लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

Posted On by &filed under राजनीति.


shindeप्रमोद भार्गव

 

जब किसी प्रजातांत्रिक देश के शासक प्रशासनिक लगाम लगाने में कमजोर साबित होते हैं,तो वे समाज को जाति और धर्म के खानों में बांटने की मुहिम में लग जाते हैं। नाकामियों के बावजूद ऐन-केन-प्रकारेण सत्ता में बन रहने की हसरत, बांटने की इस राजनीति को और ज्यादा बढ़ावा देने का काम करती है। देश के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे द्वारा राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लिखी चिटठी से कुछ ऐसे ही संकेत निकल रहे हैं। आतंकवाद के खिलाफ कार्रवार्इ के बहाने चिटठी में लिखा है कि बेगुनाह मुस्लिम युवाओं को आतंकवाद के नाम पर अनुचित तरीके से परेशान किया जाता है और हिरासत में रखा जाता है। लेकिन यदि ऐसा हो रहा है तो क्या मुस्लिम युवकों के ही साथ हो रहा है?क्या नक्सल और माओवाद के बहाने भोले-भाले आदिवासियों के साथ यही सब नहीं हो रहा है?किश्तवाड़ में हिंदुओं के साथ क्या हुआ ? अखिलेश और मुलायम के उत्तर प्रदेश में तो वोट की राजनीति के चलते खुला पक्षपात सामने आ रहा है ?क्या गृह मंत्री ने इस पर अंकुश लगाने की कवायद की ? उत्तर है, नहीं। दरअसल उस हरेक पीडि़त को भारतीय नगरिक की दृष्टि से देखने की जरूरत है,जो बेगुनाह है। उसे मुस्लिम,हिंदु या आदिवासी दृष्टि से देखा जाना समुदायों के बीच विभाजक रेखा खींचने जैसी हरकत है,जिससे सरकारों को बचने की जरूरत है।

सांप्रदायिक आतंकवाद का वास्ता सीधे-सीधे धर्म से नहीं होता है,लेकिन अंतत;उसकी आंतरिक बुनाबट का आधार धर्म ही होता है। इसीलिए परस्पर भिन्न सांप्रदायिक ताकतों को एक-दूसरे से ही उर्जा मिलती है। धर्म आधारित यह सांप्रदायिकता जब तय उद्देश्य साधने में नाकाम होती है तो अपने ही धर्मावलंबियों की उस जमात से टकराने लग जाती हैं,जो उसी धर्म से उपजी शाखाएं हैं। आज पकिस्तान में जो आतंकवाद पनप रहा है,वह इसी जड़ मानसिकता का विस्तार है। लिहाजा यहां आतंकवाद के शिकार केवल हिंदू और र्इसार्इ ही नहीं हैं,सुन्नी,षिया और अहमदिया मुसलमानों के बीच भी टकराव है। खुर्शीद अनबर ने अपने एक लेख में लिखा है,जब भी पाकिस्तान की सीमा के अंदर आतंकवाद जोर पकड़ता है,उसकी परछाइर्ं हिंदुस्तान पर पड़ने लगती है। र्इसाइयों पर हमला हो तो भी एक सोच मजबूत होने लगती है कि कातिल हैं तो आखिर मुसलमान ही ? जबकि यह सोच ही सिरे से गलत है। क्योंकि सारे आतंकवादी संगठन वहाबी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं,बांकि किसी अन्य मुस्लिम समुदाय से नहीं। यही बहाबी संगठन पूरी दुनिया में आंतकवादी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। ऐसे में जब ये संगठन भारत की सीमा में घुसकर रक्तपात करते हैं तो चाहे उसमें मुसलमान भी बराबर मारे जाएं,बावजूद मुसलमान पर ही शक की लकीर खिंच जाती है।

यदि वाकर्इ आतंकवाद की जड़ में एक उपधर्म बहावी’ धर्म के आंतकवादी हैं और इनके नेतृत्व का केंद्र सउदी अरब है तो भारत में इस फर्क को प्रचारित करने की जरूरत है। इस बात का इलहाम, इस्लाम के उन मुल्ला,मौलवियों और बुद्धिजीवियों को कराने की जरूरत  है,जो पंथों में बंटे इस्लाम की बारिकियों की समझ रखते हैं ? क्योंकि आयातित आतंकवाद पर अंकुश लगाने का यह एक व्यावहारिक तरीका होगा। और यदि किशोर एंव युवा मुस्लिमों में उपधर्मों की सोच विकसित होगी तो एकाएक वे आतंकी मंशा को विस्तार देने में लगे शैतानों की गिरफत में नहीं आएंगे। क्योंकि आतंकी घटनाओं को अंजाम तक पहुंचाने के लिए आखिरकार अपरिपक्व मानसिकता के युवाओं को ही इस्तेमाल करते हैं। ये युवक टोलियों में भी हो सकते हैं,ऐसे में यदि आतंकी घटना में संलिप्त कोर्इ एक युवक पुलिस के हाथ आता है तो वे पूरी टोली के युवाओं के नाम पुलिस को बता देते है और इस बिना पर पुलिस बेगुनाह मुस्लिम युवाओं को भी हिरासत में ले लेती है।

शायद जेल में बंद ऐसे ही मुस्लिम युवाओं को हिरासत से मुक्ति की भावना सुशील कुमार शिंदे की रही हो ? लेकिन पुलिस का यह बर्ताव क्या मुस्लिम युवकों तक ही सीमित है ? नहीं, इसका विस्तार नक्सलवाद बनाम माओवाद के बहाने निर्दोष आदिवासियों को हिरासत में लेने का भी  है। जब शासन-प्रशासन आतंकवाद हो या नक्सलवाद,इनके नियंत्रण में नाकाम रहते हैं तो दो पूरक बातें एक साथ आगे बढ़ती हैं। पहली, मघ्यप्रदेश में कुछ समय पहले खबर आर्इ थी कि प्रदेश में आदिवासी छात्रों को नक्सली बनाने की मुहिम चल रही है। गुप्तचर संस्थाओं की इस खबर ने पुलिस और सत्ता के होश उड़ाए हुए है। नक्सल प्रभावित आठ जिलों सीधी,सिंगरौली,मंडला,डिंडोरी,बालाघाट, अनूपुर,उमारिया और षडहोल में रहने वाले आदिवासी छात्रों को नक्सली अपने बेड़े में शामिल करने को उतावले हैं। इनका लक्ष्य दसवीं और बारहवीं कक्षाओं में पढ़ने वाले किशोर छात्र हैं,जिन्हें जातीय शोषण का पाठ पढा़कर नक्सली बनाया जाना कमोबेश आसान काम है। इस आशंका को इसलिए भी बल मिला,क्योंकि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेताओं पर हुए नक्सली हमले में देखा गया  कि नक्सलियों की फौज में युवाओं के साथ किशोर भी शामिल हैं। मसलन ऐन-केन प्रकारेण नक्सली युवाओं को अपनी जमात में शामिल करने में कामयाब हो रहे हैं। नक्सली बनाने की मुहिम में पुलिस को यदि किसी युवक पर संदेह होता है तो वह उसे सभी संगी-साथियों को बेवजह पूछताछ के बहाने हिरासत में ले लेती है। इसी समस्या के साथ पुछताछ के बहाने हिरासत में ले लेती है।

अब दूसरा पहलू देखीए,इंडियन पुलिस जनरल के एक अंक में आयुक्त श्रेणी के पुलिस आधिकारी सत्यपाल सिंह ने लिखा हैं कि नक्लवाद की समस्या पर काबू पाने के लिए माओवादियों को शरण और भोजन देने वाले ग्रामीणों पर सामूहिक जुर्माना लगाने व गांव के संरपचों व बुजुर्गों की जिम्मेबारी तय किए जाने के साथ ही नक्सल प्रभावित इलाकों में कर्फयु लगाने के सुझाव दिए हैं। इस समस्या के लिए ग्रामीणों की तटस्था भी जिम्मेबार है’। नक्सल क्षेत्र में तैनात इस मानसिकता के आधिकारी बेगुनाह ग्रामीणों पर कितना कहर ढहा रहे होंगे इसकी कल्पना करना भी मुमकिन नहीं है। वैसे भी नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ में पुलिसिया आतंक कितना भयावह है,इसकी बानगी के लिए माओवाद के बहाने प्रताडि़त की गर्इ आदिवासी महिला सोनी सोरी का उदाहरण काफी है। सोनी सोरी के जेल में बंद रहने के दौरान उसे निर्वस्त्र जमीन पर लिटाया जाता था। भूखा रखा जाता था। उसके नाजूक अंगो को छूकर हथियारों की तलाशी की जाती   थी। बाद में सर्वोच्च न्यायलय के हस्तक्षेप के चलते सोनी को निर्मम प्रताड़नाओं से मुक्ति मिली। दरअसल छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार के राज्य में आदिवासी अंचलों में पुलिस का दमन लगतार बढ़ रहा है। उसके निशाने पर माओवाद क बहाने वे सब लोग हैं,जो जल,जंगल और जमीन की लड़ार्इ लड़ रहे है। क्या ये बेगुनाह गृहमंत्री शिंदे को दिखार्इ नहीं देते ?

इसके साथ ही यह सवाल भी खड़ा होता है कि केंद्र उन पुलिस आघिकारियों के खिलाफ क्या कार्यवाही करने जा रही है,जो निर्दोषो को फंसाते हैं। दिल्ली पुलिस सीधे-सीधे केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन है। सवाल पूछा जा सकता है कि उन्होंने निर्भया कांड के दौरान एक पुलिसकर्मी की स्वाभाविक मौत को हत्या बताकर एक बेगुनाह युवक को हिरासत में ले लिया था। बाद में मीडिया द्वारा सच्चार्इ सामने लाने और अदालत के दखल के बाद उसे छोड़ दिया गया। क्या गृह मंत्रालय ने इस घटना के दोषी पुलिस वालों पर कोर्इ कार्रवार्इ की? जबाब हैं नहीं ? इसी साल केंद्र सरकार ने राज्यसभा को दी एक जानकारी में बताया था कि अप्रैल 2010 में मार्च 2011 के बीच देश में पुलिस हिरासत के दौरान 1574 लोगों ने दम तोड़ा। करीब 90 प्रतिषत मामलों में जांच का नतीजा कहता है कि मौत नैसर्गिक थीं या विचारघीन आरोपी ने खुदखुशी कर ली थी। लेकिन मानवाधिकार एशिया केंद्र द्वारा भारत में प्रताड़ना-2011 शीर्शक से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलिस हिरासत में हुर्इ ज्यादर मौतों की वजह प्रताड़ना है। हर दिन पुलिस और सैन्य बलों की हिरासत में चार लोगों की मौतें हो रहीं हैं। सरकार इन मौतों को रोकने की दृष्टि से सार्थक नीतियां अमल में लाएगी तो न बेगुनाह मुस्लिम पुलिस हिसासत में होंगे और न माओवाद के बहाने निर्दोष आदिवासियों को सताया जाना संभव होगा। गृह मंत्री को मुस्लिम नागरिक की बजाय,हरेक बेगुनाह भारतीय नागरिक की चिंता करने की जरूरत है,जिससे सांप्रदायिक और जातीय विभाजन की खाइ्रयां चौड़ी न हों और सरकार की किसी नर्इ नीतिगत पहल को तुष्टिकरण की दृष्टि से न देखा जाए । वैसे भी आरोपी को गुनहगार और गैरगुनहगर ठहराने का काम राजनीति का नहीं, अदालत का है। इस लिहाज से आतंकवाद के मसलों को धर्म से उपर उठकर देखने की जरूरत है।   जब नरेंद्र्र मोदी संतुलन के लिए सम्रग भारतीय नागरिकों के हित साधक की  नर्इ भूमिका में आ रहे हैं,तब कांगे्रस जैसे राष्ट्रीय दल का यह दायित्व और बढ़ जाता है कि वह देश के सामने समावेशी सोच को वाणी दे ?

Leave a Reply

1 Comment on "शिंदे ने लिखी विवाद की चिटठी"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
mahendra gupta
Guest

कांग्रेस का मुस्लिमों के प्रति वोट बैंक की खातिर प्रेम इससे साफ़ झलकता है, और उसे बहुसंख्यक वर्ग की चिंता नहीं,यही हाल उनकी विदेश नीति व देश में बनाये कानूनों से पता चलता है.पर वह यह भूल गयी है कि जातिगत समीकरण को भी इन दलों ने इतना प्रबल बना दिया है कि क्षेत्रीय दल खड़े हो गए कहीं यह न हो कि वह केवल मुसलमानों कि पार्टी बन कर रह जाये बाकि सामाजिक सौहार्द का तो बंटाधार अभी से चालू है ही.देश का मालिक भगवान ही होगा

wpDiscuz