जगत मिलन

-मिलन सिन्हा-
poem

1.जगत मिलन
सख्त चेहरा था उसका
पत्थर जैसा
झांक कर देखा अंदर
बच्चों सा दिल
मोम सा पिघलने लगा
संकल्प था उसके मन में
सपना सबका पूरा करूँगा
मिलन का वातावरण होगा
हर होंठ पर स्मिति ला दूंगा
शालीन बनकर साथ रहूँगा।

2.सार्थक कोशिश

सागर तट पर
अकेले बैठे
दूर तक
लहरों को आते-जाते देखना
उसमें, फिर खुद में खो जाना
एक सार्थक कोशिश है
अपने ‘स्व’ को ढूंढ़ने का
उसे बचाये रखने का
इस कोलाहल भरे
निरंतर बढ़ते महानगर में।

3. अंतः मन

सूरज उगता है
लालिमा छा जाती है
सूरज डूबता है
लालिमा फिर छा जाती है
मनुष्य के जन्म
एवं
उसके मृत्यु के वक्त
अंतः मन में
कुछ ऐसा ही होता है, क्या?

4. जीवन के बीज

बारिश होती है
भागता है शहरी
तलाशता है छत
पीता है चाय
बारिश होती है
झूमता है देहाती
बाहर आता है छोड़कर छत
बोता है जीवन के बीज।

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