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 डॉ. सत्यनारायण सोनी

हिन्दी विश्व में बोली जाने वाली दूसरी सबसे बड़ी भाषा है। पहले स्थान पर चीनी है, जबकि अंग्रेजी तीसरे स्थान पर है। भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह एक अत्यंत ही समृद्ध भाषा है। उत्तर भारत में हिमालय एवं दक्षिण में विंध्याचल, सतपुड़ा तक तथा सिंधु, गंगा व यमुना के विशाल मैदानों तक में इसका प्रसार है। जन-जन की जुबान पर आसीन हिन्दी भाषा ने भारत के लोगों को एक संस्कृति, कला, रीति-रिवाज एवं संपर्क का सहज सुलभ माध्यम प्रदान किया है। अनेकानेक विशेषताओं तथा सरलता, सहजता, समझने में आसान, लिखने तथा बोलने की एकरूपता, आमजन को भी स्वतः सहज समझ में आ जाना आदि के कारण करोड़ों लोगों की जुबान तक पहुंच पाने की समर्थता हिन्दी ने स्वयं में विकसित की। निरंतर इसके बोलने वालों की संख्या बढ़ रही है तथा यह विश्व की दूसरी बड़ी भाषा बन गई है।

इन्हीं सब विशेषताओं के दृष्टिगत हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा के दर्जे से सुशोभित किया जाता है, मगर वास्तविकता यही है कि आज हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा न देकर सिर्फ राजभाषा ही बनाया जा सका है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा इसे हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है।

स्वतंत्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जो भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343 (1) में इस प्रकार वर्णित हैः

‘‘संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतराष्ट्रीय रूप होगा।’’

भारत के अन्य हिस्सों में हिन्दी को सीखने-सिखाने का अभियान चलाकर पूरे भारतवर्ष को हिन्दी बोलने में समर्थ बनाए जाने के उपरान्त राजभाषा हिन्दी को राष्ट्रभाषा के पद पर सुशोभित किए जाने का निर्णय लिया गया। परन्तु हिन्दी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनाने के गम्भीर प्रयास अभी तक नहीं किए जा सके हैं।

आज सर्वत्र विदेशी भाषा अंग्रेजी का बोलबाला होता जा रहा है। हिन्दी या किसी अन्य भारतीय भाषा बोलने वालों को गंवार समझा जाने लगा है। फलस्वरूप हर भारतीय नागरिक अपने बच्चों को महंगे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाने में ही अपनी प्रतिष्ठा समझने लगा है। विडम्बना तो यह है कि आज खोजने पर भी शहर या गांव में किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान का नाम हिन्दी या स्थानीय भाषा में नहीं मिलेगा। एक दूसरी विडम्बक स्थिति यह है कि भारतीय भाषाओं को ही हिन्दी विरोधी प्रचारित किया जा रहा है तथा केवल खड़ी बोली को ही हिन्दी के रूप में स्वीकृत समझा जा रहा है। असल में हिन्दी का दायरा इतना संकुचित नहीं, बल्कि यह बहुत व्यापक है। हिन्दी महज एक भाषा नहीं, बल्कि यह भारतीय भाषाओं के संगठन का नाम है।

डॉ. जाकिर हुसैन ने ठीक ही कहा था कि हिन्दी वह धागा है जो विभिन्न मातृभाषाओं रूपी फूलों को पिरोकर भारत माता के लिए सुंदर हार का सृजन करेगी। भारतीय भाषाएं उसके विकास में सहायक हैं तथा हर भारतीय भाषा ने अपने शब्दों और साहित्य से हिन्दी को समृद्ध किया है। भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ं‘भाषा’ के मई-जून, 2004 के अंक पर आवरण चित्र के रूप में हिन्दी को एक पुष्प तथा भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज भाषाओं को उसकी पंखुड़ियांे के रूप में चित्रित किया गया है। निश्चय ही इस फूल में जितनी अधिक पंखुड़ियां होगी, हिन्दी उतनी ही अधिक समृद्ध होगी। हम चाहते हैं कि इस फूल में राजस्थानी रूपी पंखुड़ी भी लगे जिससे हिन्दी समृद्ध हो और राजस्थानी का मान बढ़े।

एकरूपता की दृष्टि से खड़ी बोली का परिष्कृत रूप हिन्दी के मानक रूप में सर्वत्र स्वीकार्य है, मगर स्थानीय शब्दावली और मुहावरों को भी पर्याप्त सम्मान मिलना चाहिए। हिन्दी के विकास के लिए जरूरी है कि उसमें हर क्षेत्र के भाषाई स्वरूप को समाहित किया जाए। असल में हिन्दी भारत का प्राणतत्त्व है। किसी भी प्रकार से इसकी सुरक्षा और संरक्षा करना जरूरी है। हर व्यक्ति अगर हिन्दी के प्रति श्रद्धा का भाव रखे, इसे अपना समझे, इसकी समृद्धता पर संशय न करे तथा दूसरे की थाली में लड्डू बड़ा देखने की भ्रामक स्थिति से निजात पाए तो निश्चय ही हिन्दी का सम्मान बढ़ेगा। यहां यह मतलब कतई नहीं है कि हम अपनी मातृभाषा की कद्र न करें या अंग्रेजी का व्यवहार बंद कर दें। जहां अंग्रेजी की जरूरत है, वहां हमें उससे परहेज नहीं करना चाहिए, मगर बिना आवश्यकता के हम यदि अपनी भाषाओं को हेय दृष्टि से देखते हुए उनके स्थान पर विदेशी भाषा को आसीन करें तो यह निश्चय ही हमारी संकीर्ण मानसिकता का ही परिचायक है। यह भी ध्यातव्य है कि राष्ट्रभाषा के प्रति सम्मान के नाम पर हमें अपनी मातृभाषाओं की बलि भी नहीं चढ़ा देनी चाहिए। क्योंकि राजस्थानी, पंजाबी, गुजराती, मराठी, बांगला आदि भाषाएं यदि बची रही तो हिन्दी का भी विकास होगा, क्योंकि ये ही वे भाषाएं हैं जिनसे हिन्दी का निरंतर विकास होता रहा है। अतः लोक व्यवहार में प्रचलित भाषाओं, उसके मुहावरों और लोकगीतों से हमारा लगाव बना रहना चाहिए। यह सब हिन्दी के हित में अनिवार्य है। हिन्दी के निर्माणक तत्त्वों से अलगाव का भाव कभी हिन्दी के लिए हितकारी नहीं हो सकता।

यहां एक अन्य उदाहरण से बात को स्पष्ट करना समीचीन होगा। जिस प्रकार राज्य-पक्षी राष्ट्रीय-पक्षी का तथा राज्य-पुष्प राष्ट्रीय-पुष्प का किसी भी मायने में विरोधी नहीं हो सकता। ठीक उसी प्रकार कोई राज्य की भाषा भी राष्ट्रभाषा के लिए अहितकारी नहीं हो सकती। जरूरत है एक सकारात्मक सोच तथा भ्रामक प्रचार से बचने की। आइए, हम अपनी मातृभाषाओं के प्रति पूर्ण श्रद्धाभाव रखते हुए राष्ट्रभाषा हिन्दी को ठीक वैसा ही सम्मान दें और दिलवाएं जो सम्मान हमारे राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान को दिया जाता है, क्योंकि मातृभाषा हमारे हृदय का हार तो राष्ट्रभाषा हिन्दी हमारे मस्तक का ताज है।

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