लेखक परिचय

ए.एन. शिबली

ए.एन. शिबली

उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी में विभिन्‍न समसामयिक मुद्दों पर निरंतर कलम चलाने वाले शिबली जी गत दस वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। दैनिक हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, कुबेर टाइम्स, उर्दू में राष्ट्रीय सहारा, क़ौमी आवाज़, क़ौमी तंजीम आलमी सहारा, हिन्दी और उर्दू चौथी दुनिया सहित अनेक वेबसाइट्स पर लेख प्रकाशित। फिलहाल उर्दू दैनिक हिंदुस्तान एक्सप्रेस में ब्‍यूरो चीफ के पद पर कार्यरत हैं।

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ए एन शिबली

बीता साल 2010 कुल मिला कर देखें तो खेलों की दुनिया में भारत के लिए अच्छा रहा। जहां वायक्तिगत तौर पर कई खिलाड़ियों ने विश्व स्तर पर भारत का नाम रोशन किया वहीं राष्ट्रमंडल खेलों का शानदार आयोजन कर भारत ने यह साबित किया की उसमें भी खेलों के बड़े बड़े आयोजन करने की सलाहियत है। यह सही है की इस बड़े आयोजन से पहले तैयारी में बड़ी कमियाँ सामने आयीं, इसमें बड़े पैमाने पर घोटाले भी सामने आए मगर कुल मिलकर जहां तक आयोजन का सवाल है तो इसका आयोजन पूरी तरह से सफल रहा और उन सभी देशों ने भारत की तारीफ की जो इसके सफल आयोजन पर शक कर रहे थे।

जहां तक खिलाड़ियों के वायक्तिगत प्रदर्शन का सवाल है तो इस बार कई नए खिलाड़ियों ने अपनी खास पहचान बनाई। राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान उन खिलाड़ियों ने भी पदक जीते जिनका कभी किसी ने नाम भी नहीं सुना था। वैसे कुल मिलकर जो खिलाड़ी सालों भर छाए रहे उनमें सचिन तेंडुलकर, सानिया मिर्ज़ा, साइना नहवाल, सुशील कुमार और सोमदेव देव बर्मन के नाम खास हैं। सचिन ने न केवल इस वर्ष किरकेट में अपने दो दशक पूरे किए बल्कि कई बेहतर पारियाँ खेल कर उनहों ने यह साबित किया की उनमें अभी बहुत किरकेट बाक़ी है और वो किसी से भी बेहतर बल्लेबाज़ी कर सकते हैं।

साल जाते जाते सचिन ने टेस्ट किरकेट में अपने शतकों का अर्धशतक तो पूरा कर ही लिया इसी साल उनहों ने एकदिवसीए किरकेट की पहली डबल संचूरी भी बना दी। एकदिवस्ये किरकेट के लगभग 40 साल के इतिहास में हमेशा से यह एक प्रश्न बना हुआ था की किया कभी कोई बल्लेबाज़ इस प्रकार की किरकेट में भी डबल संचूरी बना सकता है। बीते दिनों में कई बल्लेबाजजों ने 150 या उस से अधिक रनों की पारी खेली मगर कोई दोहरे शतक तक नहीं पहुँच सका। लगभग 15 साल पहले जब पाकिस्तान के सईद अनवर ने 194 रनों की पारी खेली तो यह भी एक रिकार्ड बना रहा। हर किसी को उम्मीद थी की सहवाग, या जयसुरिया जैसा खिलाड़ी ही एकदिवसीए मैचों में दोहरा शतक बना सकता है मगर यह कमाल किसी और ने नहीं बल्कि उस खिलाड़ी ने किया जिसके नाम पहले से ही एक दो नहीं बल्कि कई रिकार्ड थे।

इस वर्ष सचिन ने न केवल टेस्ट में शतकों का अर्धशतक पूरा किया, एक दिवासिए मैचों में दोहरा शतक लगाया बल्कि टेस्ट में पूरे साल सब से अधिक रन उनहों ने ही बनाए। डरबन में खेले गए दूसरे टेस्ट तक सचिन ने इस साल अब तक 14 मैच में 1562 रन बनाए थे जिसमें सात शतक शामिल हैं। यह 2010 में किसी भी बल्लेबाज़ का सब से ज़्यादा रन है। यह किसी कैलेंडर वर्ष में उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। इस से यह भी साबित होता है की उम्र बढ्ने के साथ साथ सचिन के खेल में और भी निखार आता जा रहा है। तेंदुलकर ने बांग्लादेश के खिलाफ नाबाद 105 रन की पारी से वर्ष का आगाज किया और फिर श्रीलंका के खिलाफ कोलंबो और आस्ट्रेलिया के खिलाफ बेंगलूर में दोहरा शतक जड़ा। उन्होंने सेंचुरियन में 50वां सैकड़ा लगाकर साबित कर दिया कि उनकी रनों की भूख अभी कम नहीं हुई है बल्कि लगातार बढ़ती जा रही है।

टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्ज़ा की तरह ही दिन ब दिन नई बुलंदियों को छू रही बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नहवाल के लिए यह साल भी यादगार रहा। याद रहे की पिछले दो तीन सालों से उनहो ने काफी नाम कमाया है। इस साल उन्होंने दुनिया की शीर्ष दो खिलाड़ियों की सूची में शामिल होने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी होने का गौरव हासिल किया। हालाकि बाद में उन्हे चौथे स्थान पर लुढ़कना पड़ा लेकिन साल के अंत में हागकाग सुपर सीरीज में खिताबी जीत की बदौलत एक बार फिर दूसरे पायदान पर काबिज हो गई। सायना का इस साल यह तीसरा और कुल चौथा सुपर सीरीज खिताब है। देश के सबसे बड़े खेल सम्मान राजीव गाधी खेल रत्न से सम्मानित सायना ने राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को स्वर्ण दिलाकर अंक तालिका में इंग्लैंड को पीछे छोडते हुए पहली बार देश को दूसरा स्थान दिलाया। साइना ने साल के शुरुआत में आल इग्लैंड सुपर सीरीज के सेमीफाइनल में पहुचने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी का दर्जा हासिल किया था। साइना जैसा खेल पेश कर रहीं है उस से उम्मीद है की आने वाले दिनों में वो विश्व की नंबर एक खिलाड़ी बन जाएंगी।

टेनिस की बात करें तो इस वर्ष सानिया मिर्ज़ा का खेल तो बेहतर रहा ही सोमदेव देव बर्मन ने भी काफी नाम कमाया। देश के नंबर एक एकल टेनिस खिलाड़ी सोमदेव देवबर्मन ने इस साल जिस तरह से प्रदर्शन किया है उससे खेल प्रेमियों को उनसे अगले सत्र में एटीपी टूर में भी खिताबी सफलता हासिल करने की आस बनने लगी है। हालांकि पेशेवर टेनिस में शीर्ष सौ खिलाडि़यों की सूची में 94वीं रैंकिंग तक पहुँचने के बाद वह अभी 106वीं रैंकिंग पर हैं मगर इसमें बेहतरी की उम्मीद है. सोमदेव की साल की स्वर्णिम सफलता की कहानी राष्ट्रमंडल खेलों से शुरू हुई जहां उन्होंने एकल वर्ग में आस्ट्रेलिया के ग्रेग जोंस को हराकर भारत के लिए सोने का पदक जीता। यही सफलता एशियाड में भी जारी रही। उन्होंने वहां कुल तीन पदक जीते जिसमें दो स्वर्ण व एक कांस्य पदक शामिल हैं. ग्वांग्झू में पहले सनम सिंह के साथ जोड़ी बनाते हुए मेजबान चीनी टीम को हराया। उसके बाद अगले दिन एकल वर्ग में भी स्वर्ण पदक जीता। सोमदेव की सफलता को देखकर ऐसा लगता है की अब भारत को लिएंडर पेस व महेश भूपति के बाद एक और बहतारेन टेनिस खिलाड़ी मिल गया है। डेविस कप में भी सोमदेव ने भारत की सफल अगुवाई की और अब ऐसा अग्ने लगा है की टेनिस प्रेमियों को महेश भूपति और लेंडर पेस की कमी का एहसास नहीं होगा।

2010 में सानिया मिर्ज़ा ने भी कुछ ऐसा प्रदर्शन किया की चोट के बाद उनकी वापसी को यादगार कहा जा सकता है। राष्ट्रमंडल खेलों में सानिया को महिला एकल में रजत पदक मिला जबकि महिला युगल में उन्होंने रश्मि चक्रवर्ती के साथ मिलकर कांस्य पदक जीता। अप्रैल में पाकिस्तानी कीकेटर शोएब मालिक से शादी करने के बाद कलाई की चोट के कारण सानिया ने कुछ दिनों का ब्रेक लिया और फिर अच्छी वापसी की। भारत को राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों में चार पदक दिलाने के अलावा उन्होंने साल के अंत में 17 महीने बाद खिताब जीता। सानिया ने दुबई में 13वीं अल हबतूर टेनिस चैलेंज के फाइनल में 80वें नंबर की सर्बिया की बोजाना जोवानोवस्की को हराया। एक समय 37 वें नंबर पर पहुँच चुकी सानिया फिलहाल 114 वें नंबर पर है मगर उनके प्रदर्शन को देख कर ऐसा लगता है की वो इस में सुधार करेंगी और एक बार फिर उन्हें अपना खोया हुआ सथान वापस मिल जाएगा।

कुश्ती में सुशील कुमार का जलवा इस साल भी जारी रहा। उनके अलावा भारत के दूसरे पहलवानों ने भी इस वर्ष कमाल का प्रदर्शन किया। भारतिए पहलवानों के बेहतर प्रदर्शन का अंदाज़ा इस से लगाया जा सकता है की राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए दस स्वर्ण सहित 19 पदक जीते। जहां तक सुशील कुमार का प्रश्न है तो वो तो पूरे साल कमाल करते ही रहे। ओलंपिक पदक जीतने बाद सुशील कुमार ने मास्को में इस साल अगस्त में आयोजित विश्व कुश्ती चैंपियन में पहली बार भारत को इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता का स्वर्ण पदक दिलाया। राष्ट्रमंडल खेलों में भी सुशील को सोने का तमग़ा मिला अब सुशील का कहना है की उनका लक्ष्य लंदन ओलंपिक खेलों का स्वर्ण पदक जीतना है। सुशील जैसा खेल पेश कर रहें है उस से कुश्ती के जानकारों को लगता है की यदि सुशील सही दिशा में मेहनत करते रहे तो उनके लिए ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतना असंभव नहीं है।

दूसरे खेलों के खिलाड़ियों की बात करें तो 2010 में मुक्केबाजी में विजेंदर सिंह, सुरंजय सिंह, और विकास कुमार यादव, बिलयर्ड्स में पंकज आडवाणी, टेबल टेनिस में शरत कमल, निशानेबाजी में गगन नारंग, अभिनव बिंद्रा, अनीसा सैयद और तैराकी में दीपिका कुमारी ने यादगार प्रदर्शन किया। उसी प्रकार चक्का फेंक में कृष्ण पूनीय ने भी कमल किया। कुल मिलकर देखें तो 2010 भारत के लिए खेलों के हिसाब से बेहतर तो रहा ही व्यक्तिगत तौर पर विभिन्न खेलों के कई खिलाड़ियों ने भी शानदार खेल पेश कर के इस साल को खुद के लिए यादगार बनाया।

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