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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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 राजेश आर्य ’रत्नेश’

प्रिय पाठकवृन्द ! वर्तमान में वैज्ञानिक सुख-सुविधाओं का उपभोग करता हुआ मानव उनके आविष्कारक वैज्ञानिकों का गुणगान करता हुआ यह भूल जाता है कि उनमें से बहुत से वैज्ञानिक नास्तिक थे अर्थात् संसार को प्रकाश व सुविधा देने के कारण ही उसका सम्मान किया जाता है, नास्तिक होने के कारण नहीं। अपने प्राणों की आहुति देकर हमें स्वतंत्र कराने वाले वीरों के विषय में भी यही बात है अर्थात् पं. रामप्रसाद बिस्मिल इसलिए आदरणीय नहीं है कि वे सच्चे आस्तिक थे और वीर भगतसिंह इसलिए आदरणीय नहीं है कि वे कट्टर नास्तिक थे। देश की जनता में आज भी उनके लिए जो प्यार और सम्मान है, उसका कारण उनका राष्ट्र-प्रेम व बलिदान है, पर कुछ दशकों से मार्क्सवादी विचारधारा के लोग इस बात से परेशान हैं कि भगतसिंह को वीर क्रान्तिकारी ही क्यों माना जात है, नास्तिक, लेनिनवादी व मार्क्सवादी क्यों नहीं। ये लोग इस बात को छिपाने का प्रयास करते हैं कि भगतसिंह की पृष्ठभूमि आर्यसमाजी व क्रांतिकारी थी। केवल लेनिन व मार्क्स के साहित्य से ही वे क्रांतिकारी नहीं बने थे। निर्वासित हुए चाचा अजीतसिंह के वियोग में बरसते चाची हरनाम कौर के आंसू नन्हें भगत को अंग्रजों से लड़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे। पिता किशनसिंह की अंग्रजों से होने वाली टक्कर को वे प्रतिदिन देखते थे। जलयांवाला बाग के हत्याकांड से वे परिचित थे। शहीद करतार सिंह सराभा को वे अपना आदर्श मानते थे। कूका आंदोलन के प्रवर्तक गुरु रामसिंह, सूफी अम्बाप्रसाद, मदनलाल ढींगारा, बलवन्त सिंह जैसे बलिदानी वीर उनमें क्रांतिभाव जगाते थे और सबसे मुख्य बात तो यह है कि उन्हें इस बात का स्मरण रहता था कि उनके दादा सरदार अर्जुनसिंह न यज्ञोपवीत के समय घोषणा की थी कि उन्हें (भगतसिंह को) खिदमते वतन के लिए वक्फ कर दिया है।

भगतसिंह को मार्क्सवादी व नास्ति प्रचारित करते समय ये लोग अन्य किसी भी आस्ति देशभक्त की चर्चा नहीं करते और सम्मान नहीं देते, फिर वह चाहे नेता सुभाष चन्द्र हो या भगतसिंह का अन्तरंग साथी चन्द्रशेखर आजाद हो। जबकि भगतसिंह ने किसी भी बलिदानी वीर की इसलिए उपेक्षा नहीं कि की वह मार्क्सवादी नहीं था और आस्तिक था। काकोरी के शहीदों के विषय में भगतसिंह ने ‘किरती’ जनवरी 1928 में ‘विद्रोही’ के नाम से लिखा। वे चारों वीर (रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला, रोशनसिंह व राजिन्द्र लाहिड़ी) आस्तिक देशभक्त थे। भगतसिंह ने लिखा- ‘‘नीचे हम उन चारों के हालात संक्षेप में लिखते हैं, जिससे यह पता चले कि यह अमूल्य रत्न मौत के सामने खड़े होते भी किस बहादुरी से हँस रहे थे।…..

श्री राजिन्द्र लाहिड़ी…… आपका स्वभाव बड़ा हँसमुख और निर्भय था। आप मोत का मजाक उड़ाते रहते थे।

श्री रोशनसिंह जी…… (फाँसी के) तख्ते पर खडे़ होने के बाद आपके मुख से जो आवाज निकली वह यह थी – वन्देमातरम्।

श्री अशफाक उल्ला…… आप श्री रामप्रसाद का दायां हाथ थे, मुसलमान होने के बावजूद आपका कट्टर आर्यसमाजी धर्म से हद दर्जे का प्रेम था। दोनों प्रेमी एक बड़े काम के लिए अपने प्राण उत्सर्ग कर अमर हो गए।

श्री रामप्रसाद बिस्मिल…… फाँसी से दो दिन पहले सी.आई.डी. के मि. हैमिल्टन आप लोगों से मिन्नतें करते रहे कि आप मौखिक रूप से सब बता दो, आपको पांच हजार रुपया नकद दिया जाएगा और सरकारी खर्चे पर विलायत भेजकर बैरिस्टर की पढ़ाई करवाई जाएगी। लेकिन आप कब इन बातों की परवाह करते थे। आप हुकूमतों को ठुकराने वाले व कभी कभार जन्म लेने वाले वीरों में से थे।..’’

मदनलाल ढींगरा परम आस्तिक देशभक्त थे, उनकी शहादत को नमन करते हुए भगतसिंह ने लिखा- ‘‘धन्य था वह वीर ! धन्य है उनकी याद ! मुर्दा देश के अमूल्य हीरे को बारम्बार नमस्कार !’’ (किरती, मार्च 1928)

श्री बलवन्त सिंह के विषय में लिखा है- ‘‘वे बड़े ईश्वरभक्त थे।’’ (‘चांद’ फाँसी अंक नवम्बर 1928)

1924 में लिखे व 28 फरवरी 1933 के ‘हिन्दी सन्देश’ में प्रकाशित ‘पंजाबी की भाषा..’ लेख में भगतसिंह लिखते हैं- ‘‘दोनों (स्वामी विवेकानन्द और स्वामी रामतीर्थ) विदेशों में भारतीय तत्त्वज्ञान की धाक जमाकर स्वयं भी जबत् प्रसिद्ध हो गए,…. जहाँ स्वामी विवेकानन्द कर्मयोग का प्रचार कर रहे थे, वहाँ स्वामी रामतीर्थ भी मस्तानावार गाया करते थे-

हम रूखे टुकड़े खायेंगे, भारत पर वारे जाएंगे।

हम सूखे चने चबाएंगे, भारत की बात बनाएंगे।

हम नंगे उमर बिताएंगे, भारत पर जान मिटाएंगे।

इतना महान देश तथा ईश्वर-भक्त हमारे प्रान्त में पैदा हुआ हो, परन्तु उसका स्मारक तक न दीख पड़े, इसका कारण साहित्यिक फिसड्डीपन के अतिरिक्त क्या हो सकता है ?’’

15 नवम्बर व 22 नवम्बर 1924 के ‘मतवाला’ में बलवन्तसिंह के नाम से भगतसिंह ‘विश्व प्रेम’ में लिखते हैं-‘‘वसुधैव कुटुम्बकम् ! जिस कवि सम्राट की यह अमूल्य कल्पना है, जिस विश्व प्रेम के अनुभवी का यह हृदयोद्गार है, उसकी महत्ता का वर्णन करना मनुष्य शक्ति से सर्वथा बाहर है।……. जिस दिन तुम सच्चे प्रचारक बनोगे इस अद्वितीय सिद्धान्त के, उस दिन तुम्हें माँ के सच्चे सुपुत्र गुरु गोविन्द सिंह की तरह कर्मक्षेत्र में उतरना पड़ेगा।… राणा प्रताप की तरह आयुपर्यन्त ठाकरें खानी होंगी, तब कहीं उस परीक्षा में उत्तीर्ण हो सकोगे।

विश्वप्रेमी वह वीर है जिसे भीषण विप्लववादी, कट्टर अराजकतावादी कहने में हम लोग तनिक भी लज्जा नहीं समझते- वही वीर सावरकर।……..

विश्वप्रेम की देवी का उपासक था ‘गीता रहस्य’ का लेखक पूज्य लोकमान्य तिलक।……

अरे ! रावण और बाली को मार गिराने वाले रामचन्द्र ने अपने विश्व प्रेम का परिचय दिया था भीलनी के झूठे बेरों को खाकर। चचेरे भाईयों में घोर युद्ध करवा देने वाले, संसार से अन्याय को सर्वथा उठा देने वाले कृष्ण ने परिचय दिया अपने विश्व प्रेम का- सुदामा के कच्चे चावलों को फांक जाने में।

6 जून 1929 को दिल्ली के सेशन जज की अदालत में दिये अपने बयान में भगतसिंह ने कहा था- ‘‘इधर देश में जो नया आन्दोलन तेजी के साथ उठ रहा है, और जिसकी पूर्व सूचना हम दे चुके हैं वह गुरु गोविन्द सिंह, शिवाजी, कमालपाशा, रिजाखां, वाशिंगटन, गैरीबाल्डी, लाफापेट और लेनिन के आदर्शों से ही प्रस्फुरित है और उन्हीं के पदचिह्नों पर चल रहा है।’’……..

नेजवान भारत सभा, लाहोर का घोषणापत्र 11 से 13 अप्रैल 1928 को तैयार किया गया, जिसमें लिखा था- ‘‘गुरु गोविन्द सिंह को आजीवन जिन नारकीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था, हो सकता है उससे भी अधिक नारकीय परिस्थितियों का सामना करना पड़े।’’……

असेम्बली हाल में बम फैंकने के बाद दिल्ली जेल से 26 अप्रैल 1929 को अपने पिता के नाम पत्र लिखकर भगतसिंह ने कुछ पुस्तकें मँगवाई, जिनमें तिलक जी की ‘गीता रहस्य’ भी थी। गुरु रामसिंह के विषय में तो यहां ताक लिखा है- ‘‘गुरु रामसिंह बड़े तेजस्वी तथा प्रभावशाली व्यक्ति थे। उनके असाधारण आत्मबल सम्बन्धी बहुत सी बातें प्रसिद्ध हैं। कहते हैं कि वे जिसके कान में दीक्षा मन्त्र फंूक देते थे वही उनका परम भक्त और शिष्य हो जाता था।…. ऐसी अनेक घटनाएं हैं। जो भी हो, इतना तो मानना ही पडे़गा कि गुरु जी ईश्वर भक्ति तथा उच्च चरित्र के कारण एक महान शक्तिशाली महापुरुष थ। अतः उपरोक्त घटनाएं असम्भव नहीं।

चिन्तनशील होने के कारण मानके के विचारों में परिवर्तन होता ही रहता है। यह परिवर्तन कभी किसी घटना विशेष के कारण हो सकता है, किसी व्यक्ति या साहित्य के संग भी हो सकती है। शिकारी लक्ष्मणदास हिरणी के गर्भस्थ शिशुओं को मरते देखकर शिकार त्यागकर वैरागी माधोदास बन जात है और फिर वही माधोदास गुरु गोविन्छ सिंह की प्रेरणा से बंदा बैरागी बन हिन्दुओं की रक्षार्थ शस्त्र धारण कर इतिहास रचता है। मूर्तिपूजक पिता का बेटा मूलशंकर शिवरात की घटना से मूर्तिपूजा विरोधी हो जाता है। विज्ञान का विद्यार्थी नास्तिक गुरुदत्त महर्षि दयानन्द की अन्तिम लीला दर्शन कर दृढ़ आस्तिक बन जाता है। दुर्व्यसनों में फंसा नास्तिक मुंशीराम महर्षि दयानन्द के संग व सत्यार्थप्रकाश के स्वाध्याय से दृढ़ आस्तिक बन वकालत को ठोकर मार गुरुकुल कांगड़ी का आचार्य बन जाता है। जीवनभर ळवक पे दवूीमतम कहकर नास्तिकता का प्रचार करने वाला इंग्लैण्ड का विचारक ब्रेडला मृत्युशय्या पर ळवक पे ीवू ीमतम कह उठता है। फिर यदि आस्तिकता का चोगा पहनकर दीन-गरीबों का शोषण करने वाले लोगों को देखकर व लेनिन, मार्क्स आदि नास्तिक क्रांतिकारियों का साहित्य पढ़कर भगतसिंह उनकी विचारधारा से प्रभावित हो गये हों, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि उन क्रांतिकारियों का मुख्य विषय देश की शोषित, पीड़ित जनता का उद्धार करना था, ईश्वर-उपासना नहीं। और भगतसिंह का भी यही उद्देश्य था। अतः धर्म के नाम पर होने वाले भेदभाव छुआछूत, सांप्रदायिक दंगे आदि का कारण ईश्वर और धर्म को मानकर इन्हें परे हटाने का मार्क्स आदि की तरह भगतसिंह का भी विचार बना। ‘किरती’ मई 1928 में ‘धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम’ शीर्षक में वे लिखते हैं-

‘‘रूसी महात्मा टालस्टॉय ने अपनी पुस्तक म्ंल ंदक स्मजजमते में धर्म पर बहस करते हुए इसके तीन हिस्से किए हैं-

1. म्ेेमदजपंसे व ित्मसपहपवदए यानी धर्म की जरूरी बातें अर्थात् सच बोलना, चारी न करना, गरीबों की सहायता करना, प्यार से रहना, वगैरा।

2. च्ीपसवेवचील व ित्मसपहपवदए यानी जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, संसार रचना आदि का दर्शन।

3. त्पजनंसे व ित्मसपहपवदए यानी रस्मों-रिवाज वगैरा।……

सो यदि धर्म पीछे लिखी तीसरी और दूसरी बात के साथ अन्धविश्वास को मिलाने का नाम है, तो धर्म की कोई जरूरत नहीं। इसे आज ही उड़ा देना चाहिये। यदि पहली और दूसरी बात में स्वतंत्र विचार मिलाकर धर्म बनता हो, तो धर्म मुबारक है।………. हमारी आजादी का अर्थ केवल अंग्रजी चंगुल से छुटकारा पाने का नाम नहीं, वह पूर्ण स्वतंत्रता का नाम है – जब लोग परस्पर घुल-मिलकर रहेंगे और दिमागी गुलामी से भी आजाद हो जाएंगे।’’

ऐसा अनुमान है कि जिस गम्भीरता से भगतसिंह ने नास्तिकवाद को पढ़ा यदि उसी गम्भीरता से वैदिक आध्यात्मिक ग्रन्थों को भी पढ़ा होता या किसी वैदिक विद्वान् से शंका-समाधान किया होता, तो वे मार्क्सवाद की जगह वैदिक समाजवाद का प्रचार करते, क्योंकि नास्तिकवाद के पक्ष में उनके प्रश्न इतने मजबूत नहीं हैं। यद्यपि ‘मै नास्तिक क्यों हूं’ शीर्षक में भगतसिंह ने लिखा है- ‘‘मैंने अराजकतावादी नेता बाकुनिन को पढ़ा, कुछ साम्यवाद के पिता मार्क्स को, किन्तु ज्यादातर लेनिन, त्रात्स्की व अन्य लोगों को पढ़ा जो अपने देश में सफलतापूर्वक क्रांति लाए थे। वे सभी नास्तिक थे।…… 1926 के अन्त तक मुझे इस बात का विश्वास हो गया कि सर्वशक्तिमान परम आत्मा की बात-…….. एक कोरी बकवारस है।’’ तथापि 1927 में अमरचन्द के नाम पत्र के अंत में वे लिखते हैं-

‘‘…….अभी तक कोई मुकदमा मेरे खिलाफ तैयार नहीं हो सका और ईश्वर ने चाहा तो हो भी नहीं सकेगा। आज एक बरस होने को आया, मगर जमानत वापस नहीं ली गई। जिस तरह ईश्वर को मंजूर होगा।………’’

मई 1927 में भगतसिंह ने ‘विद्रोही’ नाम से ‘किरती’ (पंजाबी पत्रिका) में ‘काकोरी के वीरों से परिचय’ लेख में अश्फाकउल्ला, रोशनसिंह, राजेन्द्र लाहिड़ी, रामप्रसाद बिस्मिल, मन्मथनाथ गुप्त, जोगेशचन्द्र चटर्जी आदि का परिचय देकर अन्त में लिखा- ‘‘ईश्वर उन्हें बल व शक्ति दे कि व वीरता से अपने (भूख हड़ताल के) दिन पूरे करें और उन वीरों के बलिदान रंग लाएं।’’

फरवरी 1928 में ‘महारथी’ में बी.एस. सिन्धू नाम से भगतसिंह ने ‘कूका विद्रोह-।’ लेख के अंत में लिखा है- ‘‘उन अज्ञात लोगों के बलिदानों का क्या परिणाम हुआ, सो वही सर्वज्ञ भगवान जाने। परन्तु हम तो उनकी सफलता-विफलता का विचार छोड़ उनके निष्काम बलिदान की याद में एक बार नमस्कार करते हैं।’’

नवम्बर 1928 ‘चांद‘ (फांसी अंक) में देशभक्त वीर सूफी अम्बाप्रसाद के विषय में लिखकर भगतसिंह ने अंत में लिखा है- ‘‘आज सूफी जी इस देश में नहीं हैं। पर ऐसे देशभक्त का स्मरण ही स्फूर्तिदायक हाता है। भगवान उनकी आत्मा को चिर शांति दे।’’

जून 1928 ‘किरती’ में ‘सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज’ लेख में लिखा है- ‘‘बस किसी व्यक्ति का सिख या हिन्दू होना मुसलमानों द्वारा मारे जाने के लिए काफी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था। जब स्थिति ऐसी हो तो हिन्दुस्तान का ईश्वर ही मालिक है।’’

‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ लेख में भगतसिंह ने यह भी स्वीकार किया है कि ‘विश्वास’ (ईश्वर पर) कष्टों को हल्का कर देता है, यहां तक कि उन्हें सुखकर बना सकता है। ईश्वर से मनुष्य को अत्यधिक सांत्वना देने वाला एक आधार मिल सकता है। ‘उसके’ बिना मनुष्य को स्वयं अपने ऊपर निर्भर होना पड़ता है। तूफान और झंझावात के बीच अपने पांवों पर खड़ा रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है।…’’(5-6 अक्तूबर 1930)

प्रिय पाठकवृन्द ! उपरोक्त सभी प्रमाण श्री चमनलाल द्वारा सम्पादित ‘भगतसिंह के संपूर्ण दस्तावेज’ से लिये हैं। सम्पादक का उद्देश्य भगतसिंह नास्तिक व समाजवाद का प्रचार करना है। यह ठीक है कि भगतसिंह नास्तिक व समाजवाद के समर्थक थे और किसान-मजदूरों की शोषण-मुक्ति की बात करते थे, लेकिन उनके इस विचार के पीछे की प्रेरक-शक्ति भारत राष्ट्र के किसी वर्ग को शोषित-दलित नहीं देख सकते थे। उनका वामपंथ अपने मिजाज, प्रेरणा, चरित्र और चिंतन में भारत से जोड़ने वाला था, आजकल के वामपंथी ढर्रे की तरह भारत के अतीत, संस्कृति व सभ्यता से घृणा करने वाला नहीं।

ये लोग भगतसिंह के लेख ‘मै नास्तिक क्यों हूं’ को आधार बनाकर उन्हें पूर्ण रूप से आंकने का प्रयास करते हैं। यह लेख 1979 में श्री विपिन चन्द्र प्रकाश में लाए। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भगतसिंह ने यह लेख तब लिखा था, जब फांसी का फंदा सामने था, जब चारों ओर अंग्रेजी सरकार का अत्याचार चल रहा था, गरीब, मजदूर और किसान अपमानित और शोषित हो रहे थे, आशा की किरण कम दिखाई दे रही थी। अगर भगवान के प्रति आस्था और प्यार स्वाभाविक है तो भगवान के प्रति नाराजगी भी उतनी ही स्वाभाविक है। गायादि पशुओं पर होने वाले अत्याचार को देखकर वेदों के परम विद्वान्, ईश्वर के सच्चे भक्त महर्षि दयानन्द का हृदय कांप उठा और ईश्वर को उलाहना देते हुए कहते हैं-‘‘हे परमेश्वर ! तू क्यों इन पशुओं पर, जो कि बिना अपराध मारे जाते हैं, दया नहीं करता ? क्या उन पर तेरी प्रीति नहीं है ? क्या उनके लिये तेरी न्यायसभा बन्ध हो गई है ? क्यों उनकी पीड़ा छुड़ाने पर ध्यान नहीं देता, और उनकी पुकार नहीं सुनता। क्यों इन मांसाहारियों के आत्माओं में दया प्रकाश कर निष्ठुरता, कठोरत, स्वार्थपन और मूर्खता आदि दोषों को दूर नहीं करता ? जिससे ये इन बुरे कामों से बचें।’’ (गोकरुणानिधिः)

भगतसिंह की नास्तिकता का प्रचार करने वालों को इस तरफ भी ध्यान देना चाहिए। प्रसिद्ध लेखक श्री कुलदीप नैयर ने ‘शहीद भगतसिंह के क्रांति-अनुभव’ में लिखा है- ‘‘भगतसिंह के पिता ने उसे बताया कि महात्मा गांधी ने अंग्रेज सरकार को यह कह दिया है कि अगर इन तीनों नवयुवकों को फांसी पर लटाकाना है तो उन्हें कराची में हो रहे कांग्रेस सम्मेलन से पहले लटका देना चाहिए। भगतसिंह ने पूछा कि कांग्रेस का कराची सम्मेलन कब हो रहा है ? उसके पिता ने कहा कि मार्च महीने के अंत में। भगतसिंह ने इसके उत्तर में कहा कि यह तो बहुत प्रसन्नतादायक बात है क्योंकि गर्मियां आ रही हैं, इसलिए काल-कोठरी में सड़कर मरने से फांसी पर चढ़ जाना अपेक्षाकृत अच्छी बात है। लोग कहते हैं कि मौत के बाद बहुत अच्छी जिंदगीय मिलती है परन्तु मैं पुनः भारत में ही जन्म लूंगा, क्योंकि मैंने अभी अंग्रेजों का और सामना करना है। मेरा देश जरूर आजाद होगा।’’

श्री सुभाष रस्तोगी ने ‘क्रांतिकारी भगतसिंह’ में लिखा है- एडवोकेट प्राणनाथ ने अपने ऐ संस्मरण में इस प्रकार (उल्लेख) किया है: फिर मैंने (भगतसिंह से) पूछा- ‘आपकी अंतिम इच्छा क्या है ?’ उनका उत्तर था ‘बस यही कि फिर जन्म लूं और मातृभूमि की और अधिक सेवा करूं।’

पाठकवृन्द ! क्या पुनर्जन्म मानने वाला नास्तिक होता है ? क्या अन्याय, अत्याचार से पीड़ित जन के आंसू पोंछकर उन्हें प्रसन्नता देने वाला नास्तिक होता है ? क्या समूचे राष्ट्र का हित करने वाला नास्तिक होता है ? क्या परोपकार के लिए प्राणों की आहुति देने वाला नास्तिक होता है ?

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