लेखक परिचय

आशा शुक्‍ला

आशा शुक्‍ला

(लेखिका लंबे समय से छत्तीसगढ़ में पत्रकार के रूप में काम कर चुकी हैं। इन दिनों कांकेर में रहकर सामाजिक क्षेत्रों में काम कर रही हैं)

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आशा शुक्‍ला 

देश में आज भी धर्म और जाति के आधार पर बस्‍ती, उनकी पहचान न सिर्फ मौजूद है बल्कि स्वीकार्य भी है। परंतु इसी देश में मुखबिरों की एक बस्ती भी है, यह सुनकर कोई भी चौंक सकता है। यह बस्ती न तो हमारे देश की सीमा पर कहीं गुप्त रूप से बसा है और न ही यहां बसने वाले किसी अन्य देश के नागरिक हैं बल्कि बस्तर के नारायणपुर जिला में मौजूद इस बस्ती में वो आदिवासी रहते हैं जो नक्सलियों की नजर में पुलिस के खबरी हैं। जाहिर है जिसने ये बताया उसने उसका इतिहास भी बताया।

छत्तीसगढ़ के बस्तर डिवीज़न में नारायणपुर 2007-08 में नया जिला बनकर उभरा है। इसके दो ब्लॉक नारायणपुर और अबूझमाड़ हैं। मुखबिरों की बस्ती के बाषिंदे इसी माड़ अर्थात अबूझमाड़ से भागकर आए हैं। इस बस्ती में कोई दस पहले आया था तो किसी को आए हुए दो माह हुए हैं। नारायणपुर शहर के बाजार के पीछे दो-तीन छोटे छोटे टीले हैं और खुला विस्तृत मैदान में ये बस्ती या कह लें कि बस्तियां बसती जा रही हैं। ये वो लोग हैं जिन पर से नक्सलियों का विश्‍वास उठ गया या जो उनके साथ जाना नहीं चाहते हैं। आज ये स्थिती है कि मुखबिरों की बस्ती तो बस गई पर वो अब मुखबिर नहीं रहे लेकिन फिर भी बस्ती मुखबिरों की ही कहलाती है।

अबूझमाड़ में चारों तरफ पहाड़ों की श्रृंखलाबध्द कतारें और घना जंगल है। स्वतंत्र भारत में इस क्षेत्र का आज तक किसी भी तरह का सर्वे नहीं हुआ। वाकई अबूझमाड़ आज तक अबूझ है किंतु पहाड़ों की नीलाभ आभा संकेत देती है कि ये लोहे के पहाड़ हैं, हजारों हेक्टेयर में फैले जंगल में बेशकीमती इमारती लकड़ियां हैं, साथ ही जड़ी बूटियों के साथ एक अद्भुत संस्कृति है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। इन बस्तियों में अबूझमाड़ के अलग-अलग गांवों से आए आदिवासी बसे हैं। हम जैसे ही इस बस्ती में पहुंचे लोग घरों में घुस गए और दरवाजों तथा खिड़कियों से जांचने और परखने लगे। वैसे भी हमारी दुनिया से दूर रहने वाले इन भोले-भाले आदिवासियों में काफी झिझक होती है। हम जानते थे झिझक टूटेगी और हुआ भी वही, पहले गांव-घर, खेती-बाड़ी और सुख-दुख की बातें होती रहीं। वो भी जानते थे और हम भी कि जिस जख्म को कुरेदना है उसे पहले सहलाया जाता है। एक बार उसे छूआ तो बस बहता ही चला गया। मैली-कुचैली साड़ी में लिपटी वो तरूणी भरसक प्रयास करने के बाद भी भर आए गले को नियंत्रित करते हुए रूआंसे स्वर में बोली ‘मूसा के दगार’ (चूहे के बिल) में रह रहे थे। जब देखो तो मारपीट, रोज की बेगारी से अच्छा यहां है, आधा पेट रहे या पूरा कम से कम शांति से तो रहते हैं। बस मारपीट के डर से भाग आए। बहुत देर से खामोश बैठा एक अधेड़ किसान फूट पड़ा- जब देखो काम धंधा छोड़कर मीटिंग में जाओ, घंटो खाली सुनना भर है, बोलना नहीं। क्या बोलते हैं मीटिंग में? यही कि उसको तोड़ना है, वहां हमला करना है, ये ट्रेनिंग वो ट्रेनिंग। अपना काम धंधा, खेती बाड़ी छोड़कर कितने दिन खाली रहेंगे। अपनी ही खेत में बेगारों की तरह काम करना पड़ता था। जो फसल होती थी उसपर नक्सलियों का कब्जा होता था। सरकारी राशन से जो मिलता था आधा वो ले जाते थे। उनके खौफ से वह भी बंद हो गई थी। गांव में अब न स्कूल है न अस्पताल और न ही कोई सुविधा बाकी रहने दिया। कब तक सहते। उन लोगों ने जो कुछ बताया उसके अनुसार अब अधिकांश गांव में वही लोग बचे हैं जिनकी या तो कोई मजबूरी है या फिर वह पूरी तरह से उनके साथ हैं।

मुखबिरों की सूचना यदि सही है तो अबूझमाड़ में नक्सलियों का राज चलता है। शासन-प्रशासन सिर्फ ओरछा ब्लॉक और सोनपूर गांव तक ही हैं उसके आगे उनकी सरहद है जहां से सिर्फ आगे पैदल रास्ता है। पूरे माड़ में इनके कैंप हैं, कुछ कैंप तो ऐसे हैं जहां बरसों से इनके साथ जुड़े सामान्य आदिवासी भी नहीं जा सकते हैं। अति गोपनीय इन अडडों के चारों ओर लैंडमांइस बिछी हैं। अंदर हर सुविधा मौजूद है और विदेषों से लोगों का अबाध रूप से आना-जाना लगा रहता है। मुखबिरों की इसी बस्ती से थोड़ी दूर पर एक और बस्ती है जो कटीले तारों से घिरी है। जहां चौबीसो पहर भारी सुरक्षा व्यवस्था रहती है। इसमें करीब तीस चालीस घर हैं इनमें खास मुखबिर रहते हैं जिन्हें एस.पी.ओ कहा जाता है। ये पुलिस और सुरक्षा बलों के साथ गष्त पर अंदर जाते हैं और उन्हें रास्ता दिखाते हैं। बातचीत में उसने बताया कि पुलिस से ज्यादा तगड़ी ट्रेनिंग नक्सलियों की है। उनके पास ज्यादा अच्छे और आधुनिक हथियार हैं और उनके मुखबिर ज्यादा चुस्त हैं।

मुखबिर, खबरी, भेदिया या अंग्रेजी में कहें तो इनफॉर्मर जिसका शाब्दिक अर्थ तो यही होता है पुलिस को सूचना देने वाला। किंतु मर्म को छू लेने वाला अर्थ तो है ‘यातना’। गांव-घर अपनों से छूटने और बिछड़ने की यातना। हमेशा शको-शुबह के साथ जीने की पीड़ा। इस मर्मांतक पीड़ा को तो वही महसूस कर सकता है जिस पर लोगों का विष्वास उठ गया है। जाहिर है जो लोग बरसों से शांति के साथ जी रहे इन आदिवासियों को नकार सकते हैं वो भला वह इस देश की संप्रभुता को कैसे स्वीकार्य कर लेंगे…….। देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए लगातार चैलेंज बनते जा रहे नक्सली शक्तियों से निपटने के लिए जरूरत है एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की। लेकिन कड़वा सच तो यह है कि वोट बैंक की राजनीति जब तक समाप्त नहीं होगी नक्सलियों पर लगाम कसना संभव नहीं होगा अलबता मुखबिरों की ऐसी कई बस्तियां जरूर बस्ती रहेंगी। (चरखा फीचर्स) 

(लेखिका लंबे समय से छत्तीसगढ़ में पत्रकार के रूप में काम कर चुकी हैं। इन दिनों कांकेर में रहकर सामाजिक क्षेत्रों में काम कर रही हैं)

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1 Comment on "ये मुखबिरों की बस्‍ती है"

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डॉ. मधुसूदन
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इतना महत्व पूर्ण लेख कैसे पढ़ा नहीं गया? और views भी तो काफी कम हैं|

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