राजनीति का हिन्दूकरण’ और सावरकर, भाग-1

vir-savarkarराकेश कुमार आर्य
क्रांतिवीर सावरकर जी का अपना सपना था कि ‘राजनीति का हिंदूकरण’ किया जाए। गांधी जी राजनीति के हिंदूकरण के विरोधी थे। सावरकर जी के इस कथन के प्रकाश में उनके आलोचकों ने उन्हें साम्प्रदायिक ठहराने का एकपक्षीय अनुचित प्रयास किया है। वीर सावरकर जी राजनीति के हिंदूकरण के जिस प्रकार समर्थक थे, आज उसे समझने की महती आवश्यकता है। उनके व्यक्तित्व की और चिंतन की इस उच्चतम पवित्रता को बड़ी सावधानी से समीक्षित करने की आवश्यकता है।

वीर सावरकर जी जिस काल में जी रहे थे और जिस ब्रिटिश सत्ता के विरूद्घ संघर्ष कर देश को स्वतंत्र करने-कराने में सहायक बने उस काल में सारा का सारा विधि-विधान पूर्णत: तानाशाही लोगों की मानसिकता का प्रतिबिम्ब मात्र था। इतना ही नही अंग्रेजों से पूर्व मुगल बादशाहों या तुर्क सुल्तानों के काल का इतिहास भी यह बताता है कि उस काल के शासकों की नीतियां भी साम्प्रदायिक और उत्पीडऩात्मक प्रवृत्ति से भरी हुई थीं। उनकी नीतियों में और विधि-व्यवस्था में पक्षपाती होने का भारी दोष था। सावरकर जी इतिहास के परमविद्वान थे। उन्होंने इतिहास का गहन अध्ययन किया था। अन्यायपरक और पक्षपाती शासन से लडऩे वाले क्रांतिकारियों के लिए ब्रिटिश शासन के नियम -उपनियम या विधि-विधान स्वीकार्य नही थे, ऐसी ही मान्यता मुगलिया शासन व्यवस्था के विषय में थी। हमारे क्रांतिकारियों ने विदेशी शासन के विरूद्घ लंबा संघर्ष किया था। उस लंबे संघर्ष के विषय में यह जानना आवश्यक है कि वह लड़ा क्यों गया था? और किसके द्वारा लड़ा गया था? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने पर पता चलता है कि भारत का दीर्घकालीन स्वतंत्रता संग्राम क्रूर मुस्लिम सत्ता और कालांतर में ब्रिटिश सत्ता के विरूद्घ लड़ा गया था। इस संघर्ष को लडऩे वाले राजा दाहर, गुर्जर सम्राट मिहिर भोज, पृथ्वीराज चौहान से लेकर महाराणा प्रताप, शिवाजी, दुर्गादास राठौड़, गुरू अर्जुन देव, गुरू गोविन्दसिंह, बंदा वीर वैरागी, छत्रसाल, रानी दुर्गावती, कश्मीर की रानी कोटा से लेकर भगतसिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, सुभाषचंद्र बोस आदि सभी हिंदू ही थे। इन जैसे हजारों लोगों ने अपने-अपने समय में देश में क्रांति मचाये रखी और इनका उद्देश्य उस समय देश में हिंदू राजनीति को ही स्थापित करना था।

1857 की क्रांति के समय असहाय मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर ने क्रांति के बाद हिंदू राजा के पक्ष में भी गद्दी छोडऩे की बात कही थी। ऐसा मुगल बादशाह इसलिए कहा था कि वह विदेशी अंग्रेजी सत्ता के अत्याचारों से दुखी हो चुका था, तब उन परिस्थितियों में उसने भी देश में ‘हिंदू राजनीति’ को अंग्रेजी राजनीति से उत्तम और अधिक मानवीय समझा था। जब हमारे सारे स्वतंत्रता संग्राम का उद्देश्य ही हिंदू राजनीति की स्थापना करना था तो उसके लिए वीर सावरकर ने ‘राजनीति के हिंदूकरण’ का यदि उद्घोष कर दिया था तो क्या बुरी बात हो गयी थी?
सावरकर जी के आलोचक या तो यह सिद्घ करें कि राजा दाहर से लेकर सुभाष चंद्र बोस तक के समस्त क्रांतिकारियों के संघर्ष का उद्देश्य ब्रिटिश कानूनों या मुस्लिम शरीया के अनुसार देश को चलाना था या फिर सावरकर जी के विषय में अनावश्यक और अनर्गल बातें करना बंद करें। अब प्रश्न है कि हिंदू राजनीति क्या है? इस प्रश्न को समझना इसलिए भी आवश्यक है कि इसी से सावरकर जी के ‘राजनीति के हिंदूकरण’ के रहस्य को समझा जा सकता है।

इस प्रश्न पर विचार करने के लिए अपेक्षित है कि राजनीति के परम लक्ष्य अर्थात उसके लोकल्याणकारी स्वरूप का ध्यान रखा जाए। इतिहास इस बात का साक्षी है कि साम्प्रदायिक शासन न्यायकारी और पक्षपातशून्य नही हो सकता। इसलिए राज्य का पंथनिरपेक्षतावादी होना आवश्यक है। ज्ञात रहे राज्य का यह पंथनिरपेक्षतावादी स्वरूप वास्तव में हिंदू राजनीति का मूल तत्व है। भारत ने विश्व को जो कुछ दिया है उसमें सबसे मूल्यवान देन राज्य के पंथनिरपेक्षतावादी स्वरूप की देन है। यद्यपि इस विचार को हमारे संविधान में दिया गया है और राज्य से ‘सैकुलर’ बनने की अपेक्षा की गयी है। परंतु यह ‘सैकुलर’ शब्द हिन्दू राजनीति के पंथनिरपेक्ष शब्द का स्थानापन्न नही है। इसका कारण ये है कि ‘सैकुलर’ शब्द को चरितार्थ और फलितार्थ करने के लिए भारतीय संविधान ने अपना कोई ‘राजधर्म’ घोषित नही किया है। इस महत्वपूर्ण विषय पर भारतीय संविधान का मौन रहना इसकी सबसे बड़ी विडंबना है।

भारतीय संविधान में ‘राजधर्म’ संबंधी प्रावधान को स्थापित कराने के लिए आदि संविधान निर्माता महर्षि मनु के राजधर्म को समझना होगा। जिसके विषय में हमारा मानना है भारतीय राजनीति के हिंदूकरण की बात कहकर वीर सावरकर जी ने महर्षि मनु द्वारा प्रतिपादित राजधर्म को अपनाने का चिंतन किया होगा।

महर्षि मनु की मनुस्मृति या वेद, स्मृति आदि-आदि में जहां-जहां राजनीति के मानवतावादी स्वरूप की कल्पना की गयी है, उस को सावरकर जी अपनाने और व्यवहार में लागू करने के पक्षधर थे। यह ऐसी राजनीति होती जिसे राजनीति ना कहकर ‘राष्ट्रनीति’ कहा जाता। इस राष्ट्रनीति का प्रथम कत्र्तव्य राष्ट्र की सेवा करना अर्थात जनकल्याण करना होता। ऐसे जनकल्याणकारी राष्ट्रनीति के उद्घोषक भारतवर्ष के लिए ही मि. मरे लिखता है:-”यह (भारतवर्ष) सदैव ही पाश्चात्य जगत की श्रेष्ठतम भव्य एवं वैभवशाली कल्पनाओं में रहा है, सोने और हीरे मोतियों से जगमगाता रहा है तथा सुगंधित और मोहक गंधों से सुवासित रहा है, यद्यपि इन शानदार बातों में कुछ काल्पनिक और भ्रांतिजनक भी लगता है परंतु फिर भी भारत का भूलोक में एक असंदिग्ध एवं महत्वपूर्ण स्थान है। इसके महान एवं विविध दृश्यों एवं इसकी भूमि की मूल्यवान उत्पत्तियों की विश्व में कोई भी तुलना नही है।”

महात्मा गांधी जी ने भारत में ‘रामराज्य’ की स्थापना की बात कही थी। वह ‘रामराज्य’ कैसा होता-यह तो वे स्पष्ट नही कर पाये-पर हमारी दृष्टि में ‘रामराज्य’ और सावरकर की ‘हिंदूनिष्ठ राजनीति’ में कोई अंतर नही है। हिंदूनिष्ठ राजनीति से बना ‘हिंदू राज्य’ ‘रामराज्य’ का ही समानार्थक है। क्योंकि रामचंद्रजी के काल में साम्प्रदायिकता के स्थान पर शुद्घ मानवतावाद था, और सारी राजनीति ही मानवतावाद की पोषक थी। उस समय की राजनीति में राजा की योग्यता और शासक वर्ग के भी कत्र्तव्य वर्णित थे। ये कत्र्तव्य किसी संविधान या किसी स्मृति की केवल शोभा बढ़ाने के लिए नही थे, अपितु राज्य व्यवस्था में लगे हुए लोगों से इनको अपनाने की अनिवार्य अपेक्षा की जाती थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि गांधीवादियों ने गांधी जी के ‘रामराज्य’ की कल्पना को अपनी ‘सैकुलरवादी’ सोच की बलि चढ़ा दिया, और सावरकर जी की ‘हिंदूनिष्ठ राजनीति अथवा राजनीति के हिंदूकरण’ की सोच को बिना सोचे समझे ही साम्प्रदायिक कहकर विस्मृति के गड्ढे में डाल दिया। अच्छा होता कि ये लोग हिन्दूनिष्ठ राजनीति के रहस्य को समझते और लोगों को समझाते तो आज की कितनी ही समस्याओं की उत्पत्ति ही नही होती। राजनीति का हिंदूकरण करने का अभिप्राय मनु स्मृति की इस व्यवस्था में ढूंढ़ा जा सकता है-”जैसा परमविद्वान ब्राह्मण होता है, वैसा विद्वान सुशिक्षित होकर क्षत्रिय को योग्य है कि इस सब राज्य की रक्षा न्याय से किया करे।”

मनु के आलोचक और भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ घोषित करने को पाप मानने वाले मनु के राजधर्म की व्यवस्था पर तनिक विचार करेें कि इसमें साम्प्रदायिकता कहां है? दूसरे यह भी समझें कि इस व्यवस्था से किसी वर्ग विशेष का ही लाभ होता है या संपूर्ण देशवासियों को इससे लाभ मिलता है? इसमें दो बातें हैं-एक तो राजा का परम विद्वान होना अपेक्षित है, दूसरे वह राज्य की रक्षा न्याय से किया करे। हिंदूनिष्ठ राजनीति का यह प्रथम सूत्र सभी राष्ट्रवासियों के नायक को परमविद्वान होना अनिवार्य मानता है, और साथ ही सभी लोगों को यह विश्वास दिलाता है कि राज्य उनके साथ पक्षपात रहित होकर बिना किसी वैरभाव के व्यवहार करेगा। ‘न्याय’ का अभिप्राय ही यह है कि जिस वस्तु पर जिसका अधिकार है और जो वस्तु वास्तव में उसे मिल जानी चाहिए वह उसे दे दी जाए।

राजनीति के हिंदूकरण का अभिप्राय है कि राजनीति को योगक्षेमकारी बना दिया जाए। क्योंकि योगक्षेमकारी राजनीति ही स्वाधीनता के योगक्षेमकारी स्वरूप की रक्षिका हो सकती है। योग का अर्थ है जो आपको मिल गया है उसकी रक्षा करना, और क्षेम का अर्थ है जो आपको मिलना शेष है-उसकी प्राप्ति में सहायक होना।

हिंदूनिष्ठ राजनीति का अभिप्राय है कि स्वाधीनता के योगक्षेमकारी अर्थात कल्याणकारी स्वरूप का लाभ देश के जन-जन को दिया जाता। पर साथ ही इस योगक्षेमकारी राजनीति का स्वाधीनता का एक अर्थ यह भी होता है कि जो आतंकी संगठन या आतंकी मानसिकता के लोग किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के मौलिक अधिकारों का किसी भी प्रकार से हनन करते हैं, उनके विरूद्घ भी राज्य कठोरता का प्रदर्शन करता। क्योंकि लोगों की स्वाधीनता की रक्षा करना राज्य का दायित्व है और वैसे भी सब ओर से व्याकुल लोगों की रक्षा के लिए ही ईश्वर ने ‘राजा पद’ को बनाया है। इसलिए हिंदूनिष्ठ राजनीति के लिए राजा को दुष्टों के संहार की विशेष छूट दी जाती। जो लोग इस देश को अपनी पितृभू: और पुण्यभू: नही मानते और इसके विखण्डन की प्रक्रिया के ही सपनों में जीते हैं, उनसे राज्य को कड़ाई से निपटने की तैयारी करनी थी।
प्राचीनकाल से ही हर राष्ट्र की सरकारों का यह पुनीत दायित्व रहा है कि दुष्टों को मानव न मानकर दानव माना जाए और उनसे दानव वृत्ति से ही निपटा जाए। परंतु भारत में दुष्टों के भी मानवाधिकार खोजने की प्रवृत्ति ‘सैकुलरिज्म’ ने पैदा कर दी है। जिसके कुपरिणाम हमें भोगने पड़ रहे हैं। गांधी जी के ‘रामराज्य’ में भी दुष्टों के संहार में कोई लापरवाही नही बरती जाती। क्योंक प्रभु राम तो स्वयं दुष्टों के संहारक और सज्जनों के उद्घारक रहे थे। परंतु ‘सैकुलरिस्टों’ ने इस व्यवस्था को ही पलट दिया। महर्षि मनु का कहना है-”यह सभेश राजा इंद्र के अर्थात विद्युत के समान शीघ्र ऐश्वर्यकर्ता, वायु के समान सबको प्राणवत प्रिय और हृदय की बात जानने हारा यम=पक्षपातरहित, न्यायाधीश के समान वर्तने वाला, सूर्य के समान न्याय-धर्मविद्या का प्रकाशक, अंधकार अर्थात अविद्या अन्याय का निरोधक, अग्नि के समान दुष्टों को भस्म करने वाला वरूण अर्थात बांधने वाले के सदृश दुष्टों को अनेक प्रकार से बांधने वाला, चंद्र के तुल्य श्रेष्ठ पुरूषों को आनंददाता, धनाध्यक्ष के समान कोशों का पूर्ण करने वाला होवे।”

राजनीति के हिंदूकरण के लिए सावरकर जी राजा के इन आठ गुणों को भी अपनी राजनीति का मूलाधार घोषित करते। जिसे सैकुलरिस्टों ने अपनी चमड़ी को बचाने के उद्देश्य से संविधान में कहीं भी स्थान नही दिया है। स्पष्ट है कि राजा के इन आठ गुणों के आने से हमारा संविधान अपने राजधर्म को लेकर स्पष्ट होता। इसलिए ‘हिंदूनिष्ठ राजनीति’ के इन आठ गुणों को मानने से कोई आफत नही आनी थी, अपितु देश की कई समस्याओं का समाधान मिलता और देश के नायक का या जनप्रतिनिधियों का उच्च गुणों से विभूषित होना भी स्पष्ट हो जाता।
क्रमश:

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