लेखक परिचय

आवेश तिवारी

आवेश तिवारी

पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं, नक्सलवाद, विस्थापन,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण की रिपोर्टिंग में सक्रिय आवेश का जन्म 29 दिसम्बर 1972 को वाराणसी में हुआ। कला में स्नातक तथा पूर्वांचल विश्वविद्यालय व तकनीकी शिक्षा बोर्ड उत्तर प्रदेश से विद्युत अभियांत्रिकी उपाधि ग्रहण कर चुके आवेश तिवारी क़रीब डेढ़ दशक से हिन्दी पत्रकारिता और लेखन में सक्रिय हैं। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद से आदिवासी बच्चों के बेचे जाने, विश्व के सर्वाधिक प्राचीन जीवाश्मों की तस्करी, प्रदेश की मायावती सरकार के मंत्रियों के भ्रष्टाचार के खुलासों के अलावा, देश के बड़े बांधों की जर्जरता पर लिखी गयी रिपोर्ट चर्चित रहीं| कई ख़बरों पर आईबीएन-७,एनडीटीवी द्वारा ख़बरों की प्रस्तुति| वर्तमान में नेटवर्क ६ के सम्पादक हैं।

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-आवेश तिवारी

क्या आप इरोम शर्मीला को जानते हैं? नहीं, आप अरुंधती रॉय को जानते होंगे और हाँ आप ऐश्वर्या राय या मल्लिका शेहरावत को भी जानते होंगे, आज(2 नवंबर) शर्मीला के उपवास के १० साल पूरे हो गए उसके नाक में जबरन रबर का पाइप डालकर उसे खाना खिलाया जाता है, उसे जब नहीं तब गिरफ्तार करके जेल भेज दिया जाता हैं, वो जब जेल से छूटती है तो सीधे दिल्ली राजघाट गांधी जी की समाधि पर पहुँच जाती है और वहां फफक कर रो पड़ती है, कहते हैं कि वो गाँधी का पुनर्जन्म है, उसने १० सालों से अपनी माँ का चेहरा नहीं देखा, उसके घर का नाम चानू है जो मेरी छोटी बहन का भी है और ये भी इतफाक है कि दोनों के चेहरे मिलते हैं।

कहीं पढ़ा था कि अगर एक कमरे में लाश पड़ी हो तो आप बगल वाले कमरे में चुप कैसे बैठ सकते हैं? शर्मीला भी चुप कैसे रहती? नवम्बर २, २००० को गुरुवार की उस दोपहरी में सब बदल गया, जब उग्रवादियों द्वारा एक विस्फोट किये जाने की प्रतिक्रिया में असम राइफल्स के जवानो ने १० निर्दोष नागरिकों को बेरहमी से गोली मार दी, जिन लोगों को गोली मारी गयी वो अगले दिन एक शांति रैली निकालने की तैयारी में लगे थे। भारत का स्विट्जरलैंड कहे जाने वाले मणिपुर में मानवों और मानवाधिकारों की सशस्त्र बलों द्वारा सरेआम की जा रही हत्या को शर्मीला बर्दाश्त नहीं कर पायी, वो हथियार उठा सकती थी, मगर उसने सत्याग्रह करने का निश्चय कर लिया, ऐसा सत्याग्रह जिसका साहस आजाद भारत में गाँधी के बाद किसी हिन्दुस्तानी ने नहीं किया। शर्मिला उस बर्बर कानून के खिलाफ खड़ी हो गयी जिसकी आड़ में सेना को बिना वारंट के न सिर्फ किसी की गिरफ्तारी का बल्कि गोली मारने कभी अधिकार मिल जाता है, पोटा से भी कठोर इस कानून में सेना को किसी के घर में बिना इजाजत घुसकर तलाशी करने के एकाधिकार मिल जाते हैं, ये वो कानून है जिसकी आड़ में सेना के जवान न सिर्फ कश्मीर और मणिपुर में खुलेआम बलात्कार कर रहे हैं बल्कि हत्याएं भी कर रहे हैं। शर्मिला का कहना है कि जब तक भारत सरकार सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून-१९५८ को नहीं हटा लेती, तब तक मेरी भूख हड़ताल जारी रहेगी।

आज शर्मीला का एकल सत्याग्रह संपूर्ण विश्व में मानवाधिकारों कि रक्षा के लिए किये जा रहे आंदोलनों की अगुवाई कर रहा है। अगर आप शर्मिला को नहीं जानते हैं तो इसकी वजह सिर्फ ये है कि आज भी देश में मानवाधिकार हनन के मुद्दे पर उठने वाली वही आवाज सुनी जाती है जो देश के खिलाफ जाने का भी साहस रखती हो और कोई भी आवाज सत्ता के गलियारों में कुचल दी जाती है, मीडिया पहले भी तमाशबीन था आज भी है। शर्मीला कवरपेज का हिस्सा नहीं बन सकती क्यूंकि उसने कोई बुकर पुरस्कार नहीं जीते हैं वो कोई माडल या अभिनेत्री नहीं है और न ही गाँधी का नाम ढो रहे किसी परिवार की बेटी या बहु है।

इरोम शर्मिला के कई परिचय हैं। वो इरोम नंदा और इरोम सखी देवी की प्यारी बेटी है, वो बहन विजयवंती और भाई सिंघजित की वो दुलारी बहन है जो कहती है कि मौत एक उत्सव है अगर वो दूसरो के काम आ सके, उसे योग के अलावा प्राकृतिक चिकित्सा का अदभुत ज्ञान है, वो एक कवि भी है जिसने सैकडों कवितायेँ लिखी हैं। लेकिन आम मणिपुरी के लिए वो इरोम शर्मीला न होकर मणिपुर की लौह महिला है वो महिला जिसने संवेदनहीन सत्ता की सत्ता को तो अस्वीकार किया ही, उस सत्ता के द्वारा लागू किये गए निष्ठुर कानूनों के खिलाफ इस सदी का सबसे कठोर आन्दोलन शुरू कर दिया। वो इरोम है जिसके पीछे उमड़ रही अपार भीड़ ने केंद्र सरकार के लिए नयी चुनौतियाँ पैदा कर दी हैं, जब दिसम्बर २००६ में इरोम के सत्याग्रह से चिंतित प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने बर्बर सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून को और भी शिथिल करने की बात कही तो शर्मीला ने साफ़ तौर पर कहा की हम इस गंदे कानून को पूरी तरह से उठाने से कम कुछ भी स्वीकार करने वाले नहीं हैं। गौरतलब है इस कानून को लागू करने का एकाधिकार राज्यपाल के पास है जिसके तहत वो राज्य के किसी भी इलाके में या सम्पूर्ण राज्य को संवेदनशील घोषित करके वहां यह कानून लागू कर सकता है। शर्मीला कहती है ‘आप यकीं नहीं करेंगे हम आज भी गुलाम हैं, इस कानून से समूचे नॉर्थ ईस्ट में अघोषित आपातकाल या मार्शल ला की स्थिति बन गयी है, भला हम इसे कैसे स्वीकार कर लें?’

३५ साल की उम्र में भी बूढी दिख रही शर्मीला बी.बी.सी को दिए गए अपने इंटरव्यू में अपने प्रति इस कठोर निर्णय को स्वाभाविक बताते हुए कहती है ‘ये मेरे अकेले की लड़ाई नहीं है मेरा सत्याग्रह शान्ति, प्रेम, और सत्य की स्थापना हेतु समूचे मणिपुर की जनता के लिए है।‘’ चिकित्सक कहते हैं इतने लम्बे समय से अनशन करने, और नली के द्वारा जबरन भोजन दिए जाने से इरोम की हडियाँ कमजोर पड़ गयी हैं, वे अन्दर से बेहद बीमार है। लेकिन इरोम अपने स्वास्थ्य को लेकर थोडी सी भी चिंतित नहीं दिखती, वो किसी महान साध्वी की तरह कहती है ‘मैं मानती हूँ आत्मा अमर है, मेरा अनशन कोई खुद को दी जाने वाली सजा नहीं, यंत्रणा नहीं है, ये मेरी मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए किये जाने वाली पूजा है। शर्मिला ने पिछले ८ वर्षों से अपनी माँ का चेहरा नहीं देखा वो कहती है ‘मैंने माँ से वादा लिया है की जब तक मैं अपने लक्ष्यों को पूरा न कर लूँ तुम मुझसे मिलने मत आना।’लेकिन जब शर्मीला की ७५ साल की माँ से बेटी से न मिल पाने के दर्द के बारे में पूछा जाता है उनकी आँखें छलक पड़ती हैं, रुंधे गले से सखी देवी कहती हैं ‘मैंने आखिरी बार उसे तब देखा था जब वो भूख हड़ताल पर बैठने जा रही थी, मैंने उसे आशीर्वाद दिया था, मैं नहीं चाहती कि मुझसे मिलने के बाद वो कमजोर पड़ जाये और मानवता की स्थापना के लिए किया जा रहा उसका अदभुत युद्ध पूरा न हो पाए, यही वजह है कि मैं उससे मिलने कभी नहीं जाती, हम उसे जीतता देखना चाहते है।‘

इस बात में कोई न राय नहीं है कि जम्मू कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्य और अब शेष भारत आतंकवाद, नक्सलवाद और पृथकतावाद की गंभीर परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। मगर साथ में सच ये भी है कि हर जगह राष्ट्र विरोधी ताकतों के उन्मूलन के नाम पर मानवाधिकारों की हत्या का खेल खुलेआम खेला जा रहा है, ये हकीकत है कि परदे के पीछे मानवाधिकार आहत और खून से लथपथ है, सत्ता भूल जाती है कि बंदूकों की नोक पर देशभक्त नहीं आतंकवादी पैदा किये जाते है। मणिपुर में भी यही हो रहा है, आजादी के बाद राजशाही के खात्मे की मुहिम के तहत देश का हिस्सा बने इस राज्य में आज भी रोजगार नहीं के बराबर हैं, शिक्षा का स्तर बेहद खराब है, लोग अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए दिन रात जूझ रहे हैं, ऐसे में देश के किसी भी निर्धन और उपेक्षित क्षेत्र की तरह यहाँ भी पृथकतावादी आन्दोलन और उग्रवाद मजबूती से मौजूद हैं, लेकिन इसका मतलब ये बिलकुल नहीं है कि सरकार को आम आदमी के दमन का अधिकार मिल जाना चाहिए। जब मणिपुर की पूरी तरह से निर्वस्त्र महिलायें असम रायफल्स के मुख्यालय के सामने प्रदर्शन करते हुए कहती हैं की ‘भारतीय सैनिकों आओ और हमारा बलात्कार करो ‘तब उस वक़्त सिर्फ मणिपुर नहीं रोता, सिर्फ शर्मिला नहीं रोती, आजादी भी रोती है, देश की आत्मा भी रोती है और गाँधी भी रोते हुए ही नजर आते हैं। शर्मीला कहती है ‘मैं जानती हूँ मेरा काम बेहद मुश्किल है, मुझे अभी बहुत कुछ सहना है, लेकिन अगर मैं जीवित रही, खुशियों भरे दिन एक बार फिर आयेंगे। अपने कम्बल में खुद को तेजी से जकडे शर्मीला को देखकर लोकतंत्र की आँखें झुक जाती है।

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22 Comments on "क्योंकि तुम अरुंधती नहीं हो मेरी बहन"

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Nem Singh
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मीडिया हमेसा तामस बीन होता है वह भी सर्कार की हाँ मई हा मिलाता है ओरे हाँ मई हाँ मिलाने वालों की संख्या ज्यादा होती है एसिलिया उन्हीं की आवाज को सुना जाता है एसिलिया तो एस महँ सत्याग्रही का नाम मीडिया के पन्नो पर नहीं है …………….

anshumala
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शर्मीला जिस गोलीबारी के खिलाफ भूख हड़ताल पर गई थी उस में वो लड़की भी मारी गई थी जिसे १२ वर्ष के उम्र में वीरता के लिए २६ जनवरी को राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया था | शर्मीला को हर वर्ष आत्महत्या करने का दोषी मान कर १ वर्ष की सजा दी जाती है और ज़बरदस्ती भोजन दिया जाता है जेल से छूटने के बाद उन्हें कुछ दिनों बाद फिर उसी जुर्म में वापस पकड़ लिया जाता है पिछले दस सालों से यही चाल रहा है | वो आगे भी दस साल यही करेंगी फिर भी कोई उनकी नहीं सुनने वाला… Read more »
तरुणराज गोस्वामी
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तरुणराज गोस्वामी
वाकई सत्ता और सत्ताधीश कितनी गहरी नीँद मेँ सोये हैँ । मीडिया को भी शर्म आना चाहिये जो गाँधी के देश मेँ सुरेश कलमाड़ी , अरुंधति राय , गिलानी जैसोँ को तो कवर पे छापता है या ब्रेकिँग न्यूज़ मेँ दिखाता है लेकिन इरोम शर्मिला के सत्याग्रह को नज़रअंदाज़ करता है । ये कैसा भारत है जहाँ राहुल गाँधी एक तगारी उठाकर कई कई दिनोँ तक मीडिया मेँ महात्मा गाँधी की विरासत को आगे बढ़ाते दिखाये जाते हैँ जबकि शर्मिला का दर्द जानने की जहमत कोई नहीँ उठाना चाहता । ऐसा तो शायद अंग्रेजोँ के ज़माने मेँ नहीँ हुआ होगा… Read more »
आवेश तिवारी
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@राजीव दुबे जी आप शत प्रतिशत सही हैं |

Rajeev Dubey
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समस्या सेना नहीं है. इरोम शर्मिला का आन्दोलन उन भ्रष्ट साताधीशों के कारण है जो पिछले ६ दशक से भारत के ऊपर राज करते रहे हैं और हर व्यवस्था का अपने स्वार्थ में दुरूपयोग करते रहे हैं . इस कारण जन समर्थन विरोधी शक्तियों के पक्ष में चला जाता है और फिर कड़े क़ानून लगाने की जरूरत पड़ती है . ध्यान से देखेंगे तो पता चलेगा की कश्मीर से लेकर मणिपुर तक सभी राज्य अपनी इच्छा से भारत में विलय के लिए आये थे … हमने सेना भेज कर उन्हें मजबूर नहीं किया था … पर कांग्रेस की सरकारों ने… Read more »
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