधी को यंत्र विरोधी करार देने की भूल नहीं की जानी चाहिए।
हिंद स्वराज्य में गाँधी जी ने सभ्यता के मसले पर भी लिखा है। वे उस सभ्यता के विरोधी थे जो मनुष्य को निर्मम बनाती है। इस इक्कीसवी सदी की हालत क्या है? यांत्रिकता ने हमें पूरी तरह से यंत्रवत ही बना कर रख दिया है। रोबोट होते जा रहे हैं लोग। यंत्रों में संवेदनाएँ नहीं होतीं। यंत्र यंत्र होते हैं। बटन या प्रोग्रामिंग से चलते हैं। यंत्र में तब्दील मनुष्य की संवेदनाएँ क्षरित होती जा रही हैं। यही कारण है कि आज सुदूर गाँवों में बड़े-बड़े कल-कारखाने लगाए जा रहे हैं तो वहाँ के माटी पुत्रों को बेदखल किया जा रहा है। उनको चालाकी के साथ या फिर डंडे -गालियों का भय दिखा  कर भगाया जा रहा है। खून से सनी मिट्टी में यंत्र लगाए जा रहे हैं। धन पिपासुओं के आगे समूची व्यवस्था जैसे घुटने टेकने पर विवश है। विकास की आड़ में आदिवासी या ग्रामीण उजड़ते जा रहे हैं। यही है निर्मम यांत्रिक सभ्यता जिसके विरोध में गाँधी सौ साल पहले खड़े थे, और हिंद स्वराज्य के माध्यम से आज भी खड़े हैं और शायद कल भी खड़े रहेंगे।  सौ साल पहले कहा गया गाँधी का कथन जैसे लगता है कि आजकल के लिए ही कहा गया है, देखे, कि ”धन के पीछे आज जो पागल दौड़ चल रही है, वह रुकनी चाहिए। मजदूरों को सिर्फ अच्छी रोजी मिले, इतना ही बस नहीं है। उनसे हो सके, ऐसा काम उन्हें रोज मिलना चाहिए। ऐसी हालत में यंत्र जितना सरकार को या उसके मालिक को लाभ पहुँचाएगा, उतना ही लाभ उसके चलाने वाले मजदूरों को भी पहुँचाएगा। मेरी कल्पना में यंत्रों के बारे में कुछ अपवाद हैं उनमें यह है। सिंगर  मशीन के पीछे प्रेम था इसमें मानव-सुख का विचार मुख्य था।”
यंत्रों में कोई बुराई नहीं है, यांत्रिकता बुरी है। जड़ में विकास है लेकिन जड़ता में अवरोध है। प्यार अच्छी चीज है, लेकिन मोह गलत है। विश्वास और श्रद्धा का सम्मान होना चाहिए लेकिन अंधविश्वास और अंधश्रद्धा उचित नहीं। यह विवेकहीनता है। गाँधी  मनुष्य का विवेक जागृत करने का काम करते हैं। उनकी दृष्टि व्यापक है। वे सर्वजन हिताय सोचते थे। वंचितों को उन्होंने गले लगाने की कोशिश  की। समाज में एक वातावरण बनाया। दलितों को उन्होंने हरि का जन कहा लेकिन हमारी मानसिकता ने गाँधी के अलंकरण में भी खोट देख लिया। वह अलंकरण ही प्रतिबंधित कर दिया गया। यह कट्टरता है। गाँधी जी ऐसी कट्टरता के विरुद्ध थे। यांत्रिक सभ्यता कट्टरवाद को भी जन्म देती है। गाँधी को न समझ पाने वाला एक वर्ग आज भी नफरत से भरा हुआ है। वैचारिक-अलगाव भारतीय-जीवन के केंद्र-सा बनता जा रहा है। गाँधी को गरियाने वाले आज भी मिल जाते हैं। इनमें अधिकतर वे लोग हैं जिनके जीवन में गाँधी-सा न कोई त्याग है, न कर्म। ये लोग खा-पी कर अघाए हुए तथाकथित सभ्य लोग हैं, जो न तो समाज के बारे में सोचते हैं, न देश के बारे में। वे अपनी-अपनी सीमित अस्मिताओं के लिए लड़ते रहते हैं, बस। अगर हम यांत्रिक सभ्यता के शिकार न होते तो चिंतनशील होते, प्रेम-अहिंसा जैसे मानवीय-गुणधर्मों से लबरेज होते। देश में धार्मिक या जातीय-विद्वेष इतनी तेजी से नहीं फैलता। राष्ट्रभाषा और क्षेत्र को लेकर संकुचित दृष्टि भी इतना विकराल रूप धारण न करती। यांत्रिक सोच की दुखद परिणति ही है कि आज भारत की जगह हर तरफ इंडिया ही इंडिया नजर आने लगा है। हिंद स्वराज्य के स्वराज्य क्या है नामक अध्याय में  गाँधी जी ने व्यंग्य करते हुए कहा है कि ” हमें अंगरेजी  राज्य तो चाहिए, पर अंगरेजों का शासन नहीं चाहिए। आप बाघ का स्वभाव तो चाहते हैं लेकिन बाघ नहीं चाहते। मतलब यह हुआ कि आप हिंदुस्तान को अंगरेज बनाना चाहते हैं और हिंदुस्तान जब अंगरेज बन जाएगा तब वह हिंदुस्तान नहीं कहा जाएगा। यह मेरी कल्पना का स्वराज्य नहीं है।”
 सचमुच गाँधी की कल्पना का स्वराज्य अभी तक नहीं आ पाया है। आज अंगरेज तो नहीं है लेकिन सत्ता में बैठे लोग अंगरेजों के पिताश्री हैं। उनकी मानसिकता अंगरेजी है। वे अंगरेजी  में सोचते हैं, अंगरेजी में लिखते-पढ़ते हैं, बोलते हैं और अँगरेजी में ही खाते-पीते हैं इसलिए उनका चरित्र आज भी अंगरेजियत से भरा है। वे राष्ट्रविरोधी हैं। सामंती है, मगरूर हैं, हिंसक है। प्रतिरोध में उठी आवाजें इन्हें पसंद नहीं, जैसे अंगरेजों को नहीं थीं। बड़ा आश्चर्य है कि फिर भी ये लोग अपने को सभ्य कहते हैं। दिमाग के यंत्रवत कार्य करने के कारण ही करुणा और अहिंसा जैसी बुनियादी चरित्र से शासन से दिनोदिन दूर होता गया। तंत्र ने लोक को लोक नहीं समझा। यह सब गाँधीवाद के विरुद्ध है। अगर यह देश गाँधी जी के हिंद स्वराज्य को समझ कर अपनी नीतियाँ बनाता और उस पर अमल कर लेता तो देश में रामराज्य होता, इतनी सरकारी हिंसा भी नहीं होती।

गिरीश पंकज

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2 Comments on "गाँधी जी और आज की तथाकथित यांत्रिक सभ्यता – भाग-1"

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गिरीश पंकज
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अजित गुप्त ने बहुत सही बात कही है. नहरू के कारण हिंदी देश की राष्ट्र भाषा न बन सकी. अगर ५ अगस्त को उन्होंने अपना भाषण हिंदी में दे दिया होता तो आज हिंदी को इतना संघर्ष न करना पड़ता. यांत्रिक सभ्यता में उनका बड़ा योगदान है.
मै अपने लेख में इस बात को ज़रूर शामिल करूंगा.

ajit gupta
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गाँधीजी यांत्रिकता के विरोध में थे और ग्रामीण उत्‍थान के पक्षधर। लेकिन एक बात समझ नहीं आती कि उन्‍होंने भारत के लिए नेहरू का क्‍यों चयन किया। नेहरू साक्षात यांत्रिकता के पक्षधर थे। उन्‍होंने ही भारत को इण्डिया बनाने की पहल की। यदि भारत का प्रारम्‍भ ही नेहरू से नहीं हुआ होता तो आज भारत का अलग ही स्‍वरूप होता।

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