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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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यों तो हजारों-लाखों हैं जो आते हैं और चले जाते हैं, वे बिरले ही होते हैं जो सदियों में जन्म लेते हैं और युगों तक याद रखे जाते हैं।

वागड़ की सरजमीं पर अवतरित होकर वागड़ ही नहीं बल्कि प्रदेश भर की जनता के दिलों पर राज करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री स्व. हरिदेव जोशी के लिए ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं। आज जोशी हमारे बीच नहीं हैं मगर उनके व्यक्तित्व और कर्मयोग की गंध माही की लहरों और नहरों के कल-कल गान से लेकर त्रिपुरा मैया के आंचल में पल रहे जन-जन के मन में तरंगायित हो रही हैं। 17 दिसम्बर, 1921 को बांसवाड़ा जिले के छोटे से गांव खान्दू में पैदा होकर विराट व्यक्तित्व की गंध बिखरने वाले हरिदेव जोशी को कौन नहीं जानता। आज जब भी कहीं विकास की चर्चा होती है, दूरदृष्टा जोशी के अविस्मरणीय एवं अपूर्व योगदान को आदर के साथ याद किया जाता है।

राजस्थान के नवनिर्माण में हरिदेव जोशी ने जो काम किए हैं उन्हीं के स्वप्नों को साकार करने में लोक सेवा के क्षेत्र में जुटी वर्तमान पीढ़ी भरसक कोशिशों में जुटी हुई है। राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत, केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री डॉ. सी.पी. जोशी से लेकर जनजाति क्षेत्रीय विकास मंत्री महेन्द्रजीत सिंह मालवीय और वागड़ तथा प्रदेश के जागरूक एवं विकास के प्रति समर्पित जन प्रतिनिधियों की भागीदारी से राजस्थान आज देश के अग्र्रणी राज्यों में स्थान बना रहा है। स्व. हरिदेव जोशी यही चाहते थे कि गरीबी और पिछड़ेपन से त्रस्त आदिवासी अंचलों से लेकर महानगरों तक विकास की ऐसी गंगा बहनी चाहिए जिससे कि प्रदेश का हर शख़्स जीवन का संतोष और सुकून प्राप्त कर सके।

एक छोटे से गाँव से निकलकर राजस्थान की सत्ता की बागड़ोर संभालने वाले लोकनायक स्व. हरिदेव जोशी का स्मरण कर आज हम गौरव से अभिभूत हैं। स्व. हरिदेव जोशी का नाम परिचय का मोहताज नहीं है बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में अच्छी तरह जाना-पहचाना और हृदयों में अमिट स्थान बनाए हुए है। समाज-जीवन में सादगी और शुचिता के साथ लोक सेवा के आदर्शों को आत्मसात करने वाले स्व. जोशी ने आम आदमी के विकास का स्वप्न संजोकर उसी के अनुरूप कार्य करने की शैली विकसित की और ताजिन्दगी उसी पर अमल की। इसी का परिणाम है कि वे हर दिल अजीज और विकास के पुरोधा के रूप में आज भी जन-जन के दिल में बसे हुए हैं।

आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा और समाजसेवा से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करने वाले स्व. जोशी ने जनजाति अंचलों को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और वागड़ के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी अहम् भूमिका निभायी। संघर्ष के पहाड़ों से निखर कर निकले और सार्वजनिक जीवन में सूर्य की तरह दीप्यमान जोशी ने वागड़ अंचल में माही का पानी प्यासे खेतों तक पहुंचाने, रोजगार के लिए आधार तलाशने औद्योगिक संस्थानों के विस्तार और विकास, सिंचाई सुविधाओं के प्रसार, बिजली घरों के निर्माण आदि के साथ ही उन्होंने जनजातीय लोगों और जनजाति क्षेत्रों के विकास के कितने ही आधारभूत बिंबों को आकार दिया। वागड़ का विकास आज जोशी की देन है।

विकास के पुरोधा बाबूजी द्वारा न केवल इस आदिवासी वागड़ अंचल बल्कि प्रदेश में मानव कल्याण की दिशा में किये कार्य इस बात के साक्षी हैं कि उनकी दूरगामी सोच विकास की थी जिसके नक्शे कदम पर चलकर ही विकास की यात्रा सफल हो सकती है और सही मायने में उन्हें सच्ची श्रध्दांजलि भी यही होगी।

दूरदृष्टा विकास पुरुष

विकास के लिए अपनी जन्मभूमि तक न्यौछावर कर देने वाले जोशी ने वागड़ व राजस्थान के हित में जो त्याग किया है ऐसा उदाहरण आज कहीं देखने को नहीं मिलता। आज जहां हर कोई अपने क्षेत्र को विकास और आधुनिकता से नहलाने को उत्सुक है वहीं स्व. हरिदेव जोशी ऐसे युगपुरुष थे जिन्होंने माही बांध के जरिये वागड़ में हरित क्रांति के स्वप्नों को आकार देने के लिए अर्से पहले अपने गांव खांदू और आस-पास के कई गांवों की भूमि को माही मैया को समर्पित कर दिया। इन गांवों के बलिदान की गाथा माही परियोजना की गांव-ढांणियों तक पसरी नहरें सुना रही हैं।

बांसवाड़ा जिले के लिए वह दिन स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया जब धार ग्वालियर के आमझरा से झाबुआ, रतलाम और सैलाना होती हुई निकली माही नदी के जल प्रवाह को रोककर बांसवाड़ा से 16 किलोमीटर दूर बोरखेड़ा में माहीबांध बनाने माही बजाज सागर परियोजना की नींव डाली गई जिसके जनक वागड़ के लाड़ले व राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री एवं कुशल प्रशासक रहे श्री हरिदेव जोशी थे जिनका सपना इस सरजमीं को सरसब्ज करने का था जो साकार हुआ। माहीबांध की अथाह जलराशि ने इस जिले की भूमि को नहरों के जरिये सरसब्ज किया जिसका सबूत यहां 12 महीनों लहलहाती फसलें हैं जिसने इस क्षेत्र के किसानों को न केवल खुशहाल किया है बल्कि उन्हें आर्थिक स्वावलंबन की राह भी दिखाई है।

स्व. जोशी ने अपने क्षेत्र के लोगों की सेवा और पुनर्वास में कहीं कोई कमी नहीं छोड़ी। खान्दू गांव के लोगों को बांसवाड़ा में खांदू कॉलोनी स्थापित कर बसाया। भू-गर्भ में पानी के भंडारों की कमी, सतही जलस्रोतों की वर्तमान समस्याओं की वजह से जहां प्रदेश के कई हिस्सों में पानी की कमी की बातें सुनी जाती हैं लेकिन यह जोशी की दूरदृष्टि ही थी कि माही बांध के रूप में उन्होंने ऐसी सौगात दी है जिसे आने वाली पीढ़ियां कभी भूल नहीं पाएंगी। आज बांसवाड़ा में पानी का कोई संकट नहीं है। बाहर से आने वाले लोग इस भी बात को स्वीकारते हैं कि बांसवाड़ा पानी के मामले में सुखी है।

जिस समय माही बांध बन रहा था उस समय किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि इक्कीसवीं सदी आते आते यहां विराट बिजलीघरों की स्थापना हो सकती है और इससे रेलवे सुविधा भी मिल सकती है। जोशी के ही समय जहां सिंचाई सुविधाओं का जाल बिछा वहीं बांसवाड़ा ने अपने दो बिजलीघरों के जरिये बिजली पैदा करने का गौरव पाया। जोशी के दूरदर्शी प्रयासों की वजह से प्रचुर मात्रा में पानी की उपलब्धता ही वह वजह है जिसके कारण वर्तमान अशोक गहलोत सरकार ने बांसवाड़ा के दानपुर में सुपर क्रिटीकल ताप बिजलीघर (कोयला आधारित) स्थापित करने की कार्यवाही आरंभ कर दी है। इसके साथ ही जनजाति क्षेत्रीय विकास मंत्री महेन्द्रजीत सिंह मालवीय की पहल पर बागीदौरा क्षेत्र की सागडूंगरी में गैस आधारित बिजली घर स्थापित होगा। वह दिन दूर नहीं जब पहले पानी और बिजली के क्षेत्र में भी बांसवाड़ा प्रदेश को नये गौरव का अहसास कराएगा।

वागड़ अंचल के पर्यटन विकास की अपार संभावनाओं को जोशी ने साकार करने के लिए खूब प्रयास किए। उन्हें अच्छी तरह पता था कि आने वाले समय में इस क्षेत्र में व्यापक पैमाने पर नये आयाम स्थापित होंगे। हंड्रेड आईलैण्ड विकसित करने के साथ ही इको टूरिज्म, वाटर टूरिज्म, स्पीरिच्युयल टूरिज्म और पर्यटन की सभी संभावनाओं को सार्थक करने उन्होंने ठोस प्रयास किए।

हर दिल अजीज, जन-जन के अपने नेता पूर्व मुख्यमंत्री स्व. हरिदेव जोशी के माधुर्यपूर्ण व्यक्तित्व में गांभीर्य और निरंतर चिंतन की झलक प्रत्येक क्षण दिखाई देती थी। उनकी स्मरणशक्ति का कोई मुकाबला नहीं था। वे जहां जाते वहां व्यक्ति-व्यक्ति का नाम लेकर पुकारते और आत्मीयता प्रकट करते। यही वजह थी कि जोशी को लोग दिल से चाहते थे। कैसी भी विषम परिस्थिति में धैर्य और गंभीरता के साथ सामना करना जोशी के व्यक्तित्व की बहुत बड़ी खूबी थी। जोशी ऐसे विकास पुरुष थे जो बहुत कम बोलते थे। उनके साथ रहने वाले लोग उनसे अच्छी तरह वाकिफ थे और वे इशारों और होंठों के हिलने मात्र से उनकी इच्छा को समझ जाते थे।

प्रेरणास्रोत

अतीत को देखें तो प्रदेश के दक्षिण छोर पर अवस्थित वाग्वर अंचल अनेक कहानियां समेटे है और उसके नेपथ्य में विकास की गाथा छुपी हुई है जिसका इतिहास त्याग और बलिदान से सींचा हुआ है। इन्हीं में जोशी का अप्रतिम व्यक्तित्व बांसवाड़ा में नवीन इतिहास रच गया है। जनसेवा का आदर्श स्थापित करने वाले जोशी का निधन 28 मार्च, 1995 को हुआ। बाबूजी हरिदेव जोशी का समग्र व्यक्तित्व आज की पीढ़ी खासकर सार्वजनिक जीवन जीने वाले लोगों के लिए प्रेरणा का आदर्श स्रोत है। उनके अधूरे स्वप्नों को पूरा करने का दायित्व आज के जन प्रतिनिधि निभा रहे हैं। व्यक्तित्व की चरम ऊँचाइयों से परिपूर्ण स्व. जोशी के आदर्श जीवन से प्रेरणा प्राप्त कर समाज को आगे बढ़ाने के लिए संकल्पित होकर काम करने का वक्त है। जोशी ने यही सिखाया कि जीवन में जो भी क्षण प्राप्त हो, उसका सदुपयोग लोक सेवा और सामुदायिक मंगल में होना चाहिए। स्व. हरिदेव जोशी की पन्द्रहवीं पुण्यतिथि पर समूचा अंचल श्रद्धासुमन अर्पित करता है।

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