लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉ. मधुसूदन

(१) कुछ नितान्त सरल सहज समझ में आए ऐसे शब्दों का चयन करते हुए, हिंदी (संस्कृत भी) और अंग्रेज़ी का कुछ अनुसंधान करने का प्रयास इस संक्षिप्त लेख में करने का विचार है। पाठकों की, और कुछ इ मैल द्वारा प्राप्त हुई, अन्य प्रतिक्रियाओं से उत्तेजित होकर, यह और एक लघु-निबंध लिखने की चेष्टा कर रहा हूं। प्रारंभ दो महत्त्वपूर्ण उद्धरणों से करते हैं।

फिर कुछ ऐसे शब्द चुनता हूं, जो हिंदी एवं संस्कृत में समान रूप में विद्यमान है। इतना ही नहीं, भारत की अन्य प्राकृत, देशी भाषाओं में भी जो लगभग समान रूप में ही पाए जाते हैं।

(२) पहला उद्धरण अमरिकन इतिहासकार Will Durant से,

मूल अंग्रेज़ी : मेरा हिंदी अनुवाद: (निम्न)

विल ड्युरांट: (अमरिकन इतिहासकार)

”भारत हमारे वंशगत, प्रजाति की मातृ भूमि थी,

और संस्कृत युरपकी भाषाओं की जननी:

वह हमारे दर्शन शास्त्र की जन्मदात्री थी;

अरबों द्वारा हमें प्राप्त हुए गणित (के ज्ञान) की माता,

बुद्ध द्वारा प्रसारित, इसाइ संप्रदाय के आदर्शों की भी जननी वही है।

ग्राम पंचायत की परंपरा से प्राप्त, स्वशासन और जनतंत्र की जननी भी, भारत ही है।

भारत माँ अनेकविध परंपराओं से हम सभी की माँ ही है।”

(३) सर विल्यम जोन्स (ब्रिटीश प्राच्यवेत्ता) -मेरा अनुवाद:

”संस्कृत भाषा जो कुछ भी उसकी प्राचीनता हो,

अद्भुत गठन (संरचना ) वाली,

युनानी(ग्रीक) से अधिक परिपूर्ण,

लातिनी(लॅटीन) से अधिक शब्द-समृद्ध,

और (लातिनी और युनानी) दोनों से अधिक सूक्ष्मता से,

परिष्कृत (साफ ) की गई भाषा है।”

(४) अब कुछ सरल शब्दों का अनुसंधान स्रोत ढूंढते हैं।

NAME: एक सरलतम हिंदी/संस्कृत का शब्द है ”नाम”। इसीसे प्रारंभ करता हूं। यही नाम अंग्रेज़ी में पहुंचकर नेम (Name) हो गया है। कुछ और प्रयास से यह पता लगा कि इस Name का ही कुछ सदियों पहले का स्पेल्लिंग भी Nahm (ना:म) हुआ करता था।इस नाःम की आप नामः शुद्ध संस्कृत से तुलना कर सकते हैं। यह स्पेल्लिंग मैं ने किसी पुस्तक या शोध-लेख में पढा हुआ स्मरण होता है। अब आपके ध्यान में आया होगा, शुद्ध संस्कृत का नामः (Namah), पहले नाःम (Nahm) बना, और बाद में नेम (Nemउच्चारण ) Name बना। शायद और भी कुछ बदलाव की कडियोंसे गया होने का संभव नकारा नहीं जा सकता, पर मुझे यही जंचता है।

(५) DOOR: दूसरा परिचित हिंदी-संस्कृत शब्द है ”द्वार” (दरवाज़ा)। अब अंग्रेज़ी मे यही द्वार –>डोअर बना हुआ है।मेरा अनुमान है, यह डोअर उच्चारण बनने के पहले कुछ निम्न बदलाव की कडियों से रुपांतरित हुआ होगा। द्वार –> ड्वार—>ड्वॉर–>डोअर (जो आज कल) प्रयुक्त होता है।

(६)COW: तीसरा अपना ”गौ” शब्द लेते हैं। उच्चारण प्रक्रिया को समझने में सरलता हो, इसलिए यह जानने की आवश्यकता है, कि, उच्चारण की दष्टि से क और ग दोनों का उचारण मुख-विवर के कंठ के भाग से ही आता है। यही गौ, गऊ (हिंदी) भी उच्चारित होता है। यही गऊ -गाउ और गाउ से काऊ जो आज कलका COW –स्पेल्लिंग से लिखा जाता है।

अब संक्षेप में कुछ शब्दों की परिवर्तन शृंखला देखते हैं।

वयं (संस्कृत हम अर्थ में)–>वईं (प्राकृत) —>We (अंग्रेज़ी)

यूयं (संस्कृत आप अर्थ में) —>You (यू अंग्रेज़ी)

ते (संस्कृत वे के अर्थ में) —दे- They (अंग्रेज़ी)

तत्‍ (संस्कृत वह अर्थ में)) That (दॅट-अंग्रेज़ी)

और भी बहुत शब्दों को ढूंढा जा सकता है।

अगले लेख में कुछ धातुओं का अंग्रेज़ी में फैलाव ढूंढा जाएगा।

पाठक भी ऐसा प्रयास करे, और टिप्पणियों में दिखाने की कृपा करें।

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2 Comments on "हिंदी-संस्कृत-अंग्रेज़ी स्रोत -पहला भाग"

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विश्व मोहन तिवारी
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बहुत उत्तम
बहुत धन्यवाद
विश्वमोहन

Radheshyam
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त्रि = Three

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