लेखक परिचय

आलोक कुमार

आलोक कुमार

बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

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valentinआज सभ्यता,संस्कृति की दुहाई देनेवाले हमारे देश में संस्कृति मखौल का विषय बन गई है , सभ्यता धुंधली पड़ रही है और संस्कारों का “अंतिम-संस्कार” किया जा चुका है  पहनावे में,बोलचाल में,रहन-सहन में पर्व-त्यौहार , राजनीतिक-सामाजिक जीवन में हर गलत चीज को मान्यता मिल रही है आज की मौजूदा पीढ़ी के पास “कॉकटेल” है पूरब और पश्चिम का और अनुभवी लोगों का कहना है कि “कॉकटेल” सदैव रिस्की है क्यूँकि इसका खुमार ( हैंगओवर ) जल्दी जाता नहीं है l

आज के दौर में पिज्जा एम्बुलेंस से फास्ट पहुँचता है घरों में शॉपिंग मॉल्समल्टी-प्लेक्स लेटेस्ट मॉडल की गाड़ियाँ महिला मित्रों की मण्डली डिस्कोपब् फास्ट- फूडआई – पॉडआई-फ़ोनलैपटॉपब्रांडेड कपड़े , विशेषकर कमर से लगभग एक फ़ीट नीचे  “सब कुछ दीखता है !!” को चरितार्थ करती झूलती पतलून  अजीबो-गरीब और डरावनी स्टॉइल में कटी जुल्फ़ें बगुलों की चोंच सरीखे जूते इत्यादि यही आज की पहचान बन गई है l

 

आज प्ले-स्टेशन ” का ज़माना है , “लट्टू” या “ गिल्ली – डँडा ” शायद ” गलियों में ही गुम ” हो गए हैं ! जगह – जगह से फटे कपड़े – फैशन का पर्याय बन चुके हैं l “ मर्डर 3 “ देखना अप-टू-थ मार्क है “ तीसरी कसम “ देखना तौहीन lबड़ों को पैर छू कर “प्रणाम” करना “डाउन – मार्केट” है l” गेहूँ-बाजरे और मक्के की रोटी” की सल्तनत में “पिज्जा” प्रभावी घुसपैठ कर चुका है l ” मारवाड़ी -वासा “(भोजनालय) विलुप्त होने की कगार पर हैं “मैक्डोनाल्डस” का जमाना है l “लिट्टी-चोखा” तो बर्गर का “दरबारी” है l दूध” तो कोक” की कर रहा चिरौरी” है l मंदिर-मस्जिद ” से ज्यादा “मदिरालय” में पेशी जरूरी है l “भजन” की जगह “रैप” ने ले ली है ,”तेरे द्वार खड़ा एक जोगी ” को सच में “यो-यो हनी सिंह ” ने तो “द्वारपाल ” ही बना दिया है l” गाँव” की जगह “रिसोर्ट” ने ली है l”अखाड़े” की जगह “जिम” ने ले ली है l क्रिकेट” के सामने “हॉकी” भी हकलाती है l  “गुरुकुल ” को “स्मार्ट-क्लासेज ” ने “आउट-स्मार्ट ” कर दिया है l “भरत-नाट्यम ” की भी “लुंगी -डांस ” ने “पुंगी ” बजा दी है l “मर्यादाएं” भी “रैंप की कैट -वाक ” पर “इठला ” रही हैंl “बनारस” की जगह “बैंकॉक” ने ले ली है l “काशी” पर “क्योटो” कर रहा सवारी है l “गाँवों” पर स्मार्ट-सिटी” की हकमारी है l “ज्ञान” गूगल का आभारी है l रिश्तों की डोर” “व्हाट्स –अप” के सहारे है l “नेता” ही आज “पुजारी” है l“गणतन्त्र” की गरिमा भी बिन “ओबामा” फीकी है l “कृषि-दर्शन” को “बिग-बॉस” ने लात मारी है l जनता को दफन” कर चैनलों में “चुनाव” जारी है l “डांडी” की जगह “जंतर-मंतर की नौटंकी” ही सबों को प्यारी है l “उम्मीदों” का गला घोंटने वाला “मफ़लर” ही “दिल वालों” को प्यारा है l “सुंदरियों-सायरनों-सुरक्षा” के बीच घिरा “समाजवाद” ही हमारी “बदनसीबी” है l “मित्रों” का सम्बोधन “भाइयों-बहनों” पर कर रहा “दादागिरी” है l “रिमोट” से चलने वाली “कठपुतलियों” का तांडव भी जारी है l “घोटालों” के “घड़े” ढ़ोना “हमारी” मजबूरी है l “चिंतन” की जगह  “चाय पर चर्चा” का चलन चालू है l “गाँधी के फोटू वाले कागजों” के आगे “मीडिया” की भी लाचारी है l “डॉलर” की आगे “रूपया” “भिखारी” है l

 

तीज -करवा चौथ ” पर “वैलेंटाइन डे ” का वजन भारी है l “राम-रहीम ” के “चरित्र प्रमाण – पत्र ” की भी मांग जारी है l ‘धर्म‘ की विवेचना ‘PK’ से जारी है l सेल्फी” बन चुकी “राष्ट्रीय बीमारी” है l धोती / पैजामे” की जगह “बरमुडा (एक अनूठा वस्त्र)” अपना परचम लहरा रहा है l “खादी” पर “लिनेन” की “दावेदारी” है l साड़ी” तो पहले ही अपनी नयी-नवेली सौतन “स्कर्ट” के आगे फ़ीकी पड़ चुकी है l “इंग्लिश-हिन्दी” की जगह एक नए ग्रह की भाषा “हिंग्लिश” अपने पैर पसार चुकी है l “माता जी” तो “मॉम (मोम की )” बन ही चुकी हैं l “पिताजी ” अब डैड ( जो लगभग डेड ही हैं ) हो गए हैं l ” बीबी ” वाले भी “वैलेंटाइन ” ढूँढ रहे हैं l

 

चलिए फिर भी ….राष्ट्र-निर्माण तो जारी है ….!!

 

आलोक कुमार ,

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