लेखक परिचय

रत्‍नेश त्रिपाठी

रत्‍नेश त्रिपाठी

मूलत: गोरखपुर, उत्तर प्रदेश से। गोरखपुर विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक व परास्नातक की डिग्रियां हासिल कीं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में शोध आलेख प्रकाशित। वर्तमान में जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर, मध्य प्रदेश में शोध छात्र।

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jhandewaliकात्यायिनी महामाये भवानि भुवनेश्वरि॥
संसारसागरे मग्नं मामुध्दर कृपामये।
ब्रह्माविष्णुशिवाराध्ये प्रसीद जगदम्बिके॥
मनोऽभिलशितं देवि वरं नमोस्तुते।1

भारतवर्ष हमेशा से पूजनीय व वन्दनीय रहा है, क्योंकि यहाँ के कण-कण में ईश्वर का निवास माना जाता है। प्रकृति के हर रुप में हमें ईश्वर के दर्शन होते हैं। और यही दर्शन परम्परा व्यक्तिमात्र को ईश्वर से जोड़ती है। इसीलिए हमारे धर्मग्रन्थों में यह कहा गया है कि भक्ति के सम्मुख स्वयं परमपिता परमेश्वर भी अपना शीश झुकाते हैं। ऐसी समृध्दशाली परम्परा लेकर भारतवर्ष के आर्यजन अपने जीवन के सम्पूर्ण भागों को जीते हुए अन्तत: भक्ति मार्ग द्वारा मोक्ष को प्राप्त करते हैं। इस मोक्ष प्राप्ति के सबसे बड़े साधन मंदिर व तीर्थ होते हैं जिनमें स्वयं देवी-देवताओं का निवास मानकर भारतीय समाज उनकी प्राणप्रतिष्ठा करता है। तथा उनका पूजन करता है।

भारतवर्ष ऋषियों, महापुरुषों और देवतुल्य सन्तों की धरती है, इसीलिए स्वयं भगवान् भी समय-समय पर यहां अपना जीवन काल विभिन्न अवतारों के रूप में बिताते हैं। व्यक्ति मात्र अपनी जागृत चेतना से उस ईश्वर का दर्शन करते हैं। तथा मां जगदम्बा की कृपा से भक्ति के उच्चतम शिखर को प्राप्त करते हैं। इसकी एक बड़ी शृंखला भारतवर्ष में पायी जाती है। इसी कड़ी में एक नाम आता है मा के परम भक्त बद्रीभगत जी का, जिन्होने अपनी भक्ति चेतना से मां की अनुभूति की और भूसमाहित मां की प्रतिमा का पुन:उद्धाटन किया। और अपनी तपस्या से एक नये मंदिर का निर्माण कर भक्ति की अनन्त धारा का प्रवाह किया। जो अनवरत जारी है।

मंदिर के उद्भव का इतिहास :
झण्डेवाला देवी मंदिर का एक प्राचीन इतिहास है जिसका आरम्भ 19वीं शताब्दी के मां के परम भक्त श्री बद्रीभगत से प्रारम्भ होती है। बद्रीभगत एक प्रसिध्द कपड़ा व्यवसायी थे तथा अपार सम्पत्ति के स्वामी थे। दिल्ली में उनकी प्रचुर अचल सम्पत्ति थी। किन्तु लेश मात्र भी उनको अपनी समृध्दि व धन पर घमण्ड नहीं था वे मांँ वैष्णों देवी के अनन्य भक्त थे तथा दीन-दुखियों की सेवा व भगवत् भजन में रमे रहते थे। उनके इसी स्वभाव के कारण लोग उन्हे ‘बद्री भगत’ के नाम से पुकारने लगे।2

जिस स्थान पर वर्तमान् में मंदिर स्थित है वह स्थान तब शांत, हरा-भरा उपवन था। हरी-भरी पहाड़ियाँ, फलफूलों से लदे बगीचे और कल-कल करते झरने बहते थे। यहाँ पशु-पक्षी, मोर-पपीहों के कलरव से वातावरण किसी ऋषि के आश्रम की भाँति मनोरम था। लोग इस शांत व निस्तब्ध वातावरण में मानसिक व आत्मिक शांति के लिए आते थे। ऐसे व्यक्तियों में बद्रीभगत जी भी थे। धीरे-धीरे यह पता चला कि यहाँ के झरनों व पेड़-पौधों में स्वास्थ्य लाभ के गुण भी थे। अत: यहाँ लोग मानसिक शांति के साथ-साथ स्वास्थ्य लाभ के लिए भी आते थे।

बद्रीभगत जी इस पावन स्थान पर साधना और ध्यान मग्न होकर प्रार्थना किया करते थे। एक संध्या जब एक स्वास्थ्यवर्धक झरने के पास वह साधना में रत थे, तब उन्हे अनुभूति हुई कि उसी स्थान पर एक प्राचीन मंदिर दबा हुआ है। उन्होने निश्चय किया कि वह इस प्राचीन धरोहर का पुनरोध्दार अवश्य करेगें। उस दिन से बद्रीभगत जी ने अपना तन, मन, धन इस मंदिर की खोज में लगा दिया। उन्होने इस क्षेत्र की भूमि खरीदनी प्रारम्भ कर दी। अन्त में बहुत प्रयत्न के बाद स्वास्थ्यदायी झरने के पास उन्हें इस प्राचीन मंदिर के अवशेष मिले, जिसमें माता की सदियों पुरानी चमत्कारी मूर्ति विराजमान थी। किन्तु खुदायी के दौरान मूर्ति के हाथ खंड़ित हो गये थे। अपने शास्त्रों के अनुसार खंडित मूर्ति की पूजा-अर्चना वर्जित है। इसलिए बद्रीभगत जी ने उस मूर्ति को गुफा में ही रहने दिया और उसके ठीक ऊपर एक नये मंदिर का निर्माण करवाया। उन्हें विष्वास था कि पुरानी प्रतिमा की शक्ति नई प्रतिमा में विद्यमान होगी। मूल मूर्ति की पवित्रता को ध्यान में रखते हुए नई प्रतिमा की विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा करवाई गयी। मंदिर के ऊपर ध्वजारोहण करवाया गया ताकि लोगों को दूर से ही मंदिर होने का आभास हो और वह माँ के दर्शन करने आये। इस प्रकार यह मंदिर, झण्डेवाला देवी मंदिर के नाम से प्रसिध्द हो गया। शीघ्र ही लोगों को मंदिर की चमत्कारी शक्ति का आभास होने लगा। इस मंदिर की महिमा व ख्याति सारे देश में ही नही अपितु देश के बाहर भी फैलने लगी है।3

मंदिर का क्रमिक विकास :
बद्रीभगत की चार पीढ़ियों ने निरन्तर इस मंदिर की उत्कृष्ट परम्परा का निर्वाह किया है। और अब पांचवी पीढ़ी भी इस मंदिर के क्रमिक विकास में लगी हुई है। यह बद्रीभगत के भक्ति का ही प्रताप है कि आने वाली उनकी पीढ़ियों ने भी इसको जारी रखा। क्रमश: बद्रीभगत-भगतराम जी दास-भगत श्यामसुन्दर जी-प्रेम कपूर जी व और अब श्री नवीन कपूर जी मंदिर के आधार से लेकर वर्तमान तक के वाहक रहे हैं। जैसा कि वर्णित है माता की मूर्ति खुदायी के दौरान खण्डित हो जाने पर उसी स्वरुप में नई मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा की गयी। भगत श्यामसुन्दर जी के समय में मां की मूर्ति में कुछ त्रुटि होने के कारण पुन: भगत श्यामसुन्दर जी व उनकी धर्मपत्नी धनदेवी नें नई मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की तथा मंदिर को और नवीन रुप प्रदान किया तबसे माता की वही मूर्ति वर्तमान में भी पूजनीय रुप में विद्यमान है। मंदिर का विकास आज भी निरन्तर जारी है।4 यह इन पीढ़ियों व लोगों की भक्ति का ही प्रमाण है कि मां की मौलिक मूर्ति के स्थान पर उनकी रुपित मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा की गयी मां की पूर्ण शक्ति इन मूर्तियों में विद्यमान रही। और यह मां का ही प्रताप है कि आज लाखों की संख्या में भक्त इस मंदिर में अपनी मनोकामना लेकर आते हैं और मां के दर्शन मात्र से ही उनके चित्त को शान्ति मिल जाती है।

मंदिर का स्वरुप :
झण्डेवाला देवी मंदिर अष्टकोणीय मंदिर है। इसका शीर्ष कमल के फलकों के आकार का बना है। सबसे नीचे गुफा में माता की प्राचीन मूर्ति है। तथा ठीक इसके पीछे एक शिवलिंग है जो मूर्ति के साथ ही खुदायी में प्राप्त हुई थी, चूंकि माता की मूर्ति खुदायी के समय खण्डित हो गयी थी अत: इसे उसी प्रकार छोड़ दिया गया जिससे कि इसकी और क्षति न हो। मूर्ति के नीचे का कुछ भाग आज भी उसी अवस्था में है। ठीक इसी प्रकार शिवलिंग को भी कोई क्षति न हो इसी कारण जितना भाग ऊपर था उतना छोड़कर बाकी नीचे के भाग को आधार प्रदान करते हुए उसे संरक्षित किया गया। गुफा में शिवलिंग के दक्षिण सुन्दर नक्षत्रों का चित्रण है। इसके बारे में जानकारी करने पर पता चला कि प्रारम्भ में यहां एक नक्षत्रशाला भी थी। जहां वर्ष में एक बार ज्योतिषियों का सम्मेलन भी होता था। मंदिर के ऊपरी तल पर ठीक प्राचीन मूर्ति के सीध में मां झण्डेवाली की मूर्ति प्रतिष्ठापित है जो अत्यन्त ही सुन्दर है जिसका वर्णन, देखकर स्वयं की अनुभूति से ही प्राप्त किया जा सकता है। दक्षिण दिशा में शीतला माता, संतोषी माता, वैष्णो माता, गणेश जी, लक्ष्मी जी तथा हनुमान जी आदि की मूर्तियां स्थापित हैं, ठीक इनके पीछे एक बड़ा हॉल है जहाँ निरन्तर सांस्कृतिक कार्यक्रम, माता की चौकी आदि का आयोजन होता रहता है। मंदिर प्रांगण में उत्तर-पूर्व दिशा में एक मनोरम उद्यान है। तथा उत्तर की ओर मण्डपों से होता हुआ विशाल द्वार है, जो सुरक्षा कारणों से (नवरात्रि छोड़कर) बन्द रहता है। वैसे तो मंदिर में प्रवेश के 6 द्वार हैं किन्तु मुख्य रुप से पूर्व का द्वार ही मंदिर दर्शन के लिए खुलता है। तथा दक्षिण (6 नं0)का द्वार जो सीधे मंदिर के कार्यक्रम स्थल को जाता है, वह विभिन्न आयोजनों के निमित्त खोला जाता है। नवरात्रों में मंदिर के सभी द्वार व्यवस्था की दृष्टि से खोल दिये जाते हैं। मंदिर के शीर्ष पर कमलदल से होते हुए प्राचीर पर भगवा ध्वज (मंदिर का पुरातन प्रतीक झण्डा) लहरता है जो माता के दर्शन का दूर से ही आभास कराता है।

प्रमुख त्यौहार व सांस्कृतिक कार्यक्रम :
सामान्यत: सभी शक्तिपीठों व सिध्दपीठों में नवरात्रि के समय मंदिरों में विशेष भीड़ इकट्ठा होती है तथा मां के दर्शनों के लिए भक्तों का आगमन वृहत् रूप में होता है। किन्तु मां झण्डेवाली की यह महिमा ही है कि यहां वर्ष पर्यन्त उत्सव सा माहौल होता है तथा प्रतिदिन भक्तों का तांता लगा रहता है। नवरात्र के समय में मां के दर्शन के लिए लाखों की संख्या में भक्त प्रतिदिन आते हैं तथा मंदिर की तरफ से उन श्रध्दालुओं के दर्शन की पूरी व्यवस्था रहती है तथा उनको किसी प्रकार की असुविधा न हो इसका पूरा ध्यान रखा जाता है। नवरात्रि में यहां मेला लगता है तथा साथ ही साथ बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसाइटी एक विशाल भण्डारे का आयोजन भी करती है जिसे प्रत्येक भक्त मां के प्रसाद के रूप में ग्रहण कर अपने को धन्य समझता है। सर्वविदित है कि नवरात्रि में देवी जगदम्बा के नौ विभिन्न रुपों की पूजा होती है।

झण्डेवाला मंदिर में नवरात्रों में माँ की पूजा का निराला प्रकार है :
•1 से 3 दिनों में : नवरात्रि के प्रथम दिन पूजागृह में मिट्टी की एक छोटी सी चौकी बनाई जाती है और जौ रोपित किया जाता है। जो 10वें दिन 3-5 इंच तक बढ़ जाता है तथा पूजा के उपरान्त इन बीजों को भक्तों को मां के प्रसाद के रुप में दिया जाता है। इन तीन दिनों में मां के तीन रुपों की पूजा होती है : प्रथम दिन कुमारी, द्वितीय दिन पार्वती और तृतीय दिन काली जी की, ये नारी के तीनों बाल, यौवन, व सम्पूर्ण विकसित रुपों की पूजा होती है।

•4 से 6 दिनों में : चौथे दिन माँ लक्ष्मी की पूजा होती है, पांचवे दिन ललिता पंचमी का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन दीपक जलाकर, पाठय व लेखन सामग्रियों की पूजा कर शिक्षा व कला की देवी सरस्वती की पूजा करते हैं। और छठे दिन मां कात्यायिनी की पूजा होती है।

•7-8 दिनों में :इन दोनों दिनों में सरस्वती की आराधना के साथ-साथ 8वें दिन महागौरी की पूजा होती है।

•महानवमी : इस दिन कन्या पूजन होता है, जिसमें नौ कुँवारी कन्याओं का देवी के विभिन्न नौ रुप मानकर उनका पूजन किया जाता है। यह पूजन लगभग भारतवर्ष में सभी स्थानों पर मनाया जाता है।5

नवरात्रों के अलावा भी मंदिर में प्रतिदिन विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम व माँ की चौकी का आयोजन भक्तों द्वारा होता है। जन्माष्टमी का एक विशेष कार्यक्रम मंदिर में मनाया जाता है।

मंदिर से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण बातें :
वर्ष 1944 में बद्रीभगत के पौत्र श्री श्याम सुन्दर जी द्वारा बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसाइटी स्थापित की गयी। जो आज भी मंदिर की सारी व्यवस्था व अन्य सभी कार्य इसी बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसाइटी द्वारा ही किये जाते हैं। यह मां का ही आशीर्वाद है कि उनके भक्तों द्वारा अपर्ण किया हुआ धन का एक बड़ा भाग समाज की उन्नति के लिए बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसाइटी द्वारा खर्च की जाती है। ऐसी ही कुछ रोचक बातें मंदिर के सम्बन्ध में अग्रवत हैं:

•मंदिर के स्थापना के साथ ही संस्कृत के प्रसार के लिए संस्कृत पाठशाला की नींव भी रखी गयी जो आज वर्तमान में मंडोली में ‘बद्रीभगत संस्कृत वेद विद्यालय’ के रुप में विद्यमान है। जिसका पूरा खर्च बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसाइटी वहन करती है।

•बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसाइटी द्वारा आयुर्वेद, होमियोपैथिक और पाष्चात्य चिकित्सा प्रणाली के नि:शुल्क औषधालय स्थापित किये गये हैं।

•प्राकृतिक आपदाओं में जिसमें हजारों व्यक्ति प्रभावित होते हैं, बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसाइटी उनके पुनर्वास के लिए यथासम्भव व्यवस्था करती है।

•अन्य शिक्षण कार्यों तथा भारतीय संस्कृति के लिए भी बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसाइटी हर सम्भव प्रयत्न करती है।6

•श्री सुरेन्द्र कपूर जी (श्री प्रेम कपूर जी के अनुज) ने बताया कि यहां एक कुआं था जिसका पानी इतना मीठा पवित्र माना जाता था कि 1940 के बाद तक भी आस-पास के लोग, यहाँ तक कि चांदनी चौक से भी आकर लोग कलश में पानी भर कर ले जाते थे।

•उनके अनुसार पुराने समय में विशेष आयोजनों पर पहनने वाले मंदिर के चौकीदार का चपड़ास आज भी सुरक्षित अवस्था में संरक्षित है।7

झण्डेवाला देवी मंदिर वर्तमान में दिल्ली ही नहीं बल्कि देश का ऐसा सिध्दपीठ माँ का मंदिर है जहाँ हजारों की संख्या में लोग प्रतिदिन दर्शन करने आते हैं। भक्तों की संख्या नवरात्रों व विशेष त्यौहारों पर लाखों की संख्या में पहुँच जाती है। नवरात्रि में लगभग 10 लाख लोग माता के दर्शन करनें के लिए दूर-दूर से आते हैं।

पुरातात्तिवक दृष्टि से देखा जाय तो अभी तक खुदायी में प्राप्त माता की मूर्ति व शिवलिंग की विवेचना किसी ने नहीं की है तथा यह शोध का विषय है कि 19वीं शताब्दी में बद्रीभगत द्वारा उद्धाटित यह मंदिर कितना पुराना होगा। यह सर्वविदित है कि दिल्ली का इतिहास प्रामाणिक रूप से महाभारत काल से सम्बन्धित है, और यह मूर्ति अरावली की पहाड़ी पर स्थित है अत: खुदायी से प्राप्त इस मूर्ति की प्राचीनता का पता लगाया जाय तो सम्भवत: इसका काल महाभारत काल तक जा सकता है। किन्तु यह शोध का विषय है अत: निश्चित तौर पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी। किन्तु इतना अवश्य है कि यह माता का सिध्द मंदिर लाखों करोड़ो भक्तों के आस्था का केन्द्र है, और यहाँ जितनी संख्या में बड़े-बूढ़े दर्शन करने आते हैं यह प्रसन्नता की बात है कि दिल्ली जैसे भाग-दौड़ भरे जीवन में नौजवान पीढ़ी भी माँ के दर्शनों के लिए उतनी ही संख्या में और भक्तिभाव से आती है। और झण्डेवाली देवी अपने भक्तों को निराश नहीं करती है।

-रत्नेश कुमार त्रिपाठी
(शोधछात्र)
अ. भारतीय इतिहास संकलन योजना
संदर्भ सूची

1कल्याण, पृ0. 513, फरवरी 09, गीताप्रेस, गोरखपुर
2मंदिर विवरणिका, बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसायटी, नई दिल्ली-55
3वही।
4मंदिर में शिलापट्ट द्वारा।
5इन्टरनेट पर मंदिर की वेव साइट www.jhandewalimata.com/templedetails.htm
6मंदिर विवरणिका, बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसायिटी, नई दिल्ली-55
7साक्षात्कार से :- श्री नवीन कपूर जी व उनके चाचा श्री सुरेन्द्र कपूर जी।

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5 Comments on "माँ झण्डेवाली देवी मंदिर (सिध्द पीठ)- शोध आलेख"

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PN Subramanian
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इस जानकारी के लिए आभार.

रत्‍नेश त्रिपाठी
Guest

सादर धन्यवाद

sameer.lal
Member

अच्छी जानकारी..आभार.

रत्‍नेश त्रिपाठी
Guest

सादर धन्यवाद

समीर कुमार उपाध्याय
Guest
समीर कुमार उपाध्याय

आपने बहुत अच्छा लिखा हैं सच में माता जी की बहुत कृपा हैं

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