लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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विजय कुमार

शर्मा जी कल बहुत दिन बाद मिले, तो चेहरा ऐसा लग रहा था मानो साठ वाट के बल्ब में सौ वाट की चमक आ गयी हो। होठों पर हंसी शरद पूर्णिमा की स्वच्छ चांदनी की तरह चारों ओर छिटक रही थी। मन इतना गद्गदायमान हो रहा था, जैसे बराक ओबामा ने अमरीका में राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने के बाद उन्हें उपराष्ट्रपति नियुक्त कर दिया हो। उनकी चाल ऐसी लग रही थी मानो एक पैर धरती पर, तो दूसरा मंगल ग्रह पर रख रहे हों।

– क्या बात है शर्मा जी, आज तो आपका उत्साह कपड़ों से बाहर निकल रहा है ?

– बस पूछो मत वर्मा। तुम मौनमोहन सिंह कहकर जिनकी आलोचना करते हो, उन्होंने अपना मौन भंग कर दिया है।

– शर्मा जी, मैं क्या पूरा देश उन्हें यही कहता है। विदेशियों की भी उनके बारे में यही धारणा है। हां, जब से ममता बनर्जी ने 440 वोल्ट का झटका दिया है, तबसे उनकी जुबान कुछ खुल गयी है।

– यही तो मैं भी कह रहा हूं। अब देखना देश की प्रगति सुपरफास्ट राजधानी एक्सप्रेस की तरह होगी।

– इसके बदले प्रगति यदि राबर्ट वडेरा की सम्पत्ति की तरह हो, तो अधिक अच्छा रहेगा।

– तुम चाहे जितनी बेकार की बात करो; पर अब प्रगति होकर रहेगी।

– यह तो बहुत खुशी की बात है; पर हथेली में आशा के ऐसे नकली फूल उगाकर वे देश को कई बार ‘फूल’ बना चुके हैं।

– हां, पर इस बार की बात दूसरी है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कह दिया है कि अगले पांच साल में देश के हर गांव को चैबीस घंटे सस्ती दर पर बिजली मिलने लगेगी।

– शर्मा जी, लोग तो रात को नींद में सपने देखते हैं; पर मनमोहन जी शायद दिन में भी सपने देखने लगे हैं।

– क्यों ?

– क्योंकि बिजली तो तब मिलेगी, जब वह बनेगी। कुडनकुलम परमाणु संयंत्र आंदोलनकारियों के कारण रुका है, तो कोयले वाले बिजलीघर भ्रष्टाचारियों के कारण। नदियों पर बांध बनाना भी अब इतना सरल नहीं रहा। टिहरी में बांध बने दस साल हो गये; पर आज तक वो अपनी क्षमता की आधी बिजली भी नहीं बना सका। जो बांध बने हैं, उनके पानी के लिए राज्य सरकारें आपस में लड़ रही हैं। कहीं झगड़ा सड़क पर हो रहा है, तो कहीं न्यायालय में। पर्यावरण को हानि न पहुंचाने वाली सौर ऊर्जा, वायु ऊर्जा, पशु ऊर्जा तथा छोटी पनबिजली योजनाओं की ओर किसी का ध्यान नहीं है।

– तुम चाहे जो कहो; पर मनमोहन जी ने कह दिया है, तो फिर पांच साल में सबको भरपूर बिजली सस्ते में मिलने लगेगी।

– लेकिन शर्मा जी, मनमोहन जी अगले पांच साल की बात कर रहे हैं; पर पांच दिन बाद ही वे इस कुर्सी पर होंगे या नहीं, यह कौन जानता है ?

– क्यों, उनकी कुर्सी पूरी तरह सुरक्षित है।

– हां जरूर। एक पैर ममता ने तोड़ लिया है। मायावती और मुलायम सिंह कब अपने हिस्से का पैर हटा लें, कोई नहीं जानता। इसके बाद भी आप कुर्सी को सुरक्षित कहें, तो दोष आपका नहीं, उस डाॅक्टर का है, जो आपकी आंखों का इलाज कर रहा है।

– नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। ये दोनों सरकार के पक्के समर्थक हैं। आखिर साम्प्रदायिक ताकतों को सत्ता से दूर जो रखना है।

– इसीलिए तो सरकार ने दोनों के पीछे कांग्रेस ब्यूरो आॅफ इन्वैस्टिगेशन (सी.बी.आई) को लगा दिया है। देखना है कि चूहे-बिल्ली के इस खेल में कौन जीतता है ? मायावती कभी दो दिन की बात कहती हैं, तो कभी चार दिन की। मनमोहन जी की समझ में नहीं आ रहा कि माया से ममता दिखाएं या मुलायम से सख्ती। घर में 24 घंटे बिजली होने के बावजूद वे बेचारे इस कारण न दिन में ठीक से सो पाते हैं न रात में।

– पर तुम किसी चक्कर में न रहो वर्मा। यदि किसी कारण इन्होंने हाथ खींचा, तो हम बिहारी बाबू का तीर अपने तरकश में डाल लेंगे।

– लेकिन नीतीश कुमार तो आपके विरोध में हैं ?

– तो क्या हुआ; वे इन दिनों बिहार में ‘अधिकार यात्रा’ निकाल रहे हैं। उन्होंने कहा भी है कि वे दिल्ली में उसी को समर्थन देंगे, जो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देगा।

– यानी संकट पड़ने पर आप उन्हें यह दर्जा देकर सरकार के लिए जरूरी ऊर्जा प्राप्त कर लेंगे ?

– हां, बिल्कुल।

– लेकिन शर्मा जी, कुछ दिन पूर्व सी.बी.आई के सम्मेलन में प्रधानमंत्री महोदय ने ही कहा है कि वे कानून बदलकर ऐसी व्यवस्था करेंगे, जिससे रिश्वत लेने वालों की तरह रिश्वत देने वालों को भी अपराधी माना जा सके।

– तो… ?

– तो यह कदम रिश्वत के दायरे में आयेगा या नहीं ?

यह सुनते ही शर्मा जी को सांप सूंघ गया। 24 घंटे बिजली के सपने के बावजूद उनके चेहरे का बल्ब फिर से फ्यूज हो गया। काफी देर तक जब वे नहीं बोले, तो मैं समझ गया कि मौनमोहन सिंह की पीठ पर चढ़ा बेताल अब उनके कंधे पर बैठ गया है।

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1 Comment on "मौन मोहन सिंह का मौन भंग"

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एल. आर गान्धी
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उत्कृष्ट व्यंग …. मनमोहन जी की समझ में नहीं आ रहा कि माया से ममता दिखाएं या मुलायम से सख्ती
……लाजवाब …

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