लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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suicideडॉ. मधुसूदन

(एक) कृषकों की आत्महत्त्याओं को घटाने के लिए।

प्रायः ६० करोड की कृषक जनसंख्या, सकल घरेलु उत्पाद का केवल १५ % का योगदान करती है। और उसीपर जीविका चलाती है।विचारक विचार करें।अर्थात, भारत की प्रायः आधी जनसंख्या और, केवल १५% सकल घरेलु उत्पाद? बस? जब वर्षा अनियमित होती है, तब इन का उत्पाद घट कर १३% ही हो जाता है।
अब सारे कृषक भी भूमि के स्वामी नहीं होते।
लगभग आधी ५० % जनसंख्या अपने हिस्से का ५० % सकल घरेलु उत्पाद नहीं पर मात्र १५% का उत्पाद ही प्रदान करती है। इसका अर्थ: ३७% की जनसंख्या अपने हिस्सेका उत्पाद कर नहीं रही है।

(दो) यह कारण है, आत्महत्त्याओं का।
यह समझने के लिए क्या नोबेल विजेता होने की आवश्यकता है। आप लोगों के कारण आत्महत्त्याएं होंगी।
क्या यह बात समझमें आती है? यही कारण है, आत्महत्त्याओं का। मुझे कोई पाठक टिप्पणी में, इस कारण का विश्लेषण कर अन्य कारण दिखाने की कृपा करें। मैं अत्यन्त आभारी होऊंगा।

शेष ६०-६५ करोड की जनसंख्या ८५ % घरेलु उत्पाद का निर्माण करती है।

और ऐसा १५ % का योगदान कब होता है? जब वर्षा सही समय पर सही मात्रामें होती है। भूमण्डलीय ऊष्मा (Global Warming) के कारण वर्षा अनियमित हो गयी है। पर ऐसी अनियमित वर्षा का पानी भी बाँध बनाकर रोका जा सकता है। और सिंचाई द्वारा भूमि की उपज बढाई जा सकती है। कच्छ में यही हुआ है।

भूमि अधिग्रहण के बिना, यह बाँध भी संभव नहीं। एक एकड भूमि जब अधिग्रहित होगी उसके सामने कई एकड भूमि उपजाऊ होकर ३ से ४ फसले देंगी।

इस दृष्टिकोण से आगे का आलेख पढने का अनुरोध है।

(तीन) सूचना:
१ मई के, गुजरात टाइम्स के समाचार का शीर्षक था; “कच्छ का नर्मदा नीर का सपना हुआ साकार” -उसपर आधारित यह आलेख।

(चार )कच्छ की सदियों पुरानी जल समस्या
***कच्छ की सदियों पुरानी भीषण जल समस्या सुलझायी गई है।
*** ९०% कच्छ में, पेय जल समस्या का अंत पहले हो गया था।
***अब सिंचाई जल समस्या का भी अंत होगा।
***हजारों कच्छवासी कच्छ छोडकर अहमदाबाद, मुम्बई और परदेश, अफ़्रिका, इंग्लैण्ड, अमरीका, कनाडा इत्यादि देशों में जा बसते थे।
***अब जल समस्या के कारण, और रोटी रोजी के लिए. कच्छ छोडकर जाने की आवश्यकता नहीं । ***समृद्धि ऐसी आएगी, कि, फिर घूमने फिरने के लिए कच्छवासी निकलेगा।
***पेयजल ९०% कच्छ को नर्मदा बाँध के कारण मिलता था। शेष १० % कच्छ को भी मिलना प्रारंभ हो जाएगा।
***अब कच्छ को सिंचाई का पानी मिलने लगेगा। जिससे, उस की भूमि तीन से चार गुना उपजाऊ होगी।वर्ष भर में एक के बदले ३ से ४ गुना उपज होगी।
***कृषकों की आत्महत्त्याओं पर अंकुश लगेगा। वैसे यहाँ विशेष आत्महत्त्या समाचार नहीं पढे।
***क्या शेष भारत सीख लेगा?
***चावल में कंकड चुनकर फेंकने के बदले सारे चावलों को फेंकने से बचो।

(पाँच)
क्या, इधर मत दिया, उधर बाँध बन जाएगा ?
चेताना चाहता हूँ, कि, ऐसा बाँध चुटकी में बनता नहीं है। कोई प्रकल्प चुटकी में नहीं बनता। इसमें दशकों का समय लगता है। जब, व्यवसाय को स्थिर करने में भी ५-१० वर्ष लगते हैं; तो ऐसे प्रकल्प दशकों तक चलते हैं, तब लाभ प्राप्त होता है। शायद हम नहीं, हमारी अगली पीढी लाभ प्राप्त करेगी।

(छः)
कल बुद्धिमान पूछेंगे, कि, विकास कहाँ हुआ ?
किन्तु कल ही हमारे बुद्धिमान पूछने लगेंगे, कि, सबके विकास के वादे का क्या हुआ?विकास अबतक नहीं हुआ? उत्तर होगा, कि, महाराज आपका विरोध ही विकास को रोक रहा था।
जैसे मेधा पाटकर आणी मण्डली नें नर्मदा प्रकल्प रोका। यदि विरोध ना होता, तो, कम से कम ५ वर्ष पहले ही, पूरा होता। देरी के लिए, ये विरोधक ही उत्तरदायी हैं। भारत का विकास यदि चाहते हो, तो, ठीक है, चावल में कंकड चुनकर फेंको; सारे चावलों को फिकवाने से बचो।

(सात)
“कच्छकी सदियों पुरानी जल समस्या का अंत” और विद्वानों का पागलपन?
हो सकता है, मैं कुछ सच्चाईयों से अनभिज्ञ होऊं; कुछ समझ न पा रहा होऊँ; या भारत की भौमिक सच्चाइयों से अनजान होऊँ?सारे विद्वान तो पागल नहीं हो सकते। मैं ही पागल कहाने का दोष स्वीकार कर आज लिख रहा हूँ।

(आठ)
“कच्छ की जनता का शतकों का सपना साकार”।
पहली मई के, “गुजरात टाइम्स” का समाचार शीर्षक है, “कच्छ की जनता का शतकों पुराना सपना हुआ साकार”। जब गुजरात टाइम्स में समाचार पढा। शीर्षक था, कच्छ की जनता का सपना हुआ साकार।
भगीरथ नें गंगा को उतारा था, तब से गंगा-यमुना का मैदान उर्वर हो कर हमें सम्पन्नता प्रदान कर रहा है। आज नर्मदा को, सूखा-पीडित कच्छ की धरती पर उतारा है।
जो कच्छ में हो रहा है, वही भारत में भी हो सकता है, यदि हम साथ दे।
कल समाचार छपेगा कि, भारत की कृषि उपज चार गुना हुयी तो क्या, आप दुःखी होंगे? पर भविष्य की सोच के लिए दूरदृष्टि के विचारक चाहिए, राष्ट्रीय दृष्टि और वृत्ति के चिन्तक चाहिए।

(नौ)
भूमि की उर्वरता तीन से चार गुना ।
अर्थ हुआ, कच्छ की भूमि का क्षेत्र उपज की दृष्टि से तीन से चार गुना हो गया। यह कच्छमें होगा। फिर कृषक क्यों आत्महत्त्याएँ करेंगे?
ऐसे ही भारत की भूमि की उर्वरता भी बढाई जा सकती है। जो भूमि हमारे पास है, उस तीन गुना लाभ हम ले सकते हैं।अमरीका में वर्ष में बहुतेरे राज्यों में औसत एक उपज होती है।वहां की अल्पकालीन उपजाऊ ऋतु के कारण। उनकी भूमि भारत से तीन गुना है। पर ऋतु के कारण उपज मर्यादित है।
हमारी भूमि औसत तीन उपज दे सकती हैं; पर हमारी समस्या मान्सून ऋतु की अनियमितता है।
जिसके कारण हमारी भूमि मर्यादित उपज देती है।
हमारा कृषक चातक की भाँति आकाश को तकते रहता है। जब पर्याप्त उपज नहीं होती, तो कर्ज की राशि से लज्जा अनुभव कर आत्महत्त्याएं करता है। मुझे, उसकी आत्महत्त्या में भी उसका आदर्श झलकता हुआ दिखाई देता है; अन्य देशो में जहाँ गोली मार कर दूसरों के प्राण लिए जाते हैं; वहाँ हमारा कृषक बेचारा आत्महत्त्या करता है। वह कर्ज न चुकाने की लज्जा का अनुभव करता है। यह उसकी नैतिकता का परिचायक है।

(दस)
उर्वरता बढा कर उपज ४ गुना।
वर्षा पर निर्भर होने के कारण जब उपज नहीं होती, तो, कृषक आत्महत्त्या करता है।
जब हम नर्मदा जैसे छोटे बडे बाँधों को गढेंगे, तो क्या हमारी उपज नहीं बढेगी?
और ऐसी उर्वरता बढने पर उपज ३ से ४ गुना तक बढ सकती है। ऐसा होने पर हमारा कृषक आत्महत्त्या क्यों करेगा? अर्थात एक एकड की उपज यदि ३ से ४ एकड की उपज के बराबर हो जाएगी। तो फिर कृषक आत्महत्त्याएँ करने को उद्युक्त क्यों होगा?अर्थात हमारी भूमि की गुणवत्ता बढने से
(ग्यारह)
सिंचाई के लिए नर्मदा का पानी:
रापर से १ मई का समाचार था। दशकों से कृषक जिसकी चातक की भाँति बाट देख रहे थे, जो सपना था, साकार हुआ है। कच्छ में सिंचाइ के लिए, फतेहगढ से जेसडा की ओर पानी छोडा गया, तो कच्छवासी प्रजा आनंद से झूम उठी। प्रति सेकंद ७८००० लिटर पानी उदवाहन (पम्पिंग) की क्षमता वाले, दो उदवाहकों (पम्प) का नीर कच्छ में पहुंचेगा। इस के कारण जनता का कच्छियों का स्थलान्तर रूकेगा।
कच्छ प्रदेश में कृषि उत्पादन बढकर चार गुना होगा।
पहले कागजी योजनाएँ बहुत बनी। पर मोदी द्वारा २००९ में बनी स्वर्णिम गुजरात योजना के कारण यह संभव हुआ। पर अडंगे लगाने के लिए मेधा पाटकर आणि मण्डली कूद पडी थीं।

(बारह) कौन भारत विरोधी है?

डंगों के कारण बरसों देरी हुयी। नहीं तो, कच्छ हरियाला हो चुका होता।
१९६२ से तत्कालीन शासन बाते ही करता रहा था। योजनाका क्रियान्वयन मात्र नरेंद्र मोदी शासन में ही संभव हो पाया।
उल्लेखनीय है, कि, २०१० से ९०% कच्छको पीने के लिए नर्मदा का पानी दिया जाता है। किंतु सिंचाई के लिए अब नर्मदा की नहर द्वारा पानी दिया जाएगा।
कुल ३६१ किलोमिटर परिधि में फैला जाल है। संसार के इतिहास में ऐसा जाल पहली बार फैलाया गया है।
११६ बडे नगरों को पीने का पानी पहुंचेगा। अतिरिक्त ५५७८ गाँवों को भी पीनेका पानी पहुंचेगा।
पौने दो करोड नागरिकों को १६५ करोड लिटर पानी पहुंचेगा। प्रति नागरिक ९४+ लिटर पानी मिलना प्रारंभ होगा। जब कच्छ में रहकर इतनी समृद्धि होगी, तो कच्छी जन कच्छ छोडके क्यों जाएगा?
जब उसी भूमि में ४ गुना फसल उपजेगी, तो, कच्छवासी कृषक आत्महत्त्या क्यों करेगा?

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18 Comments on "कृषकों की आत्महत्त्याएं कैसे रुकेगी?"

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डॉ. मधुसूदन
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डॉ. मधुसूदन

सारे प्रबुद्ध टिप्पणिकारों से अनुरोध:
कि, आप आलेख के जिस परिच्छेद या बिन्दू पर टिप्पणी करना चाहो, उस वाक्य को पूरा (“……”) उद्धृत कर के टिप्पणी कीजिए।
विषय जो रखा है; उस पर टिप्पणी का स्वागत है। अलग बिन्दू इस आलेख के अंतर्गत ना उठाएँ।
मधुसूदन

आर. सिंह
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प्रिय डाक्टर मधुसूदन, आपकी यह टिप्पणी मेरे इ मेल एड्रेस पर आया है और पता नहीं क्यों इसे चार बार भेजा गया है.यह तकनीकी गड़बड़ी के कारण भी हो सकता है.आपको शायद मेरी वह टिप्पणी जो मैंने सबसे बाद में भेजी है बिषय से हटकर लगी,पर मेरे विचार से वह इस ज्वलंत मुद्दे को आंशिक रूप में न लेने के लिखी गयी है. मैं अब भी दोहराना चाहता हूँ कि यह मुद्दा उससे गंभीर है,जितना आप या अब तक की सरकारें,जिसमे नमो की सरकार भीशामिल है, समझती रही हैं.आप से मेरा यही अनुरोध है की आप जैसी जानी मानी हस्ती… Read more »
Rekha Singh
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“क्षिति जल पावक गगन समीरा , पंच रचित यह अधम शरीरा ” मनुष्य का शरीर इन पांच तत्वों से बना है । पृथ्वी , जल ,अग्निः , आकाश और वायु । भारत की संस्कृति , दुनिया की सर्वोच्च संस्कृति है जिसमे प्रकृति का संतुलन समाहित है । इसी कारण हमारी जीवन शैली मे भिभिन्न संस्कारों के माध्यम से , गुरुकुल शिक्षा पद्धति के माध्यम से, हमे बचपन से ही इन सबका सदुपयोग और संरक्षण सिखाया जाता है , खाली उपयोग , उपभोग और शोषण नही । आज हमारा ज्ञान मैक्समूलर , मैकाले शिक्षा पद्दति का शिकार है । इसका दुष्परिणाम… Read more »
आर. सिंह
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डाक्टर मदुसूदन का रिपोर्ट एक तरह से कच्छ का विज्ञापन मात्र लगता है,पर इस समस्या का समाधान इतना आसान नहीं है.सुश्री रेखा सिंह सिंह ने अपनी टिप्पणी में इसका संकेत दिया है,पर इस पर वृहद रूप से प्रकाश डालने की आवश्यकता है,पर यह भी सत्य है कि जब तक हम प्रकृति से पूरी तरह नहीं जुड़ेंगे,तब तक भारत में कृषि और कृषकों की समस्या का समाधान नहीं मिलेगा.

इंसान
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सिंह जी, मैंने आपको कई बार चौपाल पर बैठ बुढ़ापा काटने का सुझाव दिया है और आप हैं कि बच्चे के समान निर्बुद्धि हठ करते बहुत समय से इन्हीं पन्नों पर बोझ बने बैठे हैं| दूसरी ओर आपकी आयु देखते उस बुढ़िया का ध्यान आता है जो आटा गूंधती बहु को “तू हिलती क्यों है?” कह असंतोष प्रकट करती है| यदि आप जैसे पढ़े लिखे लाखों व्यक्ति कभी अभागे देश का और अभाव, गरीबी और गंदगी में रहते करोड़ों असहाय देशवासियों का सोचते तो आज यह नौबत न आती| दुर्भाग्य तो यह है कि इस ओर आप कुछ करेंगे नहीं… Read more »
आर. सिंह
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“तब तक भारत की कृषि उद्योग का रूप नहीं लेगी “की जगह “जब तक भारत की कृषि उद्योग का रूप नहीं लेगी.” होना चाहिए.भूल से अर्थ बदल जा रहा है.कृपया सुधार कर पढ़िए.असुविधा के लिए खेद है.

आर. सिंह
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इंसान जी,आप जैसे लोगों को यह इंसान का मुखौटा अच्छा नहीं लगता .आप क्या जानते हैं मेरे बारे में? .भारत में कृषि को उन्नत रूप कैसे दिया जा सकता है और उसको भारत का प्रमुख निर्यात उद्दोग बनाया जा सकता है,इस पर मैं आप जैसों को पढ़ा सकता हूँ.किसान का प्रबुद्ध बेटा हूँ और आज भी हार्दिक रूप से भारत की मिट्टी से जुड़ा हूँ.मैं तो चुनौती देता हूँउन विशेषज्ञों को जिनको लोग भगवान समझते हैंऔर समझते हैं कि वे भारत के विकास के बारे में सबकुछ जानते है. मेरे विचार से भारत की उन्नति का रास्ता गांवों से होकर… Read more »
इंसान
Guest

मेरे मुखौटे में उलझ ठोकर खाते और “मैं” रमश सिंह “चुनौती देता हूँ उन विशेषज्ञों को जिनको लोग भगवान समझते हैं और समझते हैं कि वे भारत के विकास के बारे में सब कुछ जानते है.” कहते “मैं” मैं” केवल चौपाल पर ही चलती है जहां आप जाना नहीं चाहते| तनिक सोचा होता कि कभी कृषि प्रधान भारत में लगभग प्रत्येक “इंसान” भी “भारत की मिट्टी” से जुड़ा हुआ होगा| प्रभु, निरीक्षण करते ऊपर अन्तरिक्ष से तनिक नीचे आ अखिल भारतीय किसान सभा से पूछो कि आज कृषकों की आत्महत्याएं कैसे रुकेगी?

आर. सिंह
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इसका जबाब किसान सभा के पास नहीं है,बल्कि सरकारों के पास है.उन्हें अपनी नीतियों में आमूल परिवर्तन करना पड़ेगा.भारत की सम्पूर्ण आर्थिक प्लानिंग गावों को आधार बना कर करनी पड़ेगी.आप पता नहीं कौन हैं?क्यों अपने को इस छद्म रूप में रखे हुए हैं?पर मुझे इससेकोई अंतर नहीं पड़ता,क्योंकि ये सब बातें मैं प्रधान मंत्री के पोर्टल भी लिख चूका हूँ,आज मैं देश से बाहर हूँ और वह पूरा रिफरेन्स भारत में है,नहीं तो मैं इस पर और विस्तार से बताता .मैं अब भी इस विषय पर हर तरह की चुनौती के लिए तैयार हूँ.हो सकता है कि आपको इस दिशा… Read more »
इंसान
Guest
कभी मैं मैं को विश्राम दे दूसरों की सुनो लेकिन आप हैं कि पोल खोलने में लगे हुए हैं| मैं भी तो यह ही कहता हूँ कि “इसका जबाव सरकारों के पास है (था)| उन्हें अपनी नीतियों में अमूल परिवर्तन करना पड़ेगा (करना चाहिए था)|” मेरा तात्पर्य है कि जिस सरकार ने अखिल भारतीय किसान सभा के कंधों पर चढ़ “शासन हथियाया” था उससे पूछा जाए| भारतीय सामाजिक और आर्थिक जीवन को समझते ऐसा प्रतीत होता है कि आपके बताए सुझाव के लिए बहुत देर हो चुकी है| आप देश के बाहर हैं तो चौपाल नहीं तो किसी उद्यान में… Read more »
आर. सिंह
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आप फिर बहकी बहकी बातें कर रहे हैं.ऐसे गंभीर विषय पर आप जैसी कुतर्कियों को तो मुंह भी नहीं खोलना चाहिए.किस देर की बात कह रहे हैं और किस चीज के लिए देर हो चुकी है?आप लोग तो गाय गाय बहुत चिल्लाते हैं,पर कभी कृषि में गाय के महत्त्व पर ध्यान दिया है?रही बात कहीं उद्यान में बैठ कर समय बिताने की,तो उसमें भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है,अगर कोई सीखना चाहे तो.ऐसे तो भारत में लौट कर मैं आपके चौपाल भी देखूँगा..अभी तो आपकी सरकार ने उच्चतम न्यायालय में शपथ पत्र दाखिल किया किया है कि वह चार… Read more »
इंसान
Guest
“आपकी सरकार?” नहीं, क्यों न राष्ट्रद्रोहियों के लिए मन का बोझ ही हो, है तो यह सब की सरकार| मैं अवश्य ख़ुशी ख़ुशी गाय गाय चिल्लाता हूँ और चिल्लाता रहूँगा क्योंकि कृषक का बेटा रहते जब से होश संभाला है और दिल्ली में आने पर जब तक सरकार की ओर से मवेशियों को बाहर गौ शाला में रखने का कानून नहीं बना, हमने घर में गाय रखी है| कृषि हो अथवा गृहस्थ जीवन, गाय का महत्व आर्थिक व सामाजिक सुख से जुड़ा हुआ है| जब हम दोनों के इतने विचार मिलते हैं तो गंगा जमुना को लेकर क्यों झगड़ा करें?… Read more »
डॉ. मधुसूदन
Guest
डॉ. मधुसूदन
कृपया, आप भौमिक सच्चाइयों को ध्यान में लेकर समाधान निकालिए। पहले निम्न सांख्यिकी पर दृष्टिपात करें। (१) ६० करोड की भारत की कृषक जनसंख्या १३.५ से १५ % का सकल घरेलु उत्पाद का हिस्सा ही योगदान में देती है। (२) अर्थात शेष ८५% का सकल घरेलु उत्पाद लगभग बची हुयी, ६०-६५ करोड की (५०-५५%) की जनसंख्या दे रही है। (३) कच्छ में कौनसी पर्यावरण को हानि पहुँची है? प्रत्येक एकड की उपज ४ गुना तक बढने की संभावना खडी हुयी है। (४)कच्छ मरुभूमि से नंदनवन बनने जा रहा है। जल समस्या समाप्ति की ओर बढ रही है। {अहमदाबाद में भी… Read more »
आर. सिंह
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कृषि को उद्योग बनाइये और उससे संलग्न लघु उद्योगों का विकास कीजिये.सबकुछ बदल जाएगा.

डॉ. मधुसूदन
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डॉ. मधुसूदन

आदरणीय सिंह जी :
(१) गुजरात में (कच्छ मे पानी अप्रैल में पहुंच जा रहा है।) जो प्रायः वास्तविक घट चुका है; उस की अपेक्षा आप का दो पक्तियों में बताया गया, और ना घटा हुआ काल्पनिक सपना, ही अधिक सफल होगा? क्या यही आप कह रहें हैं?
(२) तो क्या बनी बनाई नहरे, और दो बहुत बडे पम्प हटा दिए जाए?
(३) और नहरे तोड दी जाए?
———————————————————
आप को उपसंहार की टिप्पणी का अवसर देता हूँ। मेरी ओरसे मैं ने जो कहना था, कह दिया। निरादर ना समझें।
धन्यवाद
मधुसूदन

आर. सिंह
Guest
डाक्टर साहिब,मुझे यह कहते हुए अफ़सोस हो रहा है कि आप जैसे लोगों के साथ दिक्कत यही है कि आपलोग एक बंधी बंधाई लकीर से आगे बढ़ कर नहीं सोचते.हो सकता हा कि आप अपने क्षेत्र में सिद्ध हस्त हों,पर आप इस क्षेत्र में जो समाधान दे रहे हैं,वह एक क्षेत्र के लिए सही होने पर भी सार्वभौम हो ऐसा आवश्यक नहीं है.मैंने जो कहा है,उसकी विशदव्याख्या भी उपलब्ध है और लोग उस पर छिट पुट काम भी कर रहे हैं,उनको न राज्यों से कोई प्रोत्साहन मिल रहा है और न केंद्र से.ऐसे मैं इस पर लेखन के रूप में… Read more »
Rekha Singh
Guest
“क्षिति जल पावक गगन समीरा , पंच रचित यह अधम शरीरा ” मनुष्य का शरीर इन पांच तत्वों से बना है । पृथ्वी , जल ,अग्निः , आकाश और वायु । भारत की संस्कृति , दुनिया की सर्वोच्च संस्कृति है जिसमे प्रकृति का संतुलन समाहित है । इसी कारण हमारी जीवन शैली मे भिभिन्न संस्कारों के माध्यम से , गुरुकुल शिक्षा पद्धति के माध्यम से, हमे बचपन से ही इन सबका सदुपयोग और संरक्षण सिखाया जाता है , खाली उपयोग , उपभोग और शोषण नही । आज हमारा ज्ञान मैक्समूलर , मैकाले शिक्षा पद्दति का शिकार है । इसका दुष्परिणाम… Read more »
Rekha Singh
Guest
“क्षिति जल पावक गगन समीरा , पंच रचित यह अधम शरीरा ” मनुष्य का शरीर इन पांच तत्वों से बना है । पृथ्वी , जल ,अग्निः , आकाश और वायु । भारत की संस्कृति , दुनिया की सर्वोच्च संस्कृति है जिसमे प्रकृति का संतुलन समाहित है । इसी कारण हमारी जीवन शैली मे भिभिन्न संस्कारों के माध्यम से , गुरुकुल शिक्षा पद्धति के माध्यम से, हमे बचपन से ही इन सबका सदुपयोग और संरक्षण सिखाया जाता है , खाली उपयोग , उपभोग और शोषण नही । आज हमारा ज्ञान मैक्समूलर , मैकाले शिक्षा पद्दति का शिकार है । इसका दुष्परिणाम… Read more »
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