लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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शैलेन्द्र चौहान
यह बेहद चिंताजनक स्थिति है कि आज भारतीय मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने लिए निर्धारित मानदंडों और आचरण संहिता को भूलकर किसी न किसी राजनीतिक दल का अनुयायी या उग्र राष्ट्रवादी संगठनों की तरह व्यवहार करने लगा है। एंकर चीख चीख कर अशोभन लहजे में अपनी परम देश निष्ठा का परिचय दे रहे हैं। अपने अलावा किसी और को बोलने का मौका वे नहीं देना चाहते। खबरों का प्रसारण यहां राजनीतिक मंतव्यों के तहत हो रहा है। कौन सी ख़बरें किस तरह कवर करनी और दिखानी है, इसका फ़ैसला वरिष्ठ पत्रकारों पर होता है लेकिन ऐसा नहीं लगता कि वे अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभा रहे हैं। अब ये भी एक सच है कि आजकल अधिसंख्य पत्र-पत्रिकाओं और चैनलों में संपादक नहीं ही होते हैं यदि होते भी हैं तो उनकी भूमिका बेहद सीमित होती है। होना तो यह चाहिये कि टीवी चैनलों और पत्र-पत्रिकाओं में ख़बरों और विचारों के प्रकाशन एवं प्रसारण से पहले उन्हें कई स्तरों पर जाँचा-परखा जाए, ताकि एक संतुलन रहे और समाज में वैमनस्य या उन्माद न फैले। सच्चाई यह भी है कि अनुभवहीन पत्रकारों की वजह से भी ऐसा होता है। लेकिन उन्हें प्रशिक्षित करने और उनकी योग्यता के अनुसार काम देने की ज़िम्मेदारी भी संपादकीय नेतृत्व की ही होती है। दरअसल अधिकांश जगहों पर संपादकीय व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है, सवाल उठता है कि क्यों? क्या इसके लिए मीडिया में चलने वाली होड़ ज़िम्मेदार है या फिर और भी कारण हैं? इसमें शक़ नहीं कि टीवी चैनल और पत्र-पत्रिकाएं एक दूसरे से आगे निकलने के लिए खुद को ज़्यादा बड़ा राष्ट्रभक्त दिखाने की कोशिशों में जुट जाते हैं। नतीजा यह होता है कि छोटी-छोटी चीज़ें भी उन्माद की शक्ल ले लेती हैं।

electronic mediaजाहिर है लोकप्रियता हासिल करके उसे व्यावसायिक लाभ में तब्दील करने की ख़तरनाक़ प्रवृत्ति दिनों-दिन मज़बूत होती जा रही है लेकिन इसका संबंध सिर्फ बाज़ार से ही नहीं, राजनीति से भी है। मीडिया जब सत्ता के एजेंडे से जुड़ जाता है या उसमें अपना स्वार्थ देखने लगता है तो सत्ताधारियों को खुश करने के लिए तमाम तरह के हठकंडे अपनाना शुरू कर देता है। इस समय यही हो रहा है। ये जगज़ाहिर तथ्य है कि कॉरपोरेट जगत, सरकार के साथ सदैव ही कदमताल करता रहा है जो आज कुछ जियादा ही तेजी में है। इसलिए यह भी स्वाभाविक है कि उसके नियंत्रण वाला मीडिया भी सत्तापक्ष की राजनीति का समर्थन करे और वह ऐसा कर भी रहा है। इसीलिए मीडिया के कंटेंट में अब बहुसंख्यकवाद हावी हो चुका है। वह पूरी कटिबद्धता के साथ उदार या भिन्न विचारों का विरोध कर रहा है उग्रता को धड़ल्ले से मंच मुहैया करवा रहा है। सोशल मीडिया का इस तरह बेकाबू हो जाना समझ में आता है। वहाँ कोई गेटकीपर नहीं है, कोई संपादक नहीं है जो लोगों की टिप्पणियों को सावधानीपूर्वक काटे-छाँटे। वहाँ कोई कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र है। मगर मुख्यधारा का मीडिया क्यों अपनी ज़िम्मेदारियाँ भूलकर समाज को बेकाबू करने में जुटा हुआ है? और बिडम्बना यह कि भारत सरकार का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय उन टी वी चैनलों को नोटिस थमा रहा है जो सत्ता की प्रोपेगंडा साझेदारी से बच रहे हैं और समाचारों को कुछ संतुलन, निष्पक्षता एवं कुछ समझदारी से पेश कर रहे हैं। हाल ही में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा पहले एन डी टी वी को सरकारी सूचनाओं को सार्वजनिक करने के आरोप में फिर ए बी पी न्यूज़, एन डी टी वी 24 तथा आजतक को याकूब मेनन की फँसी के बाद उसके पक्ष में उसके वकील एवं अन्य का साक्षात्कार लेने के लिए अदालत की अवमानना का नोटिस दे दिया। क्यों सरकार टी वी चैनलों के प्रसारण का नियमन नहीं करती। वह अन्धविश्वास, अवैज्ञानिकता और उन्माद फैलाने वाले चैनलों पर कोई कार्यवाई करने की बजाय उन चैनलों पर शिकंजा कस रही है जो उसके साथ नहीं हैं। यह सत्ता पक्ष की असहिष्णुता का परिचायक है। वह बदले की भावना से काम कर रही है। वैसे भी अधिकांश चैनेल सत्तापक्ष के शुभचिंतकों के पास हो चुके है। क्या आज की राजनीति की यही मंतव्य प्रेरित अदृश्य रणनीति है ?

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