लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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आर. सिंह 

“अबे रूक. ”

कर्कश आवाज इतनी जोर से आयी थी कि उसे रूकना पड़ा. ऐसे वह जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहता था. क्योंकि डर उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी. उसने देखा भी था कि कुछ लोग रास्तें में खड़े थे, पर उसने ध्यान देने की आवश्यकता नहीं समझी थी. उसके बाल उलझे हुए और बेतरतीब थे. दाढ़ी भी बड़ी हुई थी. लगता था कि न बालों में कंघी की है, न बढे हुए दाढ़ी पर ही उसका ध्यान गया है. कुर्ते पैजामे में लिपटे इसके दुबले पतले शरीर को देखकर पता लगाना मुश्किल था कि वह किस मजहब या धर्म से सम्बन्ध रखता है. रूकने के बाद भी वह मुड़ना नहीं चाहता था, पर मुड़ना तो पड़ा ही, क्योंकि न जाने क्यों उसे लगा कि कर्कश आवाज अकेली नहीं है. मुड़ते ही उसने देखा कि वह तो खूंखार और खून के प्यासे शैतानों के बीच घिरा हुआ था.

“तू कौन है रे ? क्या नाम है तेरा?” उन्हीं शैतान चेहरे वालों में से किसी ने पूछा.

“स्वप्न”. ऐसा लग रहा था कि वह सचमुच भयानक सपना देख रहा था और उसी बीच उसके मुंह से आवाज निकली थी.

“तेरी माँ की. स्वप्न, स्वप्न क्या रे? साला,सपना देख रहा है क्या?”

वह बुरी तरह डर गया. उसे लगा कि घर तो निकट ही है. क्यों न दौड़ कर पहुँच जाये. पर उसे अब तक उन लोगों ने घेर लिया था. आसान नहीं था घेरे को तोड़ना. ऐसे वह अपने को बहुत साहसी मानता था, पर आज तो उसका साहस भी जबाब दे रहा था. न जाने यह कैसा संकट आ पड़ा था. उसके मुंह से आवाज नहीं निकली, पर उसने देखा कि सब प्रायः उसी के उम्र के है. पर उनके चेहरे. वे ऐसे भयानक नजर आ रहे थे कि उसका दिल यह मानने को तैयार नहीं था कि वे लोग इसी इसी दुनिया के वाशिंदे थे. वे तो उसे शैतानों की औलाद लग रहे थे. पूरी तरह हथियारों से लैस थे वे लोग. मरने मारने को तैयार.

” बेटे,कुछ तो नाम होगा तेरा?यह स्वप्न, स्वप्न क्या लगा रखा है? आगे तो कुछ बोल. ”

वह सोच रहा था कि अपने इस बाप को आगे क्या कहे. तब तक दूसरे की आवाज सुनाई पडी, “साला कटुआ लगता है. देखते नहीं किस तरह दाढी बढाए हुए है. जरूर कोई मुल्ला है. अब घिर गया है तो बहाना बना रहा है. ”

वह दहल उठा. इस कटुआ शब्द की गाली के साथ जुड़े हुए सत्य से वह पूर्ण परिचित था. पर वह अभी भी समझ नहीं पा रहा था कि इन शैतानों के चंगुल से वह कैसे निकले? तभी उसके मोहल्ले की ओर से हर हर महादेव का जोरों का नारा सुनाई दिया. वह दहल उठा. वह सरकारी क्वार्टर में अपने माता पिता के साथ रहता था. उस छोटे से सेक्टर में पहले ज्यादा हिन्दू कर्मचारी रहते थे, पर मुस्लिम कर्मचारियों की संख्या भी दूसरे सेक्टरों के अपेक्षा अधिक थी. फिर पता नहीं क्या हुआ, वहाँ धीरे धीरे मुस्लिम कर्मचारियों की संख्या बढ़ने लगी और हिन्दू कर्मचारी वहाँ से हटने लगे. उसको तो पता भी नहीं चला और वह इलाका मुस्लिम बहुल हो गया. उसका परिवार उन गिने चुने हिन्दू परिवारों में था, जो अभी तक वहाँ डटे हुए थे. पर अभी यह सब सोचने का अवसर तो उसके पास था नहीं. उसे तो अपने आपको इन दरिंदों से बचाना था. तुर्रा यह कि उनमे से कुछ चेहरों को वह पहचानता था. वे वहीं के गुंडे थे. वे अपने को हिन्दू कहते थे और उसका दिखावा भी बहुत करते थे. हो सकता हैं कि दूसरे अवसर पर शायद वे भी उसे पहचान पाते, पर आज तो सब पहचान मिटता हुआ नजर आ रहा था. उसने अपना नाम भी बता दिया था. वह अपने को उसी नाम से जानता था. उसे कुछ याद सा आ रहा था कि स्वप्न के आगे भी कुछ था. शायद सेनगुप्ता, दासगुप्ता , बनर्जी या चटर्जी, पर वह तो यह सब कब का भूल चुका था. उसे तो आज इनसे सुनकर ध्यान आया था कि वह हिन्दू है, पर हिन्दू होने का क्या प्रमाण है , उसे तो यह भी ज्ञात नहीं था. स्वप्न ने जबसे होश संभाला है,वह अपने को केवल एक इन्सान मानता था,न कम न ज्यादा.

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सबेरे सबेरे ही वह लाईब्रेरी चला गया था. लाइब्रेरी में पढने से ज्यादा वह शकुन की तलाश में जाता था. उस समय तो सब कुछ सामान्य था. सर्वत्र शान्ति थी. उसने जाते जाते निगाह डाली थी. लोग अपने अपने कार्यों में लगे हुए थे. लाइब्रेरी से निकला तो दिन ढलने ही वाला था. उसको तो पता भी नहीं चला कि इस बीच क्या हुआ है, उसने ध्यान नहीं दिया था. लाइब्रेरी धीरे-धीरे खाली होने लगी थी. जब वह निकला तो वह अकेला ही था. उसको आश्चर्य हुआ. ऐसा तो कभी नहीं होता था. हालाँकि सब उस जैसे लाईब्रेरी में समय बिताने वाले नहीं थे,पर पर प्रायः एक दूका लोग रहते ही थे. लाइब्रेरियन भी सबके बाद ही निकलता था, पर आज तो वह भी गायब हो चुका था. रह गया था,उसका यह सहायक. उसने पूछा था,”क्या बात है? इतना सन्नाटा क्यों है?

उसने बताया था,” शहर के दूसरे कोने में कुछ गड़बड़ी हुई है,शायद कुछ दंगा फसाद हुआ है,अतः लोग निकल गए हैं. मेरा घर तो पास ही है. आप भी तो पास ही रहते हैं. इधर तो कुछ है नहीं ,इसीसे मैं रूक गया था. अब मैं भी जल्दी से बंद करके निकल जाऊँगा. ”

वह थोडा सोचने पर मजबूर हुआ कि यह कैसे हो गया? यहाँ तो ऐसा कुछ होने की कोई उम्मीद नहीं है. फिर सोचा कि शायद छोटी मोटी कोई घटना घटी हो और अफवाह के कारण लोग भयभीत हो गए हों. यही सब सोचते सोचते वह बाहर निकल आया. पर बाहर निकलते ही उसे डर सा लगा उसे पता भी नहीं चल रहा था कि वह क्यों डर रहा है,फिर भी वह डर रहा था. वातावरण में कुछ् ऐसा अवश्य था, जो सामान्य नहीं था अजब की निस्तब्धता थी. एक गहरा सन्नाटा छाया हुआ था. अभी भी रोशनी थी, पर उसे तो अन्धेरा लगने लगा था. वह एक निर्भीक युवक था. अकारण ही डरने वाला नहीं था. पर आज निर्भीकता की जगह बेचैनी ने ले ली थी. न जाने क्यों कुछ अघटित के घटित होने की आशंका उसे परेशान कर रही थी. घर से पुस्तकालय की दूरी अधिक नहीं थी. वह अक्सर पैदल ही आता जाता था,पर आज उसे लगा कि रिक्शा मिल जाता तो अच्छा होता. पर रिक्शा की कौंन कहे, आदमी भी नहीं दिख रहे थे. वह तेज तेज क़दमों से पैदल ही घर की ओर चल पड़ा. वातावरण उसे परेशान कर रहा था, पर अब तो वह घर के निकट पहुँच रहा था.

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आवाज गूंजी, “अबे तुम लोग चुपचाप क्यों खड़े हो?” बोलने वाला शख्स शायद उन लोगों का सरगना था. मन किया उसका कि नजर उठा कर देखे ,पर हिम्मत नहीं हुई. इसी बीच किसी ने उसपर छुरे से वार किया. उसने बाजू उठा कर रोकने का प्रयत्न किया. बाजू से खून की धारा निकल पडी. ,पर दूसरा वार होता,इससे पहले ही, न जाने क्यों, उनमें से एक बोला,” यार कहीं यह हिन्दू ही न हो. नाम तो किसी बंगाली का लगता है,पर ”

“यार. साला बंगाली होता तो नाम के आगे कुछ तो होता. “फिर वह स्वप्न की ओर मुड़कर बोला, “अबे बता तो सही कि तुम बनर्जी ,चटर्जी, दासगुप्ता, सेनगुप्ता, क्या हो?”

वह उन लोगों को क्या बताता? उसे तो स्वयं याद नहीं था कि वह क्या है? उसकी चुप्पी उन लोगों को असह्य हो रही थी. स्वप्न तो अब डर से कांपने लगा था. बाजू से निकलते खून से उसे कमजोरी भी महसूस हो रही थी.

तभी उसे एक आवाज सुनाई पडी. उन्ही में से कोई बोल रहा था, “साले के कपडे उतार डालो. अपने आप पता चल जाएगा. ”

स्वप्न को पता नहीं चल रहा था कि यह क्या बहशीपन है? कौन है ये सब? ये तो जानवर भी नहीं लग रहे हैं, क्योंकि जानवर भी ऐसा व्यवहार नहीं करते. आखिर इनका नस्ल क्या है? मन ही मन वह सोच रहा था कि आखिर कोई इनसे पूछता क्यों नहीं. उसको अब पक्का विश्वास हो गया था कि आज इन हैवानो के हाथों उसकी मौत निश्चित है. ऐसा विचार मन में आते ही गजब की शान्ति उसके दिलों दिमाग पर छा गयी.

उसी में से कोई चिल्ला रहा था, ”यार जल्दी से इसका काम निपटा,नहीं तो यहाँ भी गश्ती दल आ पहुंचा तो साला निकल जाएगा.”

वह जानता था कि अगर उसके कपडे खोल दिए गए तो वह नहीं बच सकता. वह मन ही मन प्रार्थना करने लगा कि कोई तो आ जाए, जो उसको बचा ले. दूर से बहुत सी आवाजें भी उसके कानों तक पहुँचने लगी थी, पर निकट में तो केवल वे लोग थे.

उन्होंने उसके कपडे़ खीचने शुरू किये. अब उसका पैजामा खुल चुका था, अंडरवीयर भी खुलने ही वाला था. उसने अपना पूरा जोर लगा दिया ,जिससे वे अंडरवीयर न खोल सकें, पर चार-चार लगे हुए थे उसके कपडे़ उतारने में अकेला वह क्या करता? अंत में उन लोगों की जीत हुई और अब वह उन दरिंदों के बीच नंगा खड़ा था. उस पर नजर पड़ते ही वे चिल्ला उठे, “साला कटुआ?अपने को हिन्दू बता रहा था. इसको मालूम नहीं कि हमारी नज़रों से छिपना इतना आसान नहीं है. ”

फिर तो क़यामत आ गई उसको सफाई देने का भी अवसर नहीं मिला कि उसका वास्तव में खतना नहीं हुआ है. वहाँ संकर्मण के कारण ऊपर का हिस्सा आपरेशन करके हटाना पड़ा था. अपने शिकार को बुरी तरह रौंद कर वे सब आगे बढ़ गए, स्वप्न मदद के लिए भी चिल्लाया था, पर जब तक कोई आता ,तब तक वे अपना काम करके जा चुके थे. जो लोग वहां पहुंचे वे स्वप्न को पहचानते थे. उन्हें उसके घायल किये जाने पर आश्चर्य भी हुआ, पर खून से लथपथ शरीर में उसकी वह निशानी दृष्टिगोचर नहीं हो रही थी, जो इसके इस अवस्था का कारण बनी थी. उन्होंने उसके शरीर को ढंकने का प्रयत्न किया. गस्ती दल बाद में पहुंचा और उसे वे लोग मरणासन्न अवस्था में अस्पताल ले गए.

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दूसरे दिन समाचार पत्र में इसका विस्तृत समाचार इस तरह प्रकाशित हुआ था.

कल दोपहर को शहर के एक हिस्से में एक छोटी बात पर दो समुदायों के बीच मारकाट शुरू हो गयी,जब तक पुलिस हरकत में आती, तब तक दोनों समुदायों के चार पांच व्यक्ति मारे जा चुके थे और दर्जनों घायल हो गए थे. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए शहर के उस हिस्से में कर्फ्यू लगा दिया गया था.

शाम होते-होते शहर के दूसरे भाग में भी इसका असर दिखाई दिया,जहाँ एक समुदाय के चार व्यक्तियों की हत्या हो गयी. तब तक गस्ती दल वहाँ भी पहुंच गयी. वहां दूसरे समुदाय का केवल एक व्यक्ति बुरी तरह घायल हुआ था और मरणासन्न अवस्था में पड़ा था. उसे अस्पताल पहुंचाया गया, पर वहाँ उसने दम तोड़ दिया.

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13 Comments on "खतना"

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RTyagi
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कहानी अच्छी थी… और अपना सन्देश देने में सफल हुई… पात्र किसी भी धर्म संप्रदाय के हो सकते थे… “छोटी मानसिकता” किसकी है.. अब यह कहने की ज़रुरत नहीं है… बुजुर्गो और बड़ो से किस तरह बात की जाती है.. यह सीखना पहले ज़रूरी है..

आर सिंह जी, कहानी के लिए धन्यवाद्… प्लीज keep writing.

Thanks,

RTyagi
Guest

कहानी अच्छी थी… और अपना सन्देश देने में सफल हुई… पत्र किसी भी धर्म संप्रदाय के हो सकते थे… “छोटी मानसिकता” किसकी है.. अब यह कहने की ज़रुरत नहीं है… बुजुर्गो और बड़ो से किस तरह बात की जाती है.. यह सीखना पहले ज़रूरी है..

आर सिंह जी, कहानी के लिए धन्यवाद्… प्लीज keep writing.

Thanks,

इक़बाल हिंदुस्तानी
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कहानी झूठी या सच्ची नही होती वेह एक संदेश देने के लिए होती है. आर सिंह जी की कहानी इस मकसद में कामयाब है. पात्र बदलने से भी वही संदेश जायेगा जो वे देना चाहते हैं.

मुकेश चन्‍द्र मिश्र
Member

आर सिंह जी धारा के विपरीत बहना अच्छी बात है किन्तु वहां आप सिर्फ अपनी जिन्दगी को खतरे में डालते हैं दूसरी तरफ आपने जो अपनी कहानी के पात्रों का इकतरफा चरित चित्रण किया है उससे आपने पूरे हिन्दू समाज को ही दोषी सिद्ध करने का प्रयास किया है जो किसी भी स्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता, वो भी अभी हाल ही में हुए कोसी (मथुरा) के दंगों को देखते हुए तो बिलकुल भी नहीं जिसमे हजारों हिन्दू बर्बाद हो गए हैं….

आर. सिंह
Guest

मुकेश जी अभी आप युवा हैं.कुंठा से ग्रस्त होना क्या होता है,इसे समझने में आपको देर लगेगी.रह गयी बात मेरी तो अपने बारे में मैं कुछ नहीं कहता.जो कहना होता है,उसे मैं प्रवक्ता,फेसबुक,ट्विट्टर और देशी विदेशी पत्रों में टिप्पणियों के माध्यम से कहता हूँ.आपके टिप्पणी के पहले मेरी जो टिप्पणी है ,उसको शायद आपने पढ़ा नहीं .
रह गयी. प्रसिद्धि पाने की बात ,तो उसकी इच्छा कभी नहीं रही.हाँ यह अवश्य है की धारा के साथ बहने को मैं जिन्दगी नहीं मानता.

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