लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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नेपाल के नए संविधान के साथ नए प्रधानमंत्री भी आ गए हैं। उनका नाम है− के.पी. शर्मा ओली! नेपाली संसद में प्रधानमंत्री का चुनाव बाकायदा संसद करती है। इस चुनाव में ओली को 338 वोट मिले। याने 39 वोट ज्यादा मिले। यदि उनको 299 वोट भी मिल जाते तो वे जीत जाते। लेकिन यह जीत कोई बड़ी जीत नहीं है। उनकी पार्टी एकीकृत मार्क्सवादी−लेनिनवादी पार्टी (एमाले) तो दो नंबर की पार्टी है। उससे ज्यादा सीटें तो नेपाली कांग्रेस को मिली हैं लेकिन नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार पूर्व प्रधानमंत्री सुशील कोइराला हार गए, क्योंकि ओली के समर्थन में प्रचंड की माओवादी पार्टी, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी, मधेसी जनाधिकार फोरम और कुछ छुट−पुट पार्टियों के सांसद आ गए। याने ओली की डगर आसान नहीं होगी। उन्हें छुरे की धार पर चलना होगा।

इन सब पार्टियों ने ओली को समर्थन क्यों दिया है? क्योंकि ये सब मधेसियों के मामले में ओली को अपना नेता मानते हैं। ओली मधेसियों को सिर चढ़ाने के विरुद्ध हैं। वे अपने आपको नेपाली राष्ट्रवाद का प्रतीक मानते हैं जबकि मधेसियों को भारत का दलाल माना जाता है। नेपाल में कोई भी किसी पार्टी में हो, यदि वह मधेसियों पर लगाम लगाने के पक्ष में है तो वह ओली के साथ है। दूसरा कारण ओली की लोकप्रियता का यह है कि वे भारत−विरोधी माने जाते हैं। सिर्फ ओली ही नहीं, नेपाली कांग्रेस के भी कई बड़े नेताओं को मैं व्यक्तिगत रुप से जानता रहा हूं, जिन्होंने समय−समय पर भारत−विरोध से ही अपनी राजनीति को चमकाया है। ओली के समर्थन का तीसरा कारण है−सत्ताप्रेम! सत्ता के बिना राजनीति क्या है? अब गठबंधन की सरकार में छोटे−मोटे भी अपनी पूरियां तलेंगे।

दूसरे शब्दों में ओली को बहुत सावधान होकर सरकार चलानी होगी। भारत की मोदी सरकार ने मधेसी−मामले में सीधा हस्तक्षेप करके बचकाना हरकत की है लेकिन वह शायद बिहार का चुनाव जीतने के लिए की है। मधेसियों के लाखों बिहारी रिश्तेदारों के वोट शायद भाजपा को मिल जाएं लेकिन भारत की इस अनगढ़ कूटनीति ने नेपालियों को नाराज़ कर दिया है। ओली यदि इस माहौल को सुधार नहीं पाए तो उनका प्रधानमंत्री पद बेलज्जत हो जाएगा। उन्हें चीन की तरफ झुकना पड़ेगा। वे पाकिस्तान की तरफ भी रुख करें तो आश्चर्य नहीं होगा। ऐसी स्थिति में तनाव बढ़ेगा और नेपाल की आर्थिक स्थिति और विषम होती चली जाएगी। नरेंद्र मोदी ने ओली को बधाई देकर अच्छी शुरुआत की है लेकिन देखना है कि ओली क्या करते हैं?

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