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डा.राज सक्सेना

डा.राज सक्सेना

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डा.राज सक्सेना
समलैंगिक(पुरूष) व्यभिचार के सम्बन्ध में अनेक विद्वान लेखकों ने हर दिशा और  हर दृष्टिकोण से खोंज की है | वे अपनी इस खोज को सुदूर अतीत में मैसोपोटामिया की संस्कृति तक ले जाने में सफल हुए हैं | इन खोज कर्त्ताओं में हैवलाक ऐलिस का नाम सर्वप्रमुख है | अधिकतर खोजकर्त्ता इसकी उत्पत्ति का अनुमान इस्लाम से पूर्व बर्बर खानाबदोश अरबों को मानते हैं | मुहम्मद यासीन इसे मंगोलों का दुराचार मानते हैं | (ए सोशल हिस्ट्री आफ -इन्डिया) |
बदायूंनी तो अपनी ’मुन्तखाबुत्तवारीख’ में इसे ट्रांस आक्सियाना की एक प्रथा –homosexual(व्यभिचार नहीं ?) मानता है |
यह लगभग स्पष्ट हो चुका है के इसका प्रचलन कुरान से पूर्व था | अब्दुल्ला –
यूसुफ अली ने अपनी पुस्तक ’द होली कुरान’(1937) के पृष्ठ 363 पर कुरान शरीफ के सूरा
सात,80-81 का सन्दर्भ देते हुए लिखा है कि,”हमने लूत को भेजा, उन्होंने अपने लोगों से
कहा,”तुम ऐसा दुराचरण करते हो जिसे तुमसे पूर्व संसार में कभी किसी ने नहीं किया ? –
चूंकि तुम अपनी काम वासना की तुष्टि स्त्रियों के स्थान पर पुरूषों से करते हो, तुम लोगों ने
वस्तुतः सीमाओं का उल्लंघन कर दिया है |”
निःसन्देह इस्लाम से पूर्व अरब समाज में उन्मुक्त और विविध रूप में कामुकता –
का प्रचलन था | इसीलिये पैगम्बर मुहम्मद साहब जो तत्कालीन महान समाज सुधारक एंव ,
धार्मिक पुनरोद्धारक थे ने इसको अपराध घोषित करते हुए दण्ड व्यवस्था का प्राविधान किया
था | (सूरा दो-187 अब्दुल्ला यूसुफ अली ’द होली कुरान)|
ऐसा प्रतीत होता है कि धार्मिक प्रतिबन्ध के उपरान्त भी यह व्यभिचार प्रचलन
में रहा | मुख्यतः इसके कारण थे – अरब समाज म्रें महिलाओं को पर्दे में अत्यन्त सुर-
क्षित रखा जाता था और वे आसानी से उपलब्ध नहीं थीं | दासियों का मूल्य अधिक होने
से साधारण अरब उनको क्रय कर उनका पालन करने में समर्थ नहीं था | स्त्रियों से अवैध-
सम्बन्ध तिरस्कृत और दण्डनीय थे | जबकि लड़के से यौनिक सम्बधों को समाज की मौन
सहमति सामान्यतः प्राप्त थी |
अरब सैनिक अभियानों में लगे रहते थे | इन अभियानों में वे महिलाओं को साथ
ले जा नहीं सकते थे | लड़के सहज उपलब्ध तथा सस्ते थे | साथ ही उन्हें निरापद रूप से
साथ भी रखा जा सकता था | कारण कितने भी हों कैसे भी हों, अरबों के साथ यह व्य-
भिचार अन्य देशों के साथ ईरान भी पहुंचा | यह इस लिये कहा जा सकता है किए’अवेस्ता’
या इस्लाम पूर्व की किसी धार्मिक या साहित्यिक रचना में इसका संकेत मात्र भी नहीं –
मिलता | जबकि सूफी सिलसिले की विकास रचनाओं व श्रंगार साहित्य में साक़ी(वह कम-
उम्र पुरूष या लड़का जो शराब पिलाता या परोसता हो)शब्द का प्रचुर प्रयोग सूफी साहित्य
में प्राप्त होता है |

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’खय्याम’ और ’हाफ़िज़’ जैसे महान ईरानी कवियों ने इस पर उत्कृष्ट , श्रंगार-
साहित्य की रचना की है | मुहम्मद यासीन ने ’ए सोशल हिस्टरी आफ स्लामिक इन्डिया
में अपने विचार इस तरह प्रकट किए हैं ,”सूफ़ी लोग ’पवित्र-प्रेम’ के बहाने इस अपवित्र
कामोन्माद में लिप्त रहते थे |”
जहां तक भारत में इस व्यभिचार का प्रश्न है, इस्लाम से पूर्व भारत में पुरूष
समलैंगिकता का कोई संकेत तक प्राप्त नहीं होता | धर्म-ग्रन्थ और साहित्यिक कृतियां तक
इस विषय में सर्वदा मौन हैं | यद्यपि अनेक भारतीय आचार-विचार, शील से सम्बन्धित –
महान धर्म-ग्रन्थ प्राप्त होते हैं किन्तु उनमें संकेत रूप में भी इस दुराचार का साक्ष्य का न
होना स्पष्ट करता है कि भारत इस कुरीति से सर्वथा विहीन था | अन्य कुछ कुरीतियों के
साथ यह कुरीति भी भारत में मुस्लिम आक्रमणकारियों के साथ ही आई |
भारतीय मुस्लिम साहित्य में इसका सर्वप्रथम उल्लेख अमीर खुसरो की –
’मसनवी शहर आसोव’ अथवा ’रूबा इयात पेशावरान’ में उपलब्ध होता है | जिसमे –
दिल्ली के दस्तकार लड़कों को सम्बोधित चौपा इयों (रूबा इयों) का संग्रहण है | ये पुरूष
समलिंगी काम भाव – रस पूरित हैं और यह खूब प्रचलित रहीं, निंदित नहीं |
इस सम्बन्ध में के. एम. अशरफ अपनी पुस्तक ’ला इफ एण्ड कन्डीशन्स’
में लिखते है,”पुरूष प्रियतम के प्रति प्रेम जो तत्कालीन फारसी काव्य एंव साहित्य में –
इतने स्पष्ट रूप से आया है, वस्तुतः एक अस्वस्थ यौन भाव सम्बन्धी उलझन प्रकट करता
है |’ उस समय सम्भवतः इस व्यभिचार को मुस्लिम समाज की मौन स्वीकृति थी | –
तभी तो जियऔद्दीन बर्नी जैसे मुस्लिम इतिहास कार ने भी इसके प्रति निन्दा का एक भी
शब्द नहीं कहा है | जहां तक प्रमाणों का सम्बन्ध है भारतीय मुस्लिम इतिहास समलैंगिक
पुरूष व्यभिचार के उदाहरणों से भरा पड़ा है | यथा-मुईजुद्दीन कैकूबाद के अनेक पुरूषों से
ऐसे सम्बन्ध, अला उद्दीन खिलजी के मलिक काफूर से तथा उसके उत्तराधिकारी मुबारक –
शाह के खुसरो खां से समलैंगिक सम्बन्ध इतिहास प्रसिद्ध हैं | फिरोज शाह तुगलक के यहां
तो उसे भरे दरबार सुन्दर दास भेंट करने का आदेश था और इन दासों (लड़कों) के लिये –
एक अलग से एक विभाग था |
तथाकथित महान मुगल भी इस कुकृत्य के रसिया थे | भारत में मुगल राज्य
का प्रणेता बाबर स्वंय स्वीकार करता है कि वह इसे पसंद करता था | मुहम्मद यासीन अपने
ग्रंथ’इस्लामिक इण्डिया’ में कहते हैं,”आभिजात्य वर्ग द्वारा बड़ी संख्या में बाल दासों को –
रखना प्रथागत था |” टेवर्नियर ने सूरत के शासक के एक दरवेश के लड़के को समलैंगिक –
व्यभिचार के लिये रोक लेने पर दरवेशों और फकीरों के भीषण विद्रोह का वर्णन किया है |
इतिहासकार अबुल फजल और बदायूनी अपने इतिहासग्रंथों में ऐसे अनेक उदा-
हरण प्रस्तुत करते हैं | अबुल फजल ने शाह कुली खां मेहरम के काबुल खां लड़के के प्रति
अतिशय प्रेम व उसकी सुन्दरता के किस्से सुनकर उस लड़के को अकबर द्वारा अपने संरक्ष-
ण(?) में ले लेने के कारण कुली खां के जंगल चले जाने व लड़का वापस करने के बाद ही

वापस आने का उल्लेख किया है | जो अकबर के भी इस ओर रूझान का गुप्त संकेत करता
प्रतीत होता है | बदायूनी ने ’मुन्तखाबुत्तवारीख’ में खान जमां अली कुली खां के इस ओर
अनुराग का जिक्र किया है | जो शाहीन बेग नामक लड़के के समलैंगिक प्रेम में इतना अनु-
रक्त था कि वह उसे ’मेरे बादशाह’ कहता था और दासों की तरह उसकी सेवा करता था |
स्बंय कृष्णभक्त रसखान के सम्बन्ध में आचार्य शुक्ल जी ने हिन्दी साहित्य का
इतिहास में लिखा है कि वे अपने जीवन के प्रारम्भिक चरण में एक बनिये के लड़के पर –
आशिक हो गये थे | जिससे नाराज होकर लड़के के सम्बन्धियों ने उनकी मरम्मत की थी |
इसके बाद ही उन्होंने अपना प्रेम भगवान कृष्ण की ओर मोड़ दिया तथा कालजयी भक्ति –
काव्य का सृजन किया | इस सम्बन्ध में एक उदाहरण देना उचित होगा |मौलवी अब्दुल-
वली ने संत सरमद (सूफी) की जीवनी में लिखा है कि वह एक हिन्दू लड़के अभय चन्द
पर आसक्त हो कर उसके घर पर धरना देकर बैठ गया | तत्कालीन शासक द्वारा उसके –
(दुरा-लेखक) आग्रह को मानते हुए (बल पूर्वक-लेखक) अपने प्रियतम(?) को साथ ले
जाने की अनुमति प्रदान कर दी गई |
खैर | आज भारत में यह दुराचार इस हद तक फैल चुका है कि हमारे
केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री समलैंगिक व्यभिचार को कानूनी रूप देने का प्रयास कर रहे हैं | –
पहले तो सर्वोच्च न्यायालय ने दखल देकर उनकी आशा लता पर तुषार पात कर दिया –
किन्तु बाद में उसे कौन सी दलील में दम लगा कि उसने भी अपने हाथ खड़े कर लिये |
अब तो स्त्री और पुरूष के विवाह नामक संस्था का भगवान ही मालिक है | हां यह बात
अवश्य है कि यौनिक रोग भले ही कितने हो जाएं देश की जनसंख्या पर नियंत्रण स्वंय
ही हो जाएगा |

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