लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉhindi. मधुसूदन

***हिन्दी मध्यम से उच्च शिक्षा का ऐतिहासिक उदाहर
***जनभाषा ही आर्थिक उन्नति का रहस्य।
***देश के १३१ अर ब  रुपए (प्रति वर्ष) बच सकते हैं।

(एक)  ऐतिहासिक घटा हुआ उदाहरण:
एक  घटा हुआ ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ।  चौधरी मुख्तार सिंह एक देशभक्त हिन्दीसेवी शिक्षाविद थे।१९४६ में वायसराय कौंसिल के सदस्य चौधरी मुख्तार सिंह ने जापान और जर्मनी की यात्रा  की थी;  और यह अनुभव किया था, कि यदि भारत को कम (न्यूनतम) समय में आर्थिक दृष्टि से उन्नत होना है तो उसे, जन भाषा में, जन वैज्ञानिक शिक्षित करने  होंगे ।
उन्हों ने मेरठ के पास एक छोटे से देहात में ”विज्ञान कला भवन” नामक संस्था की स्थापना की। हिन्दी मिड़िल पास छात्रों को उसमें प्रवेश दिया। और हिन्दी के माध्यम से मात्र पांच वर्षों में उन्हें एम एस सी के कोर्स पूरे कराकर ”विज्ञान विशारद” की उपाधि से विभूषित किया। इस प्रकार के, प्रयोग से वे देश के शासन को दिखा देना चाहते थे, कि जापान की भाँति भारत का हर घर ”लघु उद्योग केन्द्र” हो सकता है।
दुर्भाग्यवश दो स्नातक टोलियों के निकलने के बाद  (१९५३-१९५४) ही चौधरी जी की मृत्यु हो गई, और प्रदेश सरकार ने ”विज्ञान कलाभवन” को इंटर कॉलेज में परिवर्तित कर  दिया। वहां तैयार किए गए ग्रन्थों के प्रति भी शासन को कोई मोह  नहीं था।

(दो) जनभाषा ही, उन्नति का रहस्य:
पर इस प्रयोग ने यह भी सिद्ध तो किया ही , कि जनभाषा ही आर्थिक उन्नति का रहस्य है। जनविज्ञान, विकास की आत्मा है।

(तीन) मिडिल उत्तीर्ण छात्र मात्र ५ वर्ष में  M Sc:
हिंदी मिडिल उत्तीर्ण छात्रों को प्रवेश देकर मात्र ५ वर्ष की शिक्षा के बाद M Sc की उपाधि प्राप्त कराई गई.
अब अंग्रेज़ी द्वारा उस समय, ११ वर्ष के बाद S S C + ४ वर्ष पर  B Sc +२ वर्ष M Sc= १७ वर्ष की कुल पढाई होती थी। तो, हिंदी माध्यम से ५ वर्ष का लाभ हुआ।

(चार) चिन्तन क्षमता वृद्धि:
साथ साथ  माध्यम हिन्दी होने के कारण, वैचारिक क्षमता का बढना, स्वतंत्र विचार की शक्ति बढना, चिंतन करने का अभ्यास इत्यादि लाभ भी हुए ही होंगे। अंग्रेज़ी की  रट्टामार प्रणाली से पैदा होते, गुलाम या तोताराम तो नहीं बने।

(पाँच) अंग्रेज़ी माध्यम की  भ्रान्तियाँ:
सबसे हानिकारक भ्रान्ति छात्र को गलत दिशामें भटकाना है।
(१) छात्र अंग्रेज़ी को ही बुद्धिमानीं का लक्षण मानता है।
(२) जिस आयु में उसका चिन्तन या विचार का विकास होना होता है; वह गलत दिशामें ,
अंग्रेज़ी को ही सीखने में लगा देता है।
(३) बहुतेरे छात्र यही भ्रम जीवन भर पालते हैं। फलस्वरूप  हम स्वतंत्र चिन्तक या संशोधक के बदले अंग्रेज़ी के गुलाम अफसर पैदा करते हैं।

(छः) राष्ट्र की हानि:
जिस  प्रजा को  हम १२ वर्षों में M Sc करवाकर सुशिक्षित करवा लेते, उसे अंग्रेज़ी माध्यम से १७ वर्ष लगते हैं। प्रति छात्र हम ५ वर्ष व्यर्थ करते हैं। उतने ही वर्ष वह छात्र उत्पादन की प्रक्रिया में सम्मिलित होकर
स्वयं की और राष्ट्र की प्रगति में सहयोग कर सकता था, उससे हम वंचित रहते हैं।पाँच वर्ष अधिक धनार्जन और उत्पादन चक्र में सम्मिलित हो सकता था।

(सात) अंग्रेज़ी या अन्य विशेष भाषा चाहो तो?
अब जिन्हें अंग्रेज़ी की ही पढायी करनी है, उन्हें आगे और २ वर्ष मात्र अंग्रेज़ी ही पढाइए। जैसे पी. एच. डी. के लिए (१२ क्रेडिट) ४ पाठ्य पुस्तकों के तुल्य जर्मन, फ़्रांसीसी, रूसी इत्यादि, किसी भी एक भाषा का अध्ययन करना पडता है। इसी के समान केवल अंग्रेज़ी ५ विषयों जितना, प्रति वर्ष अंग्रेज़ी पढाकर शिक्षित करें। दो वर्षों में इच्छित भाषा  का स्वामित्व प्राप्त कर लेंगे।

(आठ) अन्य भाषाएँ:
ध्यान रहे विविध भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है।
कभी रूसी आगे थी, कभी जर्मन थी, कभी अंग्रेज़ी आगे होती है।
हमें पर्याप्त मात्रा में चीनी, अरबी, रूसी, फ्रान्सीसी, जर्मन, हिब्रु, जापानी, इत्यादि भाषाओं के  भी जानकार चाहिए।
आज अंग्रेज़ी के कुछ अधिक चाहिए, पर सारा सट्टा अंग्रेज़ी पर ही लगाना मूर्खता होगी।
हमारी अपनी संस्कृत, पालि, तमिल, अर्धमागधी इत्यादि भाषाओं के भी विद्वान चाहिए।
सीमापर चीनी गति विधियों को जानने के लिए चीनी के जानकार काफी मात्रामें चाहिए।


(नौ)आर्थिक आँकडों का गणित:

अभी आर्थिक आँकडों का गणित सामने रखता हूँ।
जन भाषा के माध्यम से वही ज्ञान पाने में,  जो छात्र अंग्रेज़ी द्वारा पाता है, छात्र के कमसे कम ४ वर्ष बचते हैं।
देशके  I N Rupees  287.5 billion (US$5.23 billion)बचते है।  —२०११ के आँकडों के अनुसार।
देश के २८७.५ अबज रुपए बचते हैं। एक अबज =१०० करोड होते हैं।
{ये आँकडे कपिल सिब्बल जी के एक विवरण से लिए गए हैं।}

(दस) समर्पित और आदर्श शिक्षक:
शिक्षक समर्पित और आदर्श  होने चाहिए। भ्रष्ट शिक्षक नहीं चलेंगे।क्यों कि, शिक्षक राष्ट्र के प्रगति चक्र में प्रबलातिप्रबल कडी है। आरक्षित या अरक्षित जो भी हो, पर ज्ञानी और प्रतिबद्ध शिक्षक चाहिए।

जैसे शिक्षा का “भाषा-माध्यम” मौलिक घटक है। उसी प्रकार शिक्षक भी संस्कार देता है, ज्ञान देता है, अनुकरण के लिए आदर्श उपलब्ध करता है।

शिक्षक को गुरू ब्रह्मा, विष्णु, महेश इत्यादि माना है…… आप जानते हैं। गुरू संस्कार का पुंज है। छात्र गुरूका बहुतेरा अंधानुकरण करता है।


(ग्यारह)आर्थिक लाभ- हानि
:
जो ज्ञान अंग्रेज़ी द्वारा, M Sc तक पढकर, उपाधि(पदवी) अंग्रेज़ी के कारण, १७ वर्षों में मिलती है, वही हिन्दी द्वारा, १२ वर्ष में प्राप्त होती है। तो हमारा शिक्षापर किया गया ५/१७ व्यय बच जाता है.
{टाईम्स ऑफ़ इंडिया मई १३ -२०११ का समाचार}
As a part of the tenth Five year Plan (2002–2007), the central government of India outlined an expenditure of 65.6% of its total education budget of I N Rupees  438.25 billion (US$7.98 billion) i.e. I N R  287.5 billion (US$5.23 billion)

I (Reporter) was sharing the dais with minister Kapil Sibal in Hyderabad sometime back, where he mentioned that the number of students in India under the age of 14 is 134 million — a remarkable number. {टाईम्स ऑफ़ इंडिया मई १३ -२०११ का समाचार} इन आँकडो का आधार पर निम्न गणित प्रस्तुत है।

(बारह)छात्र वर्षों की बचत:
१३४ मिल्लियन छात्र १४ वर्ष से कम आयु के हैं। प्रत्येक छात्र के ५ वर्ष भी लगभग लगाएं, तो १३४x५=६७०,०००,०००  छात्र वर्ष बच जाते हैं।
अब आप का राष्ट्रीय व्यय कम होता है।
६७० मिलियन वर्ष का अधिक काम कुल छात्र  कर पाते।
ऐसा गुणाकारवाला गणित हमारे नेताओं ने करना चाहिए था।
ऐसे अनुमानित गणित से प्रायः ३० प्रति शत  बचत होती है. अर्थात ०.३x४३८ =१३१ बिलियन रुपए= १३१०००००००००००० रुपए बच जाते हैं|
पाठकों कुछ स्थूल हिसाब और विचार आपके समक्ष रखे हैं।

सूचना:

ये अनुमानित गणित स्थूल ही है। पर आँख खोलनेवाला है। अफ्रिका के ४६ देश परदेशी माध्यम के कारण पिछडे हैं।क्या हम अफ्रिका के उदाहरण से कुछ सीख सकते थे? या हम मूर्ख थे ?
क्रमशः आप की टिप्पणियों की दिशा जानकर अगला आलेख बन सकेगा। मुक्त विचार रखिए।

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13 Comments on "हिन्दी शिक्षा माध्यम का आर्थिक लाभ (एक)"

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Rekha Singh
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अपनी भाषा मे शिक्षा प्राप्त करने से जीवन जीने के तरीके भी बच्चों मे स्वतः विकसित होते है । हां अन्य भाषाओं का ज्ञान भी बहुत आवश्यक है , बच्चो के बहुमुखी विकास के लिए , जैसा की लेख मे समाहित है । मेरा अपना अनुभव है की जब बालक – बालिका अपनी भाषा मे पाठशाला मे नही पढ़ते तब उनमे अव्यवहारिक संस्कार जन्म लेते है और कभी कभी अपने माता -पिता , सगे सम्बन्धी , दादा दादी , नाना -नानी , अपना खान -पान , अपनी वेश -भूषा , अपने देश और संस्कृति को नीचा समझने लगते है ।… Read more »
डॉ. मधुसूदन
Guest
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति के पूर्वाध्यक्ष का निम्न संदेश एक प्रमाण पत्र है। पाठकों के सामने रखने में गौरव अनुभव कर रहा हूँ। साथ तिवारी जी का आभार भी व्यक्त करता हूँ।—-मधुसूदन ———————————————- Subject: Re: हिन्दी माध्यम से शिक्षा का आर्थिक लाभ—मधुसूदन आ; मधु भाई, नमन मैं प्रायः आपके सारे आलेख पढता हूँ, पर आपको लिख नहीं पाता| इसका दुःख है| हिंदी के रास्ते में कठिनाईयां पैदा करने के लिए कई बहाने अपनाये जाते हैं, जैसे हिंदी पढ़ने से रोजगार नहीं मिलेगा, वैज्ञानिक विषय हिंदी में नहीं पढ़ाये जा सकते; आदि | आपने इन कई अवरोधों को निशाना बनाकर लिखा है,… Read more »
डॉ. मधुसूदन
Guest

इ मैल से आया संदेश।समय लेकर टिप्पणी देने के लिए, लेखिका का आभार।—मधुसूदन।
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आदरणीय मधुसूदन जी ,
आपके द्वारा उल्लिखित आँकड़े अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं । समय और धन सम्बन्धी बचत का गणित वस्तुत: अत्यधिक
समयसाध्य और परिश्रमसाध्य है । शिक्षाविदों और शासन के उच्च पदाधिकारियों का ध्यान इस आलेख की ओर आकृष्ट हो और वे इस पर गम्भीरता से विचार करके शिक्षणप्रणाली की योजनाएँ बनाएँ , तभी आपका परिश्रम सफल होगा और देश का कल्याण हो सकेगा । इस अत्यन्त उपयोगी एवं व्यवहारिक आलेख के लिए अनेकानेक साधुवाद!!
सादर,
शकुन्तला बहादुर

Mohan Gupta
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ड्र. मदुसूदन जी ने अपने इस लेख द्वारा हिंदी विरोधी लोगो के तर्कों को प्रभावहीन कर दिया और एक सत्यता को अधिक वल दिया हैं। एक विदेशी भाषा के माधयम से शिक्षा में , विद्यार्थी का अधिक समय विदेशी भाषा सिखने में खर्च होता हैं और विषय के ज्ञान पर बहुत कम समय खर्च करता हैं। अंग्रेजी भाषा से कौन कितना बुद्धिमान बन जाता हैं , यह कहना कठिन हैं वल्कि व्यक्ति अंग्रेजी वस्तुऐ , खान पीन , पहनाबा इत्यादि अपना लेता हैं। यह एक आश्चर्य का विषय हैं भारत में अंग्रेजी को इतना अधिक महत्व प्राप्त हैं जबकि भारत… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
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राजेश कपूर
* डा. साहेब आपका कहना मूल्यवान सत्य है. पर यह सत्य आजतक नेहरू परंंपरा के मूढोंको समझ नहीं आया. समझे की उनकी नीयत ही नहीं थी. * स्व भाषा के माध्यम से जापान के विकास का प्रमाण आपने दिया था. चीन, फ्रांस, जर्मन जैसे देशों के उदहारण हमारे सामने हैं. ** एक और भयावह समस़्या हम भारतीयों के लिये मुसीबत बन चुकी है पर इस पर अभीतक किसी का ध्यान ही नहीं ग़ा है.इस समस्या का निराकरण क्ये बिना भारत की प्रतिभाओं को बचपन में ही मार देने का काम जारी रहेगा. – भारत के विद्यालयों के लाखों बच्चों से… Read more »
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