लेखक परिचय

दीपक शर्मा 'आज़ाद'

दीपक शर्मा 'आज़ाद'

स्वतंत्र पत्रकार, जयपुर

Posted On by &filed under जन-जागरण, हिंद स्‍वराज.


एक राष्ट्र अपने धर्म का अपमान करने की जब भूल करने लगता है तब उसे भारत विभाजन के दौर से गुजरना पड़ता है, जब वही राष्ट्र दुबारा अपने धर्म को भूल उसका अपमान करता है तो उसे जम्मू और कश्मीर सुंदरता नहीं एक दाग की भांति लगने लगता है| और जब वह अपने इन कठोर और बुरे अनुभवों को भूल कर फिर वही गलती दोहराने लगता है तो उसे अपने ही घर में राष्ट्रद्रोहियों को पोषित करने का पाप मिलता है| और ऐसा राष्ट्र कभी भी सुखपूर्वक जीवन नहीं व्यतीत कर सकता है| हमारे राष्ट्र में अब तक होने वाले जितने भी आतंकी हमले जो हुए हैं वो सब हमारे राष्ट्रधर्म कि अवहेलना करने के कारण ही हुए हैं|

इन दिनों हमारी संसद में एक विवाद तूल पकड़ता नजर आ रहा है धर्म सम्बन्धी विवाद, और हमारी सोशल मीडिया में भी इस पर रायशुमारी शुरू हो गयी है| मित्रगण सही कह रहे हैं की राष्ट्र धर्म को लेकर अब राष्ट्रव्यापी बहस होनी ही चाहिए, आखिर देखें तो कौन किस खेत कि मूली है| देश की आज़ादी के तुरंत बाद जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री ने इस राष्ट्र के साथ छल किया और संविधान में जबरदस्ती धर्मनिरपेक्षता को जोड़ा गया जबकि देश का विभाजन धर्म के आधार पर करवाया गया था, इसी कारण मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान का निर्माण हुआ और वो एक पडोसी देश बनने के बजाये हमारे लिए एक भयंकर नासूर बन गया| यदि देश में यही स्थिति रखनी थी की जगह-जगह मोपला जैसे कांड होते रहें, बार बार विभाजन का डर दिलों में बना रहें तो आखिर विभाजन ही क्यों किया गया, क्या उस समय इन आने वाली कठिन परिस्थितियों पर विचार-विमर्श नहीं किया गया था| तब भी क्यों हम आने वाले खतरों को अनदेखा कर वैमनस्य को ही बढ़ावा दे रहे हैं| लोकतंत्र कि बात करने सज्जनों को ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जिससे राष्ट्र को हिन्दू राष्ट्र होने से नाकारा नहीं जा सकता| वैसे भी ये तथाकथित लोकतंत्र के रक्षक अतिआधुनिक राष्ट्रों के ही तो समर्थक हैं, अमेरिका, लंदन, चीन, रूस आदि-आदि महान राष्ट्रों के उपासक ये मित्र जरा इन देशों की धार्मिक स्थिति भी संभाल लें तो इन्हें आइना नजर आएगा| लंदन और अमेरिका में तो मुस्लिम धर्म के अनुयायियों को किस दृष्टि से देखा जाता है ये किसी से छुपा नही है| भारत में आये दिन आतंकी घटनाएं होने के बाद भी सम्पूर्ण राष्ट्र मुस्लिम मित्रों को अपने अभिन्न अंग के भांति समझता है ये भारत की संस्कृति का ही चमत्कार है और वो संस्कृति है हिन्दू सनातन धर्म की संस्कृति|

एक जानकारी के अनुसार इस्लामिक धर्म को अधिकतम 1500 वर्ष ही हुए है और ईसाई धर्म 2014 वर्ष से ज्यादा पुराना है नहीं, तब सोचिये इससे पहले भी कोई धर्म इस संसार में निर्विवाद विचरण करता होगा| सृष्टि का निर्माण तो इन सबसे पहले हो चुका था तो क्या तब तक हम अधर्मी थे, नहीं न| तब हम सब हिन्दू थे, और आर्यवृत विश्व का सबसे पुराना राष्ट्र था| हमारे पूर्वज उन्नत थे वे किसी के मोहताज नहीं थे| आप ने अपनी इतिहास की पुस्तकों में इतना तो खैर पढ़ा ही होगा की लगभग 16 वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत से व्यापार करने मुग़ल बादशाह जहांगीर के शासन के दौरान प्रवेश किया था, और 1612 में हिन्द महासागर में भारत के लिए पुर्तगाली और ईस्ट इंडिया में लड़ाई हुई थी तो जरा ये समझिए उस समय हम इतने अमीर थे की ये समृद्ध राष्ट्र हमारे साथ व्यापार करने के लिए आपस में लड़ते थे| मुग़ल भी हमारे देश की समृद्धि देखकर ही आये थे, वे आर्यवृत से सम्बन्ध नहीं रखते थे| अत: इन सबसे पहले भारत एक हिन्दू राष्ट्र था वह सनातन धर्म का समर्थक था, वह धर्म जिसने अन्य राष्ट्रों को गौतम बुद्धा और महावीर जैसे उपासक देकर जीवन जीने का तरीका सिखाया था|

फिर ये सब आज हम क्यों भूल रहे हैं, इसके पीछे का कारण क्या हैं? क्या आप ये जानते हैं, नहीं! तो चलिए मैं बताता हूँ| हम अपने कृत्तव्यों को भूल गए हैं और अपने अधिकारों की मांग करने लगे हैं| हम अपने पुत्र होने का कर्त्तव्य छोड़कर, स्वार्थ में घिर सम्पत्ति में अपना अधिकार मांगने लगे हैं| आपमें से कितने मित्र ऐसे हैं जो अपने कृत्तव्यों को भलीं भांति समझते हो! मुझे लगता हैं आप मात्र कुछ ही संख्या में होंगे| आप अपना इतिहास नहीं जानते और न ही उसे पढ़ने की कोशिश करते हैं, आपके पूर्वजों के बारे में आप केवल अपने दादा-परदादा तक ही जानते हैं उससे आगे आप न तो जानते हैं और न ही जानने कि ईच्छा ही रखते हैं| इसका सीधा सा उदाहरण हैं कि आपके ही एक धर्मग्रन्थ जिसे पूरा विश्व आदर की दृष्टि से देखता हैं ‘गीता’, उसे जब राष्ट्रीय धर्मग्रन्थ माना जाने लगे तो विरोध शुरू हो गया.. क्यों? योग, एक ऐसी विधा जिसने भारत आज पुनः विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर किये हुए हैं को बार-बार अपमानित होना पड़े ऐसी स्थिति आखिर क्यों? ऐसे ही राष्ट्र धर्म पर भी इस तरह का विवाद उठाना भी अपने धर्म से विमुख होने और अपने कृत्तव्यों को भूल जाना भी इसका ही एक उदाहरण हैं|

हमें इस दिशा में सोचना अब ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगा हैं की हम वाकई भारतीय हैं या पूरी तरह से इंडियन हो चुके हैं| भारतीय वह जो अपनी संस्कृति से प्यार करता हैं, जिसे संस्कृत भाषा भी एक उन्नत भाषा के तौर पर स्वीकार की जाती हो| जो हिन्दू-मुस्लिम और ईसाई में कोई भेद न समझता हो वही हिन्दू है और वही भारतीय भी है| पर इंडियन वह है जो असंस्कारी हैं, जिसे संस्कृत से ज्यादा जर्मन भाषा में अपनत्व नजर आता हो, और इस भाषा में बस विवाद ढूंढता हो, जिसे हिन्दू एक अपमानजनक शब्द लगता हो, जो केवल और केवल अंग्रेजी प्रेमी हो और जिसे अपने राष्ट्र कि एकता और अखंडता से कोई लेना देना नहीं हो| ऐसे लोग 1947 में अंग्रेजों के देश छोड़ने पर जो संकरित बीज कुछ देश में बचे थे वे लोग येही हैं|
इन्हें धिक्कार है….

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1 Comment on "हिन्दू राष्ट्रधर्म हैं, कोई विवाद नहीं!"

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Dr. kaushalendra
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भोजन, आवास, और सुरक्षा जीवन की मूलभूत अत्यावश्यकतायें हैं जिनके लिये संघर्ष होते रहे हैं । इन आवश्यकताओं की सुनिश्चितता के लिये कुछ शक्तिशाली लोग कभी राजतंत्र तो कभी लोकतंत्र के सपने दिखाकर स्वेच्छा से ठेके लेते रहे हैं । सभ्यता के विकास के साथ-साथ अवसरवादी लोगों ने भी धर्म के ठेके लेने शुरू कर दिये । भोजन, आवास और सुरक्षा की उपलब्धि के लिये एक सात्विक मार्ग के रूप में “धर्म” का वैचारिक अंकुश तैयार किया गया था किंतु अब मौलिक आवश्यकताओं की सुनिश्चितता के अन्य उपाय खोज लिये गये हैं और धर्म एक ऐसी भौतिक उपलब्धि बन गया… Read more »
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