लेखक परिचय

मनोज श्रीवास्‍तव 'मौन'

मनोज श्रीवास्‍तव 'मौन'

जन्म 18 जून 1968 में वाराणसी के भटपुरवां कलां गांव में हुआ। 1970 से लखनऊ में ही निवास कर रहे हैं। शिक्षा- स्नातक लखनऊ विश्‍वविद्यालय से एवं एमए कानपुर विश्‍वविद्यालय से उत्तीर्ण। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में पर्यावरण पर लेख प्रकाशित। मातृवन्दना, माडल टाइम्स, राहत टाइम्स, सहारा परिवार की मासिक पत्रिका 'अपना परिवार', एवं हिन्दुस्थान समाचार आदि। प्रकाशित पुस्तक- ''करवट'' : एक ग्रामीण परिवेष के बालक की डाक्टर बनने की कहानी है जिसमें उसको मदद करने वाले हाथों की मदद न कर पाने का पश्‍चाताप और समाजोत्थान पर आधारित है।

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विकास के नाम पर सभी देशों में वनों को काटने में जरा भी कसर नहीं छोड़ी जा रही है। हरी पहाड़ियों की हरियाली छीनकर सड़कों का निर्माण तथा रिहायसी निर्माण किया जा रहा है। चट्टानों वाली छोटी पहाड़ियों से खुदाई करके निर्माण के लिए गिटि्टयां, टाइले, सीमेंट आदि तैयार करते हुए धरती में गहरे गड्ढ़े किये जा रहे हैं। बात यहीं पर खत्म होती तो शायद ठीक रहता, मगर ऊँची-ऊँची इमारतों व भूमिगत निर्माणों द्वारा धरती माँ के गर्भ में 30 मीटर से 100 मीटर तक चीर डालने को सामान्य बात बना डाला है। इसके अलावा सभी देख खद्दानों से हीरा, कोयला, सोना, चांदी, खनिज तत्वों और रत्नों को पाने हेतु धरती के गर्भ को खोखला करते जा रहे है।

ये बातें यहीं खत्म हो जाती तो भी ठीक होता परंतु ऐसा नहीं हुआ। ग्रीन हाउस गैसों को बढ़ाने वाले विभिन्न क्षेत्रों जैसे पावर स्टेशन, औद्योगिक इकाई, परिवहन, खेती के बाई प्रोड्कट, जैविक ईंधन, व्यापारिक स्रोत, जन शोधन एवं कूड़ा निस्तारण आदि के माध्यम से पृथ्वी पर तापमान में लगातार वृद्धि ही कर रहे हैं। समस्त कारणों को अगर सामूहिक रूप से अध्ययन करें तो यही तय होता है कि मानव का विलासितापूर्ण रवैया ही इन सबका जन्मदाता है। ग्रीन हाउस तथा अन्य गैसें जो कभी पृथ्वी की उत्पत्ति में सहायक रही थीं वही गैसें आज वैश्विक तापमान को बढ़ाने में सहायक हो कर पृथ्वी को समाप्त करने की पुरजोर कोशिश कर रही है। ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ने से धरती पर पड़ने वाले प्रभावों पर अध्ययनों के दौरान कई आश्चर्यजनक तथ्य सामने आये हैं। फ्रांस के ल्यो स्थिति सेमोग्रेफ पब्लिक एग्रीकल्चर एण्ड इन्वायरामेन्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट के अनुसंधानकर्ता मार्टिन दोफ्रस्रे ने कहा कि समुद्र में मछलियों का द्रव्यमान घटकर आधा हो गया है, मछलियों का आकार घटने की मात्रा बहुत बड़े पैमाने पर सामने आ रही है, साथ ही मछलियों के प्रजनन क्षमता में भी भारी कमी हुई है जिसके परिणामस्वरूप उनके अंडाें की संख्या में काफी गिरावट हुई है।

आई.यू.सी.एन. ने घड़ियालों की संख्या में 58 प्रतिशत की कमी पायी है जिसके कारण उन्हें संकटग्रस्त जीव से अतिसंकटग्रस्त जीव के वर्ग में समाहित करना पड़ा है। स्काटलैंड के स्टाटिश भेड़ों के आकार घटने की घटनाएं भी प्रकाश में आयी हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ बर्सिलोना के प्रोफेसर ने ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि पेड़-पौधों में बायोजेनिक वोलाटाइल आर्गेनिक कंपाउन्ड का उत्सर्जन बढ़ा है। जिससे उनमें से सुगन्ध की मात्रा में विस्तार हो गया है। इस बदली हुई परिस्थति के कारण कीडे-मकोड़ों और नुकसान पहुंचाने वाले कीटों से निपटने के तौर तरीके में भी आश्चर्यजनक रूप से बदलाव सामने आये है।

आज दुनिया के बढ़ते वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन के लिए कार्बन डाई आक्साइडों के अणुओं को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है और यही वर्तमान में विश्व की राजनीतिक व आर्थिक बिंदुओं के विचार-विर्मश का केंद्र बन गया है। यही नहीं विश्व के शिक्षित वर्ग के लोगों ने अभी तक केवल जातिवाद, क्षेत्रवाद, समाजवाद, संप्रदायवाद, माओवाद, आतंकवाद आदि को ही जाना था लेकिन आज उन सभी वादों से भी ऊपर ‘पर्यावरणवाद’ ने अपना स्थान बना लिया है। यही ‘पर्यावरणवाद’ दुनियाभर का एक धर्मनिरपेक्ष धर्म बन करके उभर कर सामने आ रहा है। फ्रिमेन डायसन ने जलवायु परिवर्तन पर अपनी समीक्षा में अर्थव्यवस्था और वैश्विक नीति का केंद्र ही ग्लोबल वार्मिंग को बताया है।

भारत के मालवा क्षेत्र में एक कहावत प्रचलित रही है कि – ‘मालवा की धरती, गहन गम्भीर। पग-पग रोटी, डग-डग नीर॥’ परंतु अब वनों के घटने के कारण यह कहावत झूठी साबित हो रही है। ठीक इसी प्रकार गुरुग्रन्थ साहिब में धरती को माता और पानी को पिता कहा गया है। अब आप ही विचार करें कि जिसे हम माता और पिता के स्थान पर शोभायमान करते हो उसको नुकसान पहुंचाने में एक बार संकोच अवश्य ही आयेगा। ऐसे विचार पवित्र भारत की धरती पर आ सकते हैं। यही भाव हमें पर्यावरण की उपजी हुई वर्तमान समस्या से लड़ने की ताकत देते हैं और यही व्यवहार हमारी नीतियों में दिखने लगा है तभी नन्ही युगरत्ना ने विश्व के सभी अर्थ संपन्न लोगों से धरती को बचाने की अपील की थी और सुझाव दिया था कि वे आगे आ कर अपनी विलासिता के अंश को अपनी धरती को बचाने पर व्यय करें। आज भारत की विश्व समुदाय से विश्व स्तर पर पर्यावरणीय मित्रता के रुख की आवश्यकता ही मांग भी है।

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2 Comments on "ग्रीन हाउस गैस और पर्यावरण से उपजी समस्या – मनोज श्रीवास्तव ‘मौन’"

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डॉ. राजेश कपूर
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श्रीवास्तव जी एक सुखद सूचना देने का सुख प्राप्त करना चाहूँगा. ग्रीन हाउस गैसों को निष्प्रभावी बनाने का एक अद्भुत तरीका है ”अग्निहोत्र”. भोपाल की गैस त्रासदी के समय जिन लोगों ने अग्निहोत्र किया वे पूरी तरह से सुरक्षित रहे. ऐसे लोगों के बारे में समाचार भी छपे. दुनिया के अनेक देशों में अग्निहोत्र से विकीर्ण नष्ट करने के सफल प्रयोग हो चुके हैं . कृपया मुझ से यह मत पूछिए की यदि यह उपाय इतना कमाल का है तो फिर दुनिया इस का लाभ क्यूँ नहीं उठा रही. इसका उत्तर आप भी सोचिये. मेरी बात की प्रमाणिकता जांचने के… Read more »
vivek mishra
Guest

आप का लेख अच्छा लगा

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