प्रमोद भार्गव
लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

खेती-किसानी का बजट

प्रमोद भार्गव

उदारवाद के बाद यह पहला बजट है, जिसमें अन्नदाता के प्रभुत्व को फिर से स्वीकारने की शुरुआत हुर्इ है। कृषि, किसान, ग्रामीण विकास, उर्वरक, सिंचार्इ और इनसे जुड़ी तकनीक को विस्तार देने की झलक भी इस बजट में है। खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश को लाने के हठ में सरकार ने जो नरमी दिखार्इ है, उससे लगता है घटक दलों का दबाव काम कर रहा है। विधानसभा चुनाव परिणामों से कांग्रेस को जो झटका लगा है, उसने भी बजट को कृषी व ग्रामोन्मुखी बनाने का काम किया है। इस बार कृषि बजट में 18 फीसदी बढ़ोतरी करने के साथ उन दो सौ पिछड़े जिलों को विकास की मुख्यधारा में लाने की दस्तक दी गर्इ है, जिनमें नक्सल बनाम माओवाद फल-फूल रहा है। माओवाद से निपटने का यह एक सकारात्मक लक्ष्य है। कालांतर में इसके शुभ परिणाम देखने को मिल सकते हैं। गांव और खेती पर ध्यान देने की इसलिए भी जरुरत थी क्योंकि यही एक ऐसा अनूठा क्षेत्र है, जो देश की दो तिहार्इ कुशल-अकुशल आबादी को रोजगार देता है। साथ ही राष्ट्रीय आय में कृषि की भागीदारी 30 प्रतिशत से ज्यादा है। तमाम उधोगों को कच्चा माल हासिल कराने के साथ-साथ विदेशी मुद्रा के अर्जन में भी खेती का महत्वपूर्ण योगदान है। इस दिशा में ऐसा ही सिलसिला जारी रहेगा तो बढ़ती आबादी और आवास समस्या का अभिशाप झेल रहे नगरों को भी इन समस्याओं से मुकित मिलेगी।

देश में, बढ़ती बेरोजगारी, माओवाद, ग्रामों से पलायन और शहरीकरण खेती और ग्रामीण विकास को लगातार नजरअंदाज करते चले आने से उपजे संकट व समस्याएं हैं। आर्थिक विषमता से लेकर उपभोग और सुविधाओं के लिहाज से बढ़ती असमानता भी ग्रामीण विकास को भगवान भरोसे छोड़ देने का नतीजा है।

आमतौर से बजट घोषणा के बाद इसका आकलन छोटे पर्दे के मीडियाकार और पूंजीवादी अर्थशास्त्री सरकारी कर्मचारी, मध्यवर्ग और उधोग जगत के हितों को केंद्र में रखकर करते हैं। इससे बजट की न तो निष्पक्ष समीक्षा होती है और न ही समावेशी विकास के लक्ष्य सामने आते हैं। जबकि बुनियादी स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि, किसान और मानसून की अनुकूलता पर टिकी है। किंतु प्रभुवर्ग के हितों के सापेक्ष अन्नदाता के प्रभुत्व को कमोबेश नकारा जाता है। आज भी कृषि उत्पादन और उससे होने वाली सकल घरेलू आय के आंकड़े उतने व्यवसिथत व पारदर्शी नहीं हैं जितने नौकरीपेशा और उधोग जगत से जुड़े आंकड़ों की उपलब्धता है। लिहाजा इस क्षेत्र से होने वाली आमदनी को कम करके आंका जाता है। हालांकि हमारे देश में शताबिदयों से चली आ रही सामंती राज व्यवस्था में भूमि के अभिलेख उसके अक्श और संपूर्ण गांव के मानचित्र तैयार कर उसके संधारण की पुरातन व्यवस्था व मान्यता रही है। लेकिन आजादी के बाद राजस्व अमले ने भूमि बंदोबस्त व प्रबंधन व्यवस्था के माध्यमों से किसान के मालिकाना हक की जमीनों में इतनी बेजा दखलंदाजी की है कि आज भूमि से जुड़े जितने भी विवाद राजस्व और जिला अदालतों में चल रहे हैं, उनमें से पचहत्तर फीसदी मामले राजस्व विभाग की चालाकियों के कारण हैं। आज भी इनके माइक्रो और मेक्रो स्तर पर डाटा बेस बनाने की जरुरत है। क्योंकि इसी कृषि सांखियकी की बुनियाद पर कृषि का सही आकलन और नीतियों को सही अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है।

वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने इस आम बजट में कृषि क्षेत्र के कुल योजनागत व्यय को 18 फीसदी तक बढ़ाकर खेती-किसानी के हित साधने की उल्लेखनीय पहल की है। कृषि ऋण वितरण के लक्ष्य को भी एक लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर पौने छह लाख करोड़ रुपये किया गया है। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की वित्त व्यवस्था दुरुस्त बनी रहे, इस हेतु नाबार्ड को दस हजार करोड़ रुपये आवंटित करने का प्रस्ताव है। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के लिए अल्पकालिक ऋण पुनवर्तित कोष बनाया जा रहा है ताकि वे छोटे और सीमांत किसानों को अल्पकालीन फसल कर्ज देते रहें। इस ऋण पर सालाना सात प्रतिशत ब्याज दर रहेगी। यदि किसान निर्धारित समय सीमा में इस ऋण का भुगतान कर देता है तो उसे ब्याज में तीन प्रतिशत की अतिरिक्त छूट दी जाएगी। किसानों को भण्डार गृहों में फसल रखने की रसीद के आधार पर भी छह माह तक के लिए इसी ब्याज दर पर कर्ज देने की सुविधा हासिल करार्इ गर्इ है। इस सुविधा के चलते किसान फसल की मूल्य वृद्धि होने के समय का इंतजार कर सकता है। इससे अच्छे नतीजे मिलने और किसान की माली हालत सुधरने की उम्मीद है।

दूसरी हरित क्रांति में सकारात्मक बदलाव लाने के नजरिये से हरित क्रांति के लिए एक हजार करोड़ रुपये का प्रावधान है। जबकि पिछले बजट में यह राशि चार हजार रुपये थे। खासतौर से इस राशि का उपयोग पूर्वोत्तर राज्यों में कृषि की दशा सुधारने के लिए किया गया था। जिसके बेहतर नतीजे देखने को मिले हैं। इन राज्यों में खरीफ-सत्र में सत्तर लाख टन अतिरिक्त धान की रिकार्ड पैदावार हुर्इ है। इन प्रांतों में खेती में सुधार से बेरोजगारी खत्म होगी, जिसका सीधा असर माओवादी गतिविधियों को नियंत्रित करने में होगा। सरकार ने इस बार काफी-फसल की सुधार में भी बजट के प्रावधान रखे हैं, जो दूसरी हरित क्रांति को गति देंगे।

खेती और किसानी को तकनीक से जोड़ने की भी इस बजट में उत्कृष्ठ पहल है। खेती में तकनीकी प्रयोगों को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय कृषि विस्तार एवं प्रौधोगिकी मिशन की शुरुआत होने जा रही है। इसके जरिए किसानों को उत्पादन बढ़ाने और प्रौधोगिक अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। बागवानी में विविधता के लिए राष्ट्रीय बागवानी मिशन असितत्व में लाया जाएगा। इसके अंतर्गत केसर जैसी दुर्लभ पुष्प-वनस्पतियों की पैदावार बढ़ाने संबंधी कार्यक्रमों को अमल में लाया जाएगा। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को खेती पर देखते हुए राष्ट्रीय कृषि मिशन की शुरुआत की जाएगी। जिसमें अति लघु सिंचार्इ व वर्षा सिंचित क्षेत्र विकास कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया जाएगा। हालांकि इन संस्थागत ढांचों की संरचना सफेद हाथी के रुप में भी पेश आने की आशंका है। क्योंकि सरकारी क्षेत्र में नौकरी की सुनिशिचतता लालफीताशाही की कारक बन जाती है। अच्छा है यदि ये संस्थाएं सहकारिता के स्तर पर खड़ी हों और इनमें उन नवोन्वेशी आविष्कारकों को जोड़ा जाए, जिन्होंने ग्रामीण परिवेश में रहते हुए स्थानीय संसाधनों से ऐसे बेमिशाल उपकरणों का निर्माण किया है जो कृषि, सिंचार्इ और विधुत उत्पादन में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। खाध प्रसंस्करणों के जरिए जरुर कृषि उत्पादों को सुरक्षित रखने की समस्या किसानों को निजात मिलेगी। आलू, टमाटर और गन्ना जैसी फसलों को बरबाद करने की मजबूरी से भी शायद किसान को मुकित मिले।

किसान क्रेडिट कार्ड को स्मार्ट कार्ड में बदलने की तकनीक भी किसान को लाभकारी सिद्ध होगी। चूंकि क्षेत्रीय ग्रामीण और अन्य बैंक सेवाओं की पहुंच सत्तर फीसदी आबादी तक हो चुकी है, इसलिए इस कार्ड के मार्फत किसान को बैंकों में होने वाले भ्रष्टाचार से किसी हद तक छूट मिलेगी। क्योंकि इसका एटीएम की तरह इस्तेमाल होगा। तकनीक के जरिए सरकार उर्वरक पर निगरानी रखने जा रही है। यह प्रणाली मोबाइल आधारित होगी और धीरे-धीरे किसानों को खाद, कैरोसिन, रसोर्इ गैस और अनाज पर छूट इसी प्रणाली के जरिए नगदी के रुप में मिलने लगेगी। इसे मोबाइल आधारित उर्वरक प्रबंधन प्रणाली नाम दिया गया है। इसे साल के अंत तक पूरे देश में लागू कर दिया जाएगा। इसकी कमान आधार परियोजना की तर्ज पर संभवत: आर्इटी रणनीति के विशेषज्ञ नंदन नीलकेणी को सौंपी जाएगी। क्योंकि इस प्रणाली की सिफारिश उन्होंने ही की थी। इसका लाभ बारह करोड़ किसान परिवारों को होगा और इससे खाद वितरण के दुरुपयोग पर अंकुश लगेगा। इसका क्रियान्वयन कंपनियों को झटका देने वाला है, क्योंकि अब तक उर्वरक सबिसडी किसान की बजाय उर्वरक उत्पादक कंपनियों को मिलती थी।

इस बजट में कृषि क्षेत्र प्राथमिकता के दायरे में आया है। उदारवादी नीतियां अपनाने के बाद यह पहला अवसर है जब बजट में उधोग जगत को प्रत्यक्ष रुप से कोर्इ छूट मिली हो ऐसा दिखार्इ नहीं दे रहा है। हालांकि पिछले बजट सत्र में खुद वित्तमंत्री ने संसद को बताया था कि एक साल में कारपोरेट उधमियों को कर रियायतों के तौर पर साढ़े चार लाख करोड़ से अधिक का लाभ दिया गया है, बावजूद आर्थिक समीक्षा में इस बात की पुषिट हुर्इ है कि राजस्व प्रापितयां तय लक्ष्य से पांच फीसदी कम रहीं। उधोग जगत को खुले हाथों दी गर्इ कर-रियायतों और वसूली में बरती ढिलार्इ से हुर्इ धन हानि की पूर्ति सेवाकर का दायरा बढ़ाने के उपायों से की जा रही है। इसे भी दस प्रतिशत से बढ़ाकर बारह प्रतिशत करके मंहगार्इ बढ़ाने के रास्ते खोले दिए हैं। आम बजट में इन प्रावधानों के चलते उधोग जगत और मध्यवर्ग के प्रभावित होने का रोना रोया जा रहा है। जबकि यदि कर और कर्ज वसूली में सख्ती बरती जाती तो सरकार को न तो सेवाकर का दायरा बढ़ाना पड़ता और न ही इस कर को दस से बारह प्रतिशत करने की जरुरत पड़ती। वैसे भी हमारी ज्यादातर घरेलू मांगें और आजीविका के संसाधन कृषि पर केंदि्रत हैं, साथ ही हमारी बचत की सनातन प्रवृत्ति बैंकिंग व्यवस्था को मजबूती दे रही है, यही कारण है कि हम वैशिवक आर्थिक मंदी के दुष्प्रभावों से बचे हैं। बीते साल पूर्वोत्तर भारत में दूसरी हरित क्रांति लाने की दृषिट से जो चार सौ करोड़ का आवंटन दिया गया था, उसके चलते पहली ही साल में 70 लाख टन धान की अतिरिक्त पैदावार हुर्इ है। यह उपलबिध इस बात की पुषिट करती है कि हम कृषि को प्रोत्साहित करते हैं तो खुशीहाली और आर्थिक समृद्धि हमारे कदमों में होगी। ऐसे ही उपायों में खाध सुरक्षा के हित अंतर्निहित हैं। यही वे उपाय हैं जो किसान को आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठा लेने की मजबूरी से भी छुटकारा दिलाएंगे।

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