लेखक परिचय

रामस्‍वरूप रावतसरे

रामस्‍वरूप रावतसरे

एक जागरूक पत्रकार और कर्मठ समाजसेवी रामस्वरूप रावतसरे गत 20 वर्षों से लगातार लेखन के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। अखिल भारतीय साहित्य परिषद राजस्थान के संगठन मंत्री रामस्वरूप जी ने अनेक पत्र-पत्रिकाओं मे अपनी लेखन कला की छटा बिखेरी है। संप्रति- सहायक सम्पादक (भारतीय पक्ष मासिक पत्रिका)

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रामस्वरूप रावतसरे

एक रात्रि को आकाश में घनघोर बादल छाये हुए थे, रूक रूक कर बिजली कडक रही थी । एक वृद्ध खिडकी के पास खडे हो कर अपने विगत जीवन के बारे में विचार रहे थे कि बाल्यावस्था ,स्कूल मित्रों के साथ खेलना कूदना ,वह भोलापन ,बचपन की अल्हडताएं रह रह कर याद आती रही । उसके बाद युवावस्था का चिंतन आया सुडोल शरीर किसी भी बात की परवाह नही करने वाला मन दिमाग । बस एक ही लक्ष्य भेाग उपभोग बस । सभी परिवार जन याद आये । भार्इ बहिन, माता पिता, पतिन , बच्चे । प्रौढावस्था याद आने लगी । शरीर का तेज जाता रहा । परिजनों एवं स्वयं के लिये किये जाने वाले परिश्रम के आगे उमंगे खत्म होने लगी, उसके स्थान पर मन दिमाग में चिन्ता और शरीर में कमजोरी आने लगी ।

इन सब के निदान के लिये व्रत ,उपवास ,तीर्थयात्रा ,कथा श्रवण खुब किया पर ना ही तो मन दिमाग की चिन्ता हटी और ना ही यौवन वापिस आया ं। मन जो अशान्त रहता था वह और अशान्त रहने लगा । वृद्ध चिल्ला उठा जब उसे यह ज्ञान हुआ कि उसने अपना कीमती समय योंही गवां दिया । वह फूट फूट कर रोने लगा । अचानक उसे एक प्रकाश पुंज दिखार्इ दिया। वृद्ध ने ज्योही उसकी ओर देखा आवाज सुनार्इ दी वत्स शोक मत करो । जो बीत गया ,वह कभी आ नही सकता । अभी आगे के कर्इ क्षण बाकी है । वे भी कम नही है उनका भरपूर उपयोग करों । अपने जीवन की दशा बदल डालो । कुछ क्षण के बाद फिर आवाज आर्इ यह संसार सचिचदानन्द परमात्मा की ही प्रतिमूर्ति है, धर्म मनिदरों में नहीं है , उसे अपनी आत्मा में तलाशो । सारी विष्व -वसुधा, जीवों को ईश्वर का घटक मानकर उनकी पूजा करों ।

वृद्ध धन्य हो गया उसने अपने अनितम क्षणों को आत्म दर्शन व लोक सेवा में लगा कर अपने जीवन को सफल बना लिया । यह र्इष्वरीय संदेश सभी के लिये है । इस वृद्ध की तरह हमारे साथ भी होता हैं। समय का सदुपयोग कैसे हो इस पर विचार नही कर हम उन बातों को या जो बीत गया उसको किस प्रकार वापिस लाया जाय । इस पर अपना समय व श्रम लगाते रहते है । बदले में हमें वह कुछ तो नही मिलता उल्टा तनाव व परेशानी भोगनी पडती है।

हमने अपना बचपन ,जवानी व प्रोढवस्था को भेागा और जिस रूप में इन्हें भोगा है उसी का परिणाम हमारे सामने है । यदि हम अपने किये पर सन्तुष्ठ है तो भी और यदि हम सन्तुष्ठ नही है तो भी जो बीत गया उस पर विचार कर समय को और बरबाद करना किसी भी रूप में सही नहीं हैं। हम किस प्रकार भगवान के भजन और मानव मात्र की सेवा में अपने को लगा सकते है। इस पर विचार कर तत्काल शुरू हो जाना चाहिये । क्योंकि जब तक मनुष्य अपने बारे में ही सोचता है तब तक वह कोर्इ भी उपाय क्यों ना करले मानसिक शान्ती नही आ सकती । मानसिक शान्ती के बिना पास में कितना ही धन हो सुख सुविधा हो बुढापे में कुछ भी अच्छा नही लगता ।

मानसिक शान्ती है, तो पास में कुछ भी नही होने पर भी, फकीर की तरह राजाओं का भी राजा हो जाता है । मानसिक शान्ती लेने के भाव को कम कर, देने के भाव को बढाने से ही आ सकती है। हमने वर्षो तक समाज व अपनों से लिया है । अब देने का समय है । क्योंकि साथ कुछ भी नही जायेगा , इसलिये दिल खोल कर जो भी हम इस संसार को दे सकते हे दें। संसार ही सचिचदानन्द परमात्मा की ही प्रतिमूर्ति है और बदले में वह प्राप्त करे जो हम यहां से जाते समय अपने साथ ले जा सकते है । इसी में हमारी भलार्इ है

 

 

 

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