लेखक परिचय

सौरभ कुमार यादव

सौरभ कुमार यादव

लेखक 'हिंदुस्‍थान समाचार' एजेंसी से जुडे हैं।

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Hindiकिसी भी भाषा का प्राथमिक कार्य होता है संचार को बरकरार रखना। ये हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपनी भाषा को और अधिक समृद्ध करके अपनी आने वाली नयी पीढ़ी को स्थानांतरित करें। अपनी मातृभाषा का प्रचार व प्रसार करना हरेक व्यक्ति का पहला कर्तव्य होता है लेकिन पिछले कुछ समय से अंग्रेजी का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव से हर एक भाषा के व्यक्ति आहत है। लेकिन क्या सिर्फ आहत होने और बैठकों में चिन्तन करने से हिन्दी के अलावा अन्य राष्ट्रीय भाषाओं कोई भला होने वाला है?

भारत में अंग्रेजी का प्रभाव ब्रिटिश काल से ही बढ़ना प्रारम्भ हुआ है क्योंकि उस समय अधिकतर अंग्रेजी मानसिकता वाले लोग धड़ल्ले से अंग्रेजी का प्रयोग कर रहे थे ताकि अंग्रजों के शासन काल में उन्हे पर्याप्त तरक्की प्राप्त हो सके। अंग्रेज तो चले गए लेकिन अपने पिछलग्गुओं को यहीं छोड़ गए। अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव का एक और कारण वैश्विकरण है। वैश्विकरण के बाद से अधिकतर व्यक्तियों का अन्य देशों में आना जाना हुआ वहाँ की भाषा अंग्रजी होने से बाहर जाने वालों को भी अंग्रेजी की जानकारी आवश्यक हो गयी इसलिए भी अंग्रेजी का प्रभाव हमारे देश में बढ़ा लेकिन क्या अंग्रेजी के लिए देश के अन्य भषाओं की उपेक्षा करनी चाहिए?

वैश्विकरण के इस दौर में अंग्रेजी आवश्यक है लेकिन अंग्रेजी के लिए हमें अपने देश की मातृभाषाओं की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए क्योंकि किसी भी संस्कृति की पहचान उसकी भाषा से ही की जाती है ऐसा न हो कि अपनी मातृभाषा की उपेक्षा करते करते हम अपनी महान संस्कृति को ही भुला दें। ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें मातृभाषा की उपेक्षा से उस देश की संस्कृति के समाप्त हो जाने का खतरा उत्पन्न हो गया है इसलिए हमें ऐसी स्थिति से बचने का प्रयास करना चाहिए अन्यथा हमारी महान संस्कृति काल के गर्त में समा जाएगी और सिर्फ संस्कृति की यादें ही रह जाएंगी।

भारत में संविधान के अनुसार 22 भाषाएं हैं लेकिन कितनी भाषाओं को हम अंग्रेजी के स्तर पर रख कर सोचते हैं? क्या यह जरुरी नहीं है कि हम जितनी इज्जत अंग्रेजी को देते हैं उतनी अन्य राष्ट्रीय भाषाओं को भी देनी चाहिए? इस मामले में हमें नेपाल का उदाहरण हमेशा ध्यान में रखना चाहिए जहाँ कुछ समय पूर्व तक हिन्दी राष्ट्रभाषा थी लेकिन राष्ट्रभाषा पर नेपाल की मातृभाषा हर स्तर पर भारी पड़ी और नेपाल में नेपाली भाषा को राष्ट्रीय भाषा घोषित कर दिया गया। हालही में नेपाल के उपराष्ट्रपति परमानंद झा ने जब हिन्दी में अपना शपथ लिया तो पूरे देश में भारी विरोध दर्ज किया गया। इस मसले पर परमानंद झा ने नेपाल की जनता से सार्वजनिक रुप से माफी भी मांगी। क्या इस तरह का उदाहरण हमारे देश में संभव है। हम तो आपस में लड़ने में ही व्यस्त हैं।

कुछ ही दिनो बाद राष्ट्रीय भाषा दिवस, जिसे हम हिन्दी दिवस के रुप में मनाते हैं, आने वाला है जिसे बड़े धूम धाम से सरकारी उत्सव के रुप में मनाया जाता है लेकिन उसका व्यवहारिक रुप में कितना महत्व है ये किसी से भी छुपा नहीं है। कैसे हम अपनी राष्ट्रभाषा का अपमान बर्दास्त कर सकते हैं ?

संविधान के अनुसार भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी को घोषित किया गया है लेकिन सबसे अधिक र्दुव्यवहार हिन्दी के साथ ही किया जाता है फिर चाहे वो असोम हो या बंगाल हो या महाराष्ट्र हो हर जगह हिन्दीभाषियों के साथ ओछा सलूक किया जाता है। जब हमारी राष्ट्रभाषा का ये हाल है तो अन्य भाषाओं का क्या हाल होगा ये आप स्वयं ही सोच सकते हैं।

सबसे अधिक बुरा हाल हिन्दी का ही है हिन्दीभाषी व्यक्तियों को अन्य हर क्षेत्र में नीची निगाह से देखा जाता है। इसके लिए कुछ हद तक स्वयं हिन्दीभाषी व्यक्ति ही जिम्मेदार हैं। अधिकतर हिन्दीभाषी जिन्हें अंग्रेजी आती है वो सार्वजनिक स्थानों पर अधिकतर अंग्रेजी ही बोलना पसन्द करते हैं इससे हिन्दी भाषा पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। अन्य भाषाओं की अपेक्षा हिन्दी का कुछ ज्यादा ही बुरा हाल है। वैसे अंग्रेजी भाषा तो भारत की प्रत्येक मातृभाषा पर हावी है लेकिन हिन्दी चुकि सबसे ज्यादा बोली जाती है इसलिए हमे लगता है कि हिन्दी की दुर्दशा कुछ ज्यादा ही है। हमें इस स्थिति से निपटने का कोई प्रयास करना चाहिए अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब हम अपनी आने वाली पीढ़ी को हिन्दी समझा भी नहीं पाएगें।

क्यों नहीं हम नेपाल से कुछ सीखते हैं? क्या हमे स्वयं अपनी राष्ट्रभाषाओं के बचाव के लिए आगे नहीं आना चाहिए? लेकिन हम तो आपस में ही भाषाओं को लेकर लड़ते रहते हैं। महाराष्ट्र में हिन्दीभाषियों पर लगातार हमले होते रहते हैं क्या ऐसे में यह संभव है कि हम अंग्रेजी के खिलाफ युद्ध में एक साथ हो कर लड़ पाएंगे? वर्तमान में तो यह बिल्कुल भी संभव नहीं लगता है क्योंकि जब हम आपस में ही लड़ रहे हैं तो दुसरे का क्या मुकाबला करेंगे। बाहरी व्यक्ति का मुकाबला करने के लिए आपसी एकता की आवश्यकता होती है लेकिन मातृभाषा के मुद्दे पर हम स्वयं ही आपस में लड़ते रहते हैं तो ऐसे में हम अंग्रेजी का मुकाबला कैसे कर पाएंगे?

-सौरभ कुमार यादव

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2 Comments on "खतरे में है भारतीय मातृभाषाएँ"

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sunil patel
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सौरभ जी ने बहुत ही सही कहा कि आज वास्तव में हमारी भाषाऐ खतरे में हैं और यह खतरा अंग्रजी में है। आज यह हकीकत है कि एक टूटी फूटी अंग्रजी बोलने वाले सामान्य ज्ञान वाले व्यक्ति के सामने हिन्दीभाषी या अन्य भारतीय भाषायी विद्वान दूसरे दर्जे के माने जाते हैं। आज हमारा देश अंग्रजो के तीन वायरसों से जूझ रहा है क्रिकेट, चाय और अंग्रेजी। हमारे देश के लिए शर्म की बात है कि हमारे देश के कई राज्यों में हिन्दी को बहुत ही अपमान सहन करना पड़ता है और हमारे देश का कानून इसमें कुछ नहीं कर सकता… Read more »
anuradha srivastav
Guest

आपने शब्दशः सत्य लिखा है लेकिन हिन्दी या अन्य किसी भी भाषा के पतन के लिये हम ही जिम्मेदार हैं।

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