लेखक परिचय

नवीन देवांगन

नवीन देवांगन

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में जन्म। पत्रकारिता में बी.जे.एम.सी.की डिग्री बिलासपुर तथा एम.बी.जे प्रसारण पत्रकारिता की डिग्री भोपाल के माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से ली। दिल्ली और मुंबई के अनेक टेलिविज़न प्रोडक्शन हाऊस में कार्य करने के बाद रामोजी फिल्म सिटी के इंटरटेनमेन्ट् सेक्शन में चार वर्ष एडीटर के पद पर कार्य। दिल्ली के विभिन्न मीडिया शैक्षणिक संस्थानों में टेलिविज़न प्रोडक्शन में गेस्ट फैकेल्टी के रुप में कार्यानुभव। लेखन में रुचि। फिलहाल पिछले 6 वर्षो से सहारा समय के क्रिएटीव विभाग में सीनियर एडिटर के पद पर कार्य कर रहे है।

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– नवीन देवांगन

हिंदुस्तान को किसी ज़माने में सोने की चिड़िया कहा जाता था ऐसा अक्सर हम बचपन से सुनते आए है और किताबों में भी पढ़ते आए है पर आज के हिंदुस्तान का असली चेहरा पूरे विश्व के सामने है। दो जून की रोटी के लिए रोज़ संघर्ष करने वालो की संख्या विश्व के किसी देश के मुकाबले हिंदुस्तान में सबसे अधिक है। इसके आठ राज्यों में सबसे ज्यादा 42 करोड़ गरीब लोग बसते है, जहां किसी ज़माने में अपने लोगो को दो जून की रोटी दिलाने के लिए ख़ैरात के तौर पर अमेरिका से घटिया लाल गेहूं लिया जाता था वहीं आज अपने खून पसीने अपने ही देश में पैदा हुआ उम्दा गेहूं कुडे में पड़ा सड़ने रहा है और दूसरी ओर इसी की तलाश में गरीब लोग अपना घर द्वार छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर फुटपाथ पर नरकीय जीवन बिताने को मजबूर है पर हैरानी की बात ये है कि इसके बावजूद कृषि प्रधान देश के कृषि मंत्री जो आजकल क्रिकेट मंत्री के तौर पर ज्यादा जाने-पहचाने जाते है। माननीय शरद पवार साहब को ये समस्या अभी भी क्रिकेट की समस्याओं के मुकाबले कमतर ही लगती है।

इससे बडी विडम्बना और क्या होगी कि कृषि प्रधान देश में हर साल 20 हजार टन गेहूं गोदामों मे रखा रखा ही सड़ जाता हो, ऐसा सरकारी तौर पर माना जाता है पर गैर सरकारी तौर पर माने तो ये आँकड़ा 1 लाख टन गेहूं से भी अधिक है ये आँकड़े उस समय हमें ज्यादा चिढ़ाते हुए नज़र आते है जब हमारे देश के 8 राज्यों के गरीब आफ्रिका के 26 देशो की ग़रीबों की तुलना में कही ज्यादा है, बिहार. झारखंड, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल में 42 करोड़ से ज्यादा लोग बसते है जबकि अफ्रिका के 26 सबसे गरीब देशों की तादाद महज 41 करोड़ ही है। हमारे इन्हीं 8 राज्यों में भारत के आधे से ज्यादा और पुरी दुनिया के एक तिहाई से ज्यादा गरीब लोग रहते है ऐसे में देश की 37 फीसदी आबादी याने की तकरीबन 9 करोड़ परिवार ग़रीबी रेखा के नीचे याने बीपीएल योजना के तहत आते है इनमें से तकरीबन 2 करोड़ 50 लाख परिवार अत्यंत गरीब है, जिन्हें जीवन यापन के लिए अन्त्तोदय योज़ना के तहत 2 रुपये किलो गेहूं और 3 रुपये किलों मे चावल सरकार मुहैया कराती है, इस सब के लिए सरकार द्वारा प्रतिवर्ष तकरीबन 1 करोड़ 70 लाख टन अनाज जारी किया जाता है ये उन खुदकिस्मत गरीबो के लिए है जिनका नाम सरकारी आंकड़ो में दर्ज है पर वे करोड़ों गरीब न तो जिनके पास कोई कार्ड है और न ही किसी फाइलों या योजनाओं में उनका नाम है वे आज भी इस बेतरतीब मंहगाई में अनाज खरीदकर खाने के लिए मज़बूर है पर सबसे बड़ा सवाल ये है कि वे इसे खरीदे तो खरीदे कैसे इसके लिए उनके पास पैसे ही नहीं है।

दूसरी ओर देश के अनाज का भंडारण करने वाली सरकारी एजेंसियों और एफसीआई के गोदामों में लाखों करोड़ो टन अनाज पड़ा सड़ रहा है एफसीआई के अधिकारी इन्हें भंडारण की समस्या मानकर अपना पल्लू झाड़ने में लगे रहते है कृषि मंत्री पवार साहब की माने तो अभी स्थिति काबू में है देश में सिर्फ 0.3 प्रतिशत अनाज ही सड़ने की स्थिति में है पर ये आंकड़े अफसरों के द्वारा घालमेल कर फाईलों में बनाएं जाते है वस्तुस्थिति इसके काफी विपरीत है। अफ़सर इस आंकड़े की कभी भी 0.5 से ज्यादा फाईलो में बढ़ने नही देते जिनके चलते उनपर किसी प्रकार की कार्यवाही हो सके, रही बात सड़े गले आनाजों की तो उन्हें फिर से बोरों में भरकर उन करोड़ो गरीब लोगों के लिए भेज दिया जाता है जो सरकारी रहमों करम पर अपने पेट की आग बुझाने के लिए मजबूर रहते है।

विश्वपटल पर सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बनने के ख्वावों में डूबें देश का वर्तमान हालात क्या इसे कभी हकीक़त के धरातल पर ला पाएंगी। हिंदुस्तान एक कृषि प्रधान देश है यहा कि अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर ही निर्भर रहती है ऐसे में सरकारी अव्यवस्थाओं के चलते देश के अन्नदाता के खून पसीने से उपजे अनाजों की इस हालात का रोना कौन रोऐंगा, निश्चित तौर पर परोक्ष रुप से इसका असर अन्नदाताओं पर अवश्य पड़ेगा। ग़रीबों का क्या वे तो सरकार के रहमों करम पर ही अपना जीवन यापन करने को मजबूर है और लगभग आगे भी रहेंगें। इसे विडम्बना नही तो और क्या कहेंगें की एक तरफ तो गोदामों में अनाजों के ढेर सड़ने को मज़बूर है और दूसरी ओर इन्हीं अनाजों के लिए टकटकी बांधे गरीब तिल-तिल भूखों मरने को विवश है।

हालात काबू में है और, प्लीज मीडिया इसे ज्यादा तूल न दे … ये बयान है खेत खलिहानो से दूर क्रिकेट के मैदान पर चियर्सगल्रर्स के ठुमकों का आंनद उठाने में ज्यादा मसगूल रहने वाले हमारे देश के कृषि मंत्री श्री शरद पवार साहब का। देश की कृषि नीति से ज्यादा क्रिकेट नीति की ओर इनका ज्यादा रुझान रहता है। इनकी माने तो देश में हालात अभी काबू में है और स्थितियां पहले से बेहतर हो रही है पर असली चेहरा तो देश की इन आठ राज्यों के किसी भी गांवो कस्बों में जाकर आसानी से देखा जा सकता है जिन्हें आज भी आईपीएल से ज्यादा बीपीएल की सुविधाओं की ज़रुरत है।

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1 Comment on "देश को है आईपीएल से ज्यादा बीपीएल की दरकार"

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rajeevkumar905
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Accha Article hai.

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