लेखक परिचय

अनिल अनूप

अनिल अनूप

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार व ब्लॉगर हैं।

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-अनिल अनूप
जावेद अख़्तर एक कामयाब पटकथा लेखक, गीतकार और शायर होने के अलावा एक ऐसे परिवार के सदस्य भी हैं जिसके ज़िक्र के बग़ैंर उर्दू अदब का इतिहास पूरा नहीं कहा जा सकता। जावेद अख़्तर प्रसिद्ध प्रगतिशील शायर जाँनिसार अख़्तर और मशहूर लेखिका सफ़िया अख़्तर के बेटे और प्रगतिशील आंदोलन के एक और जगमगाते सितारे, लोकप्रिय कवि मजाज़ के भांजे हैं। अपने दौर के रससिद्ध शायर मुज़्तर ख़ैराबादी जावेद के दादा थे। मुज़्तर के वालिद सैयद अहमद हुसैन ‘रुस्वा’ एक मधुर सुवक्ता कवि थे। मुज़्तर की वालिदा सईदुन-निसा ‘हिरमाँ’ उन्नीसवीं सदी की उन चंद कवियत्रियों में से हैं जिनका नाम उर्दू के इतिहास में आता है। जावेद की शायरा परदादी हिरमाँ के वालिद अल्लामा फ़ज़ले-हक़ खैराबादी अपने समय के एक विश्वस्त अध्येता, दार्शिनक, तर्कशास्त्री और अरबी के शायर थे अल्लामा फ़ज़ले-हक़ ग़ालिब के क़रीबी दोस्त थे और वो ‘‘दीवाने-ग़ालिब’’ जिसे दुनिया आँखों से लगाती है, जावेद के सगड़दादा अल्लामा फ़ज़ले-हक़ का ही संपादित किया हुआ है। अल्लामा फ़ज़ले-हक़ ने 1857 की जंगे-आजादी में लोगों का जी जान से नेतृत्व करने के जुर्म में अंग्रेज़ों से काला पानी की सज़ा पाई और वहीं अंडमान में उनकी मृत्यु हुई।
इन तमाम पीढ़ियों से जावेद अख़्तर को सोच, साहित्य और संस्कार विरासत में मिले हैं और जावेद अख़्तर ने अपनी शायरी से विरसे में मिली इस दौलत को बढ़ाया ही है। जावेद अख़्तर की कविता एक औद्योगिक नगर की शहरी सभ्यता में जीने वाले एक शायर की शायरी है। बेबसी और बेचारगी, भूख और बेघरी, भीड़ और तनहाई, गंदगी और जुर्म, नाम और गुमनामी, पत्थर के फुटपाथों और शीशे की ऊँची इमारतों से लिपटी ये अरबन तहज़ीब न सिर्फ़ कवि की सोच बल्कि उसकी ज़बान और लहजे पर भी प्रभावी होती है।
जावेद की शायरी एक ऐसे इंसान की भावनाओं की शायरी है जिसने वक्त के अनगिनत रूप अपने भरपूर रंग में देखे हैं। जिसने ज़िन्दगी के सर्द-गर्म मौसमों को पूरी तरह महसूस किया है। जो नंगे पैर अंगारों पर चला है, जिसने ओस में भीगे फूलों को चूमा है और हर कड़वे-मीठे जज़्बे को चखा है। जिसने नुकीले से नुकीले अहसास को छू कर देखा है और जो अपनी हर भावना और अनुभव को बयान करने की शक्ति रखता है। जावेद अख़्तर ज़िन्दगी को अपनी ही आँखों से देखता है और शायद इसीलिए उसकी शायरी एक आवाज़ है, किसी और की गूँज नहीं। ‘‘…अपनी ज़िंदगी में तुमने क्या किया ? किसी से सच्चे दिल से प्यार किया ? किसी दोस्त को नेक सलाह दी ? किसी दुश्मन के बेटे को मोहब्बत की नज़र से देखा ? जहाँ अँधेरा था वहाँ रौशनी की किरन ले गये ? जितनी देर तक जिये, इस जीने का क्या मतलब था..?…’’
ग़जलों को एक नया और आसान रूप देने में जावेद साहब का बहुत बड़ा योगदान है। सलीम खान और जावेद अख्तर ने शोले, ज़ंजीर और न जाने कितनी कालजयी फ़िल्मों की पटकथा भी लिखी है। इस जोड़ी को सिनेमा में सलीम-जावेद के नाम से भी जाना जाता है। जावेद साहब को वर्ष 1999 को पद्म भूषण और 2007 में पद्म भूषण से नवाजा जा चुका है।
जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में हुआ था। उनके पिता जान निसार अखतर प्रसिद्ध प्रगतिशील कवि और माता सफिया अखतर मशहूर उर्दु लेखिका तथा शिक्षिका थीं। उनकी माँ का इंतकाल तब हो गया था जब वे बेहद ही छोटे थे। वालिद ने दूसरी शादी कर ली और कुछ दिन भोपाल में अपनी सौतेली माँ के घर रहने के बाद भोपाल शहर में उनका जीवन दोस्तों के भरोसे हो गया। यहीं कॉलेज की पढाई पूरी की और जिन्दगी के नए सबक भी सीखे।
माँ के इंतकाल के बाद वह कुछ दिन अपने नाना-नानी के पास लखनऊ में रहे उसके बाद उन्हें अलीगढ अपने खाला के घर भेज दिया गया। जहाँ के स्कूल में उनकी शुरूआती पढाई हुई। उसके बाद वह वापस भोपाल आ गये, यहाँ आकर उन्होंने अपनी पढाई को पूरा किया।
जावेद अख्तर की पहली पत्नी हनी ईरानी थीं। जिनसे उन्हें दो बच्चे है फरहान अख्तर और जोया अख्तर उनके दोनों ही बच्चे हिंदी सिनेमा के जाने माने अभिनेता, निर्देशक-निर्माता हैं। उनकी दूसरी पत्नी हिंदी सिनेमा की मशहूर अभिनेत्री शबाना आजमी हैं।
जावेद अख्तर ने अपने करियर की शुरुआत ‘सरहदी लूटेरा’ से की थी। इस फिल्म में सलीम खान ने छोटी सी भूमिका भी अदा की थी। इसके बाद सलीम-जावेद की जोड़ी ने मिलकर हिंदी सिनेमा के लिए कई सुपर-हिट फिल्मो की पटकथाएं लिखी। इन दोनों की जोड़ी को उस दौर में सलीम जावेद की जोड़ी से जाना जाता था। इन दोनों की जोड़ी ने वर्ष 1971-1982 तक करीबन 24 फिल्मों में साथ किया जिनमे सीता और गीता, शोले, हठी मेरा साथी, यादों की बारात, दीवार जैसी फिल्मे शामिल हैं। उनकी 24 फिल्मों में से करीबन 20 फ़िल्में बॉक्स-ऑफिस पर ब्लाक-बस्टर हिट साबित हुई थी।
1987 में प्रदर्शित फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ के बाद सलीम-जावेद की सुपरहिट जोड़ी अलग हो गई। इसके बाद भी जावेद अख्तर ने फिल्मों के लिए संवाद लिखने का काम जारी रखा। जावेद अख्तर को मिले सम्मानों को देखा जाए तो उन्हें उनके गीतों के लिए आठ बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। 1999 में साहित्य के जगत में जावेद अख्तर के बहुमूल्य योगदान को देखते हुए उन्हें पदमश्री से नवाजा गया। 2007 में जावेद अख्तर को पदम भूषण सम्मान से नवाजा गया।
जावेद अख्तर का असली नाम जादू है. उनके पिता की कविता थी, ‘लम्हा-लम्हा किसी जादू का फसाना होगा’ से उनका यह नाम पड़ा था। जावेद नाम जादू से मिलता-जुलता, इसलिए उनका नाम जावेद अख्तर कर दिया।
जावेद अख्तर 4 अक्टूबर 1964 को मुंबई आए थे। उस वक्त उनके पास न खाने तक के पैसे नहीं थे. उन्होंने कई रातें सड़कों पर खुले आसमान के नीचे सोकर बिताईं। बाद में कमाल अमरोही के स्टूडियो में उन्हें ठिकाना मिला।
सलीम खान के साथ जावेद अख्तर की पहली मुलाकात ‘सरहदी लुटेरा’ फिल्म की शूटिंग के दौरान हुई थीं। इस फिल्म में सलीम खान हीरो थे और जावेद क्लैपर बॉय। बाद में इन दोनों ने मिलकर बॉलीवुड को कई सुपरहिट फिल्में दीं।
सलीम खान और जावेद अख्तर को सलीम-जावेद बनाने का श्रेय डायरेक्टर एसएम सागर को जाता है। एक बार उन्हें राइटर नहीं मिला था और उन्होंने पहली बार इन दोनों को मौका दिया।
सलीम खान स्टोरी आइडिया देते थे और जावेद अख्तर डायलॉग लिखने में मदद करते थे। जावेद अख्तर उर्दू में ही स्क्रिप्ट लिखते थे, जिसका बाद में हिंदी ट्रांसलेशन किया जाता है।
70 के दशक में स्क्रिप्ट राइटर्स का नाम फिल्मों के पोस्टर पर नहीं दिया जाता था, लेकिन सलीम-जावेद ने बॉलीवुड में उन बुलंदियों को छू लिया था कि उन्हें कोई न नहीं कह सका और फिर तो पोस्टरों पर राइटर्स का भी नाम लिखा जाने लगा।
सलीम-जावेद की जोड़ी 1982 में टूट गई थी. इन दोनों ने कुल 24 फिल्में एक साथ लिखीं, जिनमें से 20 हिट रहीं। जावेद अख्तर को 14 बार फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला।इनमें सात बार उन्हें बेस्ट स्क्रिप्ट के लिए और सात बार बेस्ट लिरिक्स के लिए अवॉर्ड से नवाजा गया।जावेद अख्तर को 5 बार नेशनल अवॉर्ड भी मिल चुका है।
जावेद अख्तर की पहली पत्नी हनी ईरानी थीं, जिनके साथ उनकी पहली मुलाकात ‘सीता और गीता’ के सेट पर हुई थी।हनी और जावेद का जन्मदिन एक ही दिन पड़ता है।
जावेद अख्तर नास्तिक हैं। उन्होंने अपने बच्चों- जोया और फरहान को भी परवरिश ऐसे की है।
जावेद अख्तर शुरुआती दिनों में कैफी आजमी के सहायक थे। बाद में उन्हीं की बेटी शबाना आजमी के साथ उन्होंने दूसरी शादी की।
जावेद अख्तर 1999 में भारत सरकार द्वारा पद्म श्री पुरस्कार से और 2007 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था. उन्हे चौदह बार,सर्वश्रेष्ठ गीत के लिए और सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए “एक लड़की को देखा …” 1942-ए लव स्टोरी में, “घर से निकलते हैं …” पापा कहते हैं के लिए, “संदेशे आते हैं ….” बॉर्डर के लिए, “पंछी नदियां पवन के झोंके …” रिफ्यूजी के लिए, लगान के लिए “राधा कैसे ना जले,” कल हो ना हो के लिए “कल हो ना हो”, “तेरे लिए …” वीर-जारा और जोधा अकबर के लिए “जश्न ए बहारा” के लिए.सात बार,फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया. अख्तर 4 अक्टूबर 1964 को मुंबई में पहुंचे. मुंबई में रहने वाले अपने प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने रुपये के लिए एक छोटी सी फिल्म के लिए संवाद लिखने में कामयाब रहे. अंदाज़, सीता और गीता, शोले और डॉन जैसी सफल फिल्मों उन्होने की.
स्वलिखित जीवनी में उनकी इन पंक्तियों को देखिये:
“बम्बई में दो बरस होने को आए, न रहने का ठिकाना है न खाने का। यूँ तो एक छोटी सी फिल्म में सौ रूपये महीने पर डॉयलॉग लिख चुका हूँ। कभी कहीं असिस्टेंट हो जाता हूँ, कभी एकाध छोटा-मोटा काम मिल जाता है, अक्सर वो भी नहीं मिलता। दादर एक प्रोडयूसर के ऑफिस अपने पैसे माँगने आया हूँ, जिसने मुझसे अपनी पिक्चर के कॉमेडी सीन लिखवाए थे। ये सीन उस मशहूर राइटर के नाम से ही फिल्म में आएंगे जो ये फिल्म लिख रहा है। ऑफिस बंद है। वापस बांदरा जाना है जो काफी दूर है। पैसे बस इतने हैं कि या तो बस का टिकट ले लूँ या कुछ खा लूँ, मगर फिर पैदल वापस जाना पडेगा। चने खरीदकर जेब में भरता हूँ और पैदल सफर शुरू करता हूँ। कोहेनूर मिल्स के गेट के सामने से गुजरते हुए सोचता हूँ कि शायद सब बदल जाए लेकिन यह गेट तो रहेगा। एक दिन इसी के सामने से अपनी कार से गुजरूँगा।
एक फिल्म में डॉयलॉग लिखने का काम मिला है। कुछ सीन लिखकर डायरेक्टर के घर जाता हूँ। वो बैठा नाश्ते में अनानास खा रहा है, सीन लेकर पढता है और सारे कागज मेरे मुँह पर फेंक देता है और फिल्म से निकालते हुए मुझे बताता है कि मैं जिंदगी में कभी राइटर नहीं बन सकता । तपती धूप में एक सडक पर चलते हुए मैं अपनी आँख के कोने में आया एक आँसू पोछता हूँ और सोचता हूँ कि मैं एक दिन इस डायरेक्टर को दिखाउंगा कि मैं ……..फिर जाने क्यों ख्याल आता है कि क्या ये डायरेक्टर नाश्ते में रोज अनानास खाता होगा।”

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2 Comments on "जावेद अख़्तर को सोच, साहित्य और संस्कार विरासत में मिले हैं"

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सुनयना पाठक
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सुनयना पाठक

मान्यवर सम्पादक जी
मैं पिछले कुछ महीनों से प्रवक्ता की नियमित पाठिका हूं.
खासकर मशहूर व्यक्तित्वों की खोजपूर्ण. जीवनी और विविधा स्तम्भ मैं जरूर पढती हूं
अगर आपकी आग्या हो तो मै जीवनी का संग्रह प्रकाशित करूं…..

इंसान
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निष्पक्ष जीवनी के संग्रह में जावेद अख्तर के सार्वजनिक वक्तव्य “नब्बे प्रतिशत लोग मोदी के पक्ष में नहीं” का उल्लेख करना न भूलिएगा!

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