लेखक परिचय

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

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two brothersआखिर जिस बात का अंदेशा था वही हुआ|रमाकांत की म्रृत्यु के बाद उनके दोनों बेटों में ठन गई|मां रेवती के लाख समझाने पर भी राधाकांत पिताजी की जायदाद के बँटवारे की बात करने लगा|छोटा बेटा कृष्णकांत‌ वैसे तो खुलकर कुछ नहीं कह रहा था परंतु बड़े भाई के व्यवहार से दुखी होकर उसने भी बँटवारे के लिये हामी भर दी|मकान का बँटवारा हो गया चार चार कमरे दोनों के हिस्से में आये|पीछे के आँगन के बीचों बीच दीवाल खड़ी होने लगी|सामने के बरामदे को भी दो हिस्सों में बाँटने के लिये मिस्त्री काम पर लगा दिया गया|ऊपर का एक कमरा जो रमाकांत का स्टेडी रूम था, बँटने के लिये शेष रह गया था|दोनों भाई ऊपर पहुंचे ,जहां दो अलमारियां रखी थीं|अलमारियों और उस कमरे का बँटवारा कैसे हो इस पर विचार हो रहा था|कृष्णकांत ने देखा कि पिताजी की एक अलमारी पर लिखा था “मिलो”

और दूसरी पर लिखा था “मुस्कराओ”|उसे कुछ अजीब सा लगा,इसका मतलब क्या है वह सोचने लगा|वैसे तो बचपन से ही दोनों भाईयों में आपस में बहुत स्नेह था किंतु जैसे कि आजकल आम बात हो गई कि विवाह के बाद‌ परिवारों में फूट पड़ जाती है ,रमाकांत के बेटों के विवाह के बाद उनके परिवार को भी किसी आसुरी शक्ति की नज़र लग गई थी|रोज कलह होने लगी,मनमुटाव बढ़ने लगा ,जो चाय की प्याली में तूफान की तरह था|पिताजी के रहते तक अंगारे राख में दबे रहे किंतु उनके जाने के बाद लावा फूट पड़ा था|

कृष्णकांत बोला’ भैया मैं “मिलो” वाली अलमारी लूंगा’|’ठीक है तो मैं “मुस्कराओ” वाली ले लेता हूं’राधाकांत कुछ सोचते हुये और मुस्कराते हुये बोला|

“बहुत दिन बाद आपके चेहरे पर मुस्कान देख रहा हूं भैया,कितने अच्छे लग रहे हैं आप मुस्कराते हुये|”कृष्णकांत ने हँसते हुये कहा|

राधाकांत को हंसी आ गई”पिताजी ने अलमारियों पर यह क्यों लिखवाया,समझ में नहीं आया”वह कुछ सोचते हुये बोला|

“मिलकर रहेंगे तभी तो मुस्करायेंगे|” यही तो मतलब हुआ,कृष्णकांत जोर से खिलखिलाकर हंसने लगा और बड़े भाई के गले लग गया|राधाकांत भी मोम की तरह पिघल गया|

“पिताजी के विचार कितने ऊंचे थे”वह इतना ही कह सका|आंगन और बरामदे की आधी बन चुकी दीवारों को गिरा दिया गया है|

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2 Comments on "मिलो और मुस्कराओ"

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shakuntala bahadur
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सहज भाव से मार्गदर्शन करती सुन्दर लघुकथा सराहनीय है।

इंसान
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स्टडी में अवश्य कहीं और लिखा होगा–पढ़ो और मुस्कराओ! उत्तम लघु-कथा के लिए मेरा साधुवाद|

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