लेखक परिचय

फखरे आलम

फखरे आलम

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-फखरे आलम-

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कोसी की गोद में, जन्मा, पला बढ़ा, खेलाकुदा और अपने जीवन के 42वें पड़ाव की बहार देख चुका हूं। अपने जीवन के सुनहरे लम्हों को कोसी की तकलीफ देने वाली यादों को मन में सहेज रखा है। मेरा मन उस समाचार को पढ़कर शांत हआ और दिल को सुकून मिला, हमारी विदेश मंत्री ने दावा किया कि विगत दस बारह वर्षों से कोसी वासी जिस मुसीबतों से घिरे चले आ रहे थे, वह मुसीबतों के बादल अब घट गए हैं और विगत वर्षों की भांति इस वर्ष कोसीवासियों को दुख और समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ेगा- प्रधानमंत्री की नेपाल यात्रा के क्रम में, नेपाल सरकार ने ऐसा प्रधानमंत्री को आश्वासन दिया है। अर्थात पिछली समस्याओं की जड़ हमारी अपनी सरकार थी। जिन्होंने नेपाल चीन की मदद से हिमालय में विस्फोट करता रहा और बिहार के एक बड़े भाग को तबाह करता रहा। बेशुमार जान और माल की क्षति हुई। इस तबाही में हमने बहुत सारे सगों को गंवाया। सुखद जीवन बिताने वाला मेरा परिवार पूनर्वास में कुटिया बनाकर 20 वर्षों से जीवन बिता रहा। सौ एकड़ का स्वामी कोसी के प्रकोप और हमारे देश की नीतियों के कारण आज दरबदर है। हमारे जैसे बेशुमार और अनगिनत का दर्द गिनाया नहीं जा सकता है। अगर इस तथ्यों में जरा भी सच्चाई है तो मोदी की सरकार धन्यवाद और बधाई की पात्र है। लोकसभा में कोसी क्षेत्र के प्रतिनिधियों को ठीक प्रकार से बोलने नहीं दिया गया और न ही उनसे ठीक तौर पर कोसी का पक्ष रखा गया। मगर कृषि मंत्री के द्वारा सरबारी पक्ष मजबूत था कि सरकार ने समय पर सहायता पहुंचाया। मगर मूल रूप से कोसीवासियों की मूलभूत समस्याओं के निदान के लिए सरकार स्थाई कदम उठाती तो क्षेत्रवासियों की दुआ और अधिक सरकार के साथ होती। जैसे कोसी के प्रकोप से स्थाई निदान, सम्पूर्ण क्षेत्रों का विकास, कोसी क्षेत्रों में बड़े स्तर पर सड़क और पुल का निर्माण, अच्छे स्कूल और कॉलेजों के साथ अस्पताल एवं कुछ केन्द्रीय प्रोजेक्ट की इन क्षेत्रों में स्थापना। बड़ा पुण्य लगेगा क्षेत्रा की जनता निराश है। रोजगार नहीं है। बड़े स्तर पर क्षेत्रों से पलायन होता है। मैंने अपने जीवन के 42वें बसंत का 20 वर्ष इसी भय में बिताया है। वर्ष का 6 माह यह क्षेत्रा जलमग्न रहता है। जैसे क्षेत्रा के लोग कैद होकर रह जाते हैं। सड़क और पुलों के न रहने से शहरों और बाजारों से सम्पर्क टूटा रहता है। स्थानिये लोगों को आवागमन पर समय और पैसों का नाहक बोझ रहता है। इस क्षेत्रा के पिछड़ेपन में कोसी का योगदान सबसे उफपर है और रहा सहा कसर केन्द्र और प्रदेश की सरकारों ने निकाल दिया है। इन क्षेत्रों को प्रतिनिध्त्वि देने वाले भी माशा अल्ला। इन क्षेत्रों में प्रतिभाओं की कमी नहीं। राजकुमार सिंह जन्मे यहीं पर जनप्रतिनिधि देने कहीं और चले गए।

मैंने अपना 20 वर्ष कोसी के आगोश में बिताऐ हैं- मुझे ठीक से स्मरण है कि कोसी के कोलाहल और भय के मध्य हम जैसे हजारों नहीं लाखों बच्चों का बपचन कुचल गया! लम्बे समय तक स्कूल की छुट्टी और पिफर दशहरा, दुर्गापूजा और हमारी बकरीद भय के मध्य कभी कभार ही उत्साह के माहौल में मना होगा। किसी वर्ष पानी उतरने, अथवा किसी वर्ष बाढ़ के भय में जैसे तैसे इन त्यौहारों को समेट लिया जाता था। स्मरण है कि कोसी के मुख्य दोनों बांधें के आगे स्पर और रिंग बांध कर घेरा होता था। जिसके सुरक्षाचक्र से बांध को सुरक्षा कवच प्रदान किया जाता था। पूरे वर्ष कोसी बांध् के आसपास चहल पहल का माहौल रहता था। अस्थाई बस्ती, दुकानें न जाने क्या क्या था। वर्ष भर ट्रकें पत्थर लेकर आया करती और बांध जैसे हाइवे दिखता था। चीफ इंजिनियर के आगमन पर मंत्रियों और बाहुबलियों के काफिलों जैसा समा होता। बांध पर एक स्थान विशेष भर के लिऐ चौकीदार और उससे ऊपर वोट सरकार होते, जूनियर इंजिनियर की जीप का रोब होता था। जगह जगह स्पर स्पर पर पत्थर लगाते मजदूर और पास बने अस्थाई बस्तियां और दुकानों में रोनक देखने योग्य था। रात के समय चौकीदार और वोट सरकार चौकस रहते साथ में बड़े और छोटे ठेकेदार का अपना अलग रोब और रूबा था। क्या मजाल है- कोई कोसी के एक डेले को छू ले। कोसी भी अपना स्थान बदलते कई बार सोचती होगी। कोसी को काबू में रखने की प्रक्रियाओं कई करोड़ पति और कईयों खाक पति हो गऐ। कोसी प्रोजेक्ट पर अनियमितताओं और भ्रष्टाचार का आरोप लगा कर घोटालेबाजों और बेइमानों ने प्रोजेक्ट ही बन्द करवा दिया और मानो एक प्रकार से कोसी क्षेत्रों को बयाबान और बंजर बना दिया। कोसी की यह दशा करने वाले स्वयं भ्रष्टाचार और घोटालों में कई बार जेल गए।

बाढ़ प्रभावित और क्षेत्रों के लिऐ केन्द्र और राज्य सरकारों की ओर से बड़ी राहत और सहायता दी जाती थी। समय से पूर्व नाम और नाविकों की व्यवस्था की जाती थी। आपातकाल स्थिति से निबटने के लिए बड़े से बड़े अधिकारी और मुखियाओं की टोली तत्पर रहती थी। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से आयातित और विश्व खाद्य संगठनों के द्वारा बड़े स्तर पर सुखे दूध के पाउफडर वितरित किऐ जाते थे। गरीब से गरीबों के घर मैंने बोरी में भरा दूध का पाउडर देखा था। सड़े गले और कीड़ा लगे मुंगफलियों के दाने मुफ्त वितरित किए जाते थे। स्कूलों में वर्षों भर यह दाने दिए जाते थे। गेहूं बड़े स्तर पर रिलिफ के रूप में दिए जाते थे। अब हमें पता चला यह सब व्यय व्यर्थ के थे। सभी पैसों को एकमुश्त में नेपाल सरकार को सहायता के नाम पर दिए जाते रहेंगे तो कोसी नदी में बाढ़ आएगा ही नहीं।

बड़े स्तर पर लोग मच्छलीपालन से जुड़े थे। नजर उठाओ कहीं न कहीं मछली पकड़ते एक विशेष जाति के लोग दिखाई पड़ते थे। रोजगार के घटते अवसर और आवश्यकता की बढ़ती समस्याओं के चलते सब कुछ समाप्त हो गया। कोसी का बहुत बड़ा भाग तबाह व बर्बाद कर दिया गया। न तो राज्य का कोई प्रोजेक्ट लगा और न ही केन्द्र का। अगर कोई घोषणा भी हुई तो नाम मात्रा के लिए। सभी सरकारों के कार्यकाल में कोसी का यह उपजाउफ प्रदेश अपेक्षित और नजरअंदाज रहा। रेल जो इस स्थान की लाइफ लाइन है अभी पूर्णतः बड़ी लाइन में परिवर्तित भी नहीं हुआ। दोहरीकरण और आधुनिकीकरण तो बड़ी दूर की बात है। न कोई अच्छा स्कूल और कॉलेज है न कोई आधुनिक अस्पताल। जाति र्ध्म की राजनीति क्षेत्रा को तबाही की जंजीर में जकड़े हुए हैं। क्षेत्र के अधिकांश भागों में बाहुबलियों उनके परिवार अथवा जातिगत आधर पर लोग चुनाव जीतते हैं। ऐसी स्थिति में विकास के लिए कौन संघर्ष करेगा, ऐसी बात भी नहीं है कि कोसी के इन क्षेत्रों ने अच्छे, ईमानदार लोगों को पैदा करना बंद दिया है। मगर इस जातिगत दलदल में अच्छे और ईमानदारों की कदर नहीं है। संभावना क्षेत्रा में बहुत है जैसे मत्स्यपालन, मखाना उद्योग, पटसन उद्योग, धन और गेहं के साथ दलहन और तेलहन का बड़ा पैदावार करने वाला क्षेत्रा। छोटे और बड़े व्यापारियों, जमाखोरों की गिरफ्रत में है, सीधे तौर पर न तो खरीददार है न बाजार। सरकारी खरीदारी का आलम आप और हम को पता है। किसानों और कामगारों ने खेती करना छोड़ पलायन करना उचित समझा। कोसी क्षेत्र की बहुत सारी यादों में से कुछ इस प्रकार है।

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1 Comment on "कोसी – कुछ यादें, कुछ बातें!"

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हिमवंत
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जल संशाधन हमारे लिए वरदान है, लेकिन आज यह अभिशाप बना हुआ है । कौन है दोषी इसके लिए ? जब भी जल संशाधनो के व्यवस्थापन की बात चलती है, नेपाल के छद्म राष्ट्रवादी और भारत मे मेघा पाटकर सरीखे लोग विरोध शुरु कर देते है । भारत में अटल जी के समय बाढ की समस्या से छुटकारा पाने के लिए नदीयों को जोडने की बात चली थी तो मेघा पाटकर नेपाल पहुंच गई और लोगो को भारत की योजना के विरुद्ध भडकाने लगी । नेपाल मे भारत जब भी तटबन्ध निर्माण या मरम्मत की कोशिश करता है तो नेपाल… Read more »
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