लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

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डॉ. दीपक आचार्य

होने लगी है आशीर्वादों की बारिश

हर कोई पा लेता है आशीर्वाद

आजकल आशीर्वाद देना और पाना सबसे सस्ता और सहज काम हो गया है। आशीर्वाद पाने के लिए उतावले लोगों की जितनी भीड़ है उससे कहीं ज्यादा भीड़ आशीर्वाद देने को व्यग्र बैठे लोगों की है।

आशीर्वाद देने और पाने वाले लोगों की भारी भीड़ हर कहीं उमड़ने लगी है। फिर चातुर्मास तो आशीर्वादों की बरसात के लिए आता है। हर कहीं चातुर्मास के नाम पर उन सभी महान लोगों के डेरे सजे हुए हैं जिनके बूते ही धर्म और अध्यात्म आज जिन्दा है और इनकी गतिविधियों के कारण ही समाज में धर्म का डंका बज रहा है और हमारी धरा पावन हो रही है।

फिजाओं में धार्मिक स्वर लहरियों की गूंज है और देवालयों में सत्संग, कथा-कीर्तनों की भरमार। भक्तों के रेले के रेल उमड़ने लगे हैं जैसे धार्मिक चेतना का कुंभ ही उतर आया हो जमीन पर। और फिर अपनी धरा तो और इलाकों से कहीं ज्यादा पावन रही है। रहे भी क्यों न, यह हमारा ही क्षेत्र है जहां ईश्वर ने ऐसी-ऐसी हस्तियों को अवतरित किया है जो अपने आप में विलक्षण भी हैं और विचित्र भी। इन हस्तियों के दर्शन और व्यवहार से ही आभास होता है कि भगवान ने अपनी धरा पर कितनी मेहरबानी की है।

इसी धरा पर प्राकट्य के साथ ही बहुत बड़ी संख्या ऐसे महान लोगों की भी है जिन्हें इस पावन धरा ने आकर्षित कर अपने यहाँ बसा लिया है। कुल मिलाकर पते की बात यह है कि हमें हमेशा गर्व और गौरव का बोध होना चाहिए कि हम उस जगह के वासी हैं जो अपने आप में कई ख़ासियतों को समेटे हुए है और इसीलिए इसे धर्म धरा के नाम से पहचाना गया है।

इस धरा पर ऐसे-ऐसे संत-महात्माओं और तपस्वियों ने जन्म लिया है जिनकी कृपा दृष्टि प्राप्त होने पर वारे-न्यारे होते रहे हैं और ऐसे-ऐसे लोगों भाग्य खुल और खिल गए हैं जिनके बारे में कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

इन महान लोगों की कृपा दृष्टि पहले से अब कहीं ज्यादा उदार और करुणामयी हो गई है। एक जमाना था जब संत-महात्माओं और सिद्धों-साधकों या तपस्वियों के पास जाने और आशीर्वाद पाने का साहस वे ही लोग जुटा पाते थे जिनके जीवन में आदर्श और शुचिता का भाव सर्वोपरि रहता था और हर दृष्टि से से पावन रहने के लिए प्रयासरत रहा करते थे।

संत-महात्माओं और तपस्वियों को भी ईश्वरीय दिव्य दृष्टि प्राप्त थी और वे आशीर्वाद प्रदान करने से पहले खूब सोच-विचार किया करते थे तथा पात्र-अपात्र का विचार करने के बाद ही अपने हाथ आशीर्वाद के रूप में उठाया करते थे। तब इन महात्माओं में शिष्य बनाने, बड़े लोगों को शिष्य बनाकर जमाने भर की नज़रों में अपने आपको बहुत बड़ा दिखाने या कि भोग-विलास की निर्बाध प्राप्ति के लिए बड़े लोगों की निगाह पाने की अभीप्सा नहीं हुआ करती थी।

उनके वहाँ उन लोगों का कोई वजूद नहीं होता था जो पद-प्रतिष्ठा और पैसों के अहंकार भरे हैं और लोकप्रिय कहे जाते हैं। उस जमाने में गरीब से गरीब और छोटे से छोटा आदमी भी इनका सान्निध्य बड़ी ही सहजता से प्राप्त कर सकता था। इनके मठों, मन्दिरों और आश्रमों में धन-वैभव और प्रतिष्ठा की बजाय व्यक्ति के मन की निर्मलता और जीवन की शुद्धता को सबसे ज्यादा सम्मान दिया जाता था।

इसके साथ ही वे ही लोग आशीर्वाद पाने के हकदार हुआ करते थे जो धर्माचरण करते थे और जिनका पूरा जीवन शुद्ध आचरणों से भरा हुआ रहता था। उस जमाने में षड़यंत्रकारी, भ्रष्ट, बेईमान, घोटालेबाज, चोर-उचक्के, डकैत, व्यभिचारी, नाकारा, नुगरे और दृष्ट लोग इनके पास तक पहुंचने का साहस नहीं कर पाते थे, आशीर्वाद प्राप्त करने की बात तो दूर है।

पर आज न वे सच्चे गुरु रहे हैं, न संत-महात्मा और तपस्वी। कुछ अच्छों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांशतया एक-दूसरे की कृपा और दया पर जिन्दा रहने वाले ये लोग परस्पर आशीर्वादों की बरसात करते हुए ही अपने धंधे चला रहे हैं।

आशीर्वाद पाने वालों से कहीं ज्यादा आशीर्वाद देने वाले उतावले हैं। उन्हें भी ऐसे लोगों को आशीर्वाद देना अच्छा लगता है जिन्हें लोग बड़े-बड़े और महान मानकर पूजते और आदर देते हैं। ये बड़े लोग अच्छे और सभ्य हों यह जरूरी नहीं। जरूरी यह है कि ये लोग जनमान्य हों, पद और प्रतिष्ठा वाले हों, धन वैभव से भरे-पूरे हों या कि फिर उस किस्म के हों जिनसे लोग भीतर ही भीतर भय खाते हों मगर अभिव्यक्त नहीं कर पाने की विवशता हो।

आजकल इन महान पूज्य लोगों के डेरों में आकर आशीर्वाद लेने वाले लोगों की भीड़ छायी रहने लगी है। अब आशीर्वाद से सामने वाले का कल्याण हो न हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बात तो तात्कालिक लोकप्रियता और वर्चस्व की है और इस शक्ति परीक्षण में वही जीतता है जिसके यहाँ आशीर्वाद पाने के लिए बड़े लोगों की भीड़ लगती हो और जिसका जिक्र वे लोग करते हैं जिनके जिम्मे प्रचार तंत्र होता है।

आजकल संत-महात्माओं और तपस्वियों में भी पब्लिसिटी की भारी जंग छिड़ी हुई है और कुछ को छोड़कर सारे के सारे इसी में रमने लगे हैं। या यों कहें कि ईश्वर की प्राप्ति से कहीं ज्यादा इनकी भूख पब्लिसिटी की होकर रह गई है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। वरना संसार को त्याग बैठे और ईश्वर की प्राप्ति में निकले इन बाबा लोगों को सांसारिकता और प्रचार से क्या मतलब। एक सामान्य गृहस्थी से भी कई गुना ज्यादा पब्लिसिटी की भूख वाले इन लोगों को देख हर कोई गृहस्थ व्यक्ति यही चिंतन करता है कि इनसे तो हम ही कई गुना अच्छे हैं।

वह जमाना बीत गया जब पात्र को देखकर आशीर्वाद दिया जाता था और आशीर्वाद देने वाले का हर शब्द फलता-फूलता था। वह भी इसलिए कि इनका सीधा संबंध ईश्वर तत्व से हुआ करता था। आजकल तो आशीर्वादों का मौसम है। हर रोज कोई न कोई किसी न किसी को आशीर्वाद दे रहा है। लेने वालों और देने वालों सभी में होड़ मची है।

लोगों को आश्चर्य तब होता है जब ऐसे-ऐसे लोगों की आशीर्वाद मुद्रा में तस्वीरें सामने आती हैं जिनके बारे में कोई भी यह नहीं कह सकता कि ये लोग कहीं से भी आशीर्वाद पाने के योग्य भी हैं। ऐसे में आशीर्वाद मात्र उसी तरह के औपचारिक रह गए हैं जैसे किसी को फूलमाला या पगड़ी पहनायी जा रही हो। इसलिए नहीं कि वह योग्य है बल्कि इसलिए कि ऐसा न किया जाए तो कहीं वह नाराज होकर कुछ बिगाड़ा न कर दे।

आशीर्वाद भी तभी फलता है जब पात्र को दिया जाए। अपात्र को दिया जाने वाला आशीर्वाद कभी फलता नहीं बल्कि देने और लेने वालों दोनों के लिए अनिष्टकारक साबित होता है। लोग यह भी अच्छी तरह समझते हैं कि आशीर्वाद पाने के बाद भी ऐसा कोई बिरला नहीं दिखता जिसके स्वभाव में बदलाव आकर परोपकारी और पाक-साफ या आदर्शी हो गया हो। आशीर्वाद आवंटन की यह यात्रा जारी रहनी चाहिए ताकि वे सभी लोग खुश रह सकें जो आशीर्वाद दे या ले रहे हैं…।

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