लेखक परिचय

ललित गर्ग

ललित गर्ग

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भारतवर्ष की ख्याति जहां यहां के साम्प्रदायिक सौहार्द एवं आपसी सद्भावना के कारण है वहीं यहां के पर्व-त्यौहारों की धर्म-समन्वय एवं एकता के कारण भी है। इन त्योहारों में इस देश की सांस्कृतिक विविधता झलकती है। यहां बहुत-सी कौमें एवं जातियां अपने-अपने पर्व-त्योहारों तथा रीति-रिवाजों के साथ आगे बढ़ी हैं। प्रत्येक पर्व-त्यौहार के पीछे परंपरागत लोकमान्यताएं एवं कल्याणकारी संदेश निहित है। इन पर्व-त्यौहारों की श्रृंखला में मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार ईद का विशेष महत्व है। हिन्दुओं में जो स्थान ‘दीपावली’ का है, ईसाइयों में ‘क्रिसमस’ का है, वही स्थान मुसलमानों में ईद का है। ईद का आगमन इस बात का सूचक है कि अब चारों तरफ खुशियों का सुवास फैलनेवाला है, जो मनुष्य के जीवन को आनंद और उल्लास से आप्लावित कर देगा। ईद लोगों में बेपनाह खुशियां बांटती है और आपसी मोहब्बत का पैगाम देती है। ईद का मतलब है एक ऐसी खुशी जो बार-बार हमारे जीवन में आती है। यह खुशी वह मानसिक स्थिति है जो किसी संयोग शृंगार के फलस्वरूप मनुष्य को प्राप्त होती है।

मुसलमान एक वर्ष में दो ईदें मनाते हैं। पहली ईद रमजान के रोजों की समाप्ति के अगले दिन मनायी जाती है जिसे ईद-उल-फित्र कहते हैं और दूसरी हजरत इब्राहिम और हजरत इस्माइल द्वारा दिए गए महान बलिदानों की स्मृति में मनायी जाती है अर्थात् ‘इर्द-उल-अजीहा।’ ईदुल फित्र अरबी भाषा का शब्द है जिसका तात्पर्य अफतारी और फित्रे से है, जो हर मुसलमान पर वाजिब है। सिर्फ अच्छे वस्त्र धारण करना और अच्छे पकवानों का सेवन करना ही ईद की प्रसन्नता नहीं बल्कि इसमें यह संदेश भी निहित है कि यदि खुशी प्राप्त करना चाहते हो तो इसका केवल यही उपाय है कि प्रभु को प्रसन्न कर लो। वह प्रसन्न हो गया तो फिर तुम्हारा हर दिन ईद ही ईद है।

जिंदगी जब सारी खुशियों को स्वयं में समेटकर प्रस्तुति का बहाना माँगती है तब ईद जैसा त्योहार आता है। ईद हमारे देश ही नहीं दुनिया का एक विशिष्ट धार्मिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक त्यौहार है। अध्यात्म का अर्थ है मनुष्य का खुदा से संबंधित होना है या स्वयं का स्वयं के साथ संबंधित होना। इसलिए ईद मानव का खुदा से एवं स्वयं से स्वयं के साक्षात्कार का पर्व है। यह त्यौहार परोपकार एवं परमार्थ की प्रेरणा का विलक्षण अवसर भी है, खुदा तभी प्रसन्न होता है जब उसके जरूरतमद बन्दों की खिदमत की जाये, सेवा एवं सहयोग के उपक्रम किये जाये। असल में ईद बुराइयों के विरुद्ध उठा एक प्रयत्न है, इसी से जिंदगी जीने का नया अंदाज मिलता है, औरों के दुख-दर्द को बाँटा जाता है, बिखरती मानवीय संवेदनाओं को जोड़ा जाता है। आनंद और उल्लास के इस सबसे मुखर त्योहार का उद्देश्य मानव को मानव से जोड़ना है। मैंने बचपन से देखा कि हिन्दुओं का दीपावली और मुसलमानों की ईद- दोनों ही पर्व-त्यौहार इंसानियत से जुडे़ है। अजमेर एवं लाडनूं की हिन्दू-मुस्लिम सांझा संस्कृति में रहने के कारण दोनों ही त्यौहारों का महत्व मैंने गहराई से समझा और जीया है। मैंने अपने इर्द-गिर्द महसूस किया कि सद्भाव और समन्वय का अर्थ है- मतभेद रहते हुए भी मनभेद न रहे, अनेकता में एकता रहे। आचार्य तुलसी के समन्वयकारी एवं मानव कल्याणकारी कार्यक्रमोें से जुड़े रहने के कारण हमेशा जाति, वर्ण, वर्ग, भाषा, प्रांत एवं धर्मगत संकीर्णताओं से ऊपर उठकर मानव-धर्म को ही अपने इर्द-गिर्द देखा और महसूस किया।

इस्लाम का बुनियादी उद्देश्य व्यक्तित्व का निर्माण है और इर्द का त्यौहार इसी के लिये बना है। धार्मिकता के साथ नैतिकता और इंसानियत की शिक्षा देने का यह विशिष्ट अवसर है। इसके लिए एक महीने का प्रशिक्षण कोर्स रखा गया है जिसका नाम रमजान है। इस प्रशिक्षण काल में हर व्यक्ति अपने जीवन में उन्नत मूल्यों की स्थापना का प्रयत्न करता है। इस्लाम के अनुयायी इस कोर्स के बाद साल के बाकी 11 महीनों में इसी अनुशासन का पालन कर ईश्वर के बताये रास्ते पर चलते हुए अपनी जिंदगी सार्थक एवं सफल बनाते हैं।

रोजा वास्तव में अपने गुनाहों से मुक्त होने, उससे तौबा करने, उससे डरने और मन व हृदय को शांति एवं पवित्रता देने वाला है। रोजा रखने से उसके अंदर संयम पैदा होता है, पवित्रता का अवतरण होता है और मनोकामनाओं पर काबू पाने की शक्ति पैदा होती है। एक तरह से त्याग एवं संयममय जीवन की राह पर चलने की प्रेरणा प्राप्त होती है। इस लिहाज से यह रहमतों और बरकतों का महीना है। हदीस शरीफ में लिखा है कि आम दिनों के मुकाबले इस महीने 70 गुना पुण्य बढ़ा दिया जाता है और यदि कोई व्यक्ति दिल में नेक काम का इरादा करे और किसी कारण वह काम को न कर सके तब भी उसके नाम पुण्य लिख दिया जाता है। बुराई का मामला इससे अलग है जब तक वह व्यक्ति बुराई न करे उस समय तक उसके नाम गुनाह नहीं लिखा जाता।

हर मुस्लिम भाई इस एक माह की अवधि में अपने जीवन को पवित्र करने का प्रयास करता है। ईद जीवन का दर्शन देती है। स्वस्थ और उन्नत जीवन-शैली का सम्पादन करती है। ईद से हमारे आसपास अच्छे लोगों और अच्छे विचारों का परिवेश बनता है। यहां की उत्सवप्रियता में भी जड़ता नहीं, विवेक जागता है। हर इंसान के भीतर जीने का सही अर्थ विकसित होता है। ईद और उनसे जुड़ा दर्शन संसार की बीहड़ वीथियों के बीच मंजिल के सही रास्ते तलाशने की दृष्टि देता है। जीवन की दिशा और दर्शन का मूल्यांकन इसी से जुड़ता है। मेरी दृष्टि में बीज से बरगद बनने और दीये से दीया जलने की परम्परा का यही आधार है।

रमजान की विशेषता और महत्ता यह है कि इस महीने कुरआन शरीफ अवतरित हुआ। वह कुरआन जिसमें सारी मानवता की भलाई निहित है और जिसके बताये रास्ते पर चल कर कोई भी लोक परलोक में कामयाबी हासिल कर सकता है। रमजान का महीना हमें कुरआन के पैगाम को समझने और उस पर विचार-विमर्श करने का निमंत्रण देता है कि उसकी शिक्षाएं क्या है और वह हम से क्या चाहती है।

इन शिक्षाओं के तहत हमें दो प्रकार के सन्देश मिलते हैं। एक अल्लाह का तो दूसरा बंदों का। अल्लाह का सन्देश यह है कि उसकी आज्ञा पालन की जाए, उसके बताए रास्ते पर चला जाए और उसके साथ किसी को शरीक न किया जाए। बंदों के जो सन्देश है उसमें एक-दूसरे पर विश्वास किया जायें, एक-दूसरे की मदद की जायें और आपसी मेल-मिलाप हो।

यह मेल-मिलाप हर्ष और आनंद का स्रोत है क्योंकि इसमें एक ओर प्रभु से भक्ति की जाती है वहीं दूसरी ओर प्राणी मात्र को अपनी खुशी से सिंचित किया जाता है। संबंधियों और मित्रों के अलावा अजनबी लोगों से मिलना भी मन को आनंदित करता है जो धीरे-धीरे बढ़कर प्रेम का रूप धारण कर लेता है। इसीलिए ईद के बाद प्रत्येक मुसलमान दूसरे व्यक्ति से गले मिलता है भले वह उसे न जानता हो। इस प्रकार ऊंच-नीच, जात-पांत के सभी भेद और रंग या नस्ल की सभी सीमाएं इस अवसर पर मिट जाती है और परस्पर मिलने वाले उस समय केवल इंसान ही होते हैं। बराबर होकर खुशी देने और महसूस करने का यही संदेश है जो ईद के माध्यम से समस्त संसार को दिया जाता है। इसीलिए हजरत मोहम्मद ने यह उपदेश दिया है कि जो लोग साधन संपन्न होते हैं उनका कर्तव्य है कि वे निर्धनों और कमजोरों की यथासंभव सहायता करें। उनकी खुशी निरर्थक है यदि उनके सामने कोई कमजोर निर्धन है जिसके पास खाने-पहनने को कुछ न हो।

इसलिए ईद की खुशियों मंे उन बेबस, लाचार, मजबूर लोगों को भी सम्मिलित करना जरूरी है जो इसमें शामिल होने की हैसियत नहीं रखते। इसीलिए इस्लाम में हर मुसलमान पर सदका ए फित्र वाजिब है। इसका मतलब है कि अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए रख कर बाकी साढ़े बावन तोले चांदी या उतने ही रुपये या वह भी न हों तो पौने दो किलो अनाज ही या फिर अपनी चल पूंजी का ढ़ाई प्रतिशत हिस्सा दान के रूप में जरूरतमंदों में बांट कर ईद की खुशियों में उनके बराबर के भागीदार बनें। एक संतुलित एवं स्वस्थ समाज निर्माण यह एक आदर्श प्रकल्प है। इसलिए ईद के दिन प्रत्येक मुसलमान ईद की नमाज पढ़ने के लिए ईदगाहों में एकत्रित होते हैं, आपस में गले मिलते हैं, अपने मित्रों-संबंधियों से मिलने जाते हैं, दान करते हैं और अपने पूर्वजों की मजारों पर जाकर प्रार्थना करते हैं।

ईद का सन्देश मानव-कल्याण ही है। यही कारण है कि हाशिये पर खड़े दरिद्र और दीन-दुःखी, गरीब-लाचार लोगों के दुख-दर्द को समझें और अपनी कोशिशों से उनके चेहरों पर मुस्कान लाएं-तभी हमें ईद की वास्तविक खुशियां मिलेंगी।

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