लेखक परिचय

मा. गो. वैद्य

मा. गो. वैद्य

विचारक के रूप में ख्‍याति अर्जित करनेवाले लेखक राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के प्रवक्‍ता और 'तरुण भारत' समाचार-पत्र के मुख्‍य संपादक रहे हैं।

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इतस्तत:

 मा. गो. वैद्य

गो-अभयारण्य! मतलब गायों के लिए अभयारण्य. अभयारण्य सामान्यत: वन्य पशुओं के लिए होता है. आजकल लोगों का शिकार का शौक बहुत बढ़ा है. इतना कि, वन्य पशुओं की कुछ प्रजाति नष्ट होने का खतरा निर्माण हुआ है. इस कारण उनके लिए अनेक स्थानों पर अभयारण्य हैं. उन अभयारण्यों में वन्य पशु निर्भय होकर धूम सकते है.

लेकिन गायों के लिए अभयारण्य! कल्पना विचित्र लगने जैसी है. लेकिन ऐसा अभयारण्य मध्य प्रदेश में निर्माण किया जा रहा है. इस राज्य के शाजापुर जिले में के आगर इस गॉंव में मध्य प्रदेश सरकार ने १३५० एकड़ भूमि आरक्षित की है. प्रारंभ में उसके लिए २ करोड़ रुपयों की राशि भी दी है.

मध्य प्रदेश में गोवध बंदी का कडा कानून है. उस सरकार ने वह कानून पास किया और हाल ही में उसे राष्ट्रपति की मंजुरी मिली. सरकारी अंदाज के अनुसार राज्य में करीब सव्वा दो करोड़ गोवंश – मतलब गाय, बैल और बछड़ें – हैं. लेकिन उनके लिए आवश्यक गोचर (चारागाह) की भूमि दिनोंदिन कम हो रही है. भिन्न-भिन्न प्रजाति की गायों की वंशवृद्धि के लिए सरकार ने राज्य के सात विभाग बनाएं है. वहॉं विशिष्ठ गोवंश वृद्धि के लिए व्यवस्था की गई है. जैसे : हरयाणवी, थरपाकर, मालवी, नेमाडी इत्यादि. मध्य प्रदेश सरकार का इस योजना के लिए मुक्त कंठ से अभिनंदन करना चाहिए.

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मुबारक शेख की गोशाला

मुंबई-पुणे मार्गपर कामशेत नाम का एक गॉंव है. इस कामशेत से थोड़ा दाहिनी ओर मुड़कर हम जाएं, तो पावना नदी की ओर जाएंगे. इस नदी के किनारे आर्दव नाम का गॉंव है. इस गॉंव में जाने पर आपको एक गोशाला दिखेगी. यह गोशाला चलाने वाले व्यक्ति का नाम है मुबारक शेख. वे और उनके पिताजी अब्बास कासम की यह गोशाला है. मुबारक शेख ३८ वर्ष के है. वे उनकी गोसेवा का श्रेय उनके पिताजी को देते है. कारण यह गोशाला उनके पिताजी ने शुरू की है. आज उनकी गोशाला में २० गायें हैं. अनेक गरीब किसान बूढ़ी गायों का पालन करने में असमर्थ रहते है. वे कसाईयों को गाये बेचतें हैं. मुबारक शेख के पिता ने वह गायें खरीदकर, उनका पालन करना तय किया. शुरू में पॉंच गायें ली. आर्दव एक छोटी नदी के किनारे बसा है. उस नदी के किनारे की जमीन पर यह गायें खुली छोड़ी जाती है. मुबारक शेख के घर के लोग उन पर ध्यान रखते है. उन्हें प्रतिमाह ६० हजार रुपये खर्च आता है. इतना खर्च उठाने लायक उनका परिवार संपन्न नहीं. वे कृतज्ञापूर्वक बताते है कि, सोलापुर के छगनलाल कंवारा, लोकेश जैन और बेकरीवाले मेहबूब आलम के साथ मुबंई के राघव पटेल, की ओर से उन्हें पर्याप्त सहायता मिलती है.

लेकिन अपनी गोशाला चलाने तक ही मुबारक भाई का काम मर्यादित नहीं. गो-रक्षा के बारे में जनजागृति के लिए उन्होंने ‘मातृभूमि दक्षता’ नाम की एक संस्था स्थापन की है. महाराष्ट्र सरकार से इस संस्था की कुछ मांगे हैं. लेकिन अभी तक सरकार की ओर से उन्हें अनुकूल प्रतिसाद नहीं मिला है.

मुसलमान समाज में के इस गो-भक्त के बारे में किसे अभिमान नहीं होंगा? लेकिन मुबारक भाई का कार्य अपवादात्मक ही समझने का कारण नहीं. राज्यस्थान में जोधपुर के समीप ‘अंजुमन इस्लाम’ संस्था भी बहुत बड़ी गोशाला चलाती है.

(‘पाञ्चजन्य’, १७ जून २०१२ के अंक से)

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संघ की रीत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के, उसकी कार्यव्यवस्था के लिए संपूर्ण भारत में ३९ प्रान्त है. उनमें का एक प्रान्त है मालवा. यह अलग प्रान्त हाल ही में मतलब एक वर्ष पूर्व बनाया गया. जिसे शासकीय मध्य प्रदेश राज्य संबोधित किया जाता है, उसके संघ की दृष्टि से तीन प्रान्त है. महाकौशल, मध्य भारत और मालवा. एक वर्ष पूर्व तक, ‘मालवा’ का अंतर्भाव मध्य भारत में ही होता था.

इस मालवा प्रान्त का, प्रथम वर्ष प्रशिक्षण का संघ शिक्षा वर्ग इस वर्ष शाजापुर में संपन्न हुआ. उसमें मालवा प्रान्त के संघ दृष्टि से २६ जिलों (सरकारी दृष्टि से १५ जिलों) में से ५०२ शिक्षार्थी शामिल हुए. उनमें २७८ विद्यार्थी, ८० किसान और १४४ व्यवसायी थे. इनके अलावा, ५३ शिक्षक और व्यवस्था के लिए ७० स्वयंसेवक. आप कहेंगे कि यह सब ब्यौरा देने का कारण क्या? हर प्रान्त में प्रति वर्ष २० दिनों के ऐसे वर्ग होते है. मालवा की विशेषता क्या है? विशेषता यह है कि, करीब सव्वा छ: सौ लोगों के लिए जो भोजन बनाया जाता था, उसमें रोटियॉं नहीं बनाई जाती थी. तो, दक्षिण में के संघ शिक्षा वर्गों की तरह मालवा में भी शिक्षार्थीयों को भोजन में केवल चावल ही खाना पड़ता था? नहीं. शाजापुर के परिवार रोज, इन सव्वा छ: सौ स्वयंसेवकों के लिए रोटियों की व्यवस्था करते थें. इस व्यवस्था में ११०० परिवार शामिल थें और वे रोज ११ हजार रोटियॉं इन स्वयंसेवकों के लिए तैयार रखते थें. एक दिन नहीं. पूरे बीस दिन. सामाजिक अभिसरण की यह संघ की रीत है. नागपुर के पुराने स्वयंसेवकों को याद होगा कि, वर्ष १९६२ में, जब रेशीमबाग के स्मृतिमंदिर का उद्घाटन समारोह हुआ, तब बाहर गॉंव से आएं करीब दो हजार कार्यकर्ताओं की व्यवस्था नागपुर के स्वयंसेवकों के घर की गई थी. लेकिन वह केवल एक-दो दिनों की बात थी. शाजापुर का समाजनिबंधन २० दिनों का था.

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एक विलक्षण ‘ग्रूव्ह’

‘ग्रूव्ह’ यह अंग्रेजी शब्द है. इसका अर्थ गहरी जगह या सुरंग ऐसा शब्दकोष में दिया है. लेकिन ‘इन् द ग्रूव्ह’ इस वाक्प्रचार का रूढार्थ अलग है. वह है फॅशनेबल, अद्यावत् अड्डा. जैसा कोई नाईट क्लब. रात भर बेधुंद मजा करने का स्थान. अर्थात् युवकों का. सही में युवा शौकिनों का मनोरंजन करने का स्थान.

अर्जेंटिना नाम के दक्षिण अमेरिका में के देश की राजधानी ब्यूनास आयर्स इस शहर में भी ‘ग्रूव्ह’ होंगे ही. हैं भी. उस देश में भारत के राजदूत है, उनका नाम है विश्‍वनाथन्. उन्होंने भारतीय पर्यटकों को सलाह दी है कि, आप ब्यूनास आयर्स आएं तो एक ग्रूव्ह को मतलब नाईट क्लब को अवश्य भेट दें.

किसे भी ऐसा लगेगा कि इस विश्‍वनाथन् ने यह करने का प्रयोजन क्या? उसका प्रयोजन है. कारण यह एक अलग नाईट क्लब है. यहॉं शृंगार चेष्टाओं का नाच-गाना नहीं. मद्यपान भी नहीं. संगीत है. लेकिन वह ताल-सुरों का है. और उसके बोल होते है, ‘राधारमण हरि बोलो’, ‘जय जय रामकृष्ण हरे’, ‘जय जय शिव शंभो’ और ‘जय गुरु ॐ’. यह सब संस्कृत रचना है. उसके ताल पर युवक-युवतीयॉं यहॉं भी नाचते हैं. लेकिन भक्ति भाव से. और उनकी संख्या होती है करीब सात-आठ सौ.

पीने के लिए मद्य नहीं रहता. शीत पेय रहते हैं और भोजन होता है शुद्ध शाकाहारी. मजेदार बात तो यह है कि इस क्लब में एक योग गुरु भी आते है. वे उपस्थितों को योगासन के बारे में जानकारी देते है.

यह क्लब २००८ में शुरु हुआ और उसकी सदस्य संख्या हजारों में है. इस क्लब ने अपना अनोखा आनंद अपने देश तक ही मर्यादित नहीं रखा. उन्होंने दक्षिण अमेरिका में के ब्राझील, चिली, उरुग्वे, पॅराग्वे आदि देशों में के लोगों को भी उसका लाभ दिया है. यह संस्कृति अब अधिक फैल रही है. राजदूत विश्‍वनाथन् ने इस ग्रूव्ह को भेट देने की सलाह क्यों दी, यह अब समझ आया!

(‘विकल्पवेध’, १६ से ३० जून २०१२ के अंक से)

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एल. ई. डी. के दीये

आज ऊर्जा बचत की आवश्यकता पर सर्वत्र जोर दिया जा रहा है. बिजली निर्माण करने के लिए हजारों टन कोयला जलाया जाता है. इससे पर्यावरण की हानि होती है. क्या इस पर कोई उपाय है? है. वह है एल. ई. डी. के दीये.

एल. ई. डी. मतलब निश्‍चित क्या है? एल. ई. डी. मतलब लाईट ईमिटिंग डायोड. ऐसे डायोड से विद्युत प्रकाश प्राप्त किया जा सकता है. यह तकनीक हाल ही में विकसित हुई है. इसके पूर्व ऐसे एल. ई. डी. दीये इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में के पथदर्शक के लिए प्रयोग किए जाते थे. ऐसे पथदर्शक दीये बहुत कम प्रकाश देते थें. तथापि प्रगत तकनीक ने ऐसे एल. ई. डी. दीये से अधिक प्रमाण में प्रकाश हासिल करना साध्य हुआ है. एल. ई. डी. तैयार करने के लिए फॉस्फरस और ईपॉक्सी का मिश्रण निश्‍चित अनुपात में लेकर एक छोटे कप में रखा जाता है और इस कप को धन तथा ॠण ध्रुव दिये होते है. यह संपूर्ण यंत्रणा एक छोटे मतलब १ मि. मि., ५ मि. मि., १० मि. मि. इतने छोटे कॉंच के निर्वात बल्ब में रखी होती है. इस मिश्रण में से विद्युत प्रवाह छोड़ने पर वह मिश्रण प्रकाश उत्सर्जित करता है. बाहर निकलने वाला यह प्रकाश इस फॉस्फरस के अंतर्गत के मूलद्रव्यों के प्रमाण पर, कणों के आकार पर, उसी प्र्रकार प्रयुक्त ईपॉक्सी पर निर्भर रहता है. एल. ई. डी. से अलग-अलग रंग का प्रकाश प्राप्त किया जा सकता है. एल. ई. डी. दीयों के प्रयोग से मिलने वाले लाभ का, भवन निर्माण में उपयोग किया गया तो बड़ी मात्रा में ऊर्जा की बचत करना संभव होगा. एल. ई. डी. दीये करीब १ लाख घंटे चल सकते है जो सामान्यत: प्रयोग किए जाने वाले सी. एफ. एल. दीये (जो ३५०० से ९००० घंटे चलते है) से दस गुना अधिक है. इन दीयों का उपयोग भवन के उपयोग के साथ ही रोज करीब छ: घंटे किया गया तो कोई दुर्घटना होने तक अथवा कम से कम २५ वर्ष दीये बदलने की आवश्यकता नहीं होगी. इससे अपने आप आवर्ती खर्च में बचत होंगी. साथ ही बेकार वस्तुओं (दीयों) की संख्या में बड़ी मात्रा में कमी होने के कारण पर्यावरण रक्षा में भी उसका उपयोग होगा. एल. ई. डी. दीयों से किसी भी प्रकार की गर्मी नहीं निकलती इस कारण उसका अंतिम परिणाम वातानुकूलन यंत्रों (एअर कंडिशनर) के लिए प्रयुक्त होने वाली ऊर्जा के बचत में भी हो सकेगा. रंगीन प्रकाश प्राप्त करने के लिए सामान्यत: अलगˆ फिल्टर्स का उपयोग करना पड़ता है. भवन की अंतर्गत सजावट में रंगीन प्रकाश के लिए अधिकतर रंगीन कॉंच फिल्टर के रूप में प्रयोग की जाती है. इसमें प्रकाश-क्षय होता है. स्रोत से निकली संपूर्ण ऊर्जा का उपयोग नहीं होता. एल. ई. डी. तकनीक से यह दोष दूर करना संभव हुआ है. मूलत: फॉस्फरस और ईपॉक्सी का जो मिश्रण कप में जमा किया जाता है उसके गुणधर्म पर आधारित प्रकाश प्राप्त किया जा सकता है. इस कारण विशेष रूप में अंतर्गत सजावट में जहॉं विशिष्ट वस्तु पर तीव्र प्रकाश की आवश्यकता होती है, वहॉं उस प्रकार का रंगीन प्रकाश आवश्यक तीव्रता के अनुसार कम ऊर्जा में दिया जा सकता है. एल. ई. डी. दीये से त्वरित संपूर्ण तीव्रता का प्रकाश प्राप्त किया जा सकता है. फिलेमंट दीये में, दीया चालू करने के बाद विशिष्ट कालावधि गुजरने पर ही संपूर्ण तीव्रता का प्रकाश मिलता है. यह दोष एल. ई. डी. के उपयोग में दूर किया जा सकता है. और संपूर्ण यंत्रणा अत्यंत कम पोटेंशियल डिफरन्स पर चलने के कारण इन दीयों के उपयोग में फिलेमंट के दीयों के समान व्होल्टेज के परिवर्तन के अनुसार प्रकाश की तीव्रता कम-अधिक नहीं होती, स्थायी रूप में विशिष्ट तीव्रता का प्रकाश मिलता है. फ्लरोसेंट दीये में पारे का उपयोग किया जाता है. विपरीत एल. ई. डी. की तकनीक में पारे का जरा भी उपयोग नहीं होता. उसमें हिलने वाले अलग-अलग भाग भी नहीं रहते. इस दीये से शरीर पर अपाय करनेवाले कोई वायु भी उत्सर्जित नहीं किए जाते. इस कारण एल. ई. डी. दीयें पर्यावरणानुकूल है. आज सरकारी कार्यालय, नगर पालिका, महानगर पालिका, अतिथि-गृह देखें. आवश्यकता से कई गुना अधिक बिजली खर्च की जाती है. वहॉं आवश्यकता से कई गुना अधिक ट्यूब का प्रकाश रहता है. ऐसे सब स्थानों से ट्यूब निकालकर एल. ई. डी. दीयें लगाए गए तो बिजली की बड़ी मात्रा में बचत होगी. एल. ई. डी. दीयों का ल्यूमेन आऊटपुट प्रति वॅट सी. एफ. एल. दीये से बहुत अधिक होने के कारण एल. ई. डी. दीयों का कार्यक्षमता से उपयोग करने पर निवास के ऊर्जा प्रयोग में बहुत बचत होंगी.

भविष्य में एल. ई. डी. तकनीक का भवन निर्माण क्षेत्र में आवश्यकता के अनुसार अधिक उपयोग हो सकता है. अभी से इन दीयों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी समाज के हर घटक को देकर हर एक ने आज उपयोग किए जाने वाले दीये बदलकर एल. ई. डी. दीयों का उपयोग करना लाभदायक सिद्ध होगा. एल. ई. डी. दीयों की तकनीक के कारण सी. एफ. एल. दीयों की तुलना में २० प्रतिशत कम ऊर्जा का प्रयोग कर भी सुखकारक उजाला प्राप्त किया जा सकता है. इस कारण भवन निर्माण की रूपरेखा बनाने की प्रक्रिया से ही किस क्षमता का प्रकाश किस स्थान पर आवश्यक है, दिन में कितने घंटे उस स्थान का उपयोग होगा, उसके अनुसार अंतर्गत विद्युतीकरण की रचना कर, महंगी होती ऊर्जा तथा ऊर्जा की कमी के बारे में उपाय योजना की जा सकती है जिससे आवर्ती खर्च तथा आवर्ती ऊर्जा प्रयोग में बड़ी मात्रा में बचत होगी.

(साप्ताहिक ‘विजयत्न’ सांगली के ५ जून के अंक से)

(अनुवाद : विकास कुलकर्णी)

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