लेखक परिचय

वीरेंदर परिहार

वीरेंदर परिहार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

Posted On by &filed under राजनीति.


sus

वीरेन्द्र सिंह परिहार

म०प्र० विधानसभा का पावस-सत्र दो दिन में ही समाप्त हो गया, क्योंकि विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने विधानसभा चलने ही नहीं दिया। कांग्रेस पार्टी का मानना है कि शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते सी.बी.आई. द्वारा भी व्यापम घोटाले की निष्पक्ष जांच संभव नहीं है। कांग्रेस पार्टी का कहना है कि चंूकि मुख्यमंत्री रहते हुए शिवराज सिंह चौहान सी.बी.आई. जांच को प्रभावित करेंगे, इसलिए शिवराज सिंह चौहान को त्याग-पत्र देना जरूरी है, क्योंकि तभी निष्पक्ष जांच संभव हो सकेगी। यह बताना उचित होगा कि जब तक सी.बी.आई. जांच की घोषणा नहीं हुई थी, तब तक कांग्रेस पार्टी व्यापम घोटाले को लेकर सी.बी.आई. जांच के लिए जमीन-आसमान एक किए हुए थी। लेकिन जब स्वतः शिवराज सिंह की पहल पर सी.बी.आई. जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने आदेशित कर दिया और सी.बी.आई. ने तेजी से जांच करना और प्राथमिकी दर्ज करना शुरू कर दिया है तो अब शिवराज सिंह के त्याग-पत्र को लेकर हंगामा खड़ा किया जा रहा है, धरना और प्रदर्शन किया जा रहा है। भले ही इनमें आम जनता की कोई भागीदारी न हो। इतना ही नहीं सी.बी.आई. जो जांच कर रही है, उसे लेकर पूरी उम्मीद है कि उसकी निगरानी सर्वोच्च न्यायालय या तो स्वतः करेगा या उच्च न्यायालय से कराएगा। ऐसी स्थिति में शिवराज सिंह सी.बी.आई. जांच को कैसे प्रभावित कर पाएंगे? यह लोगों की समझ से परे है। वैसे भी यह सभी को बेहतर ढंग से पता होगा कि सी.बी.आई. केन्द्र सरकार के अधीन होती है, अतएव किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री कम-से-कम अपने बलबूते तो उसे प्रभावित करने की स्थिति में नहीं होता। यह भी देखे जाने की जरूरत है कि कांग्रेस पार्टी ने स्वतः ऐसे प्रकरणों में अपने मामले में क्या किया? वर्ष २०११ में जब सी.बी.आई. २-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच कर रही थी, तब प्रधानमंत्री कार्यालय और चार अन्य मंत्रालयों की टीप में कहा गया था कि यदि वित्त मंत्री चिदम्बरम चाहते तो २-जी का घोटाला रोक सकते थे। भाजपा समेत दूसरे विपक्षी दलों द्वारा जब चिदम्बरम का इस्तीफा मांगा गया तो कांग्रेस पार्टी द्वारा यह तर्क दिया गया कि चंूकि इस मामले में सी.बी.आई. सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में काम कर रही है, और मामला चंूकि न्यायालय के विचाराधीन है। इसलिए चिदम्बरम को सिर्फ न्यायालय के आदेश से ही हटाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में जब व्यापम का मामला सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है। इसलिए चिदम्बरम को सिर्फ न्यायालय के आदेश से ही हटाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में जब व्यापम का मामला सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है, और शिवराज सिंह के विरुद्ध किसी न्यायालय या किसी सक्षम एजेन्सी की कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं है तो कांग्रेस पार्टी शिवराज सिंह का इस्तीफा किस आधार पर मांग रही है? यू.पी.ए. शासन में हुए १ करोड़ ८६ लाख के कोलगेट घोटाले में जब वर्ष २०१२ में सी.बी.आई. जांच कर रही थी, तब कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का इस्तीफा नहीं दिलवाया, जबकि कोलगेट घोटाला अधिकांशतया तभी हुआ, जब २००६ से २००९ के मध्य निवर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कोयला मंत्रालय अपने पास रखे हुए थे। फिर सी.बी.आई. तो प्रधानमंत्री के ही अधीन होती है, और मनमोहन सिंह इस हैसियत में पूरी तरह थे कि वह सी.बी.आई. जांच को प्रभावित कर सके। तभी तो सर्वोच्च न्यायालय के मनाही के बावजूद संबंधित जांच के दस्तावेज संबंधित मंत्री और कुछ अन्य अधिकारियों को सी.बी.आई. द्वारा दिखाए गए। ऐसी स्थिति में ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सी.बी.आई. को सरकारी तोंता कहना पड़ गया था। बावजूद इसके कांग्रेस पार्टी का कहना था कि मनमोहन सिंह के इस्तीफे को कोई सवाल ही नहीं उठता। लेकिन कांग्रेस पार्टी को शिवराज सिंह का इस्तीफा मुख्यमंत्री पद से चाहिए। इसे कांग्रेस पार्टी के दोहरे मापदण्ड की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या कहेंगे? पर कांग्रेस पार्टी को ऐसा लगता है कि इस तरह से हो-हल्लाकर वह शिवराज सिंह की छवि को विवादित कर सकती है। क्योंकि शिवराज प्रदेश में भाजपा के ऐसे चेहरे हैं कि जिनके चलते प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के लिए भविष्य में भी कोई अवसर नहीं दिखाई देता। कांग्रेस पार्टी को लगता है कि इस तरह से हंगामा खड़ा करके वह शिवराज सिंह को छबि और जनाधार को प्रभावित कर सकती है और भविष्य के लिए प्रदेश में अपने लिए शायद कुछ हद तक खोई जमीन प्राप्त कर सकती है।

सिर्फ प्रदेश में ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस सिर्फ शिवराज सिंह का ही इस्तीफा नहीं, बल्कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान के मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद का पावस-सत्र भी नहीं चलने दे रही है। जबकि इस संबंध में मोदी सरकार का कहना है कि वह विपक्ष के एक-एक आरोपों का उत्तर देने को तैयार है। पर कांग्रेस पार्टी की रुचि बहस को लेकर तो हैं नहीं, उसकी रुचि हंगामा खड़ा करने की है। क्योंकि उसे इस फासिस्ट थ्योरी पर भरोसा है कि किसी झूठ को बार-बार दुहराने से लोग उसे सच मानने लगते हैं। सच्चाई यह है कि यह वही कांग्रेस पार्टी है, जब वह सत्ता में थी तो उसके सांसद संसद में इसलिए हंगामा करते थे कि विपक्षी सांसद २-जी स्पेक्ट्रम या कोलगेट घोटाले पर बोल न पाएं, सार्थक बहस का प्रयास तो दूर की बात थी। कांग्रेस पार्टी के अपने मामले में मापदण्ड कितने अलग थे, यह इसी से समझा जा सकता है कि जब वर्ष २०१० में दागी पी.जे। थामस को मुख्य सतर्कता आयुक्त नियुक्त किया गया और सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर आपत्ति उठायी तो तात्कालिक वित्त मंत्री पी। चिदम्बरम का तर्क था कि चार्ज-शीटेड होने से कोई दागी नही हो जाता। तो कांग्रेस पार्टी के मापदण्ड में चार्ज-शीटेड भी दागी नहीं है, जबकि सुषमा, वसुंधरा और शिवराज बगैर चार्जशीट के, बगैर किसी न्यायालय या जांच एजेन्सी की प्रतिकूल टिप्पणी के, कोई अवैध कृत्य किया है- ऐसे बगैर निष्कर्ष के ही दोषी हैं। स्वेच्छाचारिता की हद यह थी कि कई ऐसे मौके भी आए, जब कांग्रेस पार्टी के मंत्रियों पर आरोप लगने पर उन्होंने मांग करने पर भी संसद में कोई वक्तव्य तक उचित नहीं समझा, जैसे- १ करोड़ के घूसकाण्ड में रेल मंत्री पवन बंशल ने संसद में विपक्षी दलों की मांग के बावजूद कोई वक्तव्य तक नहीं दिया। कांग्रेस पार्टी का सदैव यही रवैया रहता था कि मतदाताओं ने हमें बहुमत दिया है- हम जो चाहेंगे, वह करेंगे, और हमें किसी को रोकने-टोकने का अधिकार नहीं। कांग्रेस पार्टी का कहना है कि यू.पी.ए. राज में भाजपा ने भी कईबार संसद नहीं चलने दी थी। लेकिन तब की और अब की परिस्थितियों में जमीन-आसमान का फर्क है। २००४ से २००९ के मध्य एकबार राजग ने संसद को इसलिए बाधित किया था, जब लालू यादव, तस्मुल्लीदीन, शिबू सोरेन जैसे घोटालेबाज और हत्या के आरोपी मंत्री बनाए गए थे। २००९ से २०१४ के मध्य पहली बार राजग द्वारा संसद इसलिए नहीं चलने दी गई थी कि कैग द्वारा २-जी घोटाला सामने लाए जाने पर भी सरकार संसदीय समिति से जांच के लिए तैयार नहीं थी। दुबारा कोयला खदानों के घोटाले पर सी.बी.आई. जांच में छेड़छाड़ किए जाने पर जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने प्रमाणित माना था, उसमें कानून मंत्री अश्विनी कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद नहीं चलने दी गई थी। पुनः तीसरी बार संसद तब ठप्प की गई थी, जब रेलवे के एक एैसे अफसर को घूसखोरी में गिरफतार किया जिसकी संाठ-गांठ रेल मंत्री के भांजे से थी। यानी कुल मिलाकर मामला रेल मंत्री तक पहुंच वाला था। बाद में तात्कालिक कानून मंत्री अश्विनी कुमार और रेल मंत्री पवन बंसल दोनों के ही इस्तीफे हुए। साफ है कि तब विपक्ष सही मुद्दों को लेकर संसद नहीं चलने दे रहा था, लेकिन वर्तमान स्थिति में जब कांग्रेस पार्टी से यह पूछा जाता है कि सुषमा वसुंधरा एवं शिवराज ने कौन-सा गैर कानूनी कृत्य किया है जिसके चलते इन्हंे पदों से हटाया जाए तो सांय-पटाय बंकना अलग बात है, कांग्रेस पार्टी के पास कोई समुचित जवाब नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि यदि ललित मोदी इतना बड़ा अपराधी था तो यू.पी.ए. राज में उसके विरूद्ध दिखावे के तौर पर कोई भी कार्यवाही क्यों नहीं की गई? यहां तक कि उसे भगोडा भी घोषित नहीं किया गया।हकीकत यह है कि कांग्रेस पार्टी को लगता है कि सन १९७७ से १९८० के मध्य जैसा हुल्लड़ मचाकर और अराजकता फैलाकर माहौल बनाया गया था, वैसे ही इस तरह से उसकी सत्ता में वापसी के आसार बनेंगे। पर शायद उसे पता नहीं कि तब की और अब की परिस्थितियों में जमीन आसमान का फर्क है और इस तरह से जनमत और भी कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध होता जा रहा है।

Leave a Reply

1 Comment on "सिर्फ हंगामा खड़ा करना……"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
Anil Gupta
Guest
यह पहले से ही पता था कि कांग्रेस का उद्देश्य व्यापम घोटाले कि निष्पक्ष जांच कभी भी नहीं रहा है क्योंकि व्यापम घोटाले कि शुरुआत १९८२ में कांग्रेस के शासन में ही हुई थी और पहली प्राथमिकी भी १९८३ में दर्ज़ हुई थी.सीबीआई जांच केवल एक बहन था.अब जब सीबीआई जांच शुरू हो गयी है और सीबीआई निदेशक अनिल सिन्हा कह चुके हैं कि इसमें जांच जल्दी ही पूर्ण कर ली जाएगी तो कांग्रेस को बैचेनी होने लगी है और उसने शिवराज सिंह चौहान की सरकार के रहते सीबीआई जांच भी निष्पक्ष रूप से संभव नहीं है यह राग अलापना… Read more »
wpDiscuz