लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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skill idiaअशोक “प्रवृद्ध”

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीबी हटाओ अभियान के तहत विश्व युवा कौशल दिवस 15 जुलाई को स्किल इंडिया मिशन अर्थात भारत कौशल विकास अभियान की शुरुआत कर भारत में युवा कौशल विकास का न केवल शंखनाद कर दिया है बल्कि संसार को इस बात का अहसास करा दिया है कि संसार के विकसित देशों के पास धन तो है लेकिन काम करने वाले कुशल जन नहीं है। भारत उन्हें कौशल विकास कार्यक्रम के तहत करोड़ों युवाओं की फौज उपलब्ध करा सकता है। मेक इन इंडिया की अपनी विचारधारा की प्रधान्मन्त्रो नरेंद्र मोदी पहले ही समस्त संसार में व्याप्ति करा चुके हैं और अब भारत कौशल विकास कार्यक्रम के द्वारा एक नवीन कीर्तिमान रचने की तैयारी में हैं । दूसरी ओर उनके अपने ही देश में उनका मुखर विरोध हो रहा है। नीति आयोग भी राजनीतिक विरोध की जद में है । हालात यह है कि प्रतिपक्ष भारत कौशल विकास अभियान से सम्बंधित नीति आयोग की बैठकों से कन्नी काटता नजर आ रहा है।

 

दरअसल भारत कौशल विकास कार्यक्रम में केन्द्र व राज्य सरकारों के 11 मंत्रालयों- रक्षा, रेल, प्रवासी भारतीय, भारी उद्योग, स्वास्थ्य, रसायन-उर्वरक, इस्पात, कोयला, विद्युत, ऊर्जा व सामाजिक न्याय की सक्रिय व महत्वपूर्ण भागीदारी होगी । इन कार्यक्रमों में 24 लाख युवाओं को प्रशिक्षण व उद्यमी बनने का अवसर मिलेगा। अपनी इसी इच्छा को अभिव्यक्त करते हुए अभियान का शुभारम्भ करते हुए प्रधानमन्त्री मोदी ने कहा कि हम नहीं चाहते कि हर कोई पढऩे के बाद नौकरी खोजे । हम चाहते हैं कि लोग कौशल सीखें । देश में 10 करोड़ से ज्यादा युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देने की जरूरत है । देश की पहली प्राथमिकता युवाओं के लिये नौकरी का अवसर पैदा करना है । फिलहाल देश में मौजूदा 30 करोड़ लोगों की वर्क फोर्स को स्किल ट्रेनिंग देनी होगी । पांच साल में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना और ऋण योजना के तहत 34 लाख प्रशिक्षित बेरोजगारों को कर्ज दिया जायेगा । जैसे चीन ने अपनी पहचान मैन्यूफेक्चरिंग हब के रूप में बनायी है । भारत को मानव संसाधन हब के रूप में विकसित होना है । प्रशिक्षित होने से आमदनी के साथ-साथ युवाओं में आत्मविश्वास आयेगा ।

 

भारत कौशल विकास अभियान के अंर्तगत 4 अन्य योजनायें राष्ट्रीय दक्षता विकास मिशन, उद्यमिता, प्रधानमंत्री कौशल विकास और प्रशिक्षित कर्ज योजना सम्बद्ध हैं। इस कार्यक्रम की सहभागिता में कई कम्पनियां, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों से निकले युवाओं के लिये दस हजार से अधिक नौकरियों के अवसर देगी। हर युवा को कम से कम 8 हजार रुपयों का रोजगार दिया जायेगा। इस समय देश में 3.5 प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं जो किसी ट्रेड में पूरी तरह कुशल कारीगर हैं। दुनिया में कुशल प्रशिक्षित लोगों के लिये नौकरियों का बहुत बड़ा बाजार है। ऐसे में भारत के प्रशिक्षित लोगों के लिये विदेशों में भी भरपूर अवसर मिलेंगे। इनमें 4-5 करोड़ कुशल कारीगरों को ससम्मान बुलाकर काम दिया जायेगा। भारत युवा देश है और हमें इस ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।

 

ऐसी उत्साहपूर्ण योजनाओं के शुभारम्भ के मध्य देश में पढ़े-लिखे शिक्षित बेरोजगारों की बढती फ़ौज चिंताजनक स्थिति उत्पन्न कर रही है। रोजगार नहीं मिलने की हालत में युवा बेकार घूमते और शहरों व सड़कों में चोरी, लूटपाट, पर्स-चैन खींचने के अपराध में लग जाते हैं। रोजगार की कमी की स्थिति का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इंजीनियर और डाक्टर की योग्यता रखते हुए भी भी युवा चपरासी व चौकीदारी की नौकरियों में भर्ती के लिये उसकी परीक्षा में बैठ रहे हैं। प्रशिक्षित व्यक्ति के साथ इन्साफ व अवसर तभी होगा जब उसे उसकी योग्यता के अनुसार काम मिले। इंजीनियर या डाक्टर को किसी दफ्तर में क्लर्क, चपरासी या चौकीदार बना भी दिया जाये तो न ही योग्यता का उपयोग हुआ और न ही वह संतुष्ट होगा। यह भी ध्यान रखना होगा कि अवसर का अर्थ सिर्फ नौकरी ही नहीं हो सकता, लेकिन अवसर का अर्थ सिर्फ कर्ज देना भी नहीं हो सकता। सबकी प्रतिभा एक जैसी नहीं होती।

 

इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं कि देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ ही रोज़गार के अवसर भी तेज़ी से बढ़े हैं, लेकिन विश्वविद्यालय जो स्नातक अर्थात ग्रेजुएट्‍स तैयार कर रहे हैं वे इंडस्ट्री की ज़रूरतों के अनुरूप नहीं हैं।जिसके कारण अच्छे प्रोफेशनल्स नहीं मिल रहे हैं । हिन्दीभाषी राज्यों से प्रतिवर्ष लाखों ग्रेजुएट्‍स निकल रहे हैं, लेकिन इनमें से कुछ हज़ार ही टेक्निकल ग्रेजुएट्‍स होते हैं। जबकि कंपनियों को स्किल्ड वर्कफोर्स चाहिए, जो अभी विश्वविद्यालय नहीं दे पा रहे। भारत की 400 कंपनियों पर किए गए एक रिक्रूटमेंट सर्वेक्षण में यह तथ्य सामने आया है कि 97 फीसदी कंपनियां मानती हैं कि अर्थव्यवस्था बढ़ने के साथ रोज़गार के अवसरों में भी इज़ाफ़ा हुआ है, मगर उस अनुपात में अच्छे प्रोफेशनल्स नहीं मिल पा रहे हैं। सर्वे के मुताबिक 60 फीसदी ग्रेजुएट्‍स किसी भी समस्या को सुलझाने में सफल नहीं हो पाते, उन्हें अपने क्षेत्र की पूरी जानकारी भी नहीं होती। ऐसे में प्रश्न उत्पन्न होता है कि कैसे तैयार होगा कार्य कुशल बल अर्थात स्किल्ड वर्कफोर्स और उन्हें रोजगार कहाँ ?

एनसीईआरटी के वैज्ञानिक अवनीश पांडेय सहित इस क्षेत्र के जानकार कहते हैं कि विश्वविद्यालयों को परंपरागत ढर्रे को छोड़कर व्यावहारिक शिक्षा अर्थात प्रैक्टिकल नॉलेज पर ज़ोर देना होगा। साथ ही इंटर्नशिप और लाइव ट्रेनिंग पर भी ध्यान देना होगा। तकनीकी बदलावों को अपनाने के साथ ही छात्रों को वाद-विवाद (डिबेट) और सामूहिक चर्चा अर्थात ग्रुप डिस्कशन का प्रशिक्षण देना चाहिए ताकि वे स्वयं को सही तरीके से प्रस्तुत कर सकें। रोजगार के क्षेत्र में वर्षों से नजर रखने वालों का कहना है कि हकीकत में मेरिट का अच्छी नौकरी से ज्यादा लेना-देना नहीं है। वे कहते हैं, सही प्लेसमेंट के लिए स्टूडेंट को मार्केट नॉलेज, संबंधित क्षेत्र की पूरी जानकारी, अर्थव्यवस्था की जानकारी, टीम भावना और मैनेजमेंट स्किल्स होनी चाहिए। कई बार देखने में आता है कि मेरिट वाले स्टूडेंट ज्यादा वक्त किताबों के साथ बिताते हैं जबकि एवरेज स्टूडेंट स्टडी के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों पर भी ध्यान देते हैं, इन खूबियों के कारण उन्हें अधिक नंबर लाने वाले छात्र के मुक़ाबले जल्दी प्लेसमेंट मिल जाता है। बहुराष्ट्रीय कंपनी डिलॉइट के उदाहरण से इसे स्पष्टतः समझा जा सकता है। यह कंपनी सेंट्रल इंडिया के अंग्रेज़ी जानने वाले विद्यार्थियों को ज्यादा अहमियत देती है क्योंकि उसका मानना है कि यहां के प्रोफेशनल्स का उच्चारण अच्छा होता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ कम्युनिकेशन में परेशानी नहीं होती। विशेषज्ञों के नज़रिए के आधार पर कहा जा सकता है कि अच्छी डिग्री के साथ ही विषय की जानकारी, संवाद कौशल, बाज़ार की समझ, सामान्य ज्ञान और प्रेजेंटेशन स्किल भी होना चाहिए, सिर्फ़ ग्रैजुएशन कर लेने से बात नहीं बनने वाली, इसके लिए अतिरिक्त कौशल की आवश्यकता होती है, जिसे प्रधानमंत्री मोदी द्वारा प्रस्तावित कौशल विकास कार्यक्रम के अंतर्गत निश्चित रूप से विकसित करके पूरी की जा सकती है, परन्तु प्रशिक्षण के साथ-साथ यह भी उतना जरूरी है कि उसे उसकी योग्यता के अनुसार काम मिले। इस उद्देश्य की पूर्ति करने के लिए ही नीति आयोग के तहत पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में बनी उपसमिति कौशल पाने के अधिकार पर कानून बनाने की संभावना तलाश रही है ताकि देश में कुशल श्रमशक्ति तैयार की जा सके। इस पर केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी का मानना है कि कौशल प्राप्त करने के अधिकार कानून तब तक बनाना मुमकिन नहीं है जब तक कि इस पर राज्यों के बीच सहमति नहीं बन जाती। मुख्यमंत्रियों से अपेक्षा की जाती है कि वे नीति आयोग को सुझाएं कि उत्पाद इकाइयों में कुशल श्रमशक्ति की कमी से कैसे निपटा जाए और कौशल कार्यक्रमों का कैसे विस्तार किया जाए?विशेष तौर पर ऐसे राज्यों में जहां युवाओं की संख्या अधिक है लेकिन लगता है कि विपक्ष के पास कोई विचार ही नहीं है। ऐसे में इस देश का भगवान ही मालिक है।

 

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