लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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शिवभक्ति का ढोंग न करें, खुद शिवमय बनें

डॉ. दीपक आचार्य

इन दिनों हर कहीं सावन की धूम जारी है। अपने क्षेत्र भर के शिवालयों में शिवभक्ति की इतनी धूम मची हुई है कि दिन-रात शिव उपासना के स्वर गूंजने लगे हैं और अपना पूरा इलाका शिवभक्ति के रंग में रंगा हुआ है।

भक्तों की सारी भीड़ दूसरे सारे देवी-देवताओं को छोड़कर भोलेनाथ को मनाने में जुटी हुई है। अपने क्षेत्र के पुराने और नए शिवालयों पर शिवभक्ति का ज्वार उमड़ा हुआ है और शिवभक्तों के रेले के रेले भूतभावन को रिझाने में दिन-रात एक कर रहे हैं।

शिवालयों पर भक्तों की भारी भीड़ के साथ ही टेप और माईक की स्वर लहरियाँ दूर-दूर तक पसरने लगी हैं। आरती और अनुष्ठानों की धूम है। पण्डितों से लेकर उन सभी की चाँदी है जो शिवभक्ति और अनुष्ठानों के लिए किसी न किसी रूप में सामग्री मुहैया करा रहे हैं।

यह भोलेनाथ की ही कृपा है कि लोग शिवभक्ति के नाम पर ही खर्च करने में लगे हुए हैं। वो सभी लोग भी खुश हैं जिनका किसी न किसी रूप में शिवोपासना में योगदान है, भले ही वह सेवा या सुविधा सशुल्क ली या दी जा रही है।

भोर से लेकर देर रात तक मन्दिरों में हर-हर महादेव के नाम और नारे गूंजने लगे हैं। शिवभक्ति के नाम पर जितना कुछ हो रहा है वह सबके सामने है। अब शिवभक्तों में कई प्रकार के लोग शामिल हैं। एक ओर वे लोग हैं जो शिवशंकर को पाने के लिए समर्पित होकर रमे हुए हैं। दूसरी किस्म में ऐसे लोग शामिल हैं जिन्हें शिवजी की बजाय अपनी मनोकामनाओं की फिकर लगी हुई है और उनके लिए श्रावण मास वार्षिक पर्व से कम नहीं है। शिव के नाम पर रूद्रार्चन, पार्थेश्वर चिन्तामणि, पंचाक्षर मंत्र जाप और जाने कितने अनुष्ठान और पूजा-पाठ चल रहे हैं। कई लोग बरसों से शैव अनुष्ठानों में रमे हुए हैं। इन दिनों जितनी शिवजी की पूछ हो रही है उतनी और किसी देवी-देवता की नहीं।

उपासना के सिद्धान्तों के अनुसार किसी भी साधक या भक्त की उपासना तभी फलीभूत होती है जब उस साधक में उपास्य के गुण आने लगें। हम जिस किसी भगवान की साधना या पूजा करें, उनके गुणों को अंगीकार करने से परहेज रखेंगे तो उस देवता या देवी की कृपा का अनुभव नहीं किया जा सकता चाहे हम कितने टन दूध, बिल्वपत्र, भंग या पानी से शिवजी को तरबतर कर लें। यह सारी क्रियाएं यात्रिक ही सिद्ध होंगी यदि हम उपास्य देव के गुणों से बेखबर हैं या उन्हें जीवन में अपनाने से परहेज करते हैं।

शिव कल्याण के देव हैं जिनका आश्रय जीव और जगत का बहुआयामी कल्याण करने वाला है। ओढरदानी शिव औदार्य और कृपा वृष्टि के देवता हैं जो जल्दी प्रसन्न होते हैं और इसी वजह से उन्हें आशुतोष अर्थात शीघ्र संतुष्ट हो जाने वाले देवता के रूप में पूजते हैं। हम जिनकी पूजा और अभिषेक करते हैं, वही शिव हैं जिनमें गरल पान की क्षमता है और वही शिव हैं जो सभी कामनाओं से परे होकर श्मशान में रहते हैं।

जो लोग शिव की उपासना करते हैं उनमें भी शिवजी के गुण होने चाहिएं या उनके गुणों का किसी न किसी अंश में समायोजन होना चाहिए। लेकिन सामान्य जीवन में हम देखते हैं कि बहुधा लोग ऐसे नहीं हुआ करते। लोगों की उपासना और व्यवहार में दिन-रात का अंतर है।

ऐसे लोगों को शिव उपासना का कोई अधिकार नहीं है जो गुस्सैल होते हैं। आज आदमी बात-बात में गुस्सा कर लेता है, अपमान के घूंट पीने का मौका आता है तब क्रोधित और उन्मादी होकर ऐसी-ऐसी हरकतें करने लगता है जैसी पागल और पशु भी नहीं कर पाते। गरल का अर्थ यही नहीं है कि जो साँप में भरा हो वही है, आज समाज-जीवन में हर क्षेत्र में जहां अच्छाइयांे का अमृत है वहीं दूसरी और निराशाओं और चिन्ताओं के गरल भी हैं जिनका पान आदमी को करना पड़ता है। आदमी अपने अनुकूल सामग्री को अमृत मानकर ग्रहण कर लेता है किन्तु विपरीत परिस्थितियों को गरल मानकर पचा नहीं पाता। शिवभक्त दोनों ही स्थितियों में समत्व रखते हैं।

जिनके जीवन में माधुर्य, उदारता और प्रेम नहीं है, जो लोग प्रकृति को रौंदने में लगे हुए हैं, मनमाना दोहन-शोषण कर रहे हैं और दूसरों की संवेदनाओं के प्रति बेपरवाह हैं, भ्रष्टाचार जिनके जीवन का अभीष्ट है, उनकी भी शिवभक्ति को नकली ही माननी चाहिए, भले ही ऐसे लोग ऋषि के वेश में, बिना जूते-चप्पल मन्दिर में आकर घण्टों शिवलिंग पर अभिषेक करते रहें, जहां कहीं मिले वहां हर-हर महादेव या जल भोलेनाथ गुंजाते रहें, माथे पर बड़ा सा त्रिपुण्ड लगा कर फबते रहें और शिव आराधना के नाम पर वह सब कुछ दिखावा कर लें जो कलियुग की देन है, मगर ये लोग कभी भी असली शिवभक्त हो ही नहीं सकते।

शिवत्व के बगैर कोई शिव का भजन करता है तो वह किसी आडम्बर और दिखावे से कम नहीं होता। इस बात को आम आदमी भले ही नहीं समझ पाए, किन्तु स्वयं भगवान शिव को तो पता ही है। भगवान सोचते हैं कि ऐसे लोग कम से कम उनके मन्दिर में जितने समय बैठे रहेंगे, उतने समय शेष संसार तो सुखी रहेगा।

शिव का निवास श्मशान में होता है। इसका आशय यह है कि हमारा मन जिस समय कामनाओं, रागों-विरागों से मुक्त होता है तब हमारा हृदयाकाश श्मशान जैसा ही रिक्त होता है और तभी भगवान शिव उसे अपना निवास बनाते हैं। लेकिन आजकल शिवभक्ति के नाम पर सब कुछ करते जा रहे कितने लोग ऐसा कर पा रहे हैं। हकीकत तो यह है कि ऐसे लोगों का मन-मस्तिष्क और हृदय कबाड़ खाना और माल गोदाम बना हुआ है जहां शिव के प्रवेश करने तक का रास्ता नहीं बचा है।

शिव प्रकृति में रमने वाले देवता हैं जिन्हें वही स्थान सुहाता है जहां विस्तृत परिसर में खुला भाग, खुला आकाश, पानी-पेड़ और हरियाली तथा एकान्त होता है। आज कितने शिवालयों की यह आदर्श स्थिति है। कहीं पेड़ गायब हैं तो कहीं शांति और एकान्त।

शिवालयों को हमने इतना जबर्दस्त बिजनैस सेंटर बना डाला है जहां भगवान शिव दुकानों, व्यावसायिक परिसरों, अशांति और भीड़ भाड़ से इस कदर घिर गए हैं कि उनका भी दम घुटने लगा है। सच तो यह है कि शिव के रहने लायक माहौल ही हमारे यहां नहीं रहा। जहां देखें वहां मन्दिरों के नाम पर बिजनैस हावी है।

यहां तक कि मन्दिरों से परिक्रमा स्थल गायब हैं और खाली तथा खुले परिसरों के नाम पर दुकानों से कमायी ली जा रही है। एकान्तप्रिय शिव को इस भीड़भाड़ में तलाशने की कोशिशों से पहले हमें चाहिए कि शिव के रहने लायक सुकूनदायी आदर्श वातावरण तैयार करें।

शिव-शिव जप करने और भगवान भोलेनाथ के नाम पर आडम्बरों से कुछ होने वाला नहीं है। समाज को शिवमय बनाना है तो शिवभक्ति में असली रंगों का निखार लाना जरूरी है। समाज के कल्याण की भावना और शिवत्व के बगैर शिवभक्ति व्यर्थ है।

सचमुच जो लोग शिव को या उनकी कृपा को पाना चाहते हैं उन्हें अपने भीतर शिव के गुणों का प्राकट्य और पल्लवन करना होगा और जीवन का जो समय शेष रह गया है उसे लोक कल्याण या जगत कल्याण में लगाना होगा, तभी शिव प्रसन्न हो पाएंगे, अन्यथा कुटिलताओं, भ्रष्टाचार, पद-प्रतिष्ठा के मिथ्या मोह, स्वार्थ और संग्रह की मनोवृत्ति के रहते कई जन्मों तक शिवप्रसाद की उम्मीद व्यर्थ है।

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