लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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ओ३म्

ईश्वर हमारा चिरस्थाई साथी है

हम मनुष्य हैं। हम संसार में आते हैं। हमारा सबसे पहले माता-पिता से सम्बन्ध बनता है। माता की ही गोद और पालना हमारा आरम्भ का निवास होता है। हम माता व पता के स्नेह-सिक्त लोरी रूपी शब्दों को सुनकर धीरे-धीरे बोलना सीखते हैं और हमारा शरीर वृद्धि को प्राप्त होता रहता है। फिर हम घर के अन्य सदस्यों दादा-दादी, बहिन व भाईयों आदि को पहचानने लगते हैं। बाद में इन्हीं के साथ और कुछ मित्रों, समाज के अन्य बन्धुओं, गुरूजनों, आयुवृद्धों व समान आयु वाले लोगों के साथ जीवन यात्रा आगे बढ़ती हुई किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था के पादानों से होती हुई मृत्यु तक पहुंचती है। कालान्तर में हमें एक दिव्य सत्ता की प्रेरणा व शक्ति से इस शरीर को छोड़ना पड़ता है। मृत्यु के बाद बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि आत्मा नष्ट हो गया है। बहुत लोग ऐसे भी होते हैं जो यह मानते हैं कि हो सकता है जीवात्मा नष्ट हो गया हो और यह भी सम्भव है कि न हुआ हो। यदि नहीं हुआ तो क्या हुआ, यह जानने की किसी को फुर्सत नहीं है। बहुत से लोग इस सिद्धान्त को मानते हैं कि आत्मा का पुनर्जन्म होगा और यह उसके कर्मानुसार होगा। ऐसा वेद, उपनिषद, दर्शन व गीता आदि ग्रन्थों के साथ महाभारत, रामायण, रामचरित मानस व पुरोणों में उल्लिखित है। यदि विज्ञान के आधार पर चिन्तन करें तो विज्ञान के अनुसार न कोई नया पदार्थ बनाया जा सकता है और न ही उसे नष्ट किया जा सकता है। यदि किसी पदार्थ को हम देख रहे हैं और वह दिखना बन्द हो जाये तो उसका रूप परिवर्तन होता है जिसे विनाश या नष्ट होना नहीं कह सकते। कागज या लकड़ी को जलाने से वह गैस बन कर उड़ जाता है और उस कागज व लकड़ी के सूक्ष्म परमाणु जो पहले कागज व लकड़ी के रूप में होते हैं, उनके जलने के बाद वायु में गैस के परमाणु के रूप में विद्यमान रहते हैं। आत्मा भी एक चेतन तत्व है, यह जन्म के समय पिता व माता के शरीरों में आता है और मृत्यु के समय निकल कर चला जाता है। आने और जाने का कार्य क्योंकि ईश्वर की प्रेरणा से होता है, अतः इसे आने पर पूर्व जन्मों व उनके अपनी योनि व कार्यकलापों का ज्ञान नहीं होता। अतः अज्ञानी व अल्पज्ञानी लोग इस आवर्तन व परावर्तन के सिद्धान्त को समझ नहीं पाते। हां योग द्वारा समाधि को सिद्ध करके अपने पूर्व जन्मों के बारे में जाना जा सकता है। हम देखते हैं कि बड़े-बड़े बुद्धिमान भी बहुत सी छोटी-छोटी बातों को नहीं जानते।

 

हमारा एक बच्चा स्कूल में जाना आरम्भ करता है और हिन्दी के अक्षरों को पहचानना व लिखना सीख जाता है। पुस्तक में देखने पर वह जानता है कि यह अनुक अक्षर व शब्द है। परन्तु हिन्दी वर्णमाला के साधारण व सरल अक्षरों व शब्दों को विदेशी बडे़-बड़े विद्वान जानते ही नहीं कि यह क्या लिखा हुआ है। मनुष्यों को ज्ञान केवल उसी वस्तु या पदार्थ का होता कि जिसके वह सम्पर्क में आता है और जो उसे सीखता है या उसे सिखाया जाता है। सम्पर्क में न आने और सीखे-सिखाये बिना किसी विषय का ज्ञान बड़े-बड़े ज्ञानियों तक को नही होता। हमारे विद्यालयों में अध्यात्म विज्ञान नहीं पढ़ाया जाता। माता-पिता भी अध्यात्म की कोई विषेश शिक्षा नहीं देते, अतः आत्मा का ज्ञान समाज के साधारण व विद्वान लोगों को नहीं हो पाता। इसे योग्य ज्ञानी गुरू से अध्ययन करना आवश्यक है। अध्यात्म विज्ञान में जीवात्मा और ईश्वर विषयक सभी प्रश्नों के उत्तर हैं और उन्हें विज्ञान के प्रयोगों की तरह योगाभ्यास रूपी प्रयोग से साक्षात्कार किया जा सकता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती और योगश्वर श्री कृष्ण जी सहित सभी उपनिषदकारों, दर्शनाचार्यों एवं वेद के ऋषियों ने आत्मा व परमात्मा का वैज्ञानिकों की तरह साक्षात्कार व अनुभव किया था। हम तो यह भी कहेंगे कि कोई व्यक्ति कोई भी व्यवसाय करता हो, बड़े से बड़ा उद्योगपति या नेता ही क्यों न हो व अन्य कुछ भी छोटा-बड़ा व्यवसाय करते हों, सभी को प्रतिदिन प्रातः या सायं समय में एक बार में या अनेक समय अन्तरालों में कम से कम एक घटे का समय निकाल कर अध्यात्म विज्ञान के ग्रन्थों का अध्ययन अवश्य करना चाहिये। इसका आरम्भ वह सत्यार्थ प्रकाश ग्रन्थ के प्रथम 10 समुल्लास पढ कर कर सकते हैं। यदि एक धण्टा नित्य प्रति भी पढ़ेगे तो एक माह में ही इतना अध्ययन पूरा हो जायेगा और न केवल जीवात्मा और ईश्क्ष्वर का ही अपितु अनेकानेक विषयों का ज्ञान हो जायेगा। यदि इस ग्रन्थ को पढ़ने पर कुछ समझ में न आये व कोई शंका पैदा हो तो उसे योग्य विद्वानों से उसका समाधान पता करना चाहिये। कई बार अयोग्य लोगों से समाधान न होने पर जिज्ञासु उस विद्या व विषय को असत्य मान लेते हैं और उसके अविश्वासी बन जाते हैं, ऐसा नहीं होना चाहिये। यदि एक विद्वान से जिज्ञासाओं या शंकाओं का समाधान नहीं हुआ है तो अन्य दूसरों से करना चाहिये। समाधान अवश्य होगा यह निश्चय है। यहां हम यह बताना भी चाहते हैं कि सत्यार्थ प्रकाश के अनेक देशी व अंग्रेजी आदि कई विदेशी भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध हैं, उनसे लाभ उठाया जा सकता है।

 

जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद हमारे इस जीवन के माता-पिता, पत्नी या पति, भाई-बहिन, पुत्र-पुत्रियों, पौत्र-पौत्रियों, मित्रों, आचार्यों व सामाजिक बन्धुओं से सम्बन्ध नहीं रहते या समाप्त हो जाते हैं। मृत्यु आने पर कोई साथ नहीं जाता। इसी प्रकार जन्म से पूर्व हमारे सभी उस जन्म के सम्बन्धियों व इष्ट-मित्रों से सम्बन्ध टूट जाने पर इस जन्म में कोई हमसे मिलता-जुलता नहीं न सुख-दुख बांटता है। आज हमारे जो अपरिहार्य सम्बन्धी जन हैं, मृत्यु के बाद कोई साथी नहीं होगा। ऐसी स्थिति में क्या हमारा कोई भी साथी नहीं होता तो इस प्रश्न का उत्तर आध्यात्मिक साहित्य का अध्ययन करने पर मिलता है कि नहीं, हमारा एक साथी हमेशा होता है जो सभी जन्मों में, पूर्व व पश्चात जन्मों के साथ इस जन्म में भी हर क्षण हमारे साथ रहता है और हमें सुख पहुंचाता रहता है, हमारी रक्षा करता है। वह हमारा परम प्रिय, माता-पिता व अन्य सभी रिश्तों से बढ़कर परमात्मा है जिसका हमसे व्याप्य-व्यापक व पिता-पुत्र का सम्बन्ध है। जो सर्वव्यापक और सर्वान्र्तयामी होने से हर क्षण हमारे साथ हमारी जीवात्मा के भीतर विद्यमान रहता है। हम जीवन में अज्ञानता व कुसंस्कारों के कारण उससे मुंह फेरे रहते हैं लेकिन वह हर क्षण हमें देखता है और सहायता व रक्षा के लिए उसके हाथ हमारी ओर फैले रहते हैं। वस्तुतः हम अधिकांशतः कृतघ्न हैं जो उस ईश्वर का सहारा, सहायता, सेवा लेने के बाद भी उसे भूले हुए हैं। जिस मनुष्य का ईश्वर की ओर ध्यान चला जाता है वह फिर साधारण मनुष्य नहीं रहता अपितु वह स्वामी दयानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, गुरूदत्त विद्यार्थी, भगवान राम, भगवान कृष्ण, ऋषि-मुनि, महात्मा, समाज सेवक, प्रभु भक्त व उपासक बन जाता है। हमारा जीवात्मा अजन्मा, अनादि, अनुत्पन्न, शाश्वत, अविनाशी, अमर, नित्य तथा सदा सर्वदा रहने वाला है और ऐसा ही मेरा परम मित्र, परम सखा, साथी, माता-पिता के समान रक्षक व पालन कर्ता, दुख निवारक व सुख प्रदाता परमात्मा है। वह परमात्मा हमेशा से हमारे साथ है और हमेशा, हर जन्म में हमारे साथ रहेगा। हमें यह जीवन उसी की खोज व अनुसंधान करने के लिए मिला है। उसे जान कर उसकी उपासना करना ही मुख्य कर्तव्य है। इस कार्य को करके मनुष्य को वह आध्यात्मिक दौलत मिलती है जो संसार का सबसे बड़ा धनपति नम्बर 1 बनने से भी प्राप्त नहीं हुआ करती। धन तो जड़ व विनाशी स्वभाव वाला है। धन की केवल तीन गतियां भोग, दान व नाश ही होती हैं। धन कमाया है तो इसे धर्म पूर्वक भोग करो, आवश्यकता से अधिक धन का सुपात्रों में दान करो अन्यथा यह नाश का कारण होगा। आज हम दूरदर्शन पर 1000 करोड़ से अधिक सम्पत्ति के अनेक स्वामियों को अपमानित व आरोपित होते हुए देख रहे हैं। यह आवश्यकता से अधिक धन का अधर्म पूर्वक अर्जन करने के कारण है। अधर्म पूर्वक धर्म अर्जित करना मृत्यु से भी अधिक हानिकारक है। अतः धन को अपना लक्ष्य न बनाकर इस संसार के रचयिता, पालक व संहारक तथा हमारे शाश्वत्, सनातन, हमेशा साथ रहने व साथ निभाने वाले सच्चे मित्र ईश्वर को अपना इष्ट व लक्ष्य बनाना चाहिये जिससे राम, कृष्ण, दयानन्द, चाणक्य, सरदार पटेल की भांति हम मर कर भी यशस्वी बन सकें।   इससे सरल व अच्छा उपाय जीवात्मा की उन्नति, कीर्ति व लक्ष्य की प्राप्ति का नहीं है। आईये, ईश्वरीय ज्ञान वेद और ऋषि प्रणीत सत्यार्थ प्रकाश आदि वैदिक साहित्य के अध्ययन का व्रत लें और जीवन को सफल बनायें

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