लेखक परिचय

डॉ. राजेश कपूर

डॉ. राजेश कपूर

लेखक पारम्‍परिक चिकित्‍सक हैं और समसामयिक मुद्दों पर टिप्‍पणी करते रहते हैं। अनेक असाध्य रोगों के सरल स्वदेशी समाधान, अनेक जड़ी-बूटियों पर शोध और प्रयोग, प्रान्त व राष्ट्रिय स्तर पर पत्र पठन-प्रकाशन व वार्ताएं (आयुर्वेद और जैविक खेती), आपात काल में नौ मास की जेल यात्रा, 'गवाक्ष भारती' मासिक का सम्पादन-प्रकाशन, आजकल स्वाध्याय व लेखनएवं चिकित्सालय का संचालन. रूचि के विशेष विषय: पारंपरिक चिकित्सा, जैविक खेती, हमारा सही गौरवशाली अतीत, भारत विरोधी छद्म आक्रमण.

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दूध बढाने वाले बोवीन ग्रोथ हार्मोन गउओं को देने पर ऑस्‍ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड तथा जापान में प्रतिबन्ध लगा हुआ है। यूरोपियन यूनियन में इस दूध की बिक्री नहीं हो सकती। कैनेडा में इस दूध को शुरू करने का दबाव संयुक्त राष्‍ट्र की ओर से है।

संयुक्त राज्य और इंग्लैण्ड के कई वैज्ञानिकों ने 1988 में ही इस हार्मोन वाले दूध के खतरों की चेतावनी देनी शुरू कर दी थी। आम गाय के दूध से 10 गुणा अध्कि ‘आईजीएफ-1’ हार्मोन इन्जैक्शन से प्राप्त किये दूध में पाया गया। एक और तथ्य सामने आया कि दूध में पाए जाने वाले प्राकृतिक ‘आईजीएफ-1’ से सिन्थैटिक ‘आईजीएफ-1’ कहीं अधिक शक्तिशाली है।

‘मोनसैण्टो’ आरबीजीएच दूध का सबसे बड़ा उत्पादक होने के नाते इन वैज्ञानिकों का प्रबल विरोध करने लगा। मोनसेण्टो कम्पनी के विशेषज्ञों के लेख 1990 में छापा कि यह दूध पूरी तरह सुरक्षित है और हानिरहित है। यह झूठ भी कहा गया कि मां के दूध से अधिक ‘आइजीएफ-1’ उनके दूध में नहीं हैं। एक और बड़ा झूठ बोला गया कि हमारे पाचक रस या एन्जाईम आईजीएफ-1 को पूरी तरह पचाकर समाप्त कर देते हैं जिससे शरीर तंत्रा पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

1990 में एफडीए के शोधकर्ताओं ने बताया कि आईजीएफ-1 पाश्चुराईजेशन से नष्ट नहीं होता बल्कि और शक्तिशाली हो जाता है। उन्होंने यह भी स्थापित किया कि अनपची प्रोटीन आंतों के आवरण को भेदकर शरीरतंत्रज्ञ में प्रविष्ट हो जाती है। खोज की महत्वपूर्ण जानकारी यह थी कि आईजीएफ-1 आंतों से रक्त प्रवाह में पहुंच जाता है। चूहों पर हुए प्रयोगों में उनकी तेज वृद्वि होती पाई गई। पर मौनसण्टो में इन खोजों को खारिज कर दिया।

मार्च 1991 में शोध्कर्ताओं ने भूल स्वीकार की नेशनल इंस्टीच्श्ूट ऑफ हैल्थ में कि आरबीजीएच वाले दूध के आईजीएफ-1 के प्रभाव का मनुष्यों पर अध्ययन अभी तक किया नहीं गया। वे नहीं जानते कि मनुष्यों की आंतों, अमाशय या आईसोफेगस पर इसका क्या प्रभाव होता है। महत्वपूर्ण समस्या यह जानना था कि ‘आईजीएफ-1’ वाला दूध पच जाता है, इसके एमीनोएसिड टूटते हैं या यह आन्तों से होकर जैसे का तैसा रक्त प्रवाह में पहुंच जाता है।

आगामी खोजों से सिद्व हो गया कि आंतों द्वारा अनपचा यह प्रोटीन रक्त प्रवाह में पहुंचकर कई प्रकार के कैंसर पैदा करने का कारण बनता है।

शरीर के कोषों और लीवर में पैदा होने वाला यह महत्वपूर्ण हार्मोन इन्सूलिन के समान है जो शरीर की वृद्वि का कार्य करता है। यह एक ऐसा पॉलीपीटाईड है जिसमें 70 एमीनो एसिड संयुक्त हैं। सभी स्तनधारी एक जैसा ‘बोवीन आईजीएफ-1’ हार्मोन अपने भीतर पैदा करते हैं।

हमारे शरीर में आईजीएफ-1 के निर्माण और नियन्त्राण का कार्य शरीर वृद्विे करने वाले हार्मोन द्वारा होता है। वृद्वि हार्मोन सबसे अधिक सक्र्यि तरुणावस्था में होता है, जबकि शरीर तेजी से यौवन की ओर बढ़ रहा होता है। उन्हीं दिनों शरीर के सारे अंग यौवनांगों सहित बढ़ते और विकसित होते हैं।

आयु बढ़ने के साथ-साथ इस वृद्वि हार्मोन की कियाशीलता घट जाती है। खास बात यह है कि आईजीएफ-1 आज तक के ज्ञात हार्मोनों में सबसे शक्तिशाली वृद्वि ;ळतवजीध्द हार्मोन है।

यह हार्मोन शरीर के स्वस्थ तथा कैंसर वाले, दोनों कोषों को बढ़ाने का काम करता है। सन् 1990 में ‘स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय’ द्वारा जारी रपट में बतलाया गया है कि ‘आईजीएफ-1’ प्रोस्टेट के कोषों को बढ़ाता है, उनकी वृद्वि करता है। अगली खोज में यह भी बतलाया गया कि यह स्तन कैंसर की बढ़त को तेज कर देता है।

सन् 1995 में ‘नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ हैल्थ’ द्वारा जारी रपट में जानकारी दी गई कि बचपन में होने वाले अनेक प्रकार के कैंसर विकसित करने में इस हार्मोन आईजीएफ-1 की प्रमुख भूमिका है। इतना ही नहीं, स्तन कैंसर, छोटे कोषों वाले फेफड़ों का कैंसर, मैलानोमा, पैंक्रिया तथा प्रोस्टेट कैंसर भी इससे होते हैं।

सन् 1997 में एक अन्तर्राट्रीय अध्ययन दल ने भी प्रमाण एकत्रित करके बताया है कि प्रोस्टेट कैंसर और इस हार्मोन में संबंध् पाया गया है। कोलन कैंसर तथा स्तन कैंसर होने के अनेकों प्रमाण शोध्कर्ताओं को मिले हैं। 23जनवरी 1998 में हारवर्ड के शोधकर्ताओं ने एक बार फिर नया शोध जारी किया कि रक्त में ‘आईजीएफ-1’ बढ़ने से प्रोस्टेट कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। प्रोस्टेट कैंसर के ज्ञात सभी कारणों में सबसे बड़ा कारण आईजीएफ-1 है। जिनके रक्त में 300 से 500 नैनोग्राम/मिली आईजीएफ-1 था उनमें प्रोस्टेट कैंसर का खतरा चार गुणा अध्कि पाया गया। जिनमें यह हार्मोन स्तर 100 से 185 के बीच था, उनमें प्रोस्टेट कैंसर की सम्भावनांए कम पाई गई।

अध्ययन से यह महत्वपूर्ण तथ्य भी सामने आया है कि 60 साल आयु के वृद्वों में आईजीएफ-1 अध्कि होने पर प्रोस्टेट कैंसर का खतरा 8 गुणा बढ़ जाता है।

आईजीएफ-1 और कैंसर का सीध संबंध् होने पर अब कोई विवाद नहीं है। महत्व का प्रश्न यह है कि रक्त में इस हार्मोन की अधिकता या कमी क्यों और कैसे होती हैं? यह अनुवांशिक है या आहार से इसकी मात्रा कम, अधिक होती है?

इल्लीनोयस विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक ‘डा. सैम्युल एपस्टीन’ ने इस पर खोज की है। सन् 1996 मे इण्टरनैशनल जनरल ऑफ हैल्थ में छपे उनके लेख के अनुसार गउओं को ‘सिन्थैटिक बोबिन ग्रोथ हार्मोन’ के इंजेक्शन लगाकर प्राप्त किये दूध में ‘आईजीएफ-1’ अत्यध्कि मात्रा में होता है। दूध बढ़ाने वाले बोविन ग्रोथ हार्मोन (rBGH) के कारण आईजीएफ-1 की मात्रा दूध में बढ़ती है तथा उस दूध का प्रयोग करने वालों में आतों और छाती के कैंसर की संभावनाएं बढ़ जाती है।

डीएनए में परिवर्तन करके जैनेटिक इंजीनियरिंग द्वारा ‘बोविन ग्रोथ हार्मोन का निर्माण 1980 में दूध बढ़ाने के लिये किया गया था। लघु दुग्ध उद्योग के सौजन्य से हुए प्रयोगों में बताया गया था कि हर दो सप्ताह में एक बार यह इंजेक्शन लगाने से दूध बढ़ जाता है। 1985 में एफडीए (फूड एण्ड ड्रग एडमिनिस्टेशन) ने संयुक्त राज्य में आरबीजीएच (rBGH or BST) वाले दूध को बेचने की अनुमति दे दी। बाद में सन् 1993 में वैटरनरी वैज्ञानिकों के प्रयोगों के बाद इस हार्मोन से गउओं में दुग्ध उत्पाद बढ़ाने और उसकी बिक्री को और बढ़ावा दिया गया।

एक अजीब आदेश एफडीए ने निकाला जिसके अनुसार बोविन और बिना बोविन वाले दूध का लेबल दूध पर लगाना वर्जित कर दिया गया। उपभोक्ता के इस अधिकार को ही समाप्त कर दिया कि वह हार्मोन या बिना हार्मोन वाले दूध में से एक को चुन सके। ‘एफ डीए’ किसके हित में काम करता है? अमेरीका की जनता के या कम्पनियों के? बेचारे अमेरीकी!

-डा. राजेश कपूर

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8 Comments on "हार्मोन वाले दूध का विरोध?"

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डॉ. राजेश कपूर
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डा. मधुसुदन जी ! भारतीय और विदेशी गो में मूलभूत अंतर पायागया है. केवल भारतीय गौएँ हैं जिनमें निम्न गुण हैं, विदेशी में नहीं. १.रचना में अंतर: *भारतीय गोवंश के चर्म में १५००से १६०० छिद्र प्रति वर्ग सेंटीमीटर होते हैं जबकि विदेशी में ४००-५०० होते हैं. इसके कारण हमारी गौएँ भारी गर्मी भी आसानी से सह जाती हैं. उनका शारीर अधिक पसीना निकालता है, अधिक ऊर्जा तथा औक्सिज़न ग्रहण करता है जिस से भीतर -बाहर शुधि-सफाई रहती है. *हमारी गौओं की पीठ गोल होती है, बाल मोटे होते हैं ,कुत्ते जैसे बारीक नहीं; आँखें बहुत सुन्दर होती हैं, गले में… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
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डा.मधुसुदन जी, एक बड़ी काम की सूचना यह है कि ‘योग सन्देश’ (पताजली योगपीठ-बाबा रामदेव जी की पत्रिका) में स्वदेशी-विदेशी गो दुग्ध के बारे में बड़ी प्रमाणिक और उपयोगी जानकारी पृष्ठ ४६,४७,४८ पर छापी है. हम पढ़ें और प्रचारित करें तो अच्छा रहेगा.
आप द्वारा प्राप्त प्रोत्साहन एवं त्वरित कार्यवाही हेतु साधुवाद एवं धन्यवाद !

डॉ. मधुसूदन
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डॉ. कपूर–लेखके लिए शतशः धन्यवाद। आज कल यहां Organic Milk निकला हुआ है। कुछ देढ गुना महंगा होता है। हम उसीका उपयोग करते हैं। शाकाहारी परिवारमें जन्म होनेसे शाकाहारी तो हम संस्कार से ही हैं, Vegan हो सकते हैं, पर फिर पता नहीं, उसमें और क्या त्रुटियां होंगी? अगस्त में यहां एक एक सप्ताहके शिविर V H P की ओर से कई राज्योमें लग रहे हैं, प्राप्त जानकारी प्रसृत की जायगी। आभार। आप अच्छा योगदान दे रहे हैं।

डॉ. राजेश कपूर
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भारतीय-गौवंश के बारे में कुछ ख़ास बातें जानने योग्य हैं. एक चिकित्सक के रूप में मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि संसार के लगभग सभी रोगों का इलाज भारतीय गौवंश के पञ्च-गव्य, स्पर्श तथा उनकी (गौवंश) की सेवा से संभव है. ऐलोपथिक दवाइयां बनाना-बेचना संसार का सबसे बड़ा व्यापार(हथियारों के बाद)बनचुका है या यूँ कहें की बनादिया गया है. ऐसे में अपने व्यापार को बढाने के लिए हर प्रकार के अनैतिक ,अमानवीय हथकंडे अपनानेवाली बहुराष्ट्रीय-कम्पनियां गौवंश के अस्तित्व को कैसे सहन कर सकती हैं, इस सच को समझना ज़रूरी है. भारतीय गौधन को समाप्त करने के हर प्रयास… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
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भाई अज्ञानी जी, विनम्र भाव से ज्ञान की बात कह लेते हैं आप.
कृपया स्वास्थ्य स्तम्भ मैं दो लेख ‘केंसर’ और ‘हैपेटाईटिस’ पर भी देख लें, शायद उपयोगी साबित हों.

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