लेखक परिचय

बी एन गोयल

बी एन गोयल

लगभग 40 वर्ष भारत सरकार के विभिन्न पदों पर रक्षा मंत्रालय, सूचना प्रसारण मंत्रालय तथा विदेश मंत्रालय में कार्य कर चुके हैं। सन् 2001 में आकाशवाणी महानिदेशालय के कार्यक्रम निदेशक पद से सेवा निवृत्त हुए। भारत में और विदेश में विस्तृत यात्राएं की हैं। भारतीय दूतावास में शिक्षा और सांस्कृतिक सचिव के पद पर कार्य कर चुके हैं। शैक्षणिक तौर पर विभिन्न विश्व विद्यालयों से पांच विभिन्न विषयों में स्नातकोत्तर किए। प्राइवेट प्रकाशनों के अतिरिक्त भारत सरकार के प्रकाशन संस्थान, नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए पुस्तकें लिखीं। पढ़ने की बहुत अधिक रूचि है और हर विषय पर पढ़ते हैं। अपने निजी पुस्तकालय में विभिन्न विषयों की पुस्तकें मिलेंगी। कला और संस्कृति पर स्वतंत्र लेख लिखने के साथ राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विषयों पर नियमित रूप से भारत और कनाडा के समाचार पत्रों में विश्लेषणात्मक टिप्पणियां लिखते रहे हैं।

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shikari ka adhikarसमीक्षा – बी एन गोयल
एक प्रसिद्ध दोहा है –
शब्द सम्हारे बोलिए शब्द के हाथ न पांव
एक शब्द करे औषधि एक शब्द करे घाव ,
इस दोहे में एक सलाह दी गयी है कि जब भी कुछ बोलो नाप तोल कर बोलो. सोच समझ कर बोलो. यह सलाह यद्यपि सब के लिए हैं लेकिन इस के कुछ अपवाद भी हैं. साहित्य में व्यंग्यकार नाम का एक प्राणी होता है. वह एक अपवाद होता है अर्थात उसे छूट होती है वह कहीं भी कैसे भी बिना किसी नाप तोल के, बिना किसी प्रकार के भय के कुछ भी बोल सकता है, उस का बोला गया शब्द औषधि और घाव दोनों ही कर सकता है – उस पर कभी किसी को एतराज़ नहीं हो सकता. उस की पैनी और तीक्ष्ण नज़र समाज के घटनाक्रम पर होती है. उस की भाषा कुछ चुटीली और तंज़ वाली होती है. उसे अपने व्यवस्था तंत्र की मज़ाक उड़ाने की छूट होती है, हाँ आपात काल नहीं होना चाहिए. प्रश्न है आखिर व्यंग्य है क्या ? व्यंग्य साहित्य की एक विधा है जिसमें थोडा उपहास, थोडा मज़ाक, कुछ मीठी चोट, कुछ चुभन होती है, इसी क्रम में थोड़ी आलोचना भी रहती है. सबसे बड़ी बात इन व्यंगकारों को सात खून माफ़ होते हैं. व्यंग्यकार न सिर्फ पाठक को प्रफुल्लित करते है बल्कि उसे सोचने के लिए मजबूर भी करते हैं. पांचवे दशक का एक समय था. उर्दू के ‘मिलाप’ अखबार में जिस दिन जनाब फिक्र तौंसवी का कालम नहीं पढ़ा तो लगता था वह दिन ज़ाया हो गया.

छठे दशक में रविन्द्र नाथ त्यागी जी के लेखों से वास्ता पड़ा. पढने की ‘खराब’ आदत पड़ गयी थी. वे भी सरकारी महकमे में उच्च पदासीन थे. मुझ से काफी वरिष्ठ थे. मैं सीढ़ी के पहले डंडे पर जमने की कोशिश में था और वे छठे डंडे पर जमे हुए थे. साहस बटोर कर एक दिन, चपरासी की नज़र बचा कर, मैं उन के दफ्तर में दाखिल हो गया, काफी देर कोने में खड़ा रहा, नंबर आने पर मैंने कहा, ‘सर, मैं आप का कलम देखना चाहता हूँ’. वे पहले समझे नहीं बाद में हंस कर अपने गंजे सर पर हाथ फेरते हुए कहने लगे, ‘मेरा सर देखो बिलकुल सपाट हो गया है- एक क्लीन स्लेट की तरह’. इनके लेखन में हास्य और व्यंग्य का मिश्रण होता था.
सातवें दशक ने शुरू से ही राग दरबारी के माध्यम से तहलका मचा दिया. सरकारी नौकरी में रहते हुए भी श्री लाल शुक्ल ने ऐसा पैना उपन्यास लिख डाला. मुझ जैसे नामचीन पाठक के लिए एक आश्चर्य जैसा था. ‘रागदरबारी’ को पढ़ कर समाप्त किया तो लगा जैसे आम की गुठली चूसने के बाद भी उसे छोड़ने का मन नहीं हो रहा है.

ऐसी ही आज कल की व्यंगकारा हैं आरिफा एविस. नए युग के नए हस्ताक्षर. बिहारी के दोहों के लिए कहा जाता है –
सतसैय्या के दोहरे ज्यों नाविक के तीर,
देखन में छोटे लगें घाव करत गंभीर.
बिहारी को पूरा मान और आदर देते हुए ऐसा भाव मेरे मन में नवोदित व्यंगकारा आरिफा के लिए आया. (क्षमा करें लेखिका ने स्वयं अपने लिए नवोदित कहा है – Pp 14) क्योंकि यह भारी भरकम पुस्तक न होकर छोटे आकार की 64 पृष्ठों की एक पुस्तिका है. इसे आप एक सिटींग में ही ख़त्म कर सकते हैं लेख छोटे हैं लेकिन मार्मिक हैं वैसे भी व्यंग्य लेख छोटे ही होने चाहिए. लेखिका ने अपने आस पास बिखरे नए नए मुहावरों को उठाया और उनकी एक नयी व्याख्या कर दी.

‘भारत माता की जय’ कहने या न कहने पर पिछले दिनों काफी हंगामा बरपा था – लेकिन जब आरिफा की एक लाइन पढ़ी – ‘जनता को भारत माता कहने वाले नेहरु की थ्योरी को अब बदलने का सही वक़्त है’ (पृष्ठ- 25) दिल बाग़ बाग़ हो गया क्योंकि मेरी पीढ़ी के ही बहुत से लोग इस बात से अनभिज्ञ हैं कि इस नारे के प्रचार की रायल्टी के सही हक़दार पंडित नेहरु ही थे.

‘पुल गिरा है कोई पहाड़ नहीं’- वैसे अब तो पहाड़ भी रोज़ ही गिर रहे हैं पुल तो कागजों पर ही गिरते और बनते रहे हैं. इस पुस्तक का नाम है ‘शिकारी का अधिकार’ – पुस्तक में यह पांचवां लेख है. प्रायः लेखक अपनी पुस्तक का नाम पहले लेख पर ही रखते हैं. लेखिका ने शायद ऐसा न करने में कोई सुरक्षा कवच देखा है – आखिर जंगल राज की न्याय प्रणाली पर चोट जो मारनी थी. हम अपनी संस्कृति की बात करते समय कहते हैं – यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते – रमन्ते तत्र देवता. “जुबां नहीं चलानी” – लेख पढ़ जाईये और फिर से कहिये अपना श्लोक.

लेखिका ने स्वयं कहा है कि यह उन की पहली प्रकाशित पुस्तक है – अगर आगाज़ इतना अच्छा है तो (मैं अंजाम की बात नहीं करता) आगे आगे देखते चलो – बहुत कुछ मिलेगा. चचा ग़ालिब की इन पंक्तियों ने मेरे दिल में मुस्तकिल जगह बना रखी है –
या रब न वो समझे हैं न समझेंगे मेरी बात –
दे उन को दिल और जो न दे मुझे जुबां और
-कहते हैं कि ग़ालिब का अंदाज़े बयां और.
हिंदी में शरद जोशी, हरि शंकर परसाई बड़े नाम हुए हैं. इन्हीं के समय में एक के पी सक्सेना थे – जिन की चोट में भी अजीब सी मीठास होती थी. उर्दू में अकबर इलाहाबादी अंग्रेजों के लिए अकेले ही मुकम्मल थे. आधुनिक युग के प्रसिद्ध नाम हैं प्रेम जनमेजय, हरीश नवल, ज्ञान चतुर्वेदी, लतीफ घोंघी.

आरिफा को एक बार फिर से स्नेहाशीष – ईश्वर करें उन के और भी बहुत से संकलन निकले, साहित्य जगत में उन का नाम हो. अंत में श्री कुंवर रविन्द्र को श्रेष्ठ आवरण पृष्ठ की अलग से बधाई………….
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(आखिर में – आरिफ और आरिफा – जाने पहचाने लब्ज़ हैं, – एविस नया लब्ज़ है – कभी पढने या सुन ने में नहीं आया – हो सके तो मुझे इस के मायने बताना)

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3 Comments on "शिकारी का अधिकार – (व्यंग्य संग्रह) आरिफा एविस"

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आरिफा एविस
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नमस्कार सर,
किसी भी लेखक के लिए उसकी रचना का छपना या उसकी किताब के बारे में छपना बहुत की सुखदायी होता है और ऊपर से मुझ जैसे नए रचनाकारों के लिए जो अभी सीखने की प्रक्रिया में है आप जैसे वरिष्ठ दोस्तों का सहयोग उत्साह पैदा करने वाला होता है. आपने सारथक गहन समीक्षा लिखी है मैं क्या कहूं मेरे पास तो शब्द ही कम पड़ रहे हैं. आभार

अनूप शुक्ल
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अनूप शुक्ल

’आरिफ़ा’ माने होता है जंग का मैदान ! ’एविस’ एक अमेरिकन उपन्यास आयरन हिल का योद्दा पात्र है !

अनूप शुक्ल
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अनूप शुक्ल

बहुत अच्छी समीक्षा !

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