लेखक परिचय

विश्‍वमोहन तिवारी

विश्‍वमोहन तिवारी

१९३५ जबलपुर, मध्यप्रदेश में जन्म। १९५६ में टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि के बाद भारतीय वायुसेना में प्रवेश और १९६८ में कैनफील्ड इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी यू.के. से एवियेशन इलेक्ट्रॉनिक्स में स्नातकोत्तर अध्ययन। संप्रतिः १९९१ में एअर वाइस मार्शल के पद से सेवा निवृत्त के बाद लिखने का शौक। युद्ध तथा युद्ध विज्ञान, वैदिक गणित, किरणों, पंछी, उपग्रह, स्वीडी साहित्य, यात्रा वृत्त आदि विविध विषयों पर ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित जिसमें एक कविता संग्रह भी। १६ देशों का भ्रमण। मानव संसाधन मंत्रालय में १९९६ से १९९८ तक सीनियर फैलो। रूसी और फ्रांसीसी भाषाओं की जानकारी। दर्शन और स्क्वाश में गहरी रुचि।

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यह एक प्रचारात्मक तथा मोहात्मक कथन है कि, ‘विश्व एक गाँव’ (ग्लोबल विलेज) है, इस कथन में हम भारतीयों को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की ध्वनि आती है, और प्रसन्न होकर हम उस विश्व-गाँव से जुड़ना चाहते हैं। इस कथन की सच्चाई को एक चेतावनी के रूप में लेना चाहिये क्योंकि ‘ग्लोबल विलेज’ का वास्तविक अर्थ है, ‘‘वसुधैव आपणः’, – ‘विश्व एक बाजार है’। ‘बाजार’ से भय क्यों? क्योंकि यह बाजार खुला है। इसमें ‘बाजार’ के सिवा कोई बन्धन नहीं। आज मानव सभ्यता का स्तर यह है कि जब कुछ भी ‘खुला’ होता है तब उसमें धन या बल से शक्तिशाली ही हावी हो जाता है, जैसे मैकडानल्ड, कोला, पॉप संगीत, माइकैल जैक्सन, ‘पल्प’ साहित्य, अंग्रेजी भाषा आदि। इसी पाशविकता पर मानवीयता (संस्कृति) द्वारा नियंत्रण करना आवश्यक होता है। किन्तु जानबूझकर शक्तिप्रेमियों ने ‘धर्म’ को अफीम कहा है। खुले बाजार का आधार केवल डलर है। खुला बाजार वास्तव में वस्तुओं के विनिमय का क्षेत्र नहीं, वरन शक्ति-आजमाने का क्षेत्र है। इस शक्ति का स्रोत है, ‘प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान (‘प्रौविज्ञान’) – श्रेष्ठता’। प्रौविज्ञान-श्रेष्ठता के बल पर ‘पश्चिमी देश’, इज़रायल तथा जापान श्रेष्ठतम देश हैं। दृष्टव्य है कि लगभग बारहवीं शती तक, यह स्वतंत्र देश भारत विज्ञान तथा उद्योग में सर्वश्रेष्ठ रहा। और अब खतरा राजनैतिक गुलामी के बजाय आर्थिक गुलामी का अधिक है। आज ‘वसुधैव आपणः’ में अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिये हमें ‘प्रौविज्ञान-श्रेष्ठता’ प्राप्त करना ही होगा। वरना हम ‘उनकी’ शर्त्तों पर ‘उनके’ लिये मात्र एक बाजार बन कर रह जाएंगें।

प्रौविज्ञान श्रेष्ठता अर्जित करने हेतु जो निम्नतम तथा महत्त्वपूर्ण आवश्यकताएं हैं, वे हैं:

1. प्रौविज्ञान की समुचित शिक्षा

2. विचार तथा कल्पना शक्ति

3. चरित्र

4. संसाधन (मानवीय, पादार्थिक तथा आर्थिक)।

हजार वर्षों से गुलाम रहे भारत जैसे देश में प्रश्न स्वाभाविक है कि प्रौविज्ञान की शिक्षा किस भाषा में दी जाए। 1947 में तर्क दिया गया कि भारतीय भाषाओं में प्रौविज्ञान की समुचित शिक्षा देने की क्षमता नहीं है। इस के विरोध में अकाट्य तर्क दिये जा सकते हैं, वह फिर कभी। अतः प्रौविज्ञान की शिक्षा, तथा प्रशासनिक सेवाओं के चुनाव के लिये माध्यम अंग्रेजी भाषा रखा गया। जो अंग्रेजी 1835 से साम्रज्यवादियों ने हम पर लादी थी, वह स्वतंत्रता के बाद हमारी इच्छा से हमारे ऊपर शासन करने लगी। अंग्रेजी रोटी की, शासन की तथा श्रेष्ठता की भाषा रही है इसलिये इसके प्रसार-प्रचार में तथा जनस्वीकृति में, परिस्थितियेां को देखते हुए, कोई कमी नहीं रही। देखें कि इस अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा से भारत में कितनी प्रौविज्ञान – श्रेष्ठता अर्जित हुई ?

भारतीय बुद्धि की क्षमता में कमी नहीं है, तब भी, नाभिकीय ऊर्जा, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, साफ्टवेअर आदि कुछ विषयों को छोड़कर हम सभी में पाश्चात्य संसार से दसियों वर्ष पीछे हैं। और उन विषयों में भी हम चार – पांच वर्ष पीछे ही हैं। और हम पीछे ही रहेंगे। साफ्टवेअर में भारत अधिकांशतया द्वितीयक कार्य ही करता है, मूल अनुसंधान तथा मौलिक विकास का काम ‘वहीं’ होता है। ‘परम’ टैरास्केल कम्प्यू टर बनाने में हम चीन तथा इज़रायल के भी पीछे हैं। हमारे ‘परम’ कम्प्यूटर को बाजार में सफलता नहीं मिली थी। माइक्रोसॉफ्ट ने, व्यावसायिक लाभ के लिये हिन्दी में मूल कार्य करने का बीड़ा उठाया है, तब हम, वही कार्य अपने देश के लिये क्यों नहीं कर सकते ? साफ्टवेअर में हमारा मुख्य आधार हमारा अंग्रेजी का ज्ञान कम, कम्प्यूटरी भाषा तथा प्रौविज्ञान का ज्ञान अधिक है क्योंकि यूएस में चीनी विशेषज्ञ भी साफ्टवेअर में भारतीयों के बराबर ही हैं, यद्यपि उनकी अंग्रेजी कमजोर रहती है। जापान जापानी भाषा में ही समस्त सॉफ्टवेअर के विकास की योग्यता रखता है और अब चीन भी उसी रास्ते पर है।

सोचने की शक्ति तथा कल्पना शक्ति दोनों विषय तथा भाषा के ज्ञान पर आधारित होती हैं कल्पना शक्ति मातृभाषा अर्थात संवेदनशील भाषा के ज्ञान पर मुख्यतः आधारित होती हैं, जबकि सोचने की अधिकांश शक्ति शब्द ज्ञान पर। विदेशी शब्दावली जो रोजी-रोटी के लिये सीखी जाती है, बहुत सीमित होती है, वह अतिरिक्त अध्ययन से ही बढ़ सकती है। रोजी रोटी की भाषा का अतिरिक्त अध्ययन कम व्यक्ति करते हैं। और आजकल टिवी ने लोगों की पढ़ने की रूचि को कम कर दिया है। अधिकांश अंग्रेजी जानने वालों की क्रियात्मक शब्द शक्ति लगभग 3000 शब्दों की होती है। इसलिये उनके सोचने की शक्ति भी कम होती है। समाचार पत्रों या टीवी में अधिकांश विषय मनोरंजन या विज्ञापन से संबंधित रहते हैं जो विचार शक्ति को सीमित करते हैं। जिसकी मातृभाषा और रोजी-रोटी की भाषा अलग अलग हो, साथ ही जो विदेशी भाषा के दबाव के कारण अपने समाज के ज मीनी यथार्थ से लगभग कट गया हो, उन खंडित व्यक्तित्वों से मौलिक विचारों तथा आविष्कारों की आशा कम ही करना चाहिये।

मौलिक सोच तथा आविष्करण के लिये विषय ज्ञान के साथ, मुख्यतया, संवेदनशील शब्दावली का उपयोग अपरिहार्य होता है। क्योंकि, कविता सृजन की तरह, आविष्कार और मौलिक सोच की कार्य प्रणाली तर्कणा शक्ति के परे भी जाती है, तथा वह व्यक्ति की संवेदनात्मक शब्दावली की समृद्धि पर भी निर्भर करती है। मनुष्य की संवेदनात्मक भाषा का अधिकांश निर्माण उसकी मातृभाषा में होता है तथा शिशु से लेकर युवावस्था कि अधिक होता है। कुछ बिरले ही व्यक्ति इतने कुशाग्र तथा संवेदनशील होते हैं कि वे इस खण्डित व्यक्तित्व की बाधा के बावजूद कल्पनाशक्ति का आविष्करण के लिये उपयोग कर लेते हैं। लगभग सभी इंजीनियरी के कारखाने बजाय स्वयं विकास या आविष्कार करने के, नकल (प्रौद्योगिकी हस्तांतरण) करना पसंद करते हैं ; यह हमारे आत्मविश्वास की तथा दूरदर्शिता की कमी का भी प्रमाण है।

संवेदनशीलता का ह्रास हम भारतीयों में स्पष्ट है। अधिकांशतया युवावस्था तक अंग्रेजी हम स्कूली वातावरण में सीखते हैं, जीवन में नहीं। अंग्रेजी ने हमें इतना गुलाम बना लिया है कि हम माता, पिता, भाई, बहिन, पत्नी, पुत्र, पुत्री, परिवार आदि के लिये अंग्रेजी शब्दों का ही उपयोग करते हैं। ऐसे सारे शब्द अपने साथ एक शाब्दिक अर्थ ही न लेकर, एक संस्कृति लेकर चलते हैं, भावनात्मक ऊर्जा लेकर चलते हैं, हमारे अधिकारों तथा कर्त्तव्यों का बोध कराते चलते हैं क्योंकि ये हमारी संवेदनात्मक भाषा के अंग हैं जो हमारे अवचेतन में कार्य करती है। हम भावनाहीनता की तरफ बढ़ रहे हैं, तभी, जन्म, मृत्यु, प्रेम, प्रसव, शिक्षक, शिष्य, समाज, भारत आदि भावनात्मक शब्दों के स्थान पर अंग्रेजी शब्दों का उपयोग करते हैं। इस तरह हमारा अभारतीयकरण तथा अमानवीयकरण हो रहा है (जिसे टीवी के हिंसा तथा यौन दृश्योंसे भरपूर कार्यक्रम और तेजी से बढ़ावा दे रहे हैं)। अभारतीयकरण तो इतना हो गया है कि अधिकांश भारतीय यह सोचने लगे हैं कि अंग्रेजी गई तो ‘इंडिया’ छिन्नभिन्न हो जाएगा। ये लोग नहीं जानते कि भारत की एकता आध्यात्मिक तथा मानवीय मूल्यों की एकता है, जिसे अंग्रेजी अपने 200 वर्षों के प्रयास से नहीं तोड़ पाई है। पाश्चात्य संस्कृति मानव का मशीनीकरण इतनी सफलता से करती है कि ह्यूस्टन विश्वविद्यालय के इंजीनियर चिन्तक जॉन लियैनहार्ड सगर्व लिखते हैं, ‘‘हम क्या हैं, और हमारी मशीनें क्या हैं, इन दोनों के बीच सीमा रेखा खींचना कठिन है, क्योंकि संस्कृति तथा प्रौद्योगिकी अब एक ही हो गई है।”

प्रश्न यह भी उठता है कि अंग्रेजी भाषा द्वारा भारत पर पूरे राज्य के बावजूद विज्ञान तथा तकनीकी विकास में हम तानाशाही चीन तथा जनतांत्रिक इज़रायल के भी पीछे कैसे रह गए। यह देश 47 में हमसे विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बहुत पीछे थे, आज बहुत आगे हैं, उनकी भाषा अंग्रेजी न हो कर स्वदेशी रही। चीन में अधिनायकत्व है, यह उत्तर काफी नहीं है। मौलिक सोच तथा सृजन अधिनायकत्व में और भी कठि न हो जाता है। इस जटिल प्रश्न का सरल उत्तर तो यह है – ‘भारतीय वैज्ञानिकों, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों तथा उनके प्रबन्धकों की क्षमताओं में साहसिकता, मौलिकता और आविष्कारिता की कमी।’ कितने भारतीयों ने विज्ञान में नोबेल पुरस्कार जीता है – मात्र एक ने, और स्वतंत्र भारत के एक ने भी नहीं। कितने भारतीयों ने विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विशेष कार्य किया है – उन्हें अंगुलियों पर गिन लें। भारत से कहीं कम आबादी वाले अनेक गैर-अंग्रेजी भाषा वाले देश हम से कई गुने नोबेल पुरस्कार जीत चुके हैं और बहुत उल्लेखनीय कार्य कर चुके हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि, अंग्रेजी शिक्षा तथा शासन की अंग्रेजी भाषा ने भारत की सृजनात्मक तथा शोधात्मक प्रतिभा का नुकसान किया है। उच्च कोटि की प्रतिभा जो दुर्लभ होती है, उस प्रतिभा का चुनाव भी उसी अंग्रेजी पढ़ी लिखी (लगभग 4-5 प्रतिशत) ‘कमजोर’ जनता में से ही किया गया है। इस तरह, अंग्रेजी ने हमारी प्रतिभा को दुगनी ताकत से मारा है। सारा प्रौविज्ञान का काम मनुष्य को करना है और उस काम का माध्यम भाषा ही है। यदि काम ठीक नहीं हुआ है, तब निष्कर्ष साफ है कि मनुष्य तथा भाषा में दोष हैं।

गांधी जी ने कहा था, ‘स्वतंत्रता के पश्चात चाहे अंग्रेज यहां रहें, किंतु अंग्रेजी एक भी दिन न रहे।’ अंग्रेजी ने हमें न केवल प्रौविज्ञान में पिछड़ा बना रखा है वरन हमारी दैनंदिन संस्कृति को भी भ्रष्ट किया है। इसे समझने के लिये भाषा तथा जीवन का संबंध देखना चाहिए। भाषा मुख्यतया तीन कार्य करती है:

1. विचारों तथा भावनाओं का मुखर सम्प्रेषण।

2. भाषा जनता में संसाधन तथा सत्ता वितरण में दखल देती है। भारत में अधिकांश सत्ता तथा संसाधन अंग्रेजी जानने वालों (कम या अधिक) के पास हैं।

3. भाषा संस्कृति की अंतः सलिला के समान वाहिनी है। बिना प्रत्यक्ष बताए, हमारी मान्यताएं, जीवन मूल्य, सामाजिक सदाचार, व्यवहार, भाषा हमें सिखा देती है। जब हम, उदाहरणार्थ, सत्य हरिश्चन्द्र की कथा सुनते हैं (महात्मा गांधी) या रामायण की, तब हमारे स्वयं के तथा पारिवारिक सम्बंधों के आदर्श हमारे मन में बैठ जाते हैं; शरदचंद्र या प्रेमचंद के उपन्यास पढ़ते हैं तब सामाजिक जीवन के मूल्य हमारे मन में स्थापित हो जाते हैं। और दूसरी तरफ, इसी तरह अधिकांश अंग्रेजी पढ़ने वालों के मन में, अनजाने, वहां के मूल्य स्थापित होते हैं, किन्तु वे टुकड़ों में होते हैं। रोटी के लिये अंग्रेजी पढ़ने वाले विद्यार्थी ‘क्लासिक्स’ कम ‘पल्प’ ज्यादा पढ़ते हैं। अधिकांश पल्प पुस्तकों को रोचक बनाने के लिये संस्कृति कम यौन तथा हिंसा का मिर्चमसाला अधिक होता है। पिछले दो सौ वर्षों से हमारे मस्तिष्क में साम्राज्यवादियों ने यह भर दिया है कि पाश्चात्य संसार आधुनिक है, हमें उनका अनुसरण करना पड़ेगा। यदि यह अनुसरण प्रौविज्ञान तक ही सीमित रहता तो भी ठीक था, किंतु यह सारे समाज के अंतर्संबन्धों में भी घुस गया है। भारतीय व्यक्ति परिवार को समाज की इकाई मानता रहा है। किंतु अब ‘व्यक्ति’ समाज की इकाई बन गया है – अर्थात – प्रत्येक व्यक्ति के लिये वह स्वयं सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। नारी स्वातंत्र्य के नाम पर नारी भोग की वस्तु, स्वयं ही बन रही है। परिवार में विघटन आ रहा है। महानगरों में तलाक के प्रकरण पहले की तुलना में सौ गुने हो रहे हैं। इस दयनीय स्थिति के लिये केवल प्रौद्योगीकरण जिम्मेदार नहीं है। पादार्थिक स्थितियों पर मानसिक, बौद्धिक तथा नैतिक स्थितियों का नियंत्रण होना चाहिये न कि इसका उलटा। यह उलटा कैसे हो गया ?

पाश्चात्य संस्कृति जो व्यक्तिवादी-भोगवादी संस्कृति है उस में अधिक सशक्त व्यक्ति (पुरूष या स्त्री) एक तो, अधिक वस्तुओं का भोग करता है, तथा दूसरे, अपने से कम सशक्त व्यक्ति (पुरूष या स्त्री) का भी भोग करता है। पाश्चात्य संसार इसके साथ दो सौ वर्ष से जी रहा है, और उसने अपने समाधान ढूंढ़ लिये हैं, संवेदना के स्थान पर उसने धन की अहमियत स्वीकार कर ली है। वे स्वार्थ तथा भोग को आपस में ‘लेने-देने’ की व्यापारिक शैली में अपनाते हैं। किंतु मूलतः व्यक्तिवादी होने से, उन लोगों में प्रेम-विवाह होने के बावजूद लगभग 70 प्रतिशत दंपतियों में तलाक होते हैं। इसका सर्वाधिक दुख संतान भोगती है। माता पिता का संतान से संबध अधिकांशतया 16-18 वर्षों के बाद ‘शिष्टाचार’ बनकर रह जाता है। यदि हम भारत में पाश्चात्य संस्कृति की नकल, वह भी भोंड़ी, ही चाहते हैं तब तो अंग्रेजी का प्रभुत्व कायम रखें।

अंग्रेजी जिस मुख्य लाभ – प्रौविज्ञान में उन्नति – के लिये स्वीकार की गई थी, वह नहीं हुआ है और न हो सकता है। अंग्रेजी के रहते न केवल हम पिछड़े रहेंगे वरन हमारा पिछड़ापन बढ़ता ही जाएगा। यदि भाषा संस्कृतिवाहिनी है तो अंग्रेजी पाश्चात्य संस्कृति के अच्छे गुण यथा, कर्मनिष्ठा, कर्म-कौशल पर अभिमान, न्यायप्रियता, ईमानदारी, समय की पाबंदी, सहयोग, साहसिकता, टीम-भावना, शुचिता आदि क्यों नहीं आई ? (हमारी संस्कृति में भी सिद्धांतन ये गुण हैं, किंतु व्यवहार में नहीं बचे हैं।) इसके अनेक कारण हैं। भोगवादी टीवी कार्यक्रमों का मन पर सीधा असर पड़ता है, वैसे भी त्यागमय भोगवाद का व्यवहार अधिक कठिन होता है। बार बार अपने उदात्त नायकों का स्मरण करने से त्यागमय-भोगवाद स्थापित हो पाता है जो हमें न तो अंग्रेजी और न मीडिया करने देता है। वरन उन उदात्त नायकों के बजाय यहां रंगीनी माध्यम हमारे सामने भोगवादी फिल्मी या खिलाड़ी नायकों को लुभावने ढंग से प्रस्तुत करता रहता है। बिना समुचित त्याग के, भोगवाद मनुष्य को हिंस्र पशु बनाता है। पश्चिम भोगवाद को ही ‘स्वर्ग’ समझता है। हमारे चार पुरूषार्थों-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-के स्थान पर ‘अर्थ’ और ‘काम’ बचे हैं। त्याग तथा भोग के संतुलन के स्थान पर सुरसा के समान भोग है। जब ‘चरित्र’ गिर जाए तब किसी भी कार्य में प्रगति कठिन हो जाती है। चरित्र का निर्माण भी संस्कृति, और भाषा करती है।

विदेशी संस्कृति से ठीक शिक्षाएं ग्रहण करना कितना कठिन, लगभग असंभव है, इसे एक उदाहरण से देखें। विद्युत प्रौद्योगिकी का उपयोग हम 80-90 वर्षों से करते आ रहे हैं, हम सैकड़ों मेगावाट की क्षमता के विद्युत उत्पादन कारखानों का निर्माण करते आ रहे हैं। किन्तु खराब रखरखाव के कारण बिजली मनमानी गुल होती रहती है, और जरा सी तेज हवा चलती है कि हमारी बिजली गुल। जरा सा पानी बरसता है हमारे टेलिफोन गुल, नालियां उफन जाती है और सड़कों में गढ्ढे बन जाते हैं। यहां तो हममें प्रौद्योगिकी-ज्ञान की कमी नहीं है। फिर क्या बात है ? प्रौद्योगिक उत्पाद तथा निर्माण के लिये उसके किताबी ज्ञान के अतिरिक्त एक विशिष्ट संस्कृति की भी आवश्यकता होती है। हमने वह किताबी ज्ञान तो अंग्रेजी में ले लिया किंतु वह विशिष्ट संस्कृति नहीं ले सके। हमें अपने किये कार्य की गुणवत्ता पर गर्व नहीं, हमारे घटिया काम से सारे समाज को कष्ट हो हमें अपनी कामचोरी या ‘घूस’ से मतलब। प्रौद्योगिकी तंत्र में प्रत्येक कार्मिक का कार्य पूरे कारखाने के कार्य को प्रभावित करता है, जब कि किसान का कार्य मुख्यतया उसके लिये ही प्रभावी है। अतएव प्रौद्योगिकी तंत्र में प्रत्येक कार्मिक की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है। वहां का कार्मिक यह जानता है कि कामचोरी बहुत नुकसानदायक है। और एतदनुसार पूरी जिम्मेदारी से कार्य करता है। भारतीयों ने यह नहीं सीखा। ऐसा नहीं है कि पाश्चात्य देशों में भ्रष्टाचार नहीं है, किंतु वे अपना काम पूरी गुणवत्ता से करते हैं, कामचोरी नहीं करते, अपने नाम का तथा समाज के कष्टों का उन्हें ध्यान रहता है। वहां का समाज अपनी जिम्मेदारियों, तथा अपने अधिकारों के प्रति सजग रहता है। इस मानसिक गरीबी का कारण आर्थिक गरीबी नहीं है, हमारा सांस्कृतिक पतन इसका कारण है, जिसका एक मु ख्य कारण अंग्रेजी भाषा की गुलामी है।

विदेशी भाषा से जो संस्कृति हम सीखते हैं वह गड्डमड्ड और खंडित रहती है। उस भाषा को सीखने का हमारा ध्येय नौकरी होता है, सही अर्थों में ज्ञानार्जन कम कौशल-उपलब्धि अधिक होता है। विदेशी भाषा हमारे अनुभवों को खंडों में बांट देती है। स्वभाषा में सीखने पर विभिन्न खंडों के बीच वह अभेद्य दीवार नहीं रहती जो विदेशी भाषा में सीखने पर रहती है। क्योंकि जीवन के विच्छिन्न अनुभवों को भाषा समेकित करती है। विज्ञान को विदेशी भाषा में सीखने पर, विज्ञान तथा जीवन के बीच दरार रहेगी ही। अतएव विदेशी भाषा द्वारा शिक्षा हमारे व्यक्तित्व को खंडित करती है। विदेशी भाषा के वे खंड जो संस्कृति शिक्षा प्रदान करते हैं डाक्टरी, इंजीनियरी जैसे व्यावसायिक विषयों में नहीं पढ़ाये जाते और उनकी तरफ नौकरी-पेशा इच्छुक विद्यार्थी अलग से ध्यान भी नहीं देते। इस तरह जो संस्कृति विदेशी भाषा से सीखी जाती है वह हमारे लिए उतनी सटीक नहीं होती वरन हानिकारक हो सकती है, क्योंकि संस्कृति का संबंध देश-काल की मिट्टी से बहुत गहरा होता है।

हम लोगों में अपनी मातृभाषा के प्रति प्रेम कम क्यों है ? अंग्रेजों ने समझ लिया था कि जब तक हमारी संस्कृति जीवित है, वे हम पर लंबी अवधि तक शासन नहीं कर सकेंगे। लार्ड मैकाले ने 1835 में शिक्षा नीति का जो लक्ष्य घोषित किया था, वह दृष्टव्य है: ‘इस समय हमें अपनी सर्वोत्तम शक्ति का उपयोग कर ऐसे वर्ग की सृष्टि करना है जो हमारे और उन लाखों, जिन पर हम शासन करते हैं, के बीच दुभाषिये का कार्य कर सके। लोगों का एक वर्ग जो रक्त और रंग में भारतीय हो, किंतु रूचि, व्यवहार, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेज हो।’ उस अद्भुत दूरदृष्टि के कारण मैकाले को अपने ध्येय में अद्भुत सफलता मिली, यदि हमें कुछ नहीं मिला तो वह थी ‘नैतिकता’ ! अंग्रेजों ने हजारों संस्कृत पाठशालाओं को बंद करवा दिया और ‘मिशन’ स्कूलों को सहायता देकर खूब फैलाया। हमारे शास्त्रों को, साहित्य को, भाषाओं को घटिया कहा और अपने को श्रेष्ठतर। हमें गरीब बनाकर अंग्रेजी हमारे ऊपर लाद दी। और हम लोगों ने अंग्रेजों की, श्रेष्ठता मान ली – हमारा देश, हमारी संस्कृति, हमारी भाषा घटिया है – यह भी मान लिया, तब हम घटिया भाषा से प्रेम कैसे कर सकते हैं !

आज के प्रौविज्ञान युग में जिस भाषा में प्रौविज्ञान के सम्प्रेषण की जीवन्त क्षमता नहीं होगी, वह अपनी शक्ति तथा उपयोगिता खो देगी। केवल साहित्य या अन्य सामाजिक संस्थान आज भाषा को जीवन्त नहीं रख सकते। परिणामस्वरूप भारतीय भाषाएं अपनी शक्ति तथा मूल्य दोनों खो रही हैं। और भारतीय भाषाओं को बोलने वाले प्रौविज्ञान से वंचित हैं। किंतु यह हमारा सौभाग्य है कि कुछ हिन्दी प्रेमियों के उदयम से हिन्दी में प्रौविज्ञान संप्रेक्षण की क्षमता अभी भी है।

अंग्रेजी भक्त लोग तर्क देते हैं कि अंग्रेजी आज अंतर्राष्ट्रीय भाषा है और विश्व एक ‘गांव’ (?) बन गया है। अंतर्राष्ट्रीयता को वरीयता देने के पहिले हमें राष्ट्रीय अस्मिता को स्थापित करना आवश्यक है, (आर्थिक एवं सैन्य) शक्ति को समुचित रूप से बढ़ाना है ताकि ‘उस’ विश्व में हमारा सम्मानजनक स्थान हो। और कितने प्रतिशत भारतीय हैं जो भारत के बाहर जाकर कुछ कर सकते हैं, जाहिर है कि एक प्रतिशत स े कम। और कितने प्रतिशत भारतीयों को अंग्रेजी भाषी देशों से सम्बन्ध रखने की आवश्यकता होगी – वह भी एक प्रतिशत से कम ! तब क्या मात्र इस दो प्रतिशत आबादी के लिए 98 प्रतिशत आबादी पर अंग्रेजी लादकर उसे पंगु बनाया जाए! अंग्रेजी हम सीखें किंतु एक विशेष विदेशी भाषा की तरह। तब हमें जो भी कार्य अंग्रेजी भाषी देशों से करना है, वह कर सकेंगे, तथा अपनी अस्मिता की रक्षा और अंतर्राष्ट्रीय कुल में सम्मानित स्थान भी बना सकेंगे। इस तरह अंग्रेजी सिखाने में खर्च कम होगा तथा प्रभाव एवं दक्षता अधिक होगी। अंग्रेजी तथा अन्य समुन्नत भाषाओं से भारतीय भाषाओं में अनुवादकों की आवश्यकता तो रहेगी ही ताकि आधुनिकतम ज्ञान बिना विलंब उपलब्ध हो सके। भारत को आज के कम्प्यूटर युग में सम्मानपूर्ण स्थान दिलाने के लिये हमें संस्कृत भाषा का सहारा लेना होगा। किंतु स्वयं हमारा अंग्रेजी मोह उसके रास्ते में रोड़े डाल रहा है।

अंग्रेजी ने हमारे (हीनता ग्रंथित) मनों पर इतना ज़बर्दस्त कब्जा कर लिया है कि जब भी भारत में भाषा-नीति पर विचार किया गया, स्वयं हमने अंग्रेजी को सर्वप्रथम आवश्यक समझा, और उसके बाद भारतीय भाषाएं। त्रिभाषी सूत्र एक उदाहरण है। हमें अपने सारे कार्य भारतीय भाषाओं में ही करना चाहिये। 2-4 प्रतिशत लोग यदि अंग्रेजी सीखें तो अनुवाद की तथा ‘विदेश’ सम्पर्क की आवश्यकताएं पूरी हो सकेंगी। एतदर् थ सर्वप्रथम अंग्रेजी को रोटी के स्थान से निकाला जाए।

जब जर्मनी, पोर्तगाल, स्पेन, फ्रांस, हालैंड, बेल्जिम, स्विटज़रलैन्ड, फिनलैंड, स्वीडन, नार्वे, इटली, इज़रायल, चीन, जापान आदि अंग्रेजी की प्रभुता के बिना विप्रौद्योगिकी में अग्रणी रहते हुए अपनी ही भाषा में जीवन जीकर अपनी अस्मिता रखते हुए प्रगति कर रहे हैं; तथा अनेक पूर्वी यूरोपीय देश भी अपनी ही भाषाओं में जीते हुए प्रौविज्ञान में समुन्नत हैं तब उदात्त संस्कृति का अधिकारी भारत यह क्यों नहीं कर सकता।

अंग्रेजी के लगभग 150-200 वर्षों के अनुभव से हमें जो प्रमुख लाभ प्रौविज्ञान हेतु मिलना थे, न केवल वे नहीं मिल रहे हैं, वरन वे हमें अमानवीय बना रहे हैं। अब यह देखना चाहिये कि हिन्दी भाषा में प्रौविज्ञान शिक्षण की क्षमता है या नहीं। (मेरे निष्कर्ष सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं पर लागू होंगे)। 1947 के पहिले डा. रघुवीर ने लगभग 30000 तकनीकी शब्दों का निर्माण कर यह सिद्ध कर दिया था कि यह क्षमता हिन्दी म� �ं है। प्रशासनिक प्रोत्साहन न मिलने के बावजूद हिन्दी में प्रौविज्ञान में बहुत लिखा गया है। 1998 तक केवल 13 भारतीय भाषाओं में प्रौविज्ञान विषयक लगभग 25000 पुस्तकें, तथा हिन्दी में 2000 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, और 1998 के बाद इस गति में वृद्धि हुई है। भारतीय विज्ञान परिषद, इलाहाबाद, 1915 से ‘विज्ञान’ नामक मासिक पत्रिका, तथा 1952 से ‘अनुसंधान’ पत्रिका लगातार प्रकाशित कर रहा है। ‘विज्ञान प्रग ति’ मासिक दिल्ली से कोई पचास वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रही है जिसकी ग्राहक संख्या 70000 से 100000 होती है। ‘अनुसंधान पत्रिका’ में स्नातकोत्तर तथा पीएचडी स्तर के शोध पत्र प्रकाशित होते हैं। सीएसआईआर की ‘वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका’ उच्चकोटि के शोध पत्र प्रकाशित करती आई है। आईआईटी में थीसिस भी हिन्दी में लिखी जा रही हैं। शब्दावली आयोग ने हिन्दी में अधुनातम लगभग 8 लाख वैज्ञानिक शब्दों का निर्माण कर लिया है। हिन्दी भाषा (के शब्दकोशों) में कुल लगभग तीन लाख शब्द होंगे। इससे हिन्दी में प्रौवैज्ञानिक शब्द निर्माण कार्य की महत्ता दिखती है, दूसरे, हिन्दी भाषा में प्रौविज्ञान का बढ़ता हुआ महत्त्व भी।

सातवें दशक में जब सूक्ष्म इलैक्ट्रॉनिक़ी किशोरावस्था में थी उस पर मेरा एक लेख ‘वैज्ञानिक’ नामक पत्रिका में, आठवें दशक में संचार की ताजी प्रौद्योगिकी ‘क्षोभ मंडल प्रकीर्णन’ – पर मेरा एक लेख ‘इंडियन इंस्टिट्यूट ऑव इंजीनियर्स’ की पत्रिका में प्रकाशित हुए। नौवें दशक में ‘इलेक्ट्रॉनिकी युद्ध कला’ जैसे गुप्त विषय पर, 1991 में युद्ध-विज्ञान तथा युद्ध कला पर ‘खाड़ी युद्ध-91’ पर, और ताज ा तथा जटिल विषय उपग्रह विज्ञान पर ‘उपग्रह के भीतर बाहर’ – 2002 में मेरी पुस्तकें प्रकाशित हुईं। अनेकानेक लेखक हैं जो प्रौविज्ञान पर, बिना किसी व्यावसायिक प्रोत्साहन के, हिन्दी (भारत) प्रेम – के कारण लगातार लिख रहे हैं। प्रकाशक पाठ्यपुस्तकों का प्रकाशन करने के लिये तभी तैयार होगा, जब उसे भरोसा होगा कि उसकी पुस्तकों के लिये बाजार है। यह तो उल्टा तर्क है कि जब तक पाठ्य पुस्तकें हिन्दी में नहीं मिलतीं, हिन्दी को उस का माध्यम नहीं घोषित किया जा सकता। वही बात है कि, ‘जब तक तैरना नहीं आएगा, तुम पानी में नहीं जा सकते’। यदि शासन आज घोषित कर दे कि दो वर्ष पश्चात 2005 जुलाई से समस्त माध्यमिक प्रौविज्ञान की शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं होंगी, और क्रमशः बढ़ते हुए स्नातकोत्तर की प्रौविज्ञान शिक्षा का माध्यम भी होती जाएंगी, तब सभी प्रौविज्ञान की पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध हो जाएंगी।

अब हिन्दी ने प्रौविज्ञान-प्रसार की अपनी शक्ति सिद्ध कर दी है तब हिन्दी में उच्च-शिक्षा प्रदान करने पर प्रतिबंध क्यों ? आयुर्विज्ञान में हमारे पास हिन्दी में शिक्षा देने की पूरी क्षमता है, किंतु (अंग्रेजी भक्त?) ‘मैडिकल काउंसिल ऑव इंडिया’ हिन्दी में शिक्षा देने की अनुमति नहीं दे रही है। क्या संसद इसे अनदेखा नहीं कर रही है ! हम क्या करें ? पहिले हमें कुछ विचारों पर मनन करना चाहिये। ( एक चेतावनी अपेक्षित है: ‘मानव व्यवहार इतना जटिल है कि उसके विषय में शत-प्रतिशत सही कथन नहीं हो सकते, वे अधिकांशतया सत्य हों तो स्वीकार्य होना चाहिए)। कुछ निष्कर्ष हैं –

1. सांस्कृतिक – आर्थिक गरीब देश में रोटी की भाषा राजभाषा बन जाती है ; जब तक अंग्रेजी रोटी की भाषा है तब तक भारत की राजभाषा अंग्रेजी ही रहेगी।

2. जब दो बिल्लियां लड़ती हैं तथा न्याय के लिए बंदर के पास जाती हैं तब सारा लाभ बंदर को खुशी-खुशी मिल जाता है। आज अनेक भारतीय भाषाएं अंग्रेजी से ही न्याय चाहती हैं। अतएव …

3. विदेशी राजभाषा अंततः राष्ट्रभाषा हो जाती है, और वह असली राष्ट्रभाषाओं को कमजोर करती है। अतएव…

4. यदि किसी देश में दो समुदाय हों – एक, श्रेष्ठता ग्रंथि से तथा दूसरा, हीनता ग्रंथि से पीड़ित, तब श्रेष्ठता ग्रंथि से पीड़ित समुदाय की भाषा और संस्कृति (जैसे हैपी बर्थ डे) ‘हीनता-ग्रंथित’ समुदाय की संस्कृति तथा भाषा पर हावी हो जाती हैं। श्रेष्ठता-ग्रंथित लोगों की भाषा अंग्रेजी है तथा भारतीय भाषाएं हीनता-ग्रंथित लोगों की। अतएव …

5. प्रौविज्ञान से समुन्नत देश की संस्कृति और भाषा कमजोर देशों की संस्कृति तथा भाषा पर हावी हो जाती है। अंग्रेजी ऐसी ही भाषा है, पाश्चात्य संस्कृति ऐसी ही है। भारत की भाषा और संस्कृति का भविष्य?

6. कुछ विद्वान हिन्दी के विकास की तरफ से निश्चिन्त हैं यह सोचकर कि हिन्दी हमेशा सत्ता के विरोध में ही फली फूली है। आज व्यक्तिवादी तथा भोगवादी युग में ऐसा नहीं होगा। उस समय वे अस्मिता के लिये अपने प्राणों का भी उत्सर्ग करते थे। अंग्रेजी की रोटी का जहर भारतीयों को बीमार ही करेगा।

7. वैचारिक दरिद्रता आर्थिक दरिद्रता से कहीं अधिक घातक है।

8. जिसमंे उचित कार्य करने का साहस नहीं है वह अनुचित कार्यों के दुष्परिणाम भुगतेगा ही।

9. आज के भोगवादी तथा खुले बाजार में अपनी अस्मिता बनाये हुए, आर्थिक-औद्योगिक विकास करते हुए तथा ससम्मान जीने के लिये एक शर्त्त, सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है – प्रौविज्ञान में अग्रिम पंक्ति में रहना।

हम यदि देश भक्त हैं तो इस पतनशील देश को कैसे उन्नतिशील बनाएं ?

1. प्रौविज्ञान की शिक्षा भारतीय भाषाओं में दें; हिन्दी में पर्याप्त प्रौवैज्ञानिक शब्दावली है, लेखक हैं और पाठक भी हैं (‘जल बिचु मीन पियासी’)। हमारा अंग्रेजी का मोह इसके प्रसार में सबसे बड़ा रोड़ा है। औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ, प्रौवैज्ञानिक साक्षरता बढ़ाने के लिये भी कार्य करना चाहिये।

2. आज की गड्डमड्ड संस्कृति से बचने लिये हमें एक समेकित भारतीय संस्कृति को जीवंत रूप में लाना है। एतदर्थ शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषा हो, साथ ही समेकित भारतीय संस्कृति की शिक्षा भी हो।

3. अंग्रेजी की शिक्षा भी अवश्य देना चाहिये किंतु रोजी रोटी के लिये सर्वप्रथम उसकी अनिवार्यता हटाई जाए। तथा अंग्रेजी को वहीं रखा जाये जहां उसकी नितांत आवश्यकता हो, उदाहरणार्थ, विप्रौद्योगिकी के साहित्य के अनुवाद आदि में। अंग्रेजी को एक विदेशी भाषा के समान ही स्थान मिलना चाहिये। त्रिभाषी सूत्र के स्थान पर द्विभाषी (हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषा) सूत्र अपनाया जाये। संस्कृत तीसरी भाषा हो सकती है।

4. अंग्रेजी को घृणित सिंहासन से हटाकर, हिन्दी को उस पर आसीन नहीं होना है। उसे तो मित्रवत सम्पर्क तथा राज भाषा का कार्य करना है। सभी प्रदेश अपनी अपनी भाषाओं में अपना सारा कार्य करें।

5. हिन्दी को रोटी के लिये अनिवार्य न बनाया जाये, हां ‘अखिल भारतीय सेवाओं’ में वे अधिकारी अपना कार्य कर सकें, बस इतना ही हिंदी ज्ञान उनके लिये आवश्यक हो। हिन्दी में केवल उर्त्तीण होना आवश्यक हो। और हिंदी भाषियों को भी एक अन्य भारतीय भाषा में उतनी ही योग्यता आवश्यक हो। अखिल भारतीय भाषाओं की परीक्षाओं में विभिन्न भाषाओं में उत्तर प्रपत्र जांचने के लिये आवश्यक समान स्तर लाया जा सकत ा है। यह कोई असमाधेय समस्या नहीं है।

6 एक सशक्त अनुवाद सेना तैयार की जाए।

7. हिन्दी भाषा के विकास के लिये अनेक संस्थाएं यथा, राजभाषा विभाग, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, केन्द्रीय हिन्दी सन्स्थान, वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, हिन्दी ग्रंथ अकादमियां आदि कार्य कर रही हैं। हिन्दी को प्रौविज्ञान शिक्षा का माध्यम बनाने हेतु पर्याप्त विकास हुआ है। इन संस्थाओं के कार्य को समेकित कर युद्ध स्तर पर यह ध्येय पूरा करने वाली एक सशक्त शीर्ष संस्था की आवश्यकता है जिसे समुचित संसाधन तथा अधिकार दिये जाएं ताकि वह अपने उत्तरदायित्व पूरे कर सके। शासन प्रौविज्ञान के विकास हेतु एक सुनियोजित सुसंबद्ध नीति का कार्यान्वयन करे।

उपरोक्त ध्येय नितांत वांछनीय है। किंतु कितने व्यावहारिक हैं? यह हमारे आदान-प्रदान के सौहार्द पर, त्याग की भावना पर तथा मुख्यतः अपने देश-प्रेम पर निर्भर करता है। प्रेम इस विश्व में सबसे महत्त्वपूर्ण शक्ति है। हमारे राष्ट्र में जो मूलभूत संस्कृति है उसका अस्तित्व सारे भारत में है। हमारी संस्कृति में एकता है, एकरूपता नहीं, एकात्मता है। हम संकीर्ण राजनैतिक स्वार्थों के ऊपर उठ सकते हैं। हमारी भाषाओं में, हिंदी में अधुनातम विप्रौद्योगिकी को अभिव्यक्त करने की शक्ति है। हिन्दी संयुक्त राष्ट्र संघ की एक भाषा बनने के लिये पूरी तरह योग्य है। भारत में विश्व-शक्ति बनने की क्षमता है। भारत तभी ऑर्नल्ड टॉयनबी का मानवता को बचाने का स्वप्न पूरा कर सकेगा – ‘भारत विश्व का अध्यात्म गुरू बन कर पाश्चात्य सभ्यता के तले रौंदी जा रही मानवता को बचा सकेगा।

– विश्वमोहन तिवारी

पूर्व एयर वाइस मार्शल ई 143/21, नाऐडा

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12 Comments on "विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में हिन्दी का महत्त्व"

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विश्व मोहन तिवारी
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विश्व मोहन तिवारी

राजीव जी
मैं भोपाल में अपनी बेटी दीपशिखा अवस्थी के पास ४ और् ५ जनवरी को रहूंगा।
मेरा मोबाइल तो रहेगा ही मेरे पास : ०९९५८८६४४९९
और् बेटी का पता है बाग मुगलिया – संत आशाराम नगर, १. P१२
अपना मोबाइल नंबर बतलाएं
शुभ् कामनाएं
विश्व मोहन तिवारी

Rajeev Dubey
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विश्व मोहन जी ,
कोशिश करूंगा कि उस समय एक यात्रा भोपाल की हो जाए, आपसे मिलने का आनंद लेना चाहूँगा और आपके अनुभवों से सीखना चाहूँगा.

आप मुझे निम्नलिखित ईमेल पते पर लिख सकते हैं :
RAJEEV.MAILBOX@GMAIL.COM

विश्व मोहन तिवारी
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विश्व मोहन तिवारी

राजीव जी,
मैं ४ तथा ५ जनवरी को भोपाल में रहूँगा अपनी बिटिया के साथ P१२ , १. संत आशाराम नगर , बाग मुगलिया में ठहरूंगा ..
कोई योजना बनाकर मिला सकें तो आपका आना सार्थक होगा..
वरना ई मेल पर बात तो हो सकती है..
शुभ कामनाएं

Rajeev Dubey
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विश्वमोहन जी , मैं वडोदरा, गुजरात में रहता हूँ , परन्तु भोपाल आवागमन बना रहता है , आप अपनी यात्रा की विस्तृत सूचना भेजिएगा, आशा है भेंट हो पायेगी .

विश्व मोहन तिवारी
Guest
विश्व मोहन तिवारी

राजीव दुबे जी
क्या आप् भोपाल में रहते हैं?
मैं ४ जनवरी को भोपाल पहुँच रहा हूं।

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