लेखक परिचय

इसरार अहमद

इसरार अहमद

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

Posted On by &filed under हिंद स्‍वराज.


Gandhi1शायद ही कोई ऐसा भारतीय होगा जो गाँधी जैसे महान व्यक्तित्व वाले महापुरुष को नहीं जानता और तस्वीर को पहचानता न होगा. यह भारत और भारत-वासीयो का सौ- भाग्य था जो उनके जैसा सर्व गुण संपन महापुरुष मिला जिसने भारत की तस्वीर और इतिहास बदल दिया. उनके और उनके दुवारा बनाई हुए एक संघठन (जिसमे जवाहर लाल नेहरु, लाला लाजपत राय, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, भीम राव आंबेडकर आदि) ने एक जुट होकर, कदम से कदम मिलकर संघर्ष किया और उनके सराहनीय कार्यो की वजह से हम भारत वासियों को एक लम्बे संघर्ष के बाद आज़ादी मिली …! उनके सराहनीय कार्यो की वजह से हम भारत वासी उनको महात्मा, बापू और राष्ट्री-पिता के नाम से पुकारते है. संस्कृत मे महात्मा (Mahatma or Great Soul ) यानि महान-आत्मा वाला … यानि महान रूह होता है, गुजराती मे बापू का मतलब होता है पिता, और इस बापू शब्द का प्रयोग उनके लिए सबसे पहले हमारे देश के एक महान कवि, लेखक रबिन्द्र नाथ टागोर ने किया था….यानि सम्पूर्ण भारत के लोगो के वह पिता की तरह जाने…. राष्ट्री पिता जाते है……………….!

गांधीजी ने हमारे देश में अनेक उल्लेखनीये काम किये है और हमारे देश में शक्ति शाली नेता के रूप में उभरे उन्होने देश की तस्वीर ही बदल डाली उन्होने देश के नागरिको मे एक नयी आत्मा ड़ाल दी हालाकि उनके दक्षिण अफ्रीका के आने से पहेले भी देश में ब्रिटिश राज्य के खिलाफ कई देश के वरिष्ट और प्राभावी नेता जन संघर्ष कर रहे थे लेकिन उनके आने के बाद एक नयी दिशा मिल गयी उनके सवादों मे और कार्य करने की शैली में एक चमत्कारी और सम्मोहिक शक्ति थी जो कोई भी उनकी तरफ खीचा चला आता था गाँधी जी अहिंसा और सादगी के एक उदाहरण थे भारत मे आने से पहेले उनकी वेश भूषा भी अलग थी लेकिन भारत में कदम रखने के बाद उनकी विचार धरा और वेश भूषा मे 100% बदलाव आया वह पारंपरिक धोती और चादर का इस्तेमाल करते थे वह अपनी चरखे से बनाये हुवे धागों से बनने वाले वस्त्र का ही इस्तेमाल करते थे उनका भोजन शाकाहारी होता था उनके जीवन मे श्रवण और महाराजा हरीश चन्द्र की कथाओ और चरित्र का गहरा प्रभाव था ………………………!

लेकिन आज वही भारत और भारतवासियों ने उस अहिंसा और सादगी से रहे वाले बापू की परिभाषा ही बदल डाली है जिन देश के नागरिको के लिए उन्होने जीवन भर संघर्ष किया और अपनी जान तक दे डाली आज वही नागरिक उनके द्वारा किये गए संघर्षो को भूल गए और उनके द्वारा बताये हुवे सदा जीवन सदा भोजन, सत्य-अहिंसा करती जीवन की रक्षा…..! आज उनके मूल्यों की परिभाषा ही बदल डाली है आज गाँधी जी देश के नेता लोगो के लिए केवल 02 अक्टूबर को याद आने वाली तरीक मात्र रह गये है तो दूसरी तरफ चोरो , दलालों, कमीशन बाजों, भ्रष्ट और बेईमान लोगो की पहचान बन गए है ………….! अपने लेख गाँधी जी – कल, आज और कल मे, मै कुछ घटनाओ का उल्लेख करूगा मुझको अच्छी तरह याद है आज से करीब 06 साल पहले मेरे एक दोस्त ने एक नयी मारूति कार लिया था और हम दोनों अपने शहर मे घूमने निकले और हाला कि हमारे दोस्त ने नए नम्बर के लिए R.T.O. मे आवेदन पत्र दे दिया था और कार के पीछे उसने A/F (नंबर के लिए आवेदित ) लिख दिया था परन्तु जैसे ही हमारी कार माल रोड पर पहुची तभी एक मोटे-ताजे और लम्बी मूछों वाले दरोगा जी ने हाथ हिलाया और कार को रोकने का इशारा किया चूकि इशारा दरोगा जी कि तरफ से था तो न चाहकर भी कार तो रोकनी ही थी मेरे दोस्त ने कार को किनारे किया और कार से उतर कर हम लोग उनके पास गए……. हम लोगो को देख कर दरोगा जी मुस्कुराये और बोले भाई कार तो नयी और अच्छे रंग कि है…..हमने भी उनकी बात को आगे बढाते हुवे बोले जी साहब 03 दिन हुवे है लेकिन हम उनकी बात का मतलब नहीं समझ सके …उन्होने तुंरत कहा आप लोग तो अच्छे घर के और शिक्षित मालूम पड़ते है और आप को अच्छी तरह मालूम है कि बिना नंबर के कार चलाना जुर्म है हमने कहा साहेब हमने नंबर के लिए आवेदन कर दिया है और एक दो दिन मे आ जायेगा और हमने उनको कार के असली पेपर भी दिखाए जिसमे कार लेने की तारीख साफ़ लिखी थी…….उन्होने सारे पेपर देखे और बोलो वह सब ठीक है लेकिन हमारा भी तो ख्याल करिये…और बोले कि अगर आप लोग दो लाख कि कार ले सकते है तो किया हमको गाँधी जी के दर्शन भी नहीं करा सकते है…….उनकी यह बात सुनते ही हम उनका मतलब समझ गए…..कि साहब को प्रसाद चाहिए….वक़्त कि नजाकत को समझते हुवे हमने उनको रिश्वत देना उचित समझा मेरे दोस्त ने अपनी जेब में हाथ डाला और सौ का एक नोट निकला और साहब के हाथ मे रखा उस नोट को देखते हुवे वह बोले भाई बडे न समझ हो गाँधी जी का मतलब भी नहीं समझते हो…अरे यह तो छोटे गाँधी है…..असली गाँधी जी तो बडे और हरे हरे होते है……..उनकी इस बात को सुनकर हम लोग अंदर से बहुत कुरोधित हुवे लेकिन……हमे लोगो से सुनी हवी एक बात याद आ गए कि मजबूरी का नाम गाँधी जी यानि मजबूरी मे गाँधी जी ही काम आते है…….इस लिए मैने अपनी जेब से 500 का एक नोट निकला और अपनी दोस्त कि कार पर निछावर कर दिया… तो यह था हम भ्रष्ट और बेईमान भारतीयों के लिए गाँधी जी की एक आधुनिक परिभाषा……..आये अब आपको मै दूसरा उदहारण देता हूँ जिसे आपको पता चलेगा कि आज भारत-वासियों के मन में गाँधी जी कि किया छवी बन गयी है…..एक बार कि बात है मेरे एक दोस्त जो विदेश (अरब देश) में जाना चाहते थे और उनको जल्दी जल्दी अपना पासपोर्ट बनवाना था……लेकिन पासपोर्ट एक अति महत्पूर्ण एवं वैधानिक विषय है इसलिए…. हमारे दोस्त ने पासपोर्ट से सम्बंधित सभी पेपर पासपोर्ट कार्यालय में जमा कर दिए थे और 15 दिनों के बाद उनकी रिपोर्ट के लिए L.I.U. विभाग से एक महाशय जांच करने आते है……. करीब आधा घंटा पूछताछ करने के बाद जब वह पूरी तरह से संतुष्ट हो जाते है….. तब हमारे मन मे विचार आता है चलो एक ज़रूरी काम हुवा जो पासपोर्ट पाने के लिए एक बहुत महत्पूर्ण क़ानूनी कार्यवाही (प्रक्रिया) मानी जाती है हमने नैतिकता से उनको चाय-पानी कराया ………चलने से पहेले वह श्रीमान बोलो भाई आप लोग किया हमे इसे सूखे सूखे वापस भेज दो गे…..कम से कम मुस्कुराने का मौका भी दो……..तब मेरे दोस्त ने पूछा कि श्रीमान हम आपका मतलब नहीं समझे तब उनके मुख से निकला भाई किया आप लोगो ने कभी 500 रूपये का नोट नहीं देखा है… हमने बोला जी देखा है तब उन्होने तपाक से कहा तो फिर अपने उसमे मुस्कुराते हुवे गाँधी जी को भी देखा होगा…….उनको एन शब्दों को सुनकर हम उनका मतलब समझ गए……और हम बोले जी हा उसमे गाँधी जी मुस्कुरा रहे है तब महाशय बोले अगर हमारे बापू मुसकुरा सकते है तो उनके बच्चे क्यों नहीं….. .उन्होने हमेशा मुस्कुराने कि सलाह दी है और हमे भी उनके पथ पर चलना चाहिए लेकिन वह महाशय शायद भूल गए की गाँधी जी ने सत्य-अहिंसा पर भी चलने की शिक्षा दी थी….हमने बात को आगे न खीच कर उनकी सेवा करना उचित समझा……

शायद यह हमारा दुर्भाग है कि हमारे बापू से सम्बंधित कुछ सामग्री सन् 2009 में नीलाम हो रही थी और उस धरोवर को बचाने के लिया कोई आगे नहीं आ रहा था उनके पारिवारिक सदस्य (तुषार गाँधी) ने कहा कहा उसको नीलम होने से बचाने के लिया गुहार लगाई उसके लिए उन्होने एक बैंक खाता भी खोला और देश के नागरिको से उसमे धन देने को कहा लेकिन…….हम एक अरब से ज़यादा भारतीय मूक दर्शक बने यह तमाशा देखते रहे…..हमारे देश मे अनेक इसे औधोगिक घराने है जो करोडो रूपया पानी कि तरह बहा देते है लेकिन वह बापू के दुवारा किये गए प्रयासों और संघर्षो को भूल गए…..वह तो भला करे उस इंसान का (विजय माल्या) जिसने प्रयासों और धन से उनकी अमूल धरोवर को वापस भारत को लाकर के दिया….ठीक इसी तरह उसने ….टीपू सुलतान कि तलवार (धरोवर) कि भी रक्षा कि थी……अगर हम एक अरब भारतीय सिर्फ एक एक रूपया जमा करते तो हम को ………..सबसे ज़यादा दुखद……..लज्जित होने वाले क्षण का सामना करना पड़ता… हम भारतीय क्रिकेट मैच मे नाचने वाली –बालाओ (Cheer-Girls) पर लाखो रूपया खर्च कर देते है लेकिन जहा हमारे महापुरषों, धरोवारो और भारत के आत्म सम्मान कि बात आती है तो हमारे खाते सूने और हम सब से गरीब हो जाते है……अरे अगर हम अपने महापुरषों और धरोवारो के लिए कुछ नया कर नहीं सकते तो कम से कम उनकी पुरानी चीजों को तो मिटने न दे…..हमारे देश के लोगो ने इस खबर को चटखारे लेकर पढ़ा और समाचार पत्रों ने खूब लिखा…. लेकिन किया हमारी अंतर-आत्मा ने एक बार भी सोचा कि बाहर के मुल्को मे हम हँसी के पात्र बनते रहे…….. और विदेशी यह सोचते रहे कि किया भारतीयों ने उस इंसान को भुला दिया जिसने उनके लिए अपने जीवन को दाव पर लगा दिया था…….!

हम जब भी अपने नेता गण से भारत और भारत वासियों की चर्चा करते है तो शायद ही उनके शब्द कोष मे कोई भी ऐसा प्रसंशा का शब्द बाकी बचता होगा जो वह महा पुरषों और भारत के इतिहास पर इस्तेमाल करते (बोलते) न करते होगे और बोलते है मेरा भारत महान….मेरा भारत महान….मेरा भारत महान….महानता तो तब है जब हम लोग सिर्फ अपने ही मुँह से महान महान न चिल्लाये बल्कि पूरा विश्व एक सुर में बोले वाकई भारत महान है …..हम सिर्फ खुशफहमी मे अगर रहे और बोले की मेरे भारत महान ….. तो ठीक नहीं है…..नि संदेह…हमारा भारत कई माय ने में महान है…..लेकिन हमारे कुछ कार्य उसकी महानता पर पानी फेर देते है……

जिस तरह से भौतिकवाद-आधुनिकता हम भारतीयों के सर पर चढ़ कर बोल रही है तब यह तो वक़्त ही बतायेगा की ….आगे आने वाले समय में….गाँधी जी और उनके जैसे कितने ही महापुरुष….सिर्फ किताबो मे ही सिमट जायेगे ……

जय भारत जय भारतवासी

इसरार अहमद

कानपुर, इंडिया

Leave a Reply

3 Comments on "गाँधी जी – कल, आज और कल : इसरार अहमद"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
आदर्श राठौर
Guest

बहुत सही बात कही है। न जाने हम किस दिशा में बड़ रहे हैं। ठीक है कि आगे बढ़ने के लिए पुरानी चीज़ों की पीछे छोड़ना पड़ता है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हम अच्छी चीज़ों को भी त्याग दें। गांधी जी की सुझाई कुछ बातें स्वर्ण आभूषणों की तरह हैं। भले ही वक्त बढ़ने के साथ लोगों की उनका डिज़ाइन पुराना लगने लगता है लेकिन उसकी कीमत पहले से कई गुनी हो गई होती है।

विनय
Guest

बिलकुल ठीक आज गाधीं जी को लोग बदनाम कर रहें हैं ।

suchitra
Guest

निश्चित् ही एक् उत्तम् लेख्

wpDiscuz