लेखक परिचय

रवि शंकर

रवि शंकर

रसायन शास्त्र से स्नातक। 1992 के राम मंदिर आंदोलन में सार्वजनिक जीवन से परिचय हुआ। 1994 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से परिचय हुआ और 1995 से 2002 तक संघ प्रचारक रहा। 2002 से पत्रकारिता शुरू की। पांचजन्य, हिन्दुस्तान समाचार, भारतीय पक्ष, एकता चक्र आदि में काम किया। संप्रति पंचवटी फाउंडेशन नामक स्वयंसेवी संस्था में शोधार्थी। “द कम्प्लीट विज़न” मासिक पत्रिका का संपादन। अध्ययन, भ्रमण और संगीत में रूचि है। इतिहास और दर्शन के अध्ययन में विशेष रूचि है।

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pravaktaबात उन दिनों की है जब मैं सक्रिय पत्रकारिता से थोड़ा दूर था और एक एनजीओ में शोधकर्ता के रूप में कार्य कर रहा था। कुछ लिखते रहने की भूख शोध कार्य करने भर से शांत नहीं होती थी, इसलिए ब्लाग लिखना शुरू किया। ब्लागिंग के वे दिन भी बड़े मजेदार थे। एक महीने में ही आठ-आट पोस्टें डाल देता था। बड़े-बड़े आलेख। दो तीन बार मेरे ब्लाग देश के प्रमुख अखबारों में भी छपे। और फिर एक दिन फोन आया संजीव भाई का। कहा, प्रवक्ता से बोल रहा हूँ। आपका आलेख वेबसाइट पर डालने की अनुमति चाहिए। मैं चौंका भी खुश भी हुआ। अनुमति नहीं देने का तो सवाल ही नहीं था। फिर संजीव भाई ने आग्रह किया कि आलेख लिखूं तो प्रवक्ता को भेजूं। मैंने उनकी बात मान ली। जो भी आलेख लिखता था, उसे उन्हें भेज देता था। ध्यान में आया कि तमाम प्रचार के बावजूद मेरे ब्लाग पर उतनी प्रतिक्रिया नहीं आती थी जितने कि प्रवक्ता पर प्रकाशित आलेखों पर। इसके पीछे संजीव भाई की मेहनत थी। हालांकि कालांतर में मेरी प्रवक्ता पर सक्रियता घटती चली गई परंतु इसे बढ़ते हुए देखना हमेशा संतोषजनक लगता रहा।

थोड़ा और पीछे चलता हूं। बात उन दिनों की है जब मैं भारतीय पक्ष काम कर रहा था। एक दिन संपादक विमल जी से मिलने भारत भूषण जी आए हुए थे। काफी सारी बातों के बीच उन्होंने हमें एक वेबसाइट दिखाई। कहा कि वे ऐसे ही प्रयोग के रूप में इसे चला रहे हैं और यह उनके द्वारा किए जा रहे काम का एक नमूना भी है। वे साफ्टवेयर इंजिनियर थे और अपनी कंपनी चला रहे थे। साइट थी प्रवक्ता डाट काम। कुछ दिनों बाद उन्होंने बताया कि इसके माडरेटर का काम संजीव भाई ने संभाल लिया है और वे अब इस वेबसाइट की ओर से निश्चिंत हो गए हैं। संजीव भाई के माडरेशन में प्रवक्ता काफी तेजी से आगे बढ़ने लगी।

बहरहाल, कठिनाइयों की बात करूं तो प्रवक्ता को वे सारी कठिनाइयां आईं जो सामान्यतः इस प्रकार के किसी भी प्रयास में आती हैं। सबसे बड़ी समस्या होती है सामग्री की और खासकर तब जब आपके आर्थिक संसाधन इतने सीमित हों कि किसी को भी आप लिखने के लिए कुछ देने की स्थिति में न हों। यहां संजीव भाई के व्यापक और आत्मीय संबंध काम आए। उन्होंने जिससे भी कहा, वह प्रवक्ता के लिए लिखने से मना नहीं कर पाया और प्रवक्ता की बढ़ती लोकप्रियता शीघ्र ही कई लेखकों को आकर्षित करने लगी। पहले प्रवक्ता पर संघी होने की छाया थी, आखिर संजीव भाई की पृष्ठभूमि संघी जो थी और वे इसे सीना ठोंक कर स्वीकारते भी थे। परंतु धीरे-धीरे दूसरी धारा के लिक्खाड़ भी प्रवक्ता पर लिखने लगे। इससे प्रवक्ता पर अच्छी बहसें चलने लगीं। हालांकि कई लोगों ने आपत्ति भी की कि इससे प्रवक्ता का स्वरूप बिगड़ रहा है, उसकी दिशा भटक रही है आदि आदि। परंतु संजीव भाई निश्चिंत थे और निश्चित भी। जब इस देश में कई विचारधाराएं पल सकती हैं तो एक वेबसाइट को यदि वह किसी संगठन का मुखपत्र नहीं है तो इतना अनुदार क्यों होना चाहिए कि किसी के विचारों को केवल इस कारण जगह न दे सके कि वह किसी दूसरी विचारधारा का है। यह अपनी प्रतिबद्धता को नहीं, बल्कि वैचारिक अतिवादिता और हिंसा ही प्रदर्शित करता है जिसका विरोध आज के अतिवादी और हिंसावादी वामपंथी बुद्धिजीवी किया करते हैं परंतु स्वयं उसी अतिवादिता और हिंसा में उलझे रहते हैं।

वास्तव में देखा जाए तो संघ (रास्वसंघ) ने कभी भी किसी को इस वैचारिक हिंसा और अतिवादिता की शिक्षा नहीं दी है। संजीव भाई कट्टर संघी हैं परंतु उन्होंने इसे कभी भी अन्य विचारों को प्रकाशित करने में आड़े नहीं आने दिया। ‘मैं ही सही हूं’ की मानसिकता की बजाय ‘मैं भी सही हूं’ की संघी मानसिकता से वे अपने काम में लगे रहे। परिणाम आज सबके सामने है। 500 से अधिक लेखक प्रवक्ता से जुड़े हैं, 9000 से अधिक लेख इस पर हैं और 50000 से अधिक हिट्स प्रतिदिन इसे प्राप्त होते हैं। अनेक विषयों पर प्रवक्ता पर अद्भुत बहस पाई जाती है। कई विषयों पर प्रवक्ता अपनी बहस चलवाई तो कई पर स्वाभाविक रूप से बहस चली। अनेक विषयों पर काफी प्रभावी सामग्री यहां उपल्बध है।

अर्थ के अभाव के कारण पैदा होने वाली दूसरी समस्या भी प्रवक्ता को झेलनी पड़ी जब हिट्स बढ़ने पर सर्वर वालों ने आधिक दाम मांगे और उसे चुकाने में असमर्थता के कारण कई दिनों तक प्रवक्ता की साइट काफी धीमी चलती रही। कई बार बंद जैसी भी दिखने लगी। मुझे नहीं पता कि भारतजी और संजीव भाई ने इसका निपटारा कैसे किया परंतु वे इस समस्या को भी पार कर पाने में सफल रहे। वास्तव में प्रवक्ता एक उदाहरण है कि यदि आपके इरादे मजबूत हों तो बड़े से बड़ा काम सरल हो जाता है। इसे ही एक बड़े प्रसिद्ध हिंसी साहित्यकार ने हनुमान कूद कहा था। संजीव भाई और भारत जी ने हनुमान कूद ही लगाई थी और सफल हो कर दिखाया है।

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1 Comment on "प्रवक्ता की हनुमान कूद / रवि शंकर"

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dilip das
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प्रवक्ता डाटकाम की विकास यात्रा की जानकारी देने के लिए रवि शंकर जी को धन्यवाद। ईमानदारी से की गई हर कोशिश सफल होती है। प्रवक्ता डाटकाम की गौरववृद्धि की कामना करता हूं।

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