लेखक परिचय

संजय कुमार बलौदिया

संजय कुमार बलौदिया

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संजय कुमार iimc

hindi diwasभाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर की ओर से किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले पचास सालों में करीब 220 भाषाएं मृत हो गई है और आने वाले दशकों में कुछ और भाषाएं जिनमें हिंदी भी शामिल है, उनके खत्म होने की भी चिंता जताई जा रही है। इस सर्वेक्षण के बाद भी क्या भाषाओं को बचाने को लेकर कुछ ठोस कदम उठाए जाएंगे। जिससे भाषाओं के अस्तित्व को बनाए रखा जा सके। हिंदी दिवस पर क्या हिंदी की स्थिति को सुधारने को लेकर कुछ काम किया जाएगा या फिर हिंदी दिवस पर हिंदी पखवाड़े और सेमिनार कर रस्म अदायगी की जाएगी।

दरअसल बात यह है कि हमें हिंदी को बचाने की चिंता नहीं बल्कि अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व और हिंदी के कारोबार की चिंता है। आमजन को सत्ता से बेदखल करने का सबसे आसान तरीका है सत्ता को ऐसी भाषा में चलाया जाए, जो जनता समझती ही न हो। ठीक इसी प्रकार अंग्रेजी के वर्चस्व को बनाए रखने और उसे बढ़ावा देने के लिए एक ढांचा खड़ा किया जा रहा है और हिन्दी को अनूदित भाषा बनाने की कोशिश की जा रही है। इस बात को कुछ उदाहरण से समझ जा सकता है।

पहला उदाहरण, दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ कॉलेजों ने हिन्दी-संस्कृत आनर्स में दाखिले के लिए अंग्रेजी पढ़े होने के साथ ही पर्सेन्टेज की डिमांड रखी गई थी। वहीं कुछ कॉलेजों ने राजनीति विज्ञान और इतिहास के लिए भी अंग्रेजी पढ़े होने की शर्त रखी। आज हिन्दी या संस्कृत पढ़ने के लिए अंग्रेजी पढ़ना अनिवार्य बना दिया जा रहा है। अंग्रेजी को ही ज्ञान का एकमात्र रास्ता बनाने की कोशिश की जा रही है। किसी छात्र का नाम अगर कटआफ में है, लेकिन उसे अंग्रेजी नहीं आती है, तो उसे दाखिल नहीं मिलेगा क्योंकि उसका ज्ञान अंग्रेजी में नहीं है। आज अंग्रेजी को हमने ऐसी भाषा बना दिया है कि अंग्रेजी के सिवा कोई भाषा ही नहीं रह गई है। हमारे यहां विषय ज्ञान की महत्ता नहीं है, ज्ञान की भाषा क्या है इसको महत्व दिया जाता है। हिन्दी को राजभाषा का दर्जा भले ही मिला हो, लेकिन वह आज छह दशकों बाद भी राजभाषा नहीं बन पाई है।

दूसरा उदाहरण, मीडिया स्टडीज ग्रुप ने दिसंबर 2012 और जून 2013 के यूजीसी की नेट परीक्षा के जनसंचार और पत्रकारिता के प्रश्न पत्रों में अंग्रेजी से किए गए हिन्दी अनुवाद का अध्ययन कर खुलासा किया था कि नेट की परीक्षा के प्रश्न पत्र मूलतः अंग्रेजी में ही तैयार किए जा रहे हैं। अंग्रेजी के शब्दों का हिन्दी भाषा में सरल अनुवाद करने के बजाय क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग किया गया था और साथ ही वाक्य सरंचना भी ठीक नहीं थी। इसी प्रकार दिल्ली विश्वविद्यालय के स्कूल आफ ओपन लॉर्निंग के एमए के सामाजिक बहिष्करण के पेपर में भी वाक्य संरचना ठीक नहीं थी। इन अध्ययनों से यह बात तो साफ हो जाती है कि अब नेट की परीक्षा के प्रश्न पत्र हो या एमए के प्रश्न पत्र सभी मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किए जा रहे। इसके बाद इनका हिन्दी अनुवाद करवाया जाता है। जब छात्रों के समाने क्लिष्ट अनुवाद होगा, उस स्थिति में उन्हें भी अंग्रेजी को समझना ही जरूरी लगेगा। इस तरह के अनुवाद से जहां हिन्दी छात्रों के साथ भेदभाव हो रहा है। वहीं इससे अंग्रेजी को बढ़ावा भी मिल रहा है। सवाल यह है कि जब प्रश्न पत्र अनुवाद ठीक तरीके से नहीं होगा, तो छात्रों के पास अंग्रेजी को समझने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचेगा। अगर यह स्थिति रही तो हिन्दी को अनूदित भाषा बनने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।

तीसरा उदाहरण, मार्च में सिविल सर्विसेज के नए परीक्षा पैटर्न में हिन्दी समेत दूसरी भारतीय भाषाओं को जगह नहीं दी गई और अंग्रेजी को अनिवार्य करने का प्रयास किया गया। लेकिन देशभर में इसका तीखा विरोध हुआ, जिससे इस फैसले को रोक दिया गया। इसके बाद भारतीय भाषा का विकल्प लेकर परीक्षा देने वाली हरिता वी कुमार टॉपर बनी। यदि अंग्रेजी की अनिवार्यता बनी रहती तो क्या ऐसा हो पाता। चुनावी माहौल के कारण सिविल सर्विसेज की परीक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्यता के लिए भले ही कुछ समय के लिए रोक लग गई हो, लेकिन चुनावों के बाद फिर ऐसी कोशिश हो सकती है। आखिर हमारा प्रशासन क्यों अंग्रेजी को ही एकमात्र ज्ञान का रास्ता बनाने में लगा हुआ है।

इन उदाहरणों से यह बात साफ हो जाती है कि कैसे प्रशासनिक स्तर पर हिन्दी भाषा को अनूदित भाषा बनाने की कोशिश की जा रही है और अंग्रेजी के वर्चस्व को बनाए रखने की साजिश हो रही है। यही वजह है कि देश में उच्च शिक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्यता कानूनी नहीं है, लेकिन उसे अनिवार्य की तरह लागू करने की कोशिश की जा रही है। वहीं, हर साल 22 करोड़ बच्चे प्राथमिक शालाओं में पढ़ते हैं, लेकिन अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण 40 लाख से भी कम स्नातक बनते हैं।

अंग्रेजी को भले ही वैश्विक भाषा के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। लेकिन यह कितना सही है कि हम अपनी भाषा की उपेक्षा कर अंग्रेजी सिखना या सिखाना चाहते है, जबकि पश्चिमी देशों में हिन्दी पढ़ाए जाने पर हम गर्व करते है। हमें अन्य देशों से सिखना चाहिए कि कैसे वह अपनी भाषा के साथ ही अन्य भाषा को भी अपनाने की कोशिश करते हैं।

 

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