लेखक परिचय

राजेश कश्यप

राजेश कश्यप

स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

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14 नवम्बर / बाल दिवस पर विशेष

राजेश कश्यप

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता सर्वप्रथम वर्ष 1934 में महसूस की गई और जेनेवा घोषणा के तहत बाल अधिकार सुनिश्चित किए गए। इसके उपरांत बच्चों के सर्वांगीण विकास और उनके हितों के रक्षार्थ संयुक्त महासभा द्वारा 20 नवम्बर, 1989 को बाल अधिकार सम्मेलन में तीन भागों में 54 अनुच्छेदों के साथ महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए। भारत ने 12 नवम्बर, 1992 को इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करके अपनी स्वीकृति दे दी थी। इस समय दुनिया के 191 देशों द्वारा यह प्रस्ताव स्वीकृत किया जा चुका है। ये प्रस्ताव बच्चों के लिए ‘पहली पुकार के सिद्धान्त’ पर आधारित हैं किसी भी स्थिति में संसाधनों के आवंटन के दौरान बच्चों की अनिवार्य जरूरतों को सर्वाधिक प्राथमिकता दी गई है। इनमें बच्चों के सुकुमार बचपन एवं सम्मान को ध्यान मे रखते हुए बच्चों के चार मौलिक अधिकार जीने का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार, विकास का अधिकार और विकास का अधिकार शामिल किए गए हैं।

सबसे पहले वर्ष 1952 में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बाल-दिवस मनाने का निर्णय लिया गया था और अक्टूबर, 1953 में पहली बार एक दर्जन से अधिक देशों ने ‘बाल-दिवस’ मनया, जिसका आयोजन अन्तर्राष्ट्रीय बाल-संघ ने किया था। सन् 1954 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने बाल-दिवस मनाने का प्रस्ताव स्वीकार किया। आज 160 से अधिक देश प्रतिवर्ष बाल-दिवस मनाते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय बाल-दिवस दिसम्बर में मनाया जाता है, लेकिन भारत में प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन 14 नवम्बर को बाल-दिवस मनाया जाता है। राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘बाल-दिवस’ मनाने का मुख्य उद्देश्य बच्चों की आवश्यकताओं और अधिकारों के प्रति सरकार और जनता का ध्यान आकृष्ट करना है।

बच्चे ‘कल के कर्णधार’ और ‘कल का भविष्य’ होते हैं। यदि बच्चे स्वस्थ, सुशिक्षित, प्रतिभावान और सर्वांगीण विकास से ओतप्रोत होंगे तो, निश्चित तौरपर वे आने वाले समय में हमारे सच्चे और सशक्त कर्णधार साबित होंगे। लेकिन, जो बच्चे सर्वांगीण विकास एवं मूलभूत सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं, उनका भविष्य किसी भयंकर अभिशाप से भी बदतर होता है। विडम्बना का विषय है कि बहुत बड़ी संख्या में कल के कर्णधारों आज मझदार में फंसे हुए हैं, अर्थात वे भूख, गरीबी, बीमारी, निरक्षरता, शोषण, यौनाचार जैसी भयंकर समस्याओं के भंवर-जाल में फंसकर अभावग्रस्त और अभिशप्त जीवन जीने का बाध्य हैं। यदि ऐसे बच्चों से सम्बंधित आंकड़ों पर गौर किया जाए तो भयंकर सिहरन पैदा हो उठती है।

यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 8 करोड़ 30 लाख बच्चे कुपोषित जीवन जीने को बाध्य हैं। इससे बड़ा चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इनमें अकेले भारत के 6.1 बच्चे शामिल हैं, जोकि देश की कुल जनसंख्या का 48 प्रतिशत बनता है। यह पड़ौसी देश पाकिस्तान (42 प्रतिशत) और बांग्लादेश (43 प्रतिशत) से भी अधिक है। केवल इतना ही नहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ो के अनुसार ऐसे बच्चे जिनका विकास अवरूद्ध हो चुका है, उनमें 34 प्रतिशत बच्चे भारत में है। रिपोर्ट के अनुसार देश में मध्य प्रदेश, बिहार और झारखण्ड में सर्वाधिक कुपोषित बच्चों की संख्या है।

अंतर्राष्ट्रीय आंकड़े बताते हैं कि भूख, गरीबी, शोषण, रोग तथा बाल-दुव्र्यवहार, प्राथमिक स्वास्थ्य व शिक्षण सुविधाओं के मामले में भारत की हालत अत्यन्त दयनीय है। ‘द स्टेट ऑफ वल्डर््स चिल्ड्रन’ नाम से जारी होने वाली यनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक 5 वर्ष की उम्र के बच्चों के मौतो के मामले में भारत विश्व में 49वाँ स्थान है, जबकि पड़ौसी देशों बांग्लादेश का 58वाँ और नेपाल का 60वाँ स्थान है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष लगभग 2.5 करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं और प्रति 1000 बच्चों में से 124 बच्चे 5 वर्ष होने के पूर्व ही, जिनमें से लगभग 20 लाख बच्चे एक वर्ष पूरा होने के पहले ही मौत के मुँह में समा जाते हैं। ये मौतें अधिकतर कुपोषण एवं बिमारियों के कारण ही होती हैं।

एक अन्य अनुमान के अनुसार 43.8 प्रतिशत बच्चे औसत अंश के प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण के शिकार हैं और 8.7 प्रतिशत बच्चे भयानक कुपोषण के शिकार हैं। देश में लगभग 60 हजार बच्चे प्रतिवर्ष विटामीन ‘ए’ की कमी के साथ-साथ प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण के चलते अन्धेपन का शिकार होने को मजबूर होते हैं। इसके साथ ही पिछले कुछ समय से बच्चे बड़ी संख्या में एड्स जैसी महामारी की चपेट में भी आने लगे हैं। वर्ष 1996 में 8 लाख 30 हजार बच्चे एड्स के शिकार मिले और एड्स के कारण मरने वाले 3.5 लाख बच्चों की उम्र पन्द्रह वर्ष से कम थी।

देश में मातृ-मृत्यु दर के आंकड़े भी बड़े चांैकाने वाले हैं। यूनिसेफ के अनुसार वर्ष 1995-2003 के दौरान भारत में प्रति लाख जीवित जन्मों पर 540 मातृ-मृत्यु दर थी। रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में प्रतिवर्ष लगभग 5.30 लाख माताएं प्रसव के दौरान मर जाती हैं और भारत में लगभग एक लाख माताएं प्रसव के दौरान प्रतिवर्ष मृत्यु का शिकार हो जाती हैं। लगभग 90 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी का शिकार होती हैं और 56 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं अपने गर्भावस्था के तीसरे चरण में आयरन की कमी से ग्रसित होती हैं।

यह भी बड़ी विडम्बना का विषय है कि दुनिया में भारत देश में ही सर्वाधिक बाल मजदूरों की संख्या सामने आई है। योजना आयोग के एक आकलन के अनुसार भारत में सन् 2000 में लगभग 2 करोड़ बाल मजदूर थे। देश के लिए सबसे बड़ी शर्मनाक बात तो यह सामने आई कि लगभग 5 लाख मासूम बच्चे मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली, हैदराबाद, कानपुर , चेन्नई जैसे महानगरों में सडक़ों पर ही जीवन जीने को बाध्य हैं।

शिक्षा के मामले में भी देश में बच्चों की स्थिति बेहतर नहीं है। आंकड़े बतलाते हैं कि देश की 40 प्रतिशत बस्तियों में तो स्कूल ही नहीं हैं और देश के लगभग 48 फीसदी बच्चे प्राथमिक स्कूलों से अछूते हैं। केवल इतना ही नहीं, देश में 6 से 14 साल की लड़कियों में से 50 प्रतिशत स्कूल बीच में ही छोडऩे के लिए बाध्य होती हैं।

भारत में बाल अपराधों के मामलों में भी तेजी से इजाफा होता चला जा रहा है। बच्चों के बीड़ी, सिगरेट, शराब, चोरी, झूठ, मार-पिटाई, कत्ल, स्कूल से गायब होना, वाहन चोरी, मोबाईल चोरी, अपहरण जैसे अपराधिक मामलों में बच्चों की भारी संख्या में उपस्थिति दर्ज हो रही है। सन् 1991 में कुल 29,591 बाल-अभियुक्त विभिन्न अपराधों के दोषों के तहत विवेचित किए गए, जिनमें 23,201 लडक़े और 6,390 लड़कियां शामिल थीं। इनमें अधिकतर बाल-अभियुक्त सेंधमारी, चोरी, दंगा, मद्यपान, जुआ और आबकारी के आपराधिक मामलों में संलिप्त थे। वर्ष 2007 में कुल 34,527 बाल-अपराध मामले दर्ज हुए, जिनमें 32,671 लडक़े और 1,856 लड़कियां शामिल थीं।

देश में बाल शोषण के तेजी से बढ़ते मामले भी बेहद चौंकाने लगे हैं। मार्च, 2007 में गठित राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को प्राप्त शिकायतों के तहत वर्ष 2007-08 में 35, वर्ष 2008 में 115 और वर्ष 2009-10 में कुल 222 मामले प्रकाश में आए। सबसे बड़ी ह्दयविदारक तथ्य यह है कि देश में बड़ी संख्या में मासूम बच्चों का यौन शोषण जैसे भयंकर अत्याचार का सामना भी करना पड़ता है। समाजशास्त्रियों के अनुसार बालक और बालिका श्रमिकों का यौन-शोषण मालिकों, ठेकेदारों, एजेन्टों, सहकर्मियों, अपराधियों आदि द्वारा इसीलिए किया जाता है, ताकि वे उनके अन्दर इस कद्र भय पैदा हो जाए, जिससे वे किसी भी तरह के शोषण के खिलाफ आवाज ही न उठा सकें। नेशलन क्राइम रिकाडऱ्स ब्यूरों द्वारा वर्ष 1991 में प्रकाशित अपराध के आँकड़ों के अनुसार 10,425 बच्चों को बलात्कार का शिकार होना पड़ा था।

देश में बाल कन्याओं पर होने वाले अत्याचार तो रूह कंपाने वाले हैं। ‘स्टेटिस्टिस्टिक्स ऑन चिल्डे्रन इन इण्डिया (1996)’ के आँकड़ों के अनुसार देश में सबसे ज्यादा शिशुओं की हत्या महाराष्ट्र (37.4 प्रतिशत) में, इसके बाद बिहार (17.6 प्रतिशत) व मध्य प्रदेश (14 प्रतिशत) होती हैं। इनमें मासूम बच्चियों की संख्या ज्यादा होती है। इसके साथ ही देश में होने वाली भ्रूण हत्याओं में भी कन्याओं की ही संख्या ज्यादा होती है। भू्रण हत्या के मामले में महाराष्ट्र (37.8 प्रतिशत) तथा मध्य प्रदेश (37.8 प्रतिशत) पहले स्थान पर और उसके बाद गुजरात (13.3 प्रतिशत) व राजस्थान (8.9 प्रतिशत) का स्थान था। अबोध बच्चियों की बिक्री के मामले में बिहार (33.5 प्रतिशत) पहले और उसके बाद महाराष्ट्र (21.8 प्रतिशत) व गुजरात (13.1 प्रतिशत) का स्थान था। वेश्यावृति के लिए होने वाली बच्चियों की बिक्री के मामलों में दिल्ली (44.2 प्रतिशत) पहले स्थान, इसके बाद आन्ध्र प्रदेश (23.5 प्रतिशत) व बिहार (13.7 प्रतिशत) का स्थान दर्ज हुआ।

सबसे बड़ी चांैकाने वाली बात यह है कि राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय बाल-श्रम उन्मूलन नीतियों की मौजूदगी में देश में गैर-कानून तरीके से बच्चों से जोखिमपूर्ण व खतरनाक उद्योगों एवं उत्पादन की प्रक्रियाओं में काम लिया जा रहा है, जिसके कारण वे नाना प्रकार की बिमारियों का सहज शिकार हो रहे हैं। मासूम बच्चे गरीबी व अन्य कई प्रकार की लाचारियों के चलते शीशा सम्बंधी कार्याे, ईंट भठ्ठा, पीतल बर्तन निर्माण, बीड़ी उद्योग, हस्तकरघा एवं पॉवरलूम, जरी एवं कढ़ाई, रूबी एवं हीरा कटाई, रद्दी चुनने, माचिस पटाखा उद्योग, कृषि उद्योग, स्लेट उद्योग, चूड़ी उद्योग, मिट्टी-बर्तन निर्माण, पत्थर एवं स्लेट खनन, गुब्बारा उद्योग, कालीन उद्योग, ताला उद्योग जैसे खतरनाक कायों में संलंग्र बाल-श्रमिक निरन्तर दमा, जलन, नेत्रदोष, तपेदिक, सिलिकोसिस, ऐंठन, अपंगता, श्वास, चर्म, संक्रमण, टेटनस, श्वासनली-शोथ, खाँसी, कैंसर, बुखार, निमोनिया जैसे रोगों का शिकार होने के साथ अन्य कई भयंकर दुर्घटनाओं के भी शिकार हो रहे हैं।

कुल मिलाकर कल के कर्णधारों का कटू सच यही है कि आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत देश में अधिकतर बच्चों की दयनीय व चिन्तनीय दशा बनी हुई है। बड़ी संख्या में बच्चे अत्यन्त अभावग्रस्त एवं अभिशप्त जीवन जीने के लिए बाध्य हैं। अनेक बच्चे दिहाड़ी, मजदूरी, बन्धुआ मजदूरी, होटल, रेस्तरां और घरों व दफ्तरों में चन्द रूपयों के बदले नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। देश में कई ऐसे बड़े-बड़े गिरोह सक्रिय हैं, जो बच्चों से जबरदस्ती अनैतिक, असामाजिक व आपराधिक काम करवाते हैं। जो बच्चे उनके इशारों पर काम नहीं करते, उन्हें अपंग तक बना दिया जाता है। फूटपाथी जीवन जीने वाले, रद्दी-कूड़ा बीनकर गुजारा करने वाले और भीख माँगकर रोटी खाने वाले बच्चों की त्रासदी तो रूह कंपाने वाली है। बहुत बड़ी संख्या में मासूम बच्चे अपने परिवार वालों की गरीबी, लाचारी और उपेक्षा के साथ-साथ अय्यासी, नशाखोरी व कामचोरी जैसी कई अन्य लतों का खामियाजा अपना अनमोल बचपन और भावी जीवन अंधकारमय बनाकर चुका रहे हैं।

हालांकि देश में बच्चों पर होने वाले अत्याचारों व शोषणों पर अंकुश लगाने के लिए कारखाना अधिनियम 1881, कारखाना (संशोधन) अधिनियम 1891, खान अधिनियम 1901, कारखाना (संशोधन) अधिनियम 1922, भारतीय खान अधिनियम 1923, खान (संशोधन) अधिनियम 1926, भारतीय बन्दरगाह (संशोधन) अधिनियम 1931, चाय जिला अप्रवासी अधिनियम 1932, बाल (श्रमिक बन्धक) अधिनियम 1933, कारखाना (संशोधन) अधिनियम 1934, खान (संशोधन) अधिनियम 1935, बाल नियोजन अधिनियम 1938, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, कारखाना अधिनियम 1948, बाल नियोजन (संशोधन) अधिनियम 1949, भारतीय संविधान (1950), बाल नियोजन (संशोधन) अधिनियम 1951, बागान श्रमिक अधिनियम 1951, खान अधिनियम 1952, बिहार दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम 1953, कारखाना (संशोधन) अधिनियम 1954, व्यापारिक जहाजरानी अधिनियम 1958, मोटर परिवहन कामगार अधिनियम 1961, एपे्रन्टिस अधिनियम 1961, बीड़ी एवं सिगार कामगार (नियोजन की शर्तें) अधिनियम 1966, बाल नियोजन (संशोधन) अधिनियम 1978, खतरनाक मशीन (विनियमन) अधिनियम 1983,, बाल श्रमिक (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम 1986 आदि के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के अनुरूप नियम एवं कानून लागू किए गए हैं, लेकिन उन पर गम्भीतापूर्वक अमल में नहीं लाए जाते, जिनके चलते ये बाल-स्थिति में सुधार होने के बजाय समस्या निरन्तर गम्भीर से गम्भीरतम होती चली जा रही है।

यदि सरकार व समाज गंभीरतापूर्वक अपने नैतिक, मानवीय व सामाजिक दायित्वों के निर्वहन करने के साथ-साथ कानूनों का भी भलीभांति पालन करे और कल के कर्णधारों का अच्छा भविष्य सुनिश्चित करने का संकल्प ले तो निश्चित तौर पर हमारेदेश व समाज का भविष्य भी अत्यन्त उज्ज्वल होगा। अन्यथा, हमारे यही कल के कर्णधार, कलयुग के कंस साबित हो सकते हैं। इसलिए हमें यह हर हाल में अपने कल के कर्णधारों को कलयुग के कंस बनने से रोकना होगा।

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1 Comment on "कलयुग के कंस न बन जाएं कल के कर्णधार"

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आर. सिंह
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कहाँ हैं ,कहाँ है ,जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहाँ हैं?

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