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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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दीनानाथ मिश्र

मेरे साथ तीन ऐसे संयोग पेश आए जिसमें नये विश्व के संदर्भ में भारत की वैश्विक संकट मोचन क्षमता के प्रति बहुत आशावाद झलकता था। एक तो मार्च 2006 के ‘दि ग्लोबलिस्ट’ मैग्जीन में छपे जीन पियरे लेहमन का आलेख पढ़ने को मिला। आलेख का शीर्षक था- ‘‘वैश्वीकरण के युग में एकेश्वरवाद का खतरा।’’ जीन पियरे, ‘‘इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर मेनेजमेंट डेवलपमेंट, स्विट्ज़रलैण्ड’’ में अन्तरराष्ट्रीय राजनैतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। दूसरा, दिल्ली में तीसरे चमनलाल स्मृति व्याख्यान में बीबीसी के विख्यात पत्रकार मार्क टली का अभिभाषण सुना। तीसरे, ‘‘इण्डिया फर्स्ट फाउण्डेशन’’ की एक राष्ट्रीय गोष्ठी में प्रख्यात विचारक एस. गुरूमूर्ति का शक्तिशाली प्रस्तावित व्याख्यान सुनने का संयोग भी मिला।

तीनों के विचारों में मैंने एक अद्भुत समानता देखी। इन तीनों में गुरूमूर्ति भारतीय हैं, और बाकी दो गोरी चमड़ी वाले हैं। यह ठीक है कि मार्क टली भारत में जन्मे लेकिन शैशव के कुछ ही वर्ष बाद उन्हें लंदन भेज दिया गया। बाद का अध्ययन उन्होंने वहीं किया। वह ईसाई हैं। ईसाइयों में ही पले-बढ़े हैं। ईसाई धर्मशास्त्र का अध्ययन किया है। शिक्षा के बाद बीबीसी संवाददाता के रूप में वे दिल्ली आ गए। तब से कमोबेश वे भारत में ही रहे हैं। भारतीयता को उन्होंने अपनी पत्रकारिता की आंखों से गहराई से देखा है। भारतीय सभ्यता, संस्कृति, धार्मिक रीति रिवाज इत्यादि को व्यवहारिकता की कसौटी पर कसा है। अनेक पुस्तकें लिखी हैं। इन दिनों भी वह एक पुस्तक लिख रहे हैं। सच तो यह है कि चमनलाल व्याख्यान माला में उन्होंने अपनी उसी पुस्तक की झांकी प्रस्तुत की।

अपने व्याख्यान में उन्होंने कहा- ‘‘न तो मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा हूं और न ही हिन्दू हूं, फिर भी मुझे चमनलाल स्मृति व्याख्यान में मुख्य वक्ता के रूप में बुलाकर आयोजकों ने उस उदारता और खुलेपन का परिचय दिया है जो भारतीय समाज का एक महत्वपूर्ण गुण है। उन्होंने कहा कि इसी उदारता के कारण यहां दुनिया के विभिन्न धर्म-ग्रंथों के अनुयायी सौहार्दपूर्वक रहते हैं।……यहां विभिन्न मत-पंथों और विचारधाराओं को मानने वालों में परस्पर संवाद होता है जो दूसरे देशों में नहीं दिखता। यही है भारतीय संस्कृति जिसकी मैं सराहना करता हूं।’’

‘‘मेरे विचार से हिन्दुत्व सभी के प्रति प्रेम और उदारता की बात करता है। हिन्दुत्व में मजहबी राज्य की कल्पना नहीं है। हिन्दुत्व के इन महान मूल्यों को संरक्षित रखना चाहिए। अन्य मत-पंथों में बुराई नहीं, अच्छाई देखनी चाहिए।’’

इस्लाम की चर्चा करते हुए श्री मार्क टली ने कहा कि ‘‘इस्लाम में भी कट्टरता है, पर भारत में इस्लाम के अनुयायियों को अपने मजहब के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता है। जबकि फ्रांस में तो स्कूलों में मुस्लिम छात्राओं को उनके मजहब के अनुसार सिर पर कपड़ा नहीं ढकने दिया जाता।

उन्होंने कहा कि खतरा किसी अन्य मत-पंथ का नहीं, बल्कि भौतिकवाद और उसे फैलाने वाले उपभोक्तावाद का है। गीता में भी भगवान कृष्ण ने लोभ-लालच का त्याग करने को कहा है। अगर हम आपसी संवाद को महत्व नहीं देंगे तो भौतिकवाद के पाश में फंसते जाएंगे। भारत में जिस तरह का सामाजिक खुलापन है और संवाद को महत्व दिया जाता है, वह दुनिया को सीखना चाहिए क्योंकि आज हम ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहां पर संस्कृति खुद को विलक्षण मानती है और अन्य संस्कृतियों पर अपने को हावी करना चाहती है। क्या एकेश्वरवादी धर्मपंथों का असहिष्णुता और संघर्ष से कोई सीधा संबन्ध है? जीन पियरे कहते हैं कि एकेश्वरवादी धर्म अपने पूरे इतिहास में और आज भी हिंसाचारी उत्पात के कारण रहे हैं। आज जरूरत है एक ऐसे वैश्विक नैतिकता और आध्यात्मिक आदर्श की जो नई वैश्विक व्यवस्था को चलायमान रखे। आज पश्चिम में बहुत से लोगों को एक अफगान व्यक्ति के बारे में जानकर करारा झटका लगा है। अब्दुल रहमान नामक इस व्यक्ति पर मौत का खतरा मंडरा रहा था। क्योंकि वह इस्लाम को छोड़कर ईसाई मजहब का हो गया था। हमें यह बताया गया है कि शरियत कानून के मुताबिक अगर कोई मुसलमान दूसरा मजहब कबूल करता है तो उसे मौत की सजा दी जाती है। यही अफगानिस्तान का कानून है जैसा कि अनेक अन्य मुस्लिम देशों में है। यह अलग बात है कि आज रहमान इटली पहुंच चुका है और सुरक्षित है। इटली ने उसे शरण दी है। लेकिन फिर भी रहमान का यह प्रकरण एकेश्वरवादी धर्मपंथ की कठोर असहिष्णुता का स्पष्ट उदाहरण है।

जीन पियरे ने कहा है कि ईसाईयत अपने परम उत्कर्ष के दिनों में इस्लाम से भी बदतर थी। केवल इसलिए नहीं कि गैर-ईसाई लोगों को तरह-तरह से खत्म कर दिया जाता था। बल्कि इसलिए भी कि उन ईसाइयों को भी खत्म कर दिया गया जिन्हें शास्त्र विरूद्ध मान लिया गया था। लेटिन अमेरिका में स्पेन के हमलावर चर्च के अधिकारियों से मिलकर बड़ी संख्या में अमेरिकन इंडियनों को जला डाला। अब यह मोटे तौर पर कहा जाता है कि करीब-करीब पिछले 200 वर्षों में जब से ईसाई चर्च की ताकत घटने लगी तब से हत्या, उत्पीड़न और अविश्वासियों को पकड़कर जेल में डालने की घटनाएं बहुत हद तक घटी हैं।

आज अनेक इसाई देशों में इस्लाम में धर्मान्तरित लोग अच्छी-खासी संख्या में रहते हैं और उन्हें अपेक्षाकृत बहुत कम शत्रुता का मुकाबला करना पड़ रहा है। ईसाई सभ्यता का विचार आज मजहबी उत्पीड़न का रास्ता छोड़ चुका है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि चर्च की सत्ता घटती गई। लेकिन होलोकास्ट इसका अपवाद है। यह सही है कि होलोकास्ट का ईसाई मुल्कों में ही घटित हुआ और इसका क्रियान्वयन सेक्युलर अधिकारियों ने किया लेकिन यह भी साफ है कि इसाई चर्च इसके सह-षड़यंत्रकारी थे। इसके कुछ नमूने क्रोशिया के उस्त आन्दोलन में मिलते हैं। और इनका सम्बन्ध कैथोलिक चर्च से था। जो यहूदी कनसन्ट्रेशन कैम्पस में लाए गए थे, उनकी हालत तो अब्दुल रहमान से भी बदतर थी। अब्दुल रहमान को तो फिर भी आने के पहले यह कहा गया था कि अगर वह वापस मुसलमान बन जाए तो वह मृत्युदंड से बच सकता है। यहूदियों को तो यह विकल्प भी नहीं दिया गया था। हालांकि इस्लाम और ईसाई मजहब की कुछ खूबियां भी हैं। लेकिन उससे कहीं ज्यादा युद्ध, असहिष्णुता मौत के घाट उतारने की घटनाएं, उन खूबियों पर कहीं भारी पड़ती हैं। इन दोनों मजहबों के नाम पर जितने लोगों की हत्या अब तक की गई है, उतनी हत्याएं और किसी अन्य कारण से नहीं हुई।

आज 21वीं शताब्दी के मुहाने पर खडे़ होकर हम देख रहे हैं कि एकेश्वरवादी धर्मपंथ पहले के मुकाबले कहीं बड़ी भूमिका अदा कर रहे हैं। यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों का अतिवादी (फंडामेन्टलिस्ट) तत्वों ने धर्मपंथों का अपहरण कर लिया है। मैं सभ्यता के विकास में सभी स्थापित धर्मपंथों के क्रमिक अवसान में विश्वास करता हूं। ताकत से नहीं, बल्कि इतिहास की गवाही, मनुष्य की तर्क-संगतता और मानवतावादी सेक्युलरवाद के जरिए। आज पश्चिमी यूरोप में जनसंख्या का बहुमत नाममात्र को ईसाई बचे है। लेकिन वह मानवतावादी नहीं बने। एक ही रास्ता बचा हुआ लगता है, अगर हम वास्तविकता को देखते हैं तो। क्योंकि हम धर्मपंथों को समाप्त नहीं कर सकते। एकेश्वरवाद के स्थान पर बहुदेववादी पंथ स्वीकार करें। अगर आप एकेश्वरवादी हैं और आपका ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो ज्यादा संभव है कि आपको दूसरे एकेश्वरवादी की असहमति सामने पड़ जाए और उसे मारने का फर्ज बन जाए। लेकिन अगर आप सैकड़ों, बल्कि हजारों भगवानों में विश्वास करते हैं तो कोई भी सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक नहीं होगा और तब आप ज्यादा सहिष्णु हो जाएंगे। बहुदेववादी पंथ मानने वालों में सैक्स के बारे में ज्यादा स्वस्थ विचार होते हैं। एकेश्वरवादियों में सेक्स को पाप समझा जाता है।

जीन पियरे लिखते हैं कि 21वीं शताब्दी के मुहाने पर एक बड़ी उत्साहजनक स्थिति है। वह है भारत का आर्थिक, राजनैतिक और संस्कृतिक धरातल पर वैश्विक शक्ति के रूप में उभार। भारतीय समाज में अनेक विडम्बनाएं, अभाव इत्यादि हैं। लेकिन भारत अपने आप में लघु जगत है और यह बताता है कि वैश्वीकरण कैसे काम कर सकता है। सांस्कृतिक बहुलतावाद को जिस खूबी से वह चला रहा है वह आगे का रास्ता बताता है। भारत 121 करोड़ आबादी का देश है। विविधता से भरा है। यूरोप से भी ज्यादा विविधता। उसमें तरह तरह की भिन्नता वाले लोगों के बीच एक ऐसी एकता है जैसी पश्चिमी यूरोप में नहीं दिखती। भारत की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उसने तमाम बाधाओं के बीच लोकतंत्र को बहाल रखा है। जैसा कि मिस्र जैसे देश नहीं रख सके। भारत कोई कल्पना लोक की बात नहीं है। न तो कोई देश और ना ही कोई व्यक्ति परिपूर्ण होता है।

महात्मा गांधी के अहिंसा के उपदेशों वाला देश होने के बावजूद भारत एक परमाणु शक्ति बन गया है। भारत में अशिक्षितों की संख्या भी ज्यादा है। भारत इस विविधता को लोकतंत्र की शक्ति से संभाले हुए है। आज भारत में ज्यादा आत्मविश्वास है। भारतीय और भारतीय मूल के लोग आज आर्थिक, व्यावसायिक, दार्शनिक, धार्मिक और साहित्यिक क्षेत्रों में अगुवाई कर रहे हैं। इस जगत को आज नैतिक व्यवस्था की जरूरत है। आध्यात्मिक और नैतिक मार्गदर्शन की भी जरूरत है। भारत की दर्शनिक परम्परा इन सब को प्रदान कर सकती है।

पिछले दिनों भारत के धार्मिक गुरू से मेरी बातचीत हुई। मुझे यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि मैं अपने सेक्युलर मान्यताओं पर कायम रहते हुए उनकी धार्मिक मान्यताओं को भी मान सकता हूं। कोई पादरी या इमाम मुझको इसकी इजाजत नहीं देता। इस पृथ्वी को अमेरिकी ईसाई अतिवादी ब्राण्ड का विकल्प चाहिए, जिसे बुश प्रशासन ने ताकत दी है। जो सारे विश्व को अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने में लगा हुआ है। यूरोप अनेक अर्थों में अब अन्तर्मुखी भू-भाग बन गया है। चीन में तानाशाही है। इस्लामिक दुनिया आज विचित्र विडम्बनापूर्ण स्थिति में है। ऐसे में भारत को ही इस सम्बंध में बड़ी भूमिका अदा करना पड़ेगा। क्योकि उसकी सभ्यता में एक आंतरिक शक्ति है और इसलिए भी कि दूसरा कोई इसके मुकाबले में नहीं है। 21वीं शताब्दी के लिए बेहतर होगा कि भारतीय बहुदेववादी दर्शन से वह प्रेरणा ले वरना यह विश्व विनाश की तरफ दौड़ रहा है।

एस. गुरूमूर्ति ने एकेश्वरवादी मजहबों की विस्तृत विवेचना करने के बाद 21वीं शदी में संकट निवारण की परम्परागत भारतीय क्षमता और दर्शन का विस्तार से वर्णन किया था। उनका यह दृढ़ विश्वास है कि भारत में संकट निवारण की क्षमता है और विश्व को अगर विनाश से बचाना है तो भारत के पास उसकी कुंजी है। वैसे यह बात समय-समय पर पिछले सौ-सवा-सौ वर्षों से बहुत बड़े-बड़े विद्वान कहते रहे हैं। आज जब भारत एक उभरती हुई शक्ति के रूप में नजर आ रहा है तो इसे कहने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है और यह शुभ है।

(लेखक : वरिष्ठ पत्रकार एवं राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं)

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