लेखक परिचय

डॉ. सौरभ मालवीय

डॉ. सौरभ मालवीय

उत्तरप्रदेश के देवरिया जनपद के पटनेजी गाँव में जन्मे डाॅ.सौरभ मालवीय बचपन से ही सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्र-निर्माण की तीव्र आकांक्षा के चलते सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए है। जगतगुरु शंकराचार्य एवं डाॅ. हेडगेवार की सांस्कृतिक चेतना और आचार्य चाणक्य की राजनीतिक दृष्टि से प्रभावित डाॅ. मालवीय का सुस्पष्ट वैचारिक धरातल है। ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और मीडिया’ विषय पर आपने शोध किया है। आप का देश भर की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर समसामयिक मुद्दों पर निरंतर लेखन जारी है। उत्कृष्ट कार्याें के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका है, जिनमें मोतीबीए नया मीडिया सम्मान, विष्णु प्रभाकर पत्रकारिता सम्मान और प्रवक्ता डाॅट काॅम सम्मान आदि सम्मिलित हैं। संप्रति- माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। मोबाइल-09907890614 ई-मेल- malviya.sourabh@gmail.com वेबसाइट-www.sourabhmalviya.com

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-सौरभ मालवीय

भारतीय समाज में अंग्रेजी भाषा और हिन्दी भाषा को लेकर कुछ तथा कथित बुद्धिजीवियों द्वारा भम्र की स्थिति उत्पन्न की जा रही है। सच तो यह है कि हिन्दी भारत की आत्मा, श्रद्धा, आस्था, निष्ठा, संस्कृति और सभ्यता से जुड़ी हुई है।

बोली की दृष्टि से संसार की सबसे दूसरी बड़ी बोली हिन्दी हैं। पहली बड़ी बोली मंदारीन है जिसका प्रभाव दक्षिण चीन के ही इलाके में सीमित है चूंकि उनका जनघनत्व और जनबल बहुत है। इस नाते वह संसार की सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है पर आचंलिक ही है। जबकि हिन्दी का विस्तार भारत के अलावा लगभग 40 प्रतिशत भू-भाग पर फैला हुआ है लेकिन किसी भाषा की सबलता केवल बोलने वाले पर निर्भर नहीं होती वरन उस भाषा में जनोपयोगी और विकास के काम कितने होते है इस पर निर्भर होता है। उसमें विज्ञान तकनीकि और श्रेष्ठतम् आदर्शवादी साहित्य की रचना कितनी होती है। साथ ही तीसरा और सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उस भाषा के बोलने वाले लोगों का आत्मबल कितना महान है। लेकिन दुर्भाग्य है इस भारत का कि प्रो. एम.एम. जोशी के शोध ग्रन्थ के बाद भौतिक विज्ञान में एक भी दरजेदार शोधग्रंथ हिन्दी में नहीं प्रकाशित हुआ। जबकि हास्यास्पद बाद तो यह है कि अब संस्कृत के शोधग्रंथ भी देश के सैकड़ों विश्वविद्यालय में अंग्रेजी में प्रस्तुत हो रहे है।

भारत में पढ़े लिखे समाज में हिन्दी बोलना दोयम दर्जे की बात हो गयी है और तो और सरकार का राजभाषा विभाग भी हिन्दी को अनुवाद की भाषा मानता है। परन्तु अब तो संवैधानिक न्यायायिक संस्थायें (उच्च न्यायालय और उच्चतम न्याय) भी यह कह रहे है कि हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा नहीं है जबकि संसार के अनेक देश जिनके पास लीप के नाम पर केवल चित्रातक विधिया है वो भी विश्व में बडे शान से खडे है जैसे जापानी, चीनी, कोरियन, मंगोलिन इत्यादि, तीसरी दुनिया में छोटे-छोटे देश भी अपनी मूल भाषा से विकासशील देशो में प्रथम पक्ति में खड़े है इन देशों में वस्निया, आस्ट्रीया, वूलगारिया, डेनमार्क, पूर्तगाल, जर्मनी, ग्रीक, इटली, नार्वे, स्पेन, वेलजियम, क्रोएशिया, फिनलैण्ड फ्रांस, हंग्री, निदरलैण्ड, पोलौण्ड और स्वीडन इत्यादि प्रमुख है।

रही बात भारत में अंग्रेजी द्वारा हिन्दी को विस्थापित करने की तो यह केवल दिवास्वपन है क्योंकि भारतीय फिल्मों और कला ने हिन्दी को ग्लोबल बना दिया है और भारत दुनिया में सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार होने के नाते भी विश्व वाणिज्य की सभी संस्थाएं हिन्दी के प्रयोग को अपरिहार्य मान रही है। हमें केवल इतना ही करना है कि हम अपना आत्मविश्वास जगाये और अपने भारत पर अभिमान रखे। हम संसार में श्रेष्ठतम् भाषा विज्ञान बोली और परम्पराओं वाले है। केवल हीन भाव के कारण हम अपने को दोयम दर्जे का समझ रहे है वरना आज के इस वैज्ञानिक युग में भी संस्कृत का भाषा विज्ञान कम्प्यूटर के लिए सर्वोत्तम पाया गया है।

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21 Comments on "हिंदी भारत की आत्‍मा है"

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Ravindra Nath
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सौरभ जी के द्वारा उठाया गया यह विषय निस्संदेह अत्यंत महत्वपूर्ण है, यद्यपी यह कोई नवीन चिंता का विषय नहीं है परन्तु दुर्भाग्य से इस पर कोई सार्थक एवं उल्लेखनीय पहल नहीं हुई है| उस पर बड़ा दुर्भाग्य यह है कि हिंदी भाषी क्षेत्र में इस विषय पर मात्र राजनीती की रोटियां ही सेंकी जाती हैं और यहाँ भी गंभीर चिंतन का निनान्त अभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है| आज हिंदी भाषा भाषी राज्यों में english medium के विद्यालयों की बढती संख्या एवं उसको दिया जाने वाला सम्मान इस का द्योतक है की यह क्षेत्र हिंदी को उसके सम्माननीय पद पर… Read more »
आलोक मिश्र
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सौरभ जी को इस लेख के लिए हार्दिक धन्यवाद और बधाइयाँ। भविष्य में भी आपसे ऐसे ही उत्कृष्ट विचारों की आशा रहेगी।

विकास आनन्द
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Sourabhji ne thik likha hai.china bahut mamlo me humse age hai .kyoki vah apna sara kam apni bhasa chinese me karte hai. sabse badi bat sourabh ji jo ki essay ke writer hai unki hindi kaphi utkrist kism ki hai.

अजित सिंह
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अजित सिंह
सौरभ बाबू ने कुछ लिखा है तो कुछ सोचा भी होगा। मैं उनकी इस सोच में एक-दो बातें जोड़ देना चाहता हूँ। पहली बात, हिन्दी को राजभाषा का दर्जा नहीं मिल पाया है तो इसमें राजनीति के अलावा “हिन्दी वालों” का भी बहुत दोष है। आज लोग अंग्रेजी को रोजगार की भाषा के रूप में देखते हैं और इस नाम पर समाज का एक वर्ग गैर अंग्रेजी वालों के साथ अन्य अत्याचारों के साथ साथ भाषाई अत्याचार भी करता है, क्योंकि इसमें उसकी सुविधा और हित जुड़े हैं। लेकिन हिन्दी वालों ने हिन्दी को रोजगार की भाषा बनाने के लिए… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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अजित सिंह
“डॉ. प्रो. मधुसूदन जी से आग्रह है कि यदि वे अपना शोध निबंध दे सकें तो इस दिशा में हम भी कुछ नया जान पाएंगे और कुछ करने की कोशिश करेंगे।”
उत्तर: मान्यवर अजित सिंह जी के आग्रहपर, इस विषय पर, सामान्य पाठक को रूचिकर हो, ऐसा प्राथमिक स्तरका निबंध निश्चित “प्रवक्ता” में प्रस्तुत करनेका प्रयास करूंगा।
डॉ. मधुसूदन उवाच
PH. D.
Prof. Structural Engineering
University of Massachusetts.
Dartmouth, USA

अजित सिंह
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अजित सिंह

डॉ. प्रो. मधुसूदन जी के शोध निबन्ध का बेसब्री से इन्तज़ार है।
यदि डॉ. साहब कुछ अन्य सामग्री भी साझा करना चाहते हों तो उसे मेरे ई-मेल पर भेज सकते हैं।
मेरा ई-मेल है ajitarsh@gmail.com
धन्यवाद।

डॉ. मधुसूदन
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“एक हिंदीकी भाषा महिमा” का लेख नीचे पते पर पढें।
आपका ए मैल आप तक पहुंचे बिना वापस आता है। आप मुझे mjhaveri@umassd.edu पर संदेश भेजे, तो शायद मिल पाए।

http://evishwa.com/articledetail.php?ArticleId=43&CategoryId=0

roshan
Guest

saurabh bhai aap jo kaam kar rahe hia, wah bahut bada yogdaan hai, vichaar ko aage badhte rahe, shubh kaamnaayein

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