लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

Posted On by &filed under आर्थिकी, राजनीति.


प्रमोद भार्गव

संसद में प्रधानमंत्री डा. मनमोहनसिंह ने ऐसा कुछ कहा ही नहीं जिससे संतुष्ट हुआ जाये। यदि कोयला घोटाले में कुछ गलत नहीं हुआ है तो फार्इलें गुम क्यों हुर्इं ? जाहिर है गायब हुर्इ फार्इलों में कुछ तो ऐसे रहस्य दर्ज हैं जिनके उजागर होने से सरकार में शामिल प्रधानमंत्री से लेकर अन्य मंत्रियों व अधिकारियों के चेहरों की हकीकत सामने आती। प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि सरकार के पास छिपाने को कुछ नहीं हैं और उसने कुछ भी गलत नहीं किया है। यह तो सब जानते हैं कि प्रधानमंत्री के पास देश में कोर्इ कोयले की खदान नहीं हैं, लेकिन 142 कोलखंडों का जो 2004-2009 के बीच आवंटन हुआ है उन पर यदि कैग ने उंगुली उठार्इ है और देश के राजकोष को 1.86 लाख करोड़ का नुकसान होना बताया है तो इस तथ्य को रेखांकित करने के लिए कैग को फार्इलों में कुछ न कुछ तो ऐसे तथ्य मिले होंगे, जिससे वह अपनी बात को प्रमाणित कर सकें। मनमोहन सिंह के चेहरे से र्इमानदारी का नकाव भले ही न उतरा हो लेकिन यह तो साबित हो ही चुका है कि उनके कार्यकाल में अब तक छोटे बडे कुल मिलाकर 80 से अधिक घोटाले हो चुके हैं और इन घोटालों की राशि 19 लाख करोड़ रूपये बैठती है। देश और सरकार का मुखिया होने के नाते क्या उनकी कोर्इ इन घोटालों के सिलसिले में जबावदेही अथवा नैतिक जिम्मेवारी नहीं बनती ?coal

केंद्र सरकार कोयले की कालिख मिटाने की उपाय, इस घोटाले से जुड़ी फाइलों को गायब करके करने में लगी है। लेकिन सरकार का यह भ्रम हैं कि फाइलें गायब होने से असलियत छिप जाएगी, इसके उलट अब सरकार की फजीहत संसद से सड़क तक हो रही है। जो फाइलें गायब हुर्इ हैं उनमें 45 कंपनियों के दस्तावेज नत्थी हैं। इस मसले से यह आशंका पुख्ता हुर्इ है कि सरकार कोल खण्ड आबंटन से जुड़े प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह को बचाना चाहती है। क्योंकि गायब हुर्इ फाइलें प्रधानमंत्री के उस कार्यकाल से जुड़ी हैं जब उनके पास कोयला मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार था। इसरो से जुड़े ऐटि्रक्स देवास मामले के बाद कोयला घोटाला ही ऐसा मामला है, जिनके बाहर आने के बाद गड़बड़ी के छीटें प्रधानमंत्री पर सीधे पड़े हैं।  कैग के बाद सीबीआर्इ भी अपनी रिपोर्ट में कोल खण्डों के आबंटन को सही ठहरा चुकी है। लिहाजा सरकार द्वारा प्रधानमंत्री को बचाया जाना लाजिमी था। इसीलिए गायब फार्इलों की अभी तक एफआर्इआर दर्ज नहीं करार्इ गर्इ है।

प्रधानमंत्री के कोयला मंत्री रहने के दौरान ये कोल खण्ड ऐसी कंपनियों को दे दिये गए जिनकी न तो कोर्इ बाजार में साख थी और न ही इस क्षेत्र में काम करने के अनुभव थे। न्यायमूर्ति आर.एस. लोढा की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने रिपोर्ट पर गौर करने के बाद साफ किया कि पहली नजर में गड़बडि़यों के आरोपों की पुष्टि होती है और यदि आरोप सही पाये जाते है तो सभी आवंटन रदद कर दिए जाएंगे। गड़बड़ घोटालों की मिशाल बन चुकी केंद्र सरकार को न्यायालय की यह टिप्पणी चिंताजनक  है।

कोल खण्डो के आवंटन से जुड़ी गड़बडि़यां कैग की अंकेक्षण प्रतिवेदन ;आडिट रिपोर्ट से सामने आर्इ थीं। उसमें तथ्यात्मक आशंकाएं जतार्इ थीं। इसी से एहसास हो गया था कि इस रिपोर्ट के अर्थ गंभीर मायनों के पर्याय हैं। लेकिन सरकार ने केवल यह जुमला छोड़ कर बरी हो जाने की कोशिश की थी कि नीति पारदर्शी थी और उसमें कोर्इ अनिमियता या गलती नहीं हुर्इ है। वैसे नीतियां तो सभी पारदर्शी और जन कल्याणकारी होती हैं, लेकिन निजी स्वार्थपूर्तियों के लिए उन पर अपारदर्शिता का मुलल्मा चढ़ाकर ही भ्रष्टाचार के द्वार खोले जाते हैं। अपारदर्शिता और अनीति का यही खेल कोल खण्डो के आबंटन में बरता गया और पलक झपकते ही चुनिंदा निजी कंपनियों को 1.86 लाख करोड़ रूपये का लाभ पहुंचा दिया। कोयले की इस दलाली में काले हाथ किसी और मंत्री – संत्री के नहीं बलिक उस प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह के हुए हैं जो र्इमानदारी का कथित चोला ओढ़े हुए हैं।

कोल खण्डों के आबंटन में गड़बडि़यां हैं, इसकी सुगबुगाहट तो बहुत पहले शुरू हो गर्इ थी। बाद में दल अण्णा ने मनमोहन सिंह समेत 15 केबिनेट मंत्रियों पर दस्तावेजी साक्ष्य पेश करके भ्रष्टाचार के जो अरोप लगाए थे, उनसे भी तय हो गया था कि केंद्र्र सरकार का यह मंत्रीमण्डल अलीबाबा चालीस चोरों का समूह है। दल के सहयोगी अरबिंद केजरीवाल और प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण ने तब भी यह आरोप सुप्रीम कोर्ट,हार्इकोर्ट और कैग की रिपोटोर्ं के आधार पर ही लगाए थे। किंतु तब अण्णा दल के पास कैग की रिपोर्ट के अधूरे दस्तावेज अनाधिकृत तौर से आए थे, इसलिए तब सरकार ने प्रधानमंत्री का बचाव इस बिना पर कर लिया था कि कैग की जिस रिपोर्ट का हवाला अण्णा दल दे रहा है, वह अभी तक संसद में पेश ही नहीं हुर्इ है। इसलिए यह सब आरोप सरकार और प्रधानमंत्री को बदनाम करने के लिए गढ़े हुए हैं। किंतु बाद में कैग ने परफोर्मेंस आडिट आफ कोल ब्लाक एलोकेषंस नामक रिपोर्ट संसद में पेश की तो कोयला धोटाला अधिकृत रूप से देश के सामने आ गया। बाद में सीबीआर्इ जांच में भी घोटाले की तस्दीक कर दी गर्इ।

मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए देशभर में भूसंपदा के रूप में फैले कोयले के ये टुकड़े बिना किसी नीलामी के पूंजीपतियों को बांट दिये गए थे। जबकि कोयला सचिव ने नोटशीट पर बाकायदा टीप दर्ज की थी कि  प्रतिस्पर्धी बोलियों के बिना महज आवेदन के आधार पर खदानों का आबंटन किया गया तो इससे सरकारी खजाने को बड़ी मात्रा में नुकसान होगा। हुआ भी यही।  कैग ने तय किया कि देश मे अब तक का सबसे बड़ा घोटाला 1.76 लाख करोड़ रूपये का 2जी स्पेक्ट्रम था और अब यह कोयला घोटाला 1.86 लाख करोड़ रूपये का हो गया। इससे पहले मार्च 2012 में कैग की ड्र्रापट रिपोर्ट सामने आर्इ थी। उसमें 10.71 लाख करोड़ रूपय के नुकसान का आकलन किया गया था। उस समय सरकार मे इसे प्रारूप पत्र कहकर टाल दिया था। तब वित्त मंत्री पी चिदंरबरम की ओर से संसद में सार्वजनिक की गर्इ इस रिपोर्ट के बारे में कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जयसवाल ने दलील दी थी कि कैग के आकलन का तरीका ही गलत है। हम संसद की लोक लेखा समिति ;पीएसी में अपना पक्ष रखेंगे।

1973 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण करके खदान मजदूरों का हित साधने और समावेषी विकास का उत्कृष्ठ नजरिया पेश करते हुए सार्वजानिक क्षेत्र की कंपनी कोल इ्रडिया को कोयला उत्खनन और वितरण की जबावदेही सौंप दी थी। कोल इंडिया ही रेलवे, ऊर्जा और इस्पात उधोगों की मांग की आपूर्ति करता था। 1993 तक यही सिथति बहाल रही। लेकिन इसी साल से कोयला उत्खनन पर कोल इंडिया का वर्चस्व खत्म करने और इसे नए नियमों की प्रकि्रया में बांधकर बाजार के हवाले कर देने की कार्रवार्इ शुरू हो गर्इ। इस समय केंद्र में पीवी नरसिंह राव की सरकार थी और इसमें वित्त मंत्री मनमोहन सिंह थे। लिहाजा आर्थिक उदारवादी नीतियों को परवान चढ़ाने के नजरिये से पहले एक मंत्रीमण्डलीय आंतरिक मूल्याकंन समिति का गठन किया गया। इसकी सिफारिश पर कोयला मंत्रालय निजी कंपनियों को कोल खंड देने लगा। लेकिन बाजार में आवारा पूंजी का प्रवाह नहीं बना तो मनमोहन सिंह ने धन की कमी के बहाने कोल इंडिया को निर्देष दिए कि वे कोल खण्डों के आवेदनों को समिति के पास भेजे बिना ही ठेके पर देने की नीति अपना लें।

2003 में जब पहली बार मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने कोयला मंत्रालय अपने ही अधीन रखा। 2004 में सरकार ने नीलामी के जरिए कोल खंड देने का फैसला किया। लेकिन इस हेतु न तो कोर्इ वैधानिक तौर तरीके बनाए और न ही कोर्इ प्रकि्रया अपनार्इ। लिहाजा प्रतिस्पर्धा बोलियों को आमंत्रित किए बिना ही निजी क्षेत्र की कंपनियों को सीधे नामांकन के आधार पर कोल खण्ड आबंटित किए जाने लगे। देखते – देखते 2004 – 2009 के बीच रिपोर्ट के मुताबिक 342 खदानों के पटटे 155 निजी कंपनियों को दे दिए गए। इन्हीं गायब फार्इलों में प्रधानमंत्री की नोटशीटों पर वे टीपें दर्ज हैं जो उन्हें कटघरे में खडा कर सकती हैं।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz