लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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पिछले कुछ दिनो से एक विवाद उठा हुआ है, कि भारत हिन्दू राष्ट्र है या नहीं।संघ और भाजपा से जुड़े कई लोग इसके पक्ष मे तर्क दे रहे हैं, हिन्दू शब्द के उद्गम और अर्थ की जानकारी दे रहे हैं, उसका इतिहास बता रहे हैं और हिन्दुस्तान के भूगोल पर शोध कर रहे हैं, कि यह भूभाग जम्बूद्वीप कहलाता था और माउंटऐवरैस्ट का नाम गौरीशंकर पर्वत था।अपनी बात की पुष्टि करने के लियें उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय को भी उद्धरित किया जा रहा है।

दूसरे पक्ष का कहना है कि भारत एक धर्मनिर्पेक्ष राष्ट्र है, उसे हिन्दू राष्ट्र कहना सांप्रदायिक ही नहीं असंवैधानिक भी है।इसके उत्तर मे पहले पक्ष का कहना है कि हिन्दू धर्म मे सभी धर्म समाहित हो सकतेहैं क्योंकि वह धर्म नहीं इस भूभाग की जीवन शैली है।मेरे विचार से हिन्दू ही नहीं, सभी धर्म जीवन शैली ही हैं, जिनमे पहनावा, खानपान , तीज त्योहार और अपने इष्ट से प्रार्थना करने के तरीक़े भी अलग अलग है जबकि भगवान तो सबका एक ही है…. नास्तिक लोगों के लियें मै भगवान नहीं प्रकृति कह देती हूँ, जो सबके लिये एक ही है।जो लोग आज हिन्दू धर्म मे सभी धर्मो के समाहित होने की बात कर रहे हैं उनसे मुझे यही कहना है कि हिन्दुओं ने भले ही मुसलमानो या इसाइयों से दोस्ती कर ली हो पर ऊंची जाति के हिन्दूओं ने खान पान की दूरी बनाये रखी।

धर्म वह है जो अधर्म न करवाये, पर आजकल हम जिसे धर्म कह रहे हैं वह खुल कर अधर्म करवा रहा है।अपने को धार्मिक मानने वाले खूब अधर्मऔर हिंसा करवा रहे हैं, वह भी अपने धर्म की रक्षा के लियें।

विषय से भटक न जाऊं इसलियें धर्म के आध्यात्मिक पक्ष पर अधिक न लिखकर लिखकर सीधे व्यावहारिक पक्ष की बात करूँगी।मेरे विचार से ये दोनो ही पक्ष, धर्म के नाम पर राजनीति कर रहे हैं।हिन्दु, सिंधु या इन्दु का इतिहास जो भी रहा हो यह महत्वपूर्ण नहीं है। हमारे संविधान ने हिन्दू , इस्लाम, सिख, इसाई, बौद्ध पारसी और  अब जैन धर्म को भी स्वतन्त्र धर्म का दर्जा दिया  है, जबकि सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन धर्म हिन्दू धर्म से ही प्रस्फुटित हुए हैं । संभव है भविष्य मे कुछ और धार्मिक समूहों जैसे आर्य समाज और राधास्वामी सतसंग को भी स्वतन्त्र धर्म का दर्जा मिल जाये और वो अल्पसंख्यकों मे आजायें।

भारत मे इस्लाम मध्य एशिया से और ईसाई धर्म योरोप से आया। कहा जाता रहा है कि हिन्दू धर्म मे सबको समाने की प्रथा चली आरही है, पर हिन्दुओं ने ही हिन्दुओंकी  निचली जातियों के साथ दुर्व्यवहार करके उन्हे हाशिये पर रखा जिस वजह से उन्होने मौक़ा मिलते ही इस्लाम या ईसाई धर्म को स्वीकार लिया। कुछ धर्म परिवर्तन दबाव या लालच के कारण हुए।धर्म जाति की तरह पैदाइश से मिलता है, धर्म परिवर्तन हो सकता है, पर जाति नहीं बदली जा सकती।

राष्ट्रीयता और धर्म दो अलग बाते हैं। हमारी राष्ट्रीयता भारतीय या इण्डियन है, यदि हम सभी भारतीयों को हिन्दू कहने लगेगे, फिरतो हिन्दू धर्म की जगह ‘सनातन’ लिखेंगे जबकि अब सभी हिन्दू सनातनी नहीं रहगये है। एक व्यक्ति राष्ट्रीयता की जगह ‘हिन्दू’ लिखेगा और धर्म की जगह ‘इस्लाम’ तो व्यर्थ मे स्थिति भ्रामक होगी। यदि हमने हिन्दू और भारतीय को समानार्थक बना दिया तो कुछ भ्रम ज़रूर पैदा होंगे, जैसे नेपाल का हिन्दू अपनी राष्ट्रीयता ‘नेपाली’ लिखेगा और धर्म ‘हिन्दू’ तो उसे भारतीय मान लेने की ग़लती हो सकती है।

एक तर्क दिया जा रहा है कि जब जर्मनी का रहने वाला जर्मन है, चीन का चीनी, जापान का जापानी तो हिन्दुस्तान का हिन्दू क्यों नहीं? सबसे पहली बात कि हिन्दुस्तान के अलावा किसी दूसरे देश का नाम धर्म से नहीं जुड़ा है, इसलियें हम अपने देश को हिन्दुस्तान न कहकर सिर्फ भारत या इण्डिया कहेंगे तो स्वाभाविक तौर पर हमारी राष्ट्रीयता भारतीय या इण्यिन ही होगी।

आदर्श स्थिति तो यह होगी कि प्रत्येक भारतीय सार्वजनिक जीवन मे सिर्फ भारतीय हो । किसी का धर्म क्या है, यह बताना ज़रूरी न हो।सबके लियें एक क़ानूनऔर एक सी सुविधाये हों।यदि आरक्षण देना है तो उसका आधार केवल आर्थिक होना चाहिये।व्यक्तिगत जीवन मे सब अपने धर्मको मानने के लियें स्वतन्त्र हों,पर अन्य धर्मो का सम्मान करें। राजनीति से धर्म को दूर रखा जाये

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59 Comments on "भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं हो सकता"

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इंसान
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“भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं हो सकता” को लेकर विषय पर अनुपयुक्त व अनावश्यक फैलाव को देखते हुए इंसानियत के नाते मेरा सभी पाठकों से अनुरोध है कि निम्नलिखित लिंक http://hindubooks.org/sudheer_birodkar/hindu_history/secularroots.html पर प्रस्तुत निबंध को एक बार अवश्य पढ़िए क्योंकि मेरा विश्वास है कि देश में हर प्रकार की विभिन्नता के बीच सार्वजनिक भलाई हेतु इस विश्लेषणात्मक निबंध में दिए विचारों में भारत के लिए एक हिन्दू राष्ट्र होने की विशेष सामग्री उपलब्ध है।

आर. सिंह
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http://hindubooks.org/sudheer_birodkar/hindu_history/secularroots.html मुझे तो आश्चर्य इस बात पर हुआ कि ईशा मसीह और हजरत मुहम्मद को अवतारों में क्यों नहीं गिना गया?क्या ऐसा इसलिए हुआ ,क्योंकि ये दोनों भारत में अवतरित नहीं हुए थे?जब आप वराह,कछुए,मछली को भगवान का अवतार मान सकते हैं,तो दो इंसानों को उनका अवतार मानने में क्या दिक्कत थी या है?ऐसा नहीं लगता कि यह आलेख या इससे सम्बंधित वक्तव्य तर्क की कसौटी पर खरे नहीं उतरते,जबकि कहा जाता है कि सनातन धर्म तर्क पर आधािरत .है. अब आती है हिंदुत्व की बात क्या इस बारे में इस लेख का लेखक दिग्भ्रमित नहीं लगता?मुझसे कहा जा सकता… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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Bahut Uchit Link dee aapane, padhana chahane-walonke lie.

Dhanyavad

आर. सिंह
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इंसान जी ,आपकी इस टिप्पणी पर ,जिसमे आपने मुझे चलती फ़िरती लाश कह डाला है,मेरी नजर ज़रा देर से पड़ी .आप जैसे वकवास करने वाले से तर्क करना या उसके सामने अपने विचार प्रस्तुत करना स्वयं की तौहीनी है. मैं अब आपसे यही अनुरोध करूंगा कि प्रवक्ता के छह वर्ष पूरे होने पर जो विचार गोष्ठी १६ अक्टूबर को होने जा रहा है,उसमे पधारिये और तब रूबरू होने पर पता चलेगा कि कौन चलती फिरती लाश है.आप जैसे बदमिजाज और सठियाये लोगों से तर्क करना भी बेकार है,क्योंकि आप व्यक्ति पूजा में इतने लीन हैं कि उसके आगे कुछ दिखाएँ… Read more »
इंसान
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जी नहीं, कोई मिलने की चाह नहीं। मैं आपसे दूर ही भला। जहां तक चलती फिरती लाश की बात है यह अन्यमनस्कता में हुआ। अन्यथा मत लीजिए।

आर. सिंह
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आमने सामने आने में आपको क्यों एतराज है?क्या कोई ख़ास कारण है? अगर ऐसा ही तो भी भी मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता.यह भी आपने अच्छी कही कि इसे आप इसे अन्यथा न लें. मैंने तो पहले ही लिख दिया है कि मैं इस सम्बोधनों को अन्यथा नहीं लेता,क्योंकि इससे मेरा अनुभव बढ़ता है और मुझे उस व्यक्ति विशेष के संस्कार जानने में मदद मिलती है.

बीनू भटनागर
Guest
बीनू भटनागर

जिन लोगों हिन्दुओं को एकजुट होने की बात कही वो अगर भारतीयों को या हिन्दुस्तानियों को, या इन्डियन्स को एक जुट होने की बात करते तो इस देश का भविष्य बहुत उज्ज्वल होता। यदि हिन्दू कहेंगे कि हिन्दू एक जुट हों और मुसलमान कहेंगे मुसलमान एक जुट हों तो हमे कई मुज्जफ्फर नगर देखने पड़ सकते हैं।

शिवेंद्र मोहन सिंह
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शिवेंद्र मोहन सिंह

बहन बड़े बोल मत बोलिए, हिन्दुओं को एक जुट होने की जरूरत क्यों पड़ रही है उसके कारण में जाइए। मतान्ध हो कर कुछ भी अनर्गल मत बोलिए। मुजफ्फर नगर की बात बोल रही हैं तो उसके कारण में जाइये फिर नाम लीजिये।

इंसान
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छोटी बाजी, लो तुम्हारी मुराद पूरी होते नज़र आती है! यह जान कर कि “भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं हो सकता” अल क़ायदा नेता अयमन अल ज़वाहिरी ने क़ायदात अल जिहाद के नाम से भारतीय उपमहाद्वीप में अपने संगठन की शाखा बनाने की घोषणा की है। सदैव की तरह घोर अराजकता मचाए कांग्रेस राज में सरकार द्वारा ऐसी संभावना का कोई समाधान अथवा उपाय न देख भारतीयों में एक दूसरे के प्रति आशंका व अविश्वास होना स्वाभाविक ही नहीं एक सामाजिक सत्य हो जाता लेकिन संयुक्त हिन्दू राष्ट्र में शांति से रहते संगठित भारतीय अपने बीच इस कायदात अल जिहाद जैसे… Read more »
इक़बाल हिंदुस्तानी
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सचिन जी आपने मेरी इस आशंका को ठीक साबित कर दिया कि आप जैसे लोग बिना किसी तर्क के मेरे ऊपर कीचड़ जरूर उछालेंगे। इसे जहर उगलना भी कह सकते हैं। आपने अपनी बात की शुरुआत ही मेरे नाम पर सवाल उठाकर की है जिस से आपकी मानसिकता का पता लगता है। मैं हिंदुस्तानी हूँ और इसमें मुझे गर्व है इसलिए मैं आप जैसे लोगो की तरह संकीर्ण जातिवादी पहचान नाम में नहीं लगता हूँ। मेरे बारे में जानना हो तो प्रवक्ता पर ही मौजूद मेरे 200 से अधिक लेख पहले पढलो तब कोई तमगा देना। वैसे मुझे आप जैसे… Read more »
RTyagi
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aap hamesha ek tarfa soch ek tarfa soch ka raag alapte hain aapki soch. ek tarfa nahin hai kya.. ?? Hindu virodhi soch?/

इक़बाल हिंदुस्तानी
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आप चूंकि खुद कट्टर हिंदूवादी हैं इसलिए आपकी सोच निष्पक्ष हो ही नहीं सकती। इसलिए आपके कुछ भी कहने का मेरे लिए पहले की तरह कोई महत्व नहीं है।

आर. सिंह
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मैं इस तरह की टिप्पणी पर केवल खुल कर हँस सकता हूँ.पर आप जैसे लोगों को तो शायद वह हँसी भी बुरी लगे.

Sachin Tyagi
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इकबाल साब , क्या आपने अपने नाम के साथ हिन्दुस्तानी , फैशन में या फ़िल्मी स्टाइल में या बस कहने -सुनने और दूसरों को दिखाने के लिए ही लगा रखा है .असल में , आपको इस शब्द से जरा सा भी लगाव नहीं ……… मतलब , खून खराबे और अशांति की बातें आप कह रहे है और सांप्रदायिक और फासिस्ट , हम हो गए ……… तालिबान , खून खराबा , अशांति , साम्प्रदायिकता , फासिज्म ,अंध राष्ट्रभक्त , ज़हर , हार , जीत – ये सब आपके शब्द हैं , हमारे नहीं ……….. क्या किसी सार्वजनिक मंच पर हिन्दू या… Read more »
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