लेखक परिचय

अंकुर विजयवर्गीय

अंकुर विजयवर्गीय

टाइम्स ऑफ इंडिया से रिपोर्टर के तौर पर पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत। वहां से दूरदर्शन पहुंचे ओर उसके बाद जी न्यूज और जी नेटवर्क के क्षेत्रीय चैनल जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ के भोपाल संवाददाता के तौर पर कार्य। इसी बीच होशंगाबाद के पास बांद्राभान में नर्मदा बचाओ आंदोलन में मेधा पाटकर के साथ कुछ समय तक काम किया। दिल्ली और अखबार का प्रेम एक बार फिर से दिल्ली ले आया। फिर पांच साल हिन्दुस्तान टाइम्स के लिए काम किया। अपने जुदा अंदाज की रिपोर्टिंग के चलते भोपाल और दिल्ली के राजनीतिक हलकों में खास पहचान। लिखने का शौक पत्रकारिता में ले आया और अब पत्रकारिता में इस लिखने के शौक को जिंदा रखे हुए है। साहित्य से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं, लेकिन फिर भी साहित्य और खास तौर पर हिन्दी सहित्य को युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाने की उत्कट इच्छा। पत्रकार एवं संस्कृतिकर्मी संजय द्विवेदी पर एकाग्र पुस्तक “कुछ तो लोग कहेंगे” का संपादन। विभिन्न सामाजिक संगठनों से संबंद्वता। संप्रति – सहायक संपादक (डिजिटल), दिल्ली प्रेस समूह, ई-3, रानी झांसी मार्ग, झंडेवालान एस्टेट, नई दिल्ली-110055

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pravakta11 जनवरी 2011 का दिन था। सर्दियों की शाम एक कविता लिखी थी। शीर्षक था “मन का शृंगार”। उस दिन से पहले भी कई कविताएं और लेख लिखे, पर कभी छपास का रोग नहीं लगा था। पता नहीं क्यूं, मन किया और उस कविता को संजीव भाई को भेज दिया। लगा छपनी तो है नहीं, इसलिए निश्चिंत होकर सो गया। सुबह उठकर अपना मेल जांचा, प्रवक्ता की ओर से एक मेल आया हुआ था, लिखा था, आपकी कविता प्रकाशित कर दी गई है। ऐसा थी प्रवक्ता से पहली मुलाकात। तब से आज तक क्रम जारी है और संबंधों की प्रगाढ़ता ऐसी है, कि प्रवक्ता के किसी कार्यक्रम में बिना बुलाए भी पहुंच जाता हूं।

प्रवक्ता अपने पांचवें साल में कदम रख रहा है। एक ठोस कदम। पूरी तरह नए कलेवर के साथ। दरअसल प्रवक्ता नामक मंच एक निश्चित सिद्धांत और दर्शन को समर्पित रहा है, जो हिंदी की पट्टी पर लिखने वाले ग्रामीण परिवेश से जुड़े शहरों की तरफ आए लोगों के लिये रहा है, जो कि कहीं न कहीं अभी भी अपनी जड़ों से जुड़े हैं। पंचसितारा रहन-सहन और ऊंची इमारतों के चालीसवे-पचासवें मंजिल पर रह कर भी बारिश में मिट्टी से उठती सोंधी गंध के लिए दीवाने हैं, चमचमाती बत्तियों में असहज महसूस करते हैं, लेकिन लालटेन और मिट्टी के तेल की चिमनी में सहज महसूस कर पाते हैं।

एलीट क्लास/अभिजात्य वर्ग में शामिल होने के लिये चेहरे पर कोई मुखौटा नहीं लगा पाने वाले लोग प्रवक्ता के भदेस, ग्रामीण, आंचलिक, मूल भारतीयता के मनोरथ को जिंदा रख पाए हैं। प्रवक्ता ने हमेशा जहां एक ओर शराफ़त का पाखंड करने वाले और सरलता का मुखौटा लगा कर भावनाओं का धंधा करने वालों से नफ़रत पाई है, तो वहीं दूसरी ओर उनसे हजार गुना अधिक लोगों का निश्छल प्यार पाया है।

स्‍वतंत्रता आंदोलन के दौरान पत्रकारिता ने जन-जागरण में अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन आज यह जनसरोकारों की बजाय पूंजी व सत्ता का उपक्रम बनकर रह गई है। मीडिया दिन-प्रतिदिन जनता से दूर हो रहा है। ऐसे में मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठना लाजिमी है। आज पूंजीवादी मीडिया के बरक्‍स वैकल्पिक मीडिया की जरूरत रेखांकित हो रही है, जो दबावों और प्रभावों से मुक्‍त हो। प्रवक्‍ता इसी दिशा में एक सक्रिय पहल है।

प्रवक्ता, संजीव भाई और भारत जी के बुलंद हौसलों के लिए अटल जी की एक कविता…

सत्य का संघर्ष सत्ता से…न्याय लड़ता निरंकुशता से

अंधेरे ने दी चुनौती है…किरण अन्तिम अस्त होती है

दांव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते

टूट सकते हैं, मगर हम झुक नहीं सकते…।

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