लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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शादाब जफर “शादाब’’

दरोगा बनने की ललक में मेरठ हादसे के अगले ही दिन 24 और अभ्यर्थी सिपाही दौड में बीमार होने के बाद आजमग में भी दौड पूरी न कर सके और अस्पताल पहुच गये। इन में से एक सिपाही तो निराशा के कारण अस्पताल की छत से जान देने के उद्देश्य से कूद भी पडा। उत्तर प्रदेश में कांस्टेबिल और हेड कांस्टेबिल से दरोगा पद पर पदोन्नति के लिये लिखित परीक्षा पास करने वाले पुलिस के सिपाही दस किमी की दौड लगाने के दौरान चंद कदम दौड कर ही मिट्टी के शोरो की तरह औंधें मुंह गिर पडे। ये कोई कहानी या किस्सा नही बल्कि हमारी उस उत्तर प्रदेश पुलिस की दास्तान है जिस की बहादुरी के किस्से हम लोग रोज अखबारो में पढ़ ते और टीवी चैनलो पर देखते है। सिपाही से दरोगा बनने कि चाह लिये मेरठ उत्तर प्रदेश की पुलिस लाइन में आयोजित दौड़ में भाग लेने आये आगरा, झांसी, अलीगढ़ और कानपुर मण्डल के लगभग दो दर्जन से ज्यादा पुलिसकर्मी मैदान में ही बेहोश होकर गिर पडे। जिन में से एक सिपाही की मौत हो गई। मौके पर मौजूद डाक्टरो ने यदि वक्त पर मोरचा न सभाला होता तो स्थिति और नाजुक हो सकती थी। मौके पर मौजूद डाक्टरो ने तुरन्त धराशाही हुए इन सिपाहियो को प्राथमिक उपचार देने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया। इन 24 सिपाहियो में पॉच की हालत गंभीर बनी हुई थी जिस में ताजा स्थिति ये थी कि एक ने याददाश्त और एक अन्य सिपाही को लक्वा हो गया था। पुलिस लाइन में सुबह लगभग आठ बजे शुरू हई दौड में चयनित सिपाही कुछ दूर तक तो दौडे मगर कुछ ही पल में ये सिपाही हांफने लगे और अचानक एक एक कर ज़मीन में गिरने के बाद बेहोश होने लगे।

प्रदेश में 5400 पदो के लिये लगभग 56000 हजार कांस्टेबिलो और हेड कांस्टेबलो ने लिखित परीक्षा दी थी जिन में 3891 सिपाहियो का पासआउट फिजिकल टेस्ट के अर्न्तगत मेरठ में दिनाक 20 जुलाई को मेरठ, सहारनपुर, और मुरादाबाद रेंज के 932 सिपाहियो की शारीरिक परीक्षा होनी थी। इस परीक्षा के लिये पुलिस मुख्यालय ने 75 मिनट में 10 किमी की दौड पूरी करने की अनिवार्यता रखी थी। जिस के प्रथम चरण की रेस के लिये बुधवार को 100 अभ्यर्थियो को बुलाया गया था। एक घंटा देर से शुरू हुई इस दौड के शुरू होने के लगभग पंद्रह मिनट बाद ही सिपाही हांफने लगे और देखे ही देखे ट्रैक पर एक के बाद एक 24 सिपाही गिर कर बेहोश हो गये कुछ सिपाही दौड पूरी करने के बाद बेहोश हुए। इस पूरे हादसे के बाद सवाल ये उठता है कि जिस प्रकार की तस्वीर प्रदेश पुलिस की सामने आई है उस से संतुष्ट नही हुआ जा सकता है। यहा ये सवाल भी उठता है कि क्या ये लोग सही प्रकार से सही सही अपने कर्तव्य को पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ अब तक पूरा कर रहे थे। या कर्तव्य के नाम पर सिर्फ और सिर्फ खानापूरी की जा रही थी। आज प्रदेश की बिखरी कानून व्यवस्था और बेलमाम होते ये कानून के रखवाले इस कदर खोखले होगे सपने में भी नही सोचा था। भविष्य की इस पुलिस का ये चेहरा वास्तव में गहरी चिंता में डालने वाला है।

दरअसल ये जो कुछ भी हुआ इस सब के लिये हमारे प्रदेश की भ्रष्ट कानून व्यवस्था पूर्ण रूप से पूरी पूरी जिम्मेदार है। क्यो कि आज मंत्री से लेकर संत्री सब के सब पैसा कमाने के लिये व्यवस्था में बिगाड पैदा कर रहे है। यूपी पुलिस में आज ऐसे सिपाहियो की कमी नही जिन के पास लाखो करोडो रूपये कि अकूत संपत्ती है। कुछ सिपाहियो के घरो का रहन सहन साज सज्जा और बच्चो की एजूकेशन पोजीशन एसपी स्तर से भी ऊॅची है। इन के घरो की महिलाए हर रोज बाजार से लाखो रूपये की शापिग करती है। क्यो कि इन सिपाहियो को पैसे की कोई कमी नही होती। उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में ऐसे हजारो सिपाही है जिन के पास आज लग्जरी कार या स्पोटर्स बाईक है। लोकपाल बिल का शोर तो मचाया जा रहा है किन्तु इसे लागू किया जाये इस के लिये अन्ना हजारे और बाबाओ को आगे कर हम लोग पीछे होकर चूहो कि सभाओ की तरह शोर तो मचा रहे है पर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे ये पता नही। आज प्रदेश में बिगडी कानून व्यवस्था के कारण त्राहि त्राहि मची है। मुरादबाद में ट्रेनिग ले रहे 35000 रंगरूटो की अभी परीक्षा भी पूरी नही हुई नियुक्ति तो दूर की बात है पर अभी से ही इन की दबंगई के किस्से आम होने लगे है वर्दी का रोब इन रंगरूटो ने अभी से दिखाना शुरू कर दिया है बेटिकट बस और टैंपो में यात्रा करना। आसपास के दुकानदारो पर रौब डालकर मुफ्त में सामान लेना आम हो चला है।

पिछले दिनो बिजनौर के एसपी महेश मिश्रा ने लिखित ये आदेश पारित किया था कि जिले के तमाम पुलिसकर्मी रोज साईकिल से गश्त करेगे। नोटिस में ये भी कहा गया था कि बीट के सभी सिपाही रोज साईकिल से गश्त करेगे गशत के दौरान अगर कोई पुलिसकर्मी मोटर साईकिल या कार से गश्त करता हुआ पकडा जायेगा तो उस के खिलाफ विभागीय कार्यवाही की जायेगी एसपी का ये आदेश आते ही कुछ शरीफ पुलिसकर्मीयो ने तो इस पर अमल शुरू कर दिया पर कुछ नये जमाने के अपटूडेट सिपाही इस आदेश को अपनी शान के खिलाफ मानते हुए इस आदेश को तुगलकी फरमान मान रहे थे। और ये दलीले दे रहे है कि एक ओर तो प्रदेश की पुलिस को हाईटैक करने की कवायद चलाई जा रही है दूसरी ओर दूरी ओर पुलिसवालो को साईकिल पर बैठा कर दौडाने की कवायद की जा रही है। क्या इस से सिपाही खुद को अपमानित महसूस नही करेगे। बिजनौर एसपी मिश्रा का तर्क ये था कि गश्त के दौरान एक पुलिस कर्मी दो से तीन किमी तक के दायरे में रहेगा। साईकिल चलाने से इन पुलिसकर्मियो की नजर अपराधियो पर रहने के साथ ही दुकानो व प्रतिष्ठानो पर रहेगी इस के अलावा साईकिल से गश्त करने वाले पुलिसकर्मियो को शारीरिक रूप से भी मजबती मिलेगी। रात में बाईक से गश्त करने वाले पुलिसकर्मियो में से अधिकतर पुलिसकर्मियो ने अपनी बाइको व गाडियो पर हूटर लगा रखे है जिन की आवाज सुनकर अपराधी या तो छुप जाते है या भाग जाते है। दरअसल इस सब के पीछे भी एक बडा गडबडझाला है। वो ये कि पछले दस सालो से ज्यादातर सिपाही बाइक और कार को ही गश्त में इस्तेमाल कर रहे है और ग्रामिण क्षेत्रो में गश्त पर जाने वाले अधिकतर सिपाही और दरोगा प्रधान के घर या किसी अन्य व्यक्ति के घर जाकर आराम से सो जाते है और बेचारा चौकीदार सिर्फ डंडे के सहारे पूरे गांव की तमाम रात हिफाजत करता है। लेकिन रिकार्ड में सिपाही और दरोगा के नाम के साथ ही इन को साईकिल से ही गश्त करते हुए दिखाया जा रहा है। देश की आजादी के बाद सकि्रय हुई पुलिस के जवानो को दूर दराज के इलाको में जाने के लिये साईकिल से गश्त करनी पडती थी इस के लिये इन सिपाहियो को तीन रूपये दैनिक भत्ते के रूप में शुरू हुआ था जो वक्त के साथ साथ बता चला गया 40 से 100 रूपये तक हो गया। थर्ड क्वालिटी के थानो के सिपाहियो को 40 रूपये हैड कांस्टेबल और महानगरो में तैनात सिपाहियो को 100 रूपये साईकिल की मरम्मत के लिये ये भत्ता दिया जाता है।

उत्तर प्रदेश पुलिस के इन सिपाहियो का यू दौड मे बेहोश होना एक गम्भीर प्रशन बन गया है। प्रशन ये उठता है कि क्या देश कि खाकी में खोखली और बीमार पुलिस है। क्यो कि देश में जिस प्रकार से आतंकवाद पैर फैला रहा है बम बलास्ट की घटनाए हो रही हो इन सिपाहियो से कुछ ज्यादा उम्मीद नही कि जा सकती कि ये लोग सुरक्षा के नाम पर देश की रक्षा कर पायेगे कहना बहुत ही मुश्किल है। इन में वो चुस्ती फुरती है ही नही जो एक जवान में होनी चाहिये दरअसल ये लोग वास्तव में सुरक्षा कर्मी है ही नही। इन में से ज्यादातर में देश सेवा व समाज सेवा का जज्बा भी नही होगा क्यो कि ये सिपाही अपने और अपने परिवारो के मंहगे शौक पूरे करने के लिये उत्तर प्रदेश पुलिस में आये है। लोगो पर रौब दिखाने के लिये पुलिस में आये है, फर्ज की खातिर जान देने नही। में उत्तर प्रदेश पुलिस के उन तमाम सिपाहियो को सलाम करना चाहूगा जो आज भी मामूली तन्खाह में अपने बच्चो और परिवार को अपने फर्ज और इमान को सलामत रखे हुए अपने कर्तव्य को बखूबी अन्जाम दे रहे है।

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